रामचरितमानस

sn vyas
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18 days ago
#श्रीरामचरितमानस चोपाई #श्रीरामचरितमानस 🪷 #जय श्री राम #रामायण ज्ञान #रामायण चौपाई यह चौपाई हमें सिखाती है कि जीवन की वास्तविक संपन्नता और शांति धन-दौलत में नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति निष्काम भक्ति और समर्पण में है। प्रभु चरणों में प्रीति होते ही मन के सारे विकार दूर हो जाते हैं और जीवन में परम आनंद व शांति का आगमन होता है। ईश्वर से विमुख व्यक्ति सदैव अपनी इच्छाओं और वासनाओं का दास बना रहता है। वह संसार के सामने हाथ फैलाता है और भीतर से स्वयं को हमेशा अधूरा तथा असहाय महसूस करता है। सांसारिक सुख क्षणिक होते हैं। भौतिक वस्तुएँ मिलने पर खोने का भय और न मिलने पर असंतोष रहता है। इसलिए प्रभु प्रेम से वंचित व्यक्ति मानसिक और आत्मिक रूप से निरंतर दुखी रहता है। तुलसीदास जी समझाते हैं कि ईश्वर के चरण ही जीव के लिए अंतिम आश्रय हैं। जब तक जीव संसार के नश्वर पदार्थों, धन, पद और मान-सम्मान में सुख खोजता रहता है, तब तक उसे स्थायी शांति नहीं मिलती। सच्चा और अक्षय आनंद केवल ईश्वर के चरणों की भक्ति में ही निहित है। अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह कें पद पंकज प्रीति नहीं॥ अवलंब भवंत कथा जिन्ह कें। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें॥ भावार्थ जिन्हें आपके चरणकमलों में प्रीति नहीं है वे नित्य ही अत्यंत दीन, मलिन (उदास) और दुःखी रहते हैं और जिन्हें आपकी लीला कथा का आधार है, उनको संत और भगवान सदा प्रिय लगने लगते हैं॥
sn vyas
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2 months ago
#रामचरितमानस #🌺 श्री रामचरितमानस चौपाई 🌺 #वाल्मीकि रामायण 🧘वाल्मीकि द्वारा श्रीराम के चौदह निवास स्थान🧘 📕श्रीरामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में एक अत्यन्त अद्भुत प्रसंग आता है। जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के समय चित्रकूट पहुँचते हैं, तब वे महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में पधारते हैं।📕 🛐मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अत्यन्त विनम्र होकर महर्षि से पूछते हैं—🛐 🙏«"हे मुनिवर! हम तीनों कहाँ निवास करें? कृपा करके कोई उपयुक्त स्थान बताइये।"»🙏 🧘तब महर्षि वाल्मीकि मुस्कराते हैं। वे जानते हैं कि प्रश्न पूछने वाले स्वयं सम्पूर्ण विश्व के अधिष्ठाता हैं। अतः वे कहते हैं—🧘 🙏"हे राम! आप तो घट-घटवासी हैं। ऐसा कौन-सा स्थान है जहाँ आप नहीं हैं? फिर भी यदि आप निवासस्थान पूछते हैं तो मैं आपको वे हृदय बताता हूँ जहाँ आपको सपरिवार निवास करना चाहिए।"🙏 🚩१. जिनके कान रामकथा के समुद्र हों जिन्हें आपकी कथा सुनने से कभी तृप्ति नहीं होती। जिनके कान समुद्र के समान हैं और जो आपकी लीलारूपी नदियों को निरन्तर ग्रहण करते रहते हैं। 🚩२. जिनकी आँखें चातक के समान हों जो केवल आपके दर्शन की अभिलाषा रखते हैं। जिनकी दृष्टि संसार में नहीं, केवल श्रीरामरूपी स्वाति- बिन्दु पर लगी रहती है। 🚩३. जिनका मन मानसरोवर हो । जिनके हृदय रूपी मानसरोवर में आपकी कीर्ति रूपी हंस विहार करते हैं। जो निरन्तर रामनाम का जप करते हैं। 🚩४. जिनकी नासिका प्रसाद की सुगन्ध ग्रहण करे। जो भगवान के चरणों में अर्पित पुष्पों की सुगन्ध को पवित्र मानते हैं। जो प्रसाद को देवकृपा समझकर ग्रहण करते हैं। 🚩५. जिन्हें संत- दर्शन प्रिय हो। जो संतों को देखकर आनन्दित होते हैं। जो सज्जनों की सेवा को सौभाग्य मानते हैं। 🚩६. जिनके हाथ सेवा में लगे हों। जिनके हाथ पूजा, सेवा और धर्मकार्य में लगे रहते हैं। 🚩७. जिनके चरण तीर्थमार्ग पर चलते हों। जो तीर्थ, मन्दिर और सत्संग की ओर अग्रसर होते हैं। 🚩८. जिनका मस्तक विनम्र हो। जो भगवान, गुरु और संतों के चरणों में झुकते हैं। 🚩९. जिनके मन में छल न हो। जो कपट रहित और सरल स्वभाव वाले हैं। 🚩१०. जो जगत को राममय देखते हैं। जो सम्पूर्ण चराचर जगत में भगवान का ही स्वरूप देखते हैं। 🚩११. जो समदर्शी हों। जिनके लिए सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान समान हों। 🚩१२. जो लोभ और शोक से मुक्त हों। जिन्हें धन का अभिमान नहीं और हानि का दुःख नहीं। 🚩१३. जो सत्यप्रिय हों। जो सदैव सत्य बोलते हैं और धर्म का पालन करते हैं। 🚩१४. जिनके हृदय में निष्काम भक्ति हो। जो किसी फल की इच्छा से नहीं, केवल प्रेमवश भगवान का स्मरण करते हैं। 🛐महर्षि वाल्मीकि का यह उपदेश अत्यन्त गूढ़ है। यहाँ भगवान राम को किसी भौतिक कुटिया में नहीं, बल्कि भक्त के अन्तःकरण में स्थापित किया गया है। इसी से स्पष्ट होता है कि श्रीराम केवल अयोध्या के राजकुमार नहीं हैं। वे स्वयं घट-घटवासी, अन्तर्यामी, सर्वव्यापक परब्रह्म हैं।🛐 🌷«"जहाँ निर्मल भक्ति है, वहीं राम का निवास है।"»🌷 🙏जय श्रीराम।🙏