गायत्री

subhash jha
821 views
17 days ago
#गायत्री व सावित्री एक सिक्के का दो पहलू###🕉️🌺
sn vyas
805 views
1 months ago
#गायत्री गायत्री महाविज्ञान 〰️〰️🔸〰️〰️ गायत्री का शाप विमोचन और उत्कीलन का रहस्य 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ सर्वसुलभ समर्थ साधना गायत्री मन्त्र की महिमा गाते हुए शास्त्र और ऋषि- महर्षि थकते नहीं। इसकी प्रशंसा तथा महत्ता के सम्बन्ध में जितना कहा गया है, उतना शायद ही और किसी की प्रशंसा में कहा गया हो। प्राचीनकाल में बड़े- बड़े तपस्वियों ने प्रधान रूप से गायत्री की ही तपश्चर्याएँ करके अभीष्ट सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। शाप और वरदान के लिए वे विविध विधियों से गायत्री का ही प्रयोग करते थे। प्राचनीकाल में गायत्री गुरुमन्त्र था। आज भी गायत्री मन्त्र प्रसिद्ध है। अधिकांश मनुष्य उसे जानते हैं। अनेक मनुष्य किसी न किसी प्रकार उसको दुहराते या जपते रहते हैं अथवा किसी विशेष अवसर पर स्मरण कर लेते हैं। इतने पर भी देखा जाता है कि उससे कोई विशेष लाभ नहीं होता। गायत्री जानने वालों में कोई विशेष स्तर दिखाई नहीं देता। इस आधार पर यह आशंका होने लगती है कि कहीं गायत्री की प्रशंसा और महिमा में वर्णन करने वालों ने अत्युक्ति तो नहीं की? कई मनुष्य आरम्भ में उत्साह दिखाकर थोड़े ही दिनों में उसे छोड़ बैठते हैं। वे देखते हैं कि इतने दिन हमने गायत्री की उपासना की, पर लाभ कुछ न हुआ, फिर क्यों इसके लिए समय बरबाद किया जाए। कारण यह है कि प्रत्येक कार्य एक नियत विधि- व्यवस्था द्वारा पूरा होता है। चाहे जैसे, चाहे जिस काम को चाहे जिस प्रकार करना आरम्भ कर दिया जाए, तो अभीष्ट परिणाम नहीं मिल सकता। मशीनों द्वारा बड़े- बड़े कार्य होते हैं, पर होते तभी हैं जब वे उचित रीति से चलायी जाएँ। यदि कोई अनाड़ी चलाने वाला, मशीन को यों ही अन्धाधुन्ध चालू कर दे तो लाभ होना तो दूर, उलटे कारखाने के लिए तथा चलाने वाले के लिए संकट उत्पन्न हो सकता है। मोटर तेज दौडऩे वाला वाहन है। उसके द्वारा एक- एक दिन में कई सौ मील की यात्रा सुखपूर्वक की जा सकती है। पर अगर कोई अनाड़ी आदमी ड्राइवर की जगह जा बैठे और चलाने की विधि तथा कल- पुर्जों के उपयोग की जानकारी न होते हुए भी उसे चलाना प्रारम्भ कर दे तो यात्रा तो दूर, उलटे ड्राइवर और मोटर यात्रा करने वालों के लिए अनिष्ट खड़ा हो जाएगा या यात्रा निष्फल होगी। ऐसी दशा में मोटर को कोसना, उसकी शक्ति पर अविश्वास कर बैठना उचित नहीं कहा जा सकता। अनाड़ी साधकों द्वारा की गयी उपासना भी यदि निष्फल हो, तो आश्चर्य की बात नहीं है। जो वस्तु जितनी अधिक महत्त्वपूर्ण होती है, उसकी प्राप्ति उतनी ही कठिन भी होती है। सीप- घोंघे आसानी से मिल सकते हैं, उन्हें चाहे कोई बिन सकता है; पर जिन्हें मोती प्राप्त करने हैं, उन्हें समुद्र तल तक पहुँचना पड़ेगा और इस खतरे के काम को किसी से सीखना पड़ेगा। कोई अजनबी आदमी गोताखोरी को बच्चों का खेल समझकर या यों ही समुद्र तल में उतरने के लिए डुबकी लगाये, तो उसे अपनी नासमझी के कारण असफलता पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए। यों गायत्री में अन्य समस्त मन्त्रों की अपेक्षा एक खास विशेषता यह है कि नियत विधि से साधना न करने पर भी साधक की कुछ हानि नहीं होती। परिश्रम भी निष्फल नहीं जाता, कुछ न कुछ लाभ ही रहता है, पर उतना लाभ नहीं होता, जितना कि विधिपूर्वक साधना के द्वारा होना चाहिए। गायत्री की तान्त्रिक उपासना में तो अविधि साधना से हानि भी होती है, पर साधारण साधना में वैसा कोई खतरा नहीं है, तो भी परिश्रम का पूरा प्रतिफल न मिलना भी तो एक प्रकार की हानि ही है। इसलिए बुद्धिमान मनुष्य उतावली, अहमन्यता, उपेक्षा के शिकार नहीं होते और साधना मार्ग पर वैसी ही समझदारी से चलते हैं, जैसे हाथी नदी पार करते समय थाह ले- लेकर धीरे- धीरे आगे कदम बढ़ाता है। प्रतिबन्ध क्या? क्यों?👉 कुछ औषधियाँ नियत मात्रा में लेकर नियत विधिपूर्वक तैयार करके रसायन बनायी जाएँ और नियत मात्रा में नियत अनुपात के साथ रोगी को सेवन करायी जाएँ, तो आश्चयर्जनक लाभ होता है; परन्तु उन्हीं औषधियों को चाहे जिस तरह, चाहे जितनी मात्रा में लेकर चाहे जैसा बना डाला जाए और चाहे जिस रोगी को, चाहे जितनी मात्रा में, चाहे जिस अनुपात में सेवन करा दिया जाए, तो निश्चय ही परिणाम अच्छा न होगा। वे औषधियाँ जो विधिपूर्वक प्रयुक्त होने पर अमृतोपम लाभ दिखाती थीं, अविधिपूर्वक प्रयुक्त होने पर निरर्थक सिद्ध होती हैं। ऐसी दशा में उन औषधियों को दोष देना न्याय संगत नहीं कहा जा सकता। गायत्री साधना भी यदि अविधिपूर्वक की गयी है, तो वैसा लाभ नहीं दिखा सकती जैसा कि विधिपूर्वक साधना से होना चाहिए। पात्र- कुपात्र कोई भी गायत्री शक्ति का मनमाने प्रयोग न कर सके, इसलिए कलियुग से पूर्व ही गायत्री को कीलित कर दिया गया है। कीलित करने का अर्थ है- उसके प्रभाव को रोक देना। जैसे किसी गतिशील वस्तु को कहीं कील गाढक़र जड़ दिया जाय तो उसकी गति रुक जाती है, इसी तरह मन्त्रों को सूक्ष्म शक्ति से कीलित करने की व्यवस्था रही है। जो उसका उत्कीलन जानता है, वही लाभ उठा सकता है। बन्दूक का लाइसेन्स सरकार उन्हीं को देती है जो उसके पात्र हैं। परमाणु बम का रहस्य थोड़े- से लोगों तक सीमित रखा गया है, ताकि हर कोई उसका दुरुपयोग न कर डाले। कीमती खजाने की तिजोरियों में बढिय़ा चोर ताले लगे होते हैं ताकि अनधिकारी लोग उसे खोल न सकें। इसी आधार पर गायत्री को कीलित किया गया है कि हर कोई उससे अनुपयुक्त प्रयोजन सिद्ध न कर सके। पुराणों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि एक बार गायत्री को वसिष्ठ और विश्वामित्र जी ने शाप दिया कि ‘उसकी साधना निष्फल होगी’। इतनी बड़ी शक्ति के निष्फल होने से हाहाकार मच गया। तब देवताओं ने प्रार्थना की कि इन शापों का विमोचन होना चाहिए। अन्त में ऐसा मार्ग निकाला गया कि जो शाप- विमोचन की विधि पूरी करके गायत्री साधना करेगा, उसका प्रयत्न सफल होगा और शेष लोगों का श्रम निरर्थक जाएगा। इस पौराणिक उपाख्यान में एक भारी रहस्य छिपा हुआ है, जिसे न जानने वाले केवल ‘शापमुक्ताभव’ मन्त्रों को दुहराकर यह मान लेते हैं कि हमारी साधना शापमुक्त हो गयी। (परम्परागत साधना में गायत्री मन्त्र- साधना करने वालों को उत्कीलन करने की सलाह दी गई है। उसमें साधक निर्धारित मन्त्र पढक़र ‘शापमुक्ताभव’ कहता है।) वसिष्ठ का अर्थ है👉 ‘विशेष रूप से श्रेष्ठ गायत्री साधना में जिन्होंने विशेष रूप से श्रम किया है, जिसने सवा करोड़ जप किया होता है, उसे वसिष्ठ पदवी दी जाती है। रधुवंशियों के कुल गुरु सदा ऐसे ही वसिष्ठ पदवीधारी होते थे। रघु, अज, दिलीप, दशरथ, राम, लव- कुश आदि इन छ: पीढिय़ों के गुरु एक वसिष्ठ नहीं बल्कि अलग- अलग थे, पर उपासना के आधार पर इन सभी ने वसिष्ठ पदवी को पाया था। वसिष्ठ का शाप मोचन करने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकार के वसिष्ठ से गायत्री साधना की शिक्षा लेनी चाहिए, उसे अपना पथ- प्रदर्शक नियुक्त करना चाहिए। कारण है कि अनुभवी व्यक्ति ही यह जान सकता है कि मार्ग में कहाँ क्या- क्या कठिनाइयाँ आती हैं और उनका निवारण कैसे किया जा सकता है? जब पानी में तैरने की शिक्षा किसी नये व्यक्ति को दी जाती है, तो कोई कुशल तैराक उसके साथ रहता है, ताकि कदाचित् नौसिखिया डूबने लगे तो वह हाथ पकडक़र उसे खींच ले और उसे पार लगा दे तथा तैरते समय जो भूल हो रही हो, उसे समझाता- सुधारता चला जाए। यदि कोई शिक्षक तैराक न हो और तैरना सीखने के लिए बालक मचल रहे हों, तो कोई वृद्ध विनोदी पुरुष उन बालकों को समझाने के लिए ऐसा कह सकता है कि- ‘बच्चो! तालाब में न उतरना, इसमें तैराक गुरु का शाप है। बिना गुरु के शापमुक्त हुए तैरना सीखोगे, तो वह निष्फल होगा।’ इन शब्दों में अहंकार तो है, शाब्दिक अत्युक्ति भी इसे कह सकते हैं, पर तथ्य बिल्कुल सच्चा है। बिना शिक्षक की निगरानी के तैरना सीखने की कोशिश करना एक दुस्साहस ही है। सवा करोड़ गायत्री जप की साधना करने वाले गायत्री उपासक वसिष्ठ की संरक्षकता प्राप्त कर लेना ही वसिष्ठ शाप- मोचन है। इससे साधक निर्भय, निधडक़ अपने मार्ग पर तेजी से बढ़ता चलता है। रास्ते की कठिनाइयों को वह संरक्षक दूर करता चलता है, जिससे नये साधक के मार्ग की बहुत- सी बाधाएँ अपने आप दूर हो जाती हैं और अभीष्ट उद्देश्य तक जल्दी ही पहुँच जाता है। गायत्री को केवल वसिष्ठ का ही शाप नहीं, एक दूसरा शाप भी है, वह है विश्वामित्र का। इस रत्न- कोष पर दुहरे ताले जड़े हुए हैं ताकि अधिकारी लोग ही खोल सकें; ले भागू, जल्दबाज, अश्रद्धालु, हरामखोरों की दाल न गलने पाए। विश्वामित्र का अर्थ है- संसार की भलाई करने वाला, परमार्थी, उदार, सत्पुरुष, कर्त्तव्यनिष्ठ। गायत्री का शिक्षक केवल वसिष्ठ गुण वाला होना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् उसे विश्वामित्र गुण वाला भी होना चाहिए। कठोर साधना और तपश्चर्या द्वारा बुरे स्वभाव के लोग भी सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। रावण वेदपाठी था, उसने बड़ी- बड़ी तपश्चर्याएँ करके आश्चर्यजनक सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। इस प्रकार वह वसिष्ठ पदवीधारी तो कहा जा सकता है, पर विश्वामित्र नहीं; क्योंकि संसार की भलाई के, धर्माचार्य एवं परमार्थ के गुण उनमें नहीं थे। स्वार्थी, लालची तथा संकीर्ण मनोवृत्ति के लोग चाहे कितने ही बड़े सिद्ध क्यों न हों, शिक्षण किये जाने योग्य नहीं, यही दुहरा शाप विमोचन है। जिसने वसिष्ठ और विश्वामित्र गुण वाला पर्थ- प्रदर्शक, गायत्री- गुरु प्राप्त कर लिया, उसने दोनों शापों से गायत्री को छुड़ा लिया। उनकी साधना वैसा ही फल उपस्थित करेगी, जैसा कि शास्त्रों में वर्णित है। यह कार्य सरल नहीं है, क्योंकि एक तो ऐसे व्यक्ति मुश्किल से मिलते हैं जो वसिष्ठ और विश्वामित्र के गुणों से सम्पन्न हों। यदि मिलें भी तो हर किसी का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेने को तैयार नहीं होते, क्योंकि उनकी शक्ति और सामर्थ्य सीमित होती है और उससे वे कुछ थोड़े ही लोगों की सेवा कर सकते हैं। यदि पहले से ही उतने लोगों का भार अपने ऊपर लिया हुआ है, तो अधिक की सेवा करना उनके लिए कठिन है। स्कूलों में एक अध्यापक प्राय: ३० की संख्या तक विद्यार्थी पढ़ा सकता है। यदि वह संख्या ६० हो जाय, तो न तो अध्यापक पढ़ा सकेगा, न बालक पढ़ सकेंगे, इसलिए ऐसे सुयोग्य शिक्षक सदा ही नहीं मिल सकते। लोभी, स्वार्थी और ठग गुरुओं की कमी नहीं, जो दो रुपया गुरु दक्षिणा लेने के लोभ से चाहे किसी के गले में कण्ठी बाँध देते हैं। ऐसे लोगों को पथ- प्रदर्शक नियुक्त करना एक प्रवञ्चना और विडम्बना मात्र है। ‘गायत्री दीक्षा’ गुरुमुख होकर ली जाती है, तभी फलदायक होती है। बारूद को जमीन पर चाहे जहाँ फैलाकर उसमें दियासलाई लगाई जाए, तो वह मामूली तरह से जल जायेगी, पर उसे बन्दूक में भरकर विधिपूर्वक प्रयुक्त किया जाए, तो उससे भयंकर शब्द के साथ एक प्राणघातक शक्ति पैदा होगी। छपे हुए कागज में पढक़र अथवा कहीं किसी से भी गायत्री सीख लेना ऐसा ही है, जैसा जमीन पर बिछाकर बारूद को जलाना और गुरुमुख होकर गायत्री दीक्षा लेना ऐसा है, जैसा बन्दूक के माध्यम से बारूद का उपयोग होना। उपयुक्त मार्गदर्शक ‘गुरु- गायत्री’ की विधिपूर्वक साधना करना ही अपने परिश्रम को सफल बनाने का सीधा मार्ग है। इस मार्ग का पहला आधार ऐसे पथ- प्रदर्शक को खोज निकालना है, जो वसिष्ठ एवं विश्वामित्र गुण वाला हो और जिसके संरक्षण में शाप- विमोचन गायत्री साधना हो सके। ऐसे सुयोग्य संरक्षक सबसे पहले यह देखते हैं कि साधक की मनोभूमि, शक्ति, सामर्थ्य, रुचि कैसी है? उसी के अनुसार वे उसके लिए साधना- विधि चुनकर देते हैं। अपने आप विद्यार्थी यह निश्चय नहीं कर सकता कि मुझे किस क्रम से क्या- क्या पढऩा चाहिए? इसे तो अध्यापक ही जानता है कि वह विद्यार्थी किस कक्षा की योग्यता रखता है और इसे क्या पढ़ाया जाना चाहिए। जैसे अलग- अलग प्रकृति के एक रोग के रोगियों को भी औषधि अलग- अलग अनुपान तथा मात्रा का ध्यान रखकर दी जाती है, वैसे ही साधकों की आन्तरिक स्थिति के अनुसार उसके साधना- नियमों में हेर- फेर हो जाता है। इसका निर्णय साधक स्वयं नहीं कर सकता। यह कार्य तो सुयोग्य, अनुभवी और सूक्ष्मदर्शी पथ- प्रदर्शक ही कर सकता है। आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाने के लिए श्रद्धा और विश्वास यह दो प्रधान अवलम्बन हैं। इन दोनों का आरम्भिक अभ्यास गुरु को माध्यम बनाकर किया जाता है। जैसे ईश्वर उपासना का प्रारम्भिक माध्यम किसी मूर्ति, चित्र या छवि को बनाया जाता है, वैसे ही श्रद्धा और विश्वास की उन्नति गुरु नामक व्यक्ति के ऊपर उन्हें दृढ़तापूर्वक जमाने से होती है। प्रेम तो स्त्री, भाई, मित्र आदि पर भी हो सकता है, पर श्रद्धायुक्त प्रेम का पात्र गुरु ही होता है। माता- पिता भी यदि वसिष्ठ- विश्वामित्र गुण वाले हों, तो वे सबसे उत्तम गुरु हो सकते हैं। गुरु परम हितचिन्तक, शिष्य की मनोभूमि से परिचित और उसकी कमजोरियों को समझने वाला होता है, इसलिए उसके दोषों को जानकर उन्हें धीरे- धीरे दूर करने का उपाय करता रहता है; पर उन दोषों के कारण वह न तो शिष्य से घृणा करता है और न विरोध। न ही उसको अपमानित, तिरस्कृत एवं बदनाम होने देता है, वरन् उन दोषों को बाल- चापल्य समझकर धीरे- धीरे उसकी रुचि दूसरी ओर मोडऩे का प्रयत्न करता रहता है, ताकि वे अपने आप छूट जाएँ। योग्य गुरु अपनी साधना द्वारा एकत्र की हुई आत्मशक्ति को धीरे- धीरे शिष्य के अन्तःकरण में वैसे ही प्रवेश कराता है, जैसे माता अपने पचाए हुए भोजन को स्तनों में दूध बनाकर अपने बालक को पिलाती रहती है। माता का दूध पीकर बालक पुष्ट होता है। गुरु का आत्मतेज पीकर शिष्य का आत्मबल बढ़ता है। इस आदान- प्रदान को आध्यात्मिक भाषा मे ‘शक्तिपात’ कहते हैं। ऐसे गुरु का प्राप्त होना पूर्व संचित शुभ संस्कारों का फल अथवा प्रभु की महती कृपा का चिह्न ही समझना चाहिए। कितने ही व्यक्ति सोचते हैं कि हम अमुक समय एक व्यक्ति को गुरु बना चुके, अब हमें दूसरे पथ- प्रदर्शक की नियुक्ति का अधिकार नहीं रहा। उनका यह सोचना वैसा ही है, जैसे कोई विद्यार्थी यह कहे कि ‘अक्षर आरम्भ करते समय जिस अध्यापक को मैंने अध्यापक माना था, अब जीवन भर उसके अतिरिक्त न किसी से शिक्षा ग्रहण करूँगा और न किसी को अध्यापक मानूँगा।’ एक ही अध्यापक से संसार के सभी विषयों को जान लेने की आशा नहीं की जा सकती। फिर वह अध्यापक मर जाए, रोगी हो जाए, कहीं चला जाए, तो भी उसी से शिक्षा लेने का आग्रह करना किस प्रकार उचित कहा जा सकता है? फिर ऐसा भी हो सकता है कि कोई शिष्य प्राथमिक गुरु की अपेक्षा कहीं अधिक जानकार हो जाए और उसका जिज्ञासा क्षेत्र बहुत विस्तृत हो जाए, ऐसी दशा में भी उसकी जिज्ञासाओं का समाधान उस प्राथमिक शिक्षक द्वारा ही करने का आग्रह किया जाए, तो यह किस प्रकार सम्भव है? प्रचीनकाल के इतिहास पर दृष्टिपात करने से उलझन का समाधान हो जाता है। महर्षि दत्तात्रेय ने चौबीस गुरु किये थे। राम और लक्ष्मण ने जहाँ वसिष्ठ से शिक्षा पायी थी, वहाँ विश्वामित्र से भी बहुत कुछ सीखा था। दोनों ही उनके गुरु थे। श्रीकृष्ण ने सन्दीपन ऋषि से भी विद्याएँ पढ़ी थीं और महर्षि दुर्वासा भी उनके गुरु थे। अर्जुन के गुरु द्रोणाचार्य भी थे और कृष्ण भी। इन्द्र के बृहस्पति भी थे और नारद भी। इस प्रकार अनेकों उदाहरण ऐसे मिलते हैं, जिनसे प्रकट होता है कि आवश्यकतानुसार एक गुरु अनेक शिष्यों की सेवा कर सकता है और एक शिष्य अनेक गुरुओं से ज्ञान प्राप्त कर सकता है। इसमें कोई ऐसा सीमा बन्धन नहीं, जिसके कारण एक के उपरान्त किसी दूसरे से प्रकाश प्राप्त करने में प्रतिबन्ध हो। वैसे भी एक व्यक्ति के कई पुरोहित होते हैं- ग्राम्य पुरोहित, तीर्थ पुरोहित, कुल पुरोहित, राष्ट्र पुरोहित, दीक्षा पुरोहित आदि। जिसे गायत्री साधना का पथ- प्रदर्शक नियुक्त किया जाता है, वह साधना पुरोहित या ब्रह्म पुरोहित है। ये सभी पुरोहित अपने- अपने क्षेत्र, अवसर और कार्य में पूछने योग्य तथा पूजने योग्य हैं। वे एक- दूसरे के विरोधी नहीं, वरन् पूरक हैं। चौबीस अक्षरों का गायत्री मन्त्र सर्व प्रसिद्ध है, उसे आजकल शिक्षित वर्ग के सभी लोग जानते हैं। फिर भी उपासना करनी है, साधनाजन्य लाभों को लेना है, तो गुरुमुख होकर गायत्री दीक्षा लेनी चाहिए। वसिष्ठ और विश्वामित्र का शाप- विमोचन करके, कीलित गायत्री का उत्कीलन करके साधना करनी चाहिए। गुरुमुख होकर गायत्री दीक्षा लेना एक संस्कार है। उसमें उस दिन गुरु- शिष्य दोनों को उपवास रखना पड़ता है। शिष्य चन्दन, अक्षत, धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य, अन्न, वस्त्र, पात्र, दक्षिणा आदि से गुरु का पूजन करता है। गुरु शिष्य को मन्त्र देता है और पथ- प्रदर्शन का भार अपने ऊपर लेता है। इस ग्रन्थि- बन्धन के उपरान्त अपने उपयुक्त साधना निश्चित कराके जो शिष्य श्रद्धापूर्वक आगे बढ़ते हैं, वे भगवती की कृपा से अपने अभीष्ट उद्देश्य को प्राप्त कर लेते हैं। जब से गायत्री की दीक्षा ले ली जाय, तब से लेकर जब तक पूर्ण सिद्धि प्राप्त न हो जाय, तब तक साधना गुरु को अपनी साधना के समय समीप रखना चाहिए। गुरु का प्रत्यक्ष रूप से सदा साथ रहना तो संभव नहीं हो सकता, पर उनका चित्र शीशे में मढ़वाकर पूजा के स्थान पर रखा जा सकता है और गायत्री, सन्ध्या, जप, अनुष्ठान या कोई और साधना आरम्भ करने से पूर्व उस चित्र का पूजन धूप, अक्षत, नैवेद्य, पुष्प, चन्दन आदि से कर लेना चाहिए। जहाँ चित्र उपलब्ध न हो, वहाँ एक नारियल को गुरु के प्रतीक रूप में स्थापित कर लेना चाहिए। एकलव्य भील की कथा प्रसिद्ध है कि उसने द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति स्थापित करके उसी को गुरु माना था और उसी से पूछकर बाण- विद्या सीखता था। अन्त में वह इतना सफल धनुर्धारी हुआ कि पाण्डवों तक को उसकी विशेषता देखकर आश्चर्यचकित होना पड़ा था। चित्र या नारियल के माध्यम से गुरु पूजा करके तब जो भी गायत्री साधना आरम्भ की जायेगी, वह शापमुक्त तथा उत्कीलित होगी। इन सबके अतिरिक्त माँ गायत्री ब्रह्मा एव शुक्र द्वारा भी श्रापित है साधना से पहले साधक नीचे बताई विधि द्वारा गायत्री को शाप मुक्त कर सकते है। लेकिन गुरु आज्ञा एवं निर्देश सर्वोपरि है। गायत्री शाप विमोचन विधि 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ ब्रह्मा, वशिष्ठ विश्वामित्र जी के द्वारा [ कहीं शुक्र के द्वारा] गायत्री-मन्त्र शप्त है! अत: शाप-निवृत्ति के लिये शाप-विमोचन करना चाहिये!-- १-ब्रह्म-शापविमोचन- विनियोग --- ॐ अस्य श्रीब्रह्मशाप विमोचनमंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिर्भुक्तिमुक्तप्रदा ब्रह्मशापविमोचनी गायत्री शक्तिर्देवता गायत्र छंद: ब्रह्मशापवोमोचाने विनियोग:! मन्त्र- ॐ गायत्रीं ब्रह्मेत्युपासीत यद्रूपं ब्रह्मविदो विदु:! तां पश्यन्ति धीरा: सुमनसो वाचमग्रत :!! ॐ वेदान्तनाथाय विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात! ॐ देवी! गायत्री ! त्वं ब्रह्मशापाद्विमुक्ता भाव! २वसिष्ठशापविमोचन विनियोग--- ॐ अस्य श्री वसिष्ठशापविमोचनमंत्रस्य निग्रहानुहकर्ता वसिष्ठ ऋषिर्वसिष्ठानुगृहीता गायत्री शक्तिर्देवता विश्वोद्भवा गायत्री छंद: वसिष्ठशाप विमोचननार्थ जपे विनियोग:! मन्त्र- ॐ सोsहमर्कमयं ज्योतिरात्मज्योतिरहं शिवं ! आत्मज्योतिरहं शुक्र: सर्वज्योतिरसोsस्म्यहम!! योनी मुद्रा दिखाकर तीन बार गायत्री जपे ! ३विश्वामित्र-शापविमोचन- विनियोग- ॐ अस्य श्रीविश्वामित्रशापविमोचनमंत्रस्य नूतनसृष्टिकर्ता विश्वामित्रऋषिर्विश्वामित्रानुगृहीता गायत्री शक्तिर्देवता वाग्देहा गायत्री छंद: विश्वामित्र शाप विमोचनार्थं जपे विनियोग:! मन्त्र- ॐ गायत्रीं भजाम्यग्नीमुखीं विश्वगर्भां यदुद्भवा:! देवाश्चक्रिरे विश्वसृष्टं तां कल्याणीमिष्टकरीं प्रपद्ये!! ॐ देवी ! गायत्री ! त्वं विश्वामित्रशापाद्विमुक्ता भव!! ४शुक्र-शापविमोचन विनियोग- ॐ अस्य श्रीशुक्रशापविमोचनमंत्रस्य श्री शुक्र ऋषि: अनुष्टुपछंद: देवी गायत्री देवता शुक्र शाप विमोचनार्थं जपे विनियोग! मन्त्र- ॐ सोsहमर्कमयं ज्योतिरात्मज्योतिरहं शिवं ! आत्मज्योतिरहं शुक्र: सर्वज्योतिरसोsस्म्यहम!! ॐ देवी! गायत्री! त्वं शुक्रशापाद्विमुक्ता भव:! प्रार्थना- ॐ अहो देवी महादेवी संध्ये विद्ये सरस्वती! अजरे अमरे चैव ब्रह्मयोनिर्नमोsस्तु ते!! ॐ देवी गायत्री त्वं ब्रह्म शापाद्विमुक्ता भव, वसिष्ठशापाद्विमुक्ता भव विश्वामित्रशापा द्विमुक्ता भव, शुक्रशापाद्विमुक्ता भव! माँ गायत्री के तीन रूपों की पूजा होती है! अर्थात माँ के तीन रूप हैं गायत्र देवी- प्रात:कालबाला हंसवाहिनी ब्रह्मरूपा, मध्याह्नकाल-गरुड़वाहिनी विष्णुरूपा सायंकाल-वृषभवाहिनी शिव रूपा! ॐ भूर्भव: स्व: तत्सवितुर्वरेन्यं भर्गो देवस्य धीमहि यो न: प्रचोदयात! [शु. यजु. ३६/३] गायत्री-मन्त्र अर्थ 〰️〰️🔸〰️〰️ भू:=सत, भव=चित, स्व:=आनंद स्वरुप, सवितु: देवस्य=सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्मा के, तत वरेण्यं भर्ग=उस प्रसिद्ध वरणीय तेजका [हम] ध्यान करते हैं, य:=जो परमात्मा, न हमारी, धिय=बुद्धि को [सत की ओर] प्रचुदयात=प्रेरित करे! गायत्री कवच 〰️🔸🔸〰️ विनियोग- ॐ अस्य श्री गायत्री कवचस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायात्री छंदों गायत्री देवता ॐ भू: बीजं, भुव: शक्ति:, स्व: कीलकम, गायत्रीप्रीत्यर्थे जपे विनियोग:! निम्नलिखित मन्त्रों से गायत्री माता का ध्यान करे! ध्यान इस प्रकार करें! 〰️〰️🔸🔸〰️〰️ पञ्चवक्त्रां दश भुजां सूर्यकोटिसमप्रभाम! सावित्रीं ब्रह्मवरदां च चन्द्रकोटि सुशीतलाम!! त्रिनेत्रां सितवक्त्रां च मुक्ताहारविराजिताम! वराभयान्कशाहेमपात्राक्षमालिकाम !! शंखचक्रब्जयुगलं कराभ्यां दधतीं वाराम! सित पंकज संस्थं च हंसारूढान सुखास्मिताम! ध्यात्वैवं मान सानसाम्भोजे गायत्री कवचं जपत! तदनन्तर गायत्री कवच का पाठ करें! गायत्री कवच 〰️🔸🔸〰️ ॐ ब्रह्मोवाच-- विश्वामित्र ! महाप्राज्ञ ! गायत्री कवचं रिणु! यस्य विज्ञानंमात्रेण त्रैलोक्यं वशयेत क्षणात !! सावित्री मे शिर: पातु शिखायाममृतेश्वरी ! ललाटं ब्रह्मदैव्य भ्रुवौ मे पातु वैष्णवी !! कर्णों मे पातु रुद्राणी सूर्या सावित्रिकाsम्बिके! गायत्री वदनं पातु शारदा दशनच्छदौ !! द्विजान यज्ञप्रिया पातु रसनायां सरस्वती! सांख्यायनी नासिकां मे कपोलौ चन्द्रहासिनी!! चिबुकं वेदगर्भा च कंठं पात्वघनाशिनी! स्तनौ मे पातु इन्द्राणी हृदयं ब्रह्मवादिनी!! ऊदर्ण विश्वभोक्त्री च नाभौ पातु सुरप्रिया! जघनं नारसिंही च पृष्ठं ब्रमांडधारिणी !! पार्श्वौ मे पातु पदमाक्षी गुह्यं गोगोप्त्रिकाsवतु! ऊर्वोरोंकाररूपा च जान्वो: संध्यात्मिकाsवतु!! जघन्यो: पातु अक्षोभ्या गुल्फयोर्ब्रह्मशीर्षका! सूर्या पद्द्वयं पातु चंद्रा पादान्गुलीषु!! — गायत्री बीज युक्त मन्त्र 〰️〰️🔸🔸〰️〰️ ॐ श्रीं ह्रीं ॐ भूर्भुव: स्व: ॐ ऐं ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं ॐ क्लीं ॐ भर्गोदेवस्य धीमहि ॐ सौ: ॐ धियो यो न: प्रचोदयात ॐ ह्रीं श्रीं ॐ!! साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️
K S Supyal
3.7K views
2 months ago
AI indicator
"Om Bhur Bhuvah Svah, Tat Savitur Varenyam, Bhargo Devasya Dhimahi, Dhiyo Yo Nah Prachodayat." This Gayatri mantra is to praise lord Sun, means "We meditate upon the supreme, adorable radiance of the Divine Sun (the Creator). May that divine light destroy our ignorance, purify our hearts, and guide our intellect on the right path." Loud or mental chanting of the Gayatri Mantra is traditionally avoided late at night. Gayatri Mantra is chanted three times a day during the junctions of time, known as Sandhya Kaal: 1. Pratah Sandhya (Morning): Right before and during sunrise. 2.Madhyahna Sandhya (Noon): When the sun is directly overhead at its peak. and 3. Sayan Sandhya (Evening): Right before and during sunset.ॐ सूर्याय नमः!🚩 #सुप्रभात #शुभ_प्रभात #🌞 Good Morn!ng #🌷शुभ रविवार #गायत्री
Bhakti Varsha
5.1K views
2 months ago
AI indicator
🌸 सिर्फ 30 सेकंड में महसूस करें माँ गायत्री की दिव्य शक्ति 🙏 | Gayatri Mantra Shorts ✨#viral #short #trending #bhakti #gayatri