मणिकर्णिका घाट 🚩🚩🚩

Raj pannu
720 views
7 days ago
AI indicator
https://www.youtube.com/@RajendraPannu-ps5kv बनारस सिर्फ एक शहर नहीं, भक्ति और सुकून की एक अधूरी सी ख़्वाहिश है। गंगा घाट की आरती और यहाँ की संकरी गलियाँ हर दिल को अपना बना लेती हैं। #beauty of banaras #apna banaras #बनारस घाट🙏🚩💐 #Banaras ka assi ghat🙏
Raj pannu
3.6K views
12 days ago
AI indicator
https://www.youtube.com/@RajendraPannu-ps5kv "घाटों की रौनक और गंगा जी की लहरें, बनारस की हर बात ही निराली है।" #beauty of banaras #बनारस घाट🙏🚩💐 #banaras ganga ghat #banaras ka namo ghat "काशी की गलियों का सफर और शाम की महा आरती, दिल को सुकून दे जाती है।"
sn vyas
1.2K views
1 months ago
#मणिकर्णिका घाट 🚩🚩🚩 #जीवन का सबसे बड़ा सच.... मणिकर्णिका घाट वाराणसी महादेव 🙏🏻💐 यह पावन कथा शिव पुराण के कोटिरुद्र संहिता और काशी खंड में आती है। यह कथा काशी (वाराणसी) के सबसे पवित्र तीर्थ मणिकर्णिका घाट के निर्माण, भगवान विष्णु और शिव जी के प्रेम, तथा यहाँ मिलने वाले अमोघ मोक्ष के रहस्य को उजागर करती है। 1. संसार की रचना और श्री हरि की तपस्या सृष्टि के आरंभ में, जब संपूर्ण ब्रह्मांड जलमग्न था, तब भगवान शिव और माता पार्वती ने अपनी आनंदमयी इच्छा से 'काशी' क्षेत्र का निर्माण किया। यह स्थान भगवान शिव के त्रिशूल के ऊपर स्थित था और प्रलय काल में भी सुरक्षित रहने वाला था। भगवान शिव ने अपने अंश से भगवान श्री हरि विष्णु को प्रकट किया और उन्हें सृष्टि के निर्माण व संचालन का दायित्व सौंपा। भगवान विष्णु ने सृष्टि की रचना से पूर्व शक्ति और सिद्धि प्राप्त करने के लिए काशी में घोर तपस्या करने का संकल्प लिया। उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से वहाँ एक अत्यंत सुंदर और दिव्य कुंड (पोखर) खोदा। उस कुंड में स्नान करके विष्णु जी ने हज़ारों वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या के पसीने से वह कुंड पूरी तरह भर गया, जिसे 'चक्रपुष्करिणी कुंड' कहा गया। 2. मणिकर्णिका नाम कैसे पड़ा? भगवान विष्णु की भक्ति और कठोर तपस्या देखकर भगवान शिव और माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुए। वे दोनों श्री हरि को वरदान देने के लिए चक्रपुष्करिणी कुंड के तट पर प्रकट हुए। भगवान शिव के अलौकिक, ज्योतिर्मय और सुंदर रूप को देखकर माता पार्वती आनंदित हो गईं। प्रसन्नता और भावविभोर अवस्था में जब माता पार्वती ने अपना सिर हिलाया, तो उनके कान का एक दिव्य आभूषण—'मणियुक्त कुंडल' (मणिकर्णिका)—टूटकर सीधे उसी कुंड में गिर गया। कंगन और कुंडल के कुंड में गिरने के कारण भगवान शिव ने उस पावन तीर्थ का नाम 'मणिकर्णिका' रखा। शिव जी ने प्रसन्न होकर कहा: "हे जनार्दन! आपके पसीने और देवी पार्वती के मणिकर्णिका (कुंडल) से पवित्र हुआ यह कुंड संसार का सबसे श्रेष्ठ मुक्ति-तीर्थ कहलाएगा।" 3. काशी का मणिकर्णिका और 'तारक मंत्र' का रहस्य मणिकर्णिका घाट पर केवल जल का ही महत्व नहीं है, बल्कि यह महाश्मशान के रूप में भी प्रसिद्ध है, जहाँ सृष्टि के अंत और मोक्ष का विधान रचा गया है। शिव पुराण के अनुसार, मणिकर्णिका पर जब किसी भी प्राणी (मनुष्य, पशु या पक्षी) की मृत्यु होती है या उसकी देह का दाह-संस्कार किया जाता है, तो स्वयं भगवान विश्वनाथ (शिव जी) वहाँ प्रकट होते हैं। भगवान शिव उस मृत जीव के कान में स्वयं 'तारक मंत्र' (राम नाम या ॐ) का उपदेश देते हैं: यह तारक मंत्र जीव के जन्म-जन्मांतर के सभी कर्मों और बंधनों को क्षण भर में भस्म कर देता है। इसके प्रभाव से जीव को पुनः चौरासी लाख योनियों में भटकना नहीं पड़ता और वह सीधे 'सायुज्य मोक्ष' प्राप्त करके शिवलोक (कैलाश) में लीन हो जाता है। 4. मणिकर्णिका का आध्यात्मिक महत्व मणिकर्णिका घाट को 'सृष्टि और प्रलय का संगम स्थान' माना गया है। यहाँ जल (चक्रपुष्करिणी) जीवन और निर्माण का प्रतीक है, तो अग्नि (चिताग्नि) देह के अंत और आत्मा की मुक्ति का प्रतीक है। यहाँ की श्मशान भूमि को कभी 'अशुभ' नहीं माना जाता, क्योंकि यहाँ मृत्यु शोक का कारण नहीं, बल्कि शिव कृपा से परम मुक्ति का उत्सव बन जाती है। कथा का संदेश: मणिकर्णिका केवल एक भौगोलिक स्थान या घाट नहीं है, बल्कि यह भगवान शिव और विष्णु की अखंड कृपा का साक्षात रूप है। यह कथा सिखाती है कि भौतिक शरीर नश्वर है, परंतु यदि जीवन में शिव-भक्ति का भाव हो, तो अंत काल में ईश्वर स्वयं जीव का हाथ थामकर उसे मोक्ष प्रदान करते हैं।