JAI सियाराम✨🙏

sn vyas
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1 days ago
#🙏🙏जय सियाराम 🙏🙏 ।। जय श्री राम।। प्रथम भक्ति संतन कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।। भगवान की यह दूसरी भक्ति इसमें भी बड़ी सुंदर बात है भगवान की कथा में रति तो हो पर कामना न हो।रति का पति काम है, और जहां रति होगी वहां काम तो होगा।कामना के कारण ही रति होती है पर कहा गया है की कथा में रती तो हो पर काम नहीं होना चाहिए। जिनके श्रवण समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।। भरहि निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हियं तुम्ह कहुं गृह रुरे।। भगवान की कथा सुनने में जिनके कान समुद्र के समान हो जाए, जिस प्रकार समुद्र में नदियां समाती जाती है समाती जाती है, पर समुद्र कभी भरता नहीं है। इसी प्रकार भगवान की कथा सुनते जाएं सुनते जाएं ऐसी मन में रती होना चाहिए। कि भगवान की कथा सुनते सुनते कभी मन तृप्त न हो इसी को भगवान की कथा में रति होना कहा गया है। भगवानकी कथा में रति किस प्रकार होना चाहिए महात्मा जी एक भक्त की कथा सुनाते हैं।हजारीबाग जिलेके एक गांव में ब्राह्मण वंशमें एक बालक का जन्म हुआ। नाम रखा गया राम टहल पांडे, घर में बड़ी खुशियां मनाई गई जन्म के कुछ समय पश्चात माता पिता दोनों चल बसे। भाई भोजाई ने उस बालक का लालन पालन किया। चेचक निकली चेचक में उसके दोनों नेत्र चले गए ।दुर्भाग्य ने फिर भी पीछा नहीं छोड़ा कुछ दिन बाद भाई भी चला गया अब विधवा भाभी और रामटहल पांडे दोनों ही रह गए। घर में गरीबी आई तो रिश्तेदारों ने भी मुंह मोड़ लिया।परिस्थिति अनुकूल थी तब तक तो लोग उन्हें पांडे जी कहते थे पर परिस्थिति प्रतिकूल होते ही लोग उन्हें टहलवा कहने लगे। रामटहल पांडे पर भगवान की ऐसी कृपा थी कि भगवान की कथा सुनने का उन्हें व्यसन हो गया भगवान की कथा के प्रति उन्हें रति हो गई।श्रीमद् भागवत की कथा हो रही थी व्यास जी कथा करते थे ।पांडे जी भी कथा में जाते बैठकर भगवान की कथा सुनते और प्रभु प्रेम में आंसू बहाते थे । कथा श्रवण करने के पश्चात एक दिन पांडे जी ने व्यास जी से कहा मुझे आपके साथ रख लो मुझसे जितनी बनेगी उतनी आपकी सेवा करता रहूंगा। अंधा आदमी हूं,पर फिर भी मैं आपके कपड़े धो दिया करूंगा और छोटा मोटा काम कर दिया करुंगा।मुझे आपकी कथा सुनने को मिलती रहेगी। व्यासजी ने कहा पांडेजी आप तो भगवान की कथा सुनते रहो सेवा करने वाले तो और भी बहुत से लोग हैं, वह सेवा करेंगे।गांवसे चार मील दूर कथा हो रही थी पांडे जी सुबह ही पहुंच जाते थे। एक दिन बड़ी भयंकर गर्जना हुई और पानी बरसने लगा पांडे जी की भाभी ने सोचा आज शायद देवर कथा में नहीं जाएंगे, इसलिए भोजन नहीं बनाया। रामटहल पांडे तैयार होकर आ गए भाभी से पूंछा भाभी भोजन तैयार हो गया?।भाभी ने कहा आज भोजन नहीं बनाया मैंने सोचा आप आज जाओगे नहीं पानी गिर रहा है। पांडे जी रूठ कर चल दिए लाठी हाथ में चार मील दूर गांव था रास्ता भटक गए एक कुंए में गिर गए।अब पांडे जी मन ही मन भगवान से कहते हैं। भगवान मैंने आज तक तुमसे कभी शिकायत नहीं की। तुमने मेरे माता-पिता छीन लिए भाई छीन लिया गरीबी दे दी मुझे कोई शिकायत नहीं है।पर आज आपसे शिकायत है आज आपने मुझसे आपकी कथा भी छीन ली इस तरह कह कर रोने लगे। अपने भक्त के भाव को देखकर भगवान एक साधारण व्यक्ति के रूप में प्रकट हो गए और कहा ।अरे पांडे जी आप कुंए में कैसे गिर गए?। मेरा हाथ पकड़ो मैं तुम्हें बाहर निकाल दूंगा। राम टहल पांडे ने कहा मैं अंधा आदमी हूं मुझे आपका हाथ दिखाई नहीं दे रहा है, पर आपको तो मेरा हाथ दिखाई दे रहा है आप ही मेरा हाथ पकड़ लो पर तुम्हें रस्सी की जरूरत तो पड़ेगी यह कुआ है। भगवान ने कहा कुआं नहीं यह तो एक गड्ढा है लाओ आपका हाथ मुझे दो।भगवान ने हाथ पकड़ कर पांडे जी को बाहर निकाल लिया और उनके हाथ में पुष्प देते हुए कहा आप मेरी और से यह पुष्प कथा में चढ़ा देना। पांडे जी ने कहा भाई आप कथा में नहीं चलोगे?। भगवान ने कहा अभी कथा प्रारंभ नहीं हुई है, व्यास जी का स्वास्थ्य गड़बड़ हो गया है इसलिए कथा देर से प्रारंभ होगी। पांडे जी ने कहा सायद हमारे लिए ही कथा लेट हुई है। भगवान ने कहा मैं श्रोताओं को बुलाने जा रहा हूं। राम टहल पांडे के पहुंचने से पहले ही उनकी भाभी भोजन लेकर कथा पांडाल में पहुंच गई भोजन रख दिया। व्यास जी व्यास पीठ पर आकर बैठे तब तक पांडे जी भी वहां पहुंच गए। व्यास जी ने कहा भैया पहले भोजन कर लो आपकी भाभी भोजन रख कर गई है। मेरे लिए भी एक पान लेकर आई थी मैंने पान खाया मैं अब बिल्कुल स्वस्थ हो गया हूं।पांडे जी ने बताया कि मैं गड्ढे में गिर गया था किसी दयालु व्यक्ति ने मुझे बाहर निकाला है।पांडे जी ने भी भोजन किया। कथा समाप्ति के बाद राम टहल पांडे बर्तन लेकर भाभी के पास गए और कहा भाभी मुझे क्षमा कर दो मैं कथा में लेट हो रहा था इसलिए थोड़ा क्रौधित हो गया था तुम नहीं जाती तो मुझे बड़ी कठिनाई होती मैं भूखा रहता। भाभी बोली मैं तो कहीं गई ही नहीं। दूसरे दिन पांडे जी ने आकर व्यास जी से कहा कि कल कथा में हमारी भाभी तो आई ही नहीं थी फिर हमारे लिए भोजन लेकर कौन आया था?। व्यास जी की आंखें सजल हो गई। व्यास जी ने कहा वह परमात्मा ही हो सकता है जिन्होंने मुझे पान खिलाकर स्वास्थ्य कर दिया और भाभी का रूप बनाकर तुम्हें भोजन करा गया। ऐसे दयालु प्रभु अपने भक्तों के कारण किसी भी रूप में आकर उनकी सहायता कर देते हैं।शबरी माता से भगवान कहते हैं जिन्हें मेरी कथा में रति हो ऐसे भक्तों के मैं वश में रहता है। संत कहते हैं भगवान की कथा यदि सुनने को न भी मिले यदि मन में यह चिंतन बना रहे हैं कि भगवान की ऐसी कृपा हो जाए कि मुझे भगवान को कथा श्रवण करने का अवसर मिल जाए तो भगवान की कथा के प्रति चिंतन भी कल्याण कर देता है। भगवान शबरी माता से कहते हैं यह मेरी दूसरी भक्ति है।(दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ) आगे तीसरी भक्ति का वर्णन है (गुरु पद पंकज सेवा।) इसे हम अगले प्रसंग में पढ़ेंगे।।जय श्री राम।।
sn vyas
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11 days ago
#🙏🙏जय सियाराम 🙏🙏 🙏*जय सियाराम !* 🙏 🧘 राग-द्वेष से *बड़ी हानि* होती है। जब राग होता है, तब द्वेष पैदा हो जाता है। *नाशवान् पदार्थों में राग होने से अविनाशी (भगवान्) के साथ द्वेष हो जाता है,★* पर साधक को इसका पता नहीं लगता। जब भोग अच्छे लगते हैं, तब भगवान् अच्छे नहीं लगते। *अतः थोड़ा भी राग उत्पन्न हो तो 'हे नाथ! 'हे मेरे नाथ!' पुकारो।* अवगुणों का नाश करने के लिये और सद्‌गुणों को लाने के लिये दोनों के लिये भगवान्‌ को पुकारो। उनकी कृपा से ही अवगुणों का नाश और सद्गुणों की रक्षा होती है। *चलते-फिरते, उठते-बैठते हरदम 'हे नाथ! 'हे मेरे नाथ!' पुकारते रहो तो भगवान् सब तरह से रक्षा करेंगे।* जब अपने उद्योग से राग-द्वेष दूर न हों, तब दुःखी होकर भगवान् को पुकारो। *भगवान् की कृपा होने पर बड़ी सरलता से सब काम हो जायगा।*🧘 🛐मैं राग-द्वेष को जीत सकता हैं- ऐसा अभिमान जिसके भी होता है. वह भगवान् का सहारा नहीं ले सकता। *जब तक मनुष्य अपना बल समझता है. तब तक वह परास्त होता रहता है।★*🛐 गोस्वामीजी महाराज लिखते हैं- *हौं हारयौ करि जतन बिबिध* *बिधि अतिसै प्रबल अजै।* *तुलसिदास बस होड़ तबहिं* *जब प्रेरक प्रभु बरजै ॥* (विनयपत्रिका ८९। ४) ‼️अतः पहले अपना बल लगा कर इन दोषों को दूर करो। *जब दूर नहीं हों, तब निर्बल होकर भगवान्‌ को 'हे नाथ! 'हे मेरे नाथ!' पुकारो।* इसके समान दूसरा कोई उपाय नहीं है। पर अपने में बल का अभिमान नहीं होना चाहिये। *अपने बल का अभिमान होगा तो सच्ची प्रार्थना कर सकोगे नहीं, देरी लगेगी।* अपने में बल, बुद्धि, विद्या, साधन, वर्ण, आश्रम आदि का अभिमान होगा *तो यह उपाय काम नहीं देगा।* ‼️ 🤹भगवान्‌ को पुकारने में हार स्वीकार मत करो, भले ही वर्ष लग जायें। अन्त में आपकी विजय जरूर होगी, इसमें सन्देह नहीं है। *अपना समझ कर भगवान‌् को पुकारो।★* नकली प्रार्थना को भी भगवान् असली मानकर स्वीकार कर लेते हैं। *अपने बल से निराश और भगवान्‌ के बल पर विश्वास ये दो बातें होंगी तो जरूर सफलता मिलेगी।* 🤹