sn vyas
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#श्रीमानसजी_में_भेदभक्ति01
🎄भाग -१🎄
बहुतो भक्त जन द्वारा मोक्ष की अपेक्षा प्रभु की भक्ति की प्रधानता दी गयी है l वे तो सदा प्रभु के सगुन रूप को अपने ह्रदय में में देखने की चाहत रखते है l
*भेदभक्ति* में सेवक-सेव्य भाव है, जिसमें एक सेवाग्राही भगवान हैं और दूसरा सेवापरायण भक्त । *भेदभक्ति में भक्त भगवान के साथ मुख्यतः पाँच सम्बन्धों- शान्त, दास, सख्य, वात्सल्य और मधुर में से अपनी रुचि के अनुकूल किसी सम्बन्ध को जोड़कर तद्वत्-भावना में जन्म-जन्म परमानन्द में मग्न रहता है।* भगवत्प्रेमी का ध्येय पुनर्जन्म पाकर भगवत्कैर्यपरायण होना, भगवत्सेवा, पूजा-अर्चानिष्ट होना, जप-ध्यान करना, कथा-कीर्तन-सत्सङ्ग करना, साधुसहवास में निरत रहना और भगवद्गुणगान ही है। और यही नवधा-भक्ति भी है।
श्रीमद्गोस्वामीजी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के सातों सोपानों में *'भेदभक्ति'* शब्द केवल तीन ही प्रसंग में मिलता है। यद्यपि भक्तिसम्बन्धी प्रसंगों पर विचार समर्पण करने का साहस इस दीन के लिये ठीक *'साक बनिक मनि गुन गन जैसें'* का ही रूपक है, परन्तु *'सब तें सेवक धरमु कठोरा'* के भी मार्मिकों के निश्चयानुसार *'अग्या सम न सुसाहिब सेवा'* को परम धर्म जानकर उसीके आधार पर यह ढिठाई हो रही है। अतः अपनी विवशता का निवेदन करते हुए दीनभाव से प्रार्थना करता हूँ कि-
*छमिहहिं सन्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई ॥*
_भेदभक्ति शब्द तीन जगह कहाँ-कहाँ आया है-_
*१-*- अरण्यकाण्डान्तर्गत श्रीशरभंगजी के प्रसंग में–
*'ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ ।'*
*२-* लंकाकाण्डान्तर्गत श्रीदशरथजी महाराज के प्रसंग में-
*'ताते उमा मोच्छ नहिं पायो । दसरथ भेद भगति मन लायो ॥'*
*३-* उत्तरकाण्डान्तर्गत श्रीकाकभुशुण्डिजी के प्रसंग में- श्रीभुशुण्डिजी ने श्रीगरुड़जी से कहा है-
*'ताते नाम न होड़ दास कर । भेद भगति बाढ़ड़ बिहंगबर ॥'*
उपर्युक्त तीनों चौपाइयों में *'ताते'* शब्द का प्रयोग ही पूर्वप्रसंग की अपेक्षा निश्चित कर रहा है। अतः पूर्व आधार पर समन्वयसंयुक्त प्रत्येक प्रसंग स्पष्ट हो जाने से ही भेदभक्ति स्वरूप लक्षित होगा। इसलिए क्रमानुसार पहले श्रीशरभंगजी का प्रसंग -
क्रमशः......
*🙏🏻जय जय सियाराम🙏🏻*
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#श्रीरामचरितमानस चोपाई #श्रीरामचरितमानस 🪷
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