#क्राइम न्यूज #बिहार #📰 बिहार अपडेट #बाढ़ ##😢बिहार: जहरीली शराब से कई मौतें
🔴जहरीली शराब से चार मौतें और पुलिस की जल्दबाजी क्यों🤔
बाढ़ के बेढ़ना गांव में चार युवकों की मौत ने बिहार में शराबबंदी की पोल एक बार फिर खोल दी है। शराब पीने के बाद चार लोगों की एक साथ मौत हुई तो पहली आशंका जहरीली शराब की हुई। लेकिन पुलिस ने कुछ ही समय में इसे नया रूप दे दिया—शराब जहरीली नहीं थी, बल्कि शराब में जहर मिलाकर चार लोगों की हत्या की गई और इसके पीछे कथित प्रेम प्रसंग से पैदा हुई रंजिश थी।
सवाल यह नहीं कि पुलिस की यह थ्योरी सही है या गलत। सवाल यह है कि क्या जांच पूरी होने से पहले पुलिस को इसे सार्वजनिक निष्कर्ष की तरह पेश करना चाहिए था?
ग्रामीण एसपी के अनुसार मुख्य आरोपी ने पूछताछ में शराब में जहर मिलाने की बात स्वीकार की है। पुलिस का दावा है कि निशु का आरोपी की बहन से कथित प्रेम संबंध था और इसी रंजिश में यह साजिश रची गई। लेकिन आरोपी का बयान अपने आप में अंतिम प्रमाण नहीं होता। उसे स्वतंत्र साक्ष्यों से पुष्ट करना पड़ता है।
और सबसे गंभीर बात—पुलिस ने इस कथित प्रेम प्रसंग से जुड़ी महिला का नाम भी सार्वजनिक चर्चा में ला दिया। महिला ने इस आरोप से इनकार करते हुए पुलिस से सबूत मांगा है।
किसी महिला की निजी जिंदगी को सार्वजनिक रूप से हत्या की वजह बताना मामूली बात नहीं है।
@यदि पुलिस के पास मोबाइल चैट, कॉल रिकॉर्ड, तस्वीरें, लोकेशन या अन्य ठोस प्रमाण हैं तो उसे जांच में शामिल किया जाए। अब महिला पुलिस से साक्ष्य माँग रही है नहीं तो वो पुलिस पर मान हानि का मुक़दमा करेगी।
मामले में एक दूसरा पहलू भी सामने आया है। मृतक पंकज के परिवार ने पुरानी हत्या के एक मामले में उसकी गवाही और कथित धमकी का हवाला दिया है। यह आरोप भी अभी सिद्ध नहीं है, लेकिन यह बताता है कि जांच को केवल प्रेम प्रसंग के कोण तक सीमित करना उचित नहीं होगा।
शराब में जहर था तो एफएसएल बताएगा। जहर किसने खरीदा, उसका पता लगाया जाना चाहिए। किसने शराब में मिलाया, इसका वैज्ञानिक प्रमाण होना चाहिए। चारों ने वही शराब पी थी तो उनमें जहर की मात्रा क्या थी, यह सामने आना चाहिए। पांचवें व्यक्ति ने यदि वही शराब नहीं पी और वह बच गया, तो उसकी भूमिका और बयान भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।
सबसे बढ़कर यह पता लगना चाहिए कि हत्या की वजह वास्तव में क्या थी।लेकिन पुलिस के लिए सबसे आसान रास्ता एक कहानी बनाकर उसके आधार पर जांच आगे बढ़ाना है। कठिन रास्ता है—हर संभावना को खुला रखना और फिर सबूतों के आधार पर कहानी तक पहुंचना।
बिहार में जहरीली शराब से मौत कोई नई बात नहीं। शराबबंदी के बावजूद शराब पहुंचती है, बिकती है और लोग मरते हैं। ऐसे में हर शराब से जुड़ी सामूहिक मौत को केवल स्थानीय विवाद या निजी रंजिश में बदल देना भी खतरनाक है। इससे उस बड़े सवाल से ध्यान हट सकता है कि आखिर जहरीला पदार्थ या अवैध शराब लोगों तक पहुंची कैसे।
अगर यह हत्या है तो हत्यारे और साजिशकर्ता सामने आने चाहिए। अगर जहरीली शराब है तो उसके कारोबारी और संरक्षण देने वाले बेनकाब होने चाहिए। और अगर पुलिस की शुरुआती कहानी गलत साबित होती है तो जांच में जल्दबाजी करने वालों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
चार मौतों का सच किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस से तय नहीं होगा।सच एफएसएल की रिपोर्ट, पोस्टमार्टम, डिजिटल साक्ष्य, गवाहों और अदालत में टिकने वाले प्रमाणों से तय होगा।
पुलिस का काम सबसे पहले कहानी सुनाना नहीं है।पुलिस का काम सच तक पहुंचना है।