शिव पुराण 🌺

sn vyas
555 views
4 days ago
#🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #शिव पुराण रुद्रसंहिता #शिव पुराण 🌺 शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता में भगवान शिव के पावन धाम काशी के अलौकिक महिमा-मंडल के अंतर्गत यह अत्यंत कल्याणकारी कथा आती है। यह कथा दर्शाती है कि अनजाने में किया गया थोड़ा सा भी धर्म-कार्य या शिव-भक्त की सेवा किस प्रकार महापापी जीव को भी यम-यातना से मुक्त कर परम गति प्रदान कर सकती है। 1. वैश्य कृपाण का आचरण और स्वभाव प्राचीन काल में पावन नगरी काशी में कृपाण नाम का एक वैश्य (व्यापारी) रहता था। वह नाम से ही नहीं, स्वभाव से भी अत्यंत कृपण (कंजूस), कठोर और अधर्मी था। उसने अपने जीवन में कभी किसी भूखे को भोजन नहीं कराया और न ही कभी कोई दान-पुण्य किया। उसका एकमात्र लक्ष्य किसी भी छल-कपट से धन जोड़ना था। वह नित्य प्रति केवल धन के लोभ में डूबा रहता था और ईश्वर-भक्ति तथा धर्म-कर्म को व्यर्थ समझता था। 2. अनजाने में हुआ पुण्य-कर्म समय बीतता गया और वैश्य कृपाण अति-वृद्धावस्था में पहुँच गया। एक दिन उसके द्वार पर एक अत्यंत भूखा, प्यासा और क्षीणकाय शिव-भक्त संन्यासी/भिक्षुक आया। वह संन्यासी निरंतर 'ॐ नमः शिवाय' का जाप कर रहा था। वैश्य ने हमेशा की तरह उसे भगाने का प्रयास किया, किंतु वृद्ध और दुर्बल होने के कारण वह स्वयं भोजन कर रहा था। जब संन्यासी ने अति-दीन भाव से केवल जल और तनिक अन्न की याचना की, तो वैश्य ने भारी अनमनेपन से (बिना किसी श्रद्धा के, केवल पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से) अपने भोजन का एक छोटा सा अशेष भाग और जल उस भक्त के पात्र में डाल दिया। वह संन्यासी उस अनजाने में प्राप्त अन्न-जल को भगवान शिव का प्रसाद मानकर संतुष्ट होकर चला गया। 3. प्राण-त्याग और यमदूतों का आगमन कुछ समय पश्चात् वैश्य कृपाण की मृत्यु हो गई। चूँकि उसने जीवन भर केवल अधर्म और पाप कर्म किए थे, इसलिए उसके प्राण छूटते ही भयंकर रूप वाले यमदूत उसे पाश से बाँधकर यमलोक की ओर घसीटने लगे। यमदूत उसे उसके पापों का स्मरण कराते हुए कह रहे थे: "हे पापी! तूने जीवन भर कभी धर्म नहीं किया, केवल धन का संचय किया। अब तुझे कुंभीपाक और असिपत्रवन जैसे भयंकर नरकों में युगों-युगों तक यातनाएँ भोगनी होंगी।" 4. शिवदूतों का प्राकट्य और यमदूतों से संग्राम जैसे ही यमदूत उसे यमलोक के मार्ग पर ले जा रहे थे, तभी दिव्य त्रिशूल और डमरू धारण किए हुए परम तेजस्वी शिवदूत (रुद्रगण) वहाँ प्रकट हुए। शिवदूतों ने यमदूतों को रोक दिया और वैश्य के पाश काट दिए। यमदूतों ने आश्चर्यचकित होकर पूछा: "हे शिवगण! यह वैश्य तो जीवनभर अत्यंत कृपण और अधर्मी रहा है। इसने कभी कोई व्रत या पूजा नहीं की। आप इसे नरक जाने से क्यों रोक रहे हैं?" शिवदूतों ने मुस्कुराते हुए यमराज के दूतों को शिव-महिमा का रहस्य बताते हुए कहा: "हे दूतों! भले ही इसने जान-बूझकर पुण्य न किया हो, किंतु अपने अंतकाल के समय काशी-क्षेत्र में इसने अनजाने ही सही, एक अनन्य शिव-भक्त को भोजन और जल अर्पित किया था। शिव-भक्त की तृप्ति से साक्षात भगवान विश्वनाथ तृप्त होते हैं। इसके इस एकमात्र पुण्य-प्रभाव से और काशी की पावन भूमि पर प्राण त्यागने से इसके समस्त जन्मों के पाप भस्म हो चुके हैं।" 5. वैश्य का उद्धार और शिवलोक प्राप्ति शिवदूतों ने यमदूतों को वापस भेज दिया और वैश्य कृपाण को एक दिव्य विमान में बैठाकर शिवलोक (कैलास) ले गए। अनजाने में किए गए उस छोटे से शिव-भक्त सेवा के फल से वह पापी वैश्य मुक्त होकर शिव-गण के पद पर प्रतिष्ठित हुआ। कथा का संदेश: यह प्रसंग सिखाता है कि भगवान शिव 'आशुतोष' (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) हैं। यदि कोई मनुष्य भाव से या अनजाने में भी किसी सच्चे शिव-भक्त या दीन-दुखी की सेवा करता है, तो शिव जी उसका कल्याण करने में क्षण भर का भी विलंब नहीं करते।
sn vyas
554 views
8 days ago
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 ---*⚜*--- *दीपप्रिय: कार्तवीर्यो मार्तण्डो नतिवल्लभ: ।* *स्तुतिप्रियो महाविष्णुर्गगणेशस्ततर्पणप्रियः* *दुर्गाऽर्चनप्रिया नूनमभिषेकप्रियः शिवः ।* *तस्मात्तेषां प्रतोषाय विदध्यात्तत्तदादृतः ।।* मन्त्रमहोदधि २७/११६-११७ "कार्तवीर्य को दीप प्रिय है, सूर्य को नमस्कार प्रिय है, विष्णुजी को स्तुति प्रिय है, गणेशजी को तर्पण प्रिय है,दुर्गाजी को अर्चना प्रिय है और *शिवजी को अभिषेक प्रिय है ।* अतः इन देवताओ को प्रसन्न करने के लिये इनके प्रिय कार्य ही करने चाहिये।" ---*⚜*--- *विना भस्मत्रिपुंड्रेण विना रुद्राक्षमालया ।* *बिल्वपत्रं विना नैव पूजयेच्छंकरं बुधः ।।* *भस्माप्राप्तौ मुनिश्रेष्ठाः प्रवृत्ते शिवपूजने।* *तस्मान्मृदापि कर्तव्यं ललाटे च त्रिपुंड्रकम् ।।* शिवपुराण, वि० २१/५५,५६ ‘‘विद्वान पुरूष को चाहिये की बिना भस्म का त्रिपुण्ड्र लगाये, बिना रूद्राक्ष की माला धारण किये तथा बिल्वपत्र का बिना संग्रह किये भगवान शंकर की पूजा न करे । शिवपूजन आरम्भ करते समय यदि भस्म न मिल, तो मिट्टी से ही ललाट में त्रिपुण्ड्र अवश्य कर लेना चाहिये।‘‘ ---*⚜*--- 🙏 *जय मातादी* 🙏 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 #शिव महापुराण🙏 #श्री शिव महापुराण कथा #प्रदीप मिश्रा द्वारा शिव महापुराण कथा #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #शिव पुराण 🌺
sn vyas
660 views
9 days ago
#प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏 #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #शिव पुराण 🌺 यह अनूठी और रोचक कथा शिव पुराण की रुद्र संहिता (सृष्टि खंड) में आती है। रामायण में शूर्पणखा को केवल एक दुष्ट राक्षसी के रूप में देखा जाता है, किंतु शिव पुराण उसके पूर्वजन्म की उस भूल और लालसा को उजागर करता है जिसके कारण उसे अगले जन्म में भयानक राक्षसी का शरीर मिला। 1. पूर्वजन्म में 'नयन्ती' और उसकी लालसा अपने पूर्वजन्म में शूर्पणखा 'नयन्ती' नाम की एक अत्यंत रूपवती और गंधर्व-कन्या समान सुंदरी थी। वह अपने रूप-सौंदर्य पर अत्यंत गर्व करती थी। उसके मन में केवल एक ही प्रबल अभिलाषा थी—संसार का सबसे सुंदर, शक्तिशाली और कामदेव जैसा मनमोहक पुरुष उसका पति बने। जब उसने देखा कि ऐसा पति केवल ईश्वर की अनुकंपा से ही मिल सकता है, तो उसने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या करने का निर्णय लिया। 2. भगवान शिव की तपस्या और कामासक्ति नयन्ती वन में जाकर पार्थिव (मिट्टी के) शिवलिंग का निर्माण कर भगवान शिव की कठिन साधना करने लगी। वह वर्षों तक पंचाग्नि तप करती रही और 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करती रही। किंतु, उसकी तपस्या में एक बहुत बड़ी त्रुटि थी—उसकी तपस्या में 'भक्ति' या 'मुक्ति' का भाव नहीं था, बल्कि केवल 'काम' (शारीरिक सौंदर्य और सुंदर पति) की तीव्र वासना थी। वह पूजा करते समय भी भगवान शिव के निष्काम स्वरूप का ध्यान करने के बजाय केवल एक अति-सुंदर पति की कल्पनाओं में खोई रहती थी। 3. भगवान शिव की परीक्षा और वरदान जब उसकी तपस्या की अवधि पूर्ण हुई, तब भगवान शिव एक दिव्य वृद्ध ब्राह्मण के रूप में नयन्ती के आश्रम में प्रकट हुए। वृद्ध ब्राह्मण रूपी शिव जी ने उससे पूछा: "हे कल्याणी! तुम इस सुकुमार अवस्था में इतना कठोर तप क्यों कर रही हो? तुम्हें किस वस्तु की अभिलाषा है?" नयन्ती ने बिना संकोच के अपने मन की कामना प्रकट करते हुए कहा: "हे महाराज! मैं इस ब्रह्मांड के सबसे सुंदर, कांतिमान और कामातुर पुरुष को अपने पति के रूप में पाना चाहती हूँ, जो केवल मुझसे ही प्रेम करे और उसके रूप की तुलना कोई न कर सके।" ब्राह्मण रूपी शिव जी ने उसे समझाया कि केवल बाहरी रूप-सौंदर्य और काम-वासना के लिए की गई तपस्या जीव को अंत में दुख ही देती है। किंतु नयन्ती अपनी हठ पर अड़ी रही। तब शिव जी ने अपने असली स्वरूप में दर्शन दिए और कहा: "हे नयन्ती! तुम्हारी तपस्या के फलस्वरूप तुम्हें अगले जन्म में संसार का सबसे सुंदर पुरुष पति के रूप में पाने का अवसर मिलेगा, किंतु तुम्हारी इस अत्यधिक काम-लालसा और आसक्ति के कारण तुम्हें राक्षस योनि में जन्म लेना पड़ेगा।" 4. शूर्पणखा के रूप में जन्म और फल अगले जन्म में वही नयन्ती महर्षि विश्रवा की पुत्री और रावण की बहन 'शूर्पणखा' के रूप में जन्मी। राक्षसी योनि में जन्म लेने के बाद भी उसके पूर्वजन्म का वह 'संस्कार' (सुंदर पति पाने की लालसा) वैसा ही बना रहा। जब त्रेतायुग में उसने पंचवटी में परम सुंदर भगवान श्रीराम और लक्ष्मण को देखा, तो उसके पूर्वजन्म की वही काम-वासना पुनः जागृत हो गई। उसने श्रीराम और लक्ष्मण को अपने मोहिनी रूप से रिझाने का प्रयास किया। किंतु, प्रभु श्रीराम तो 'एकपत्नीव्रती' और मर्यादा पुरुषोत्तम थे तथा लक्ष्मण जी भी अपनी भ्रातृ-भक्ति में लीन थे। जब शूर्पणखा ने माता सीता पर आक्रमण करने का दुस्साहस किया, तो लक्ष्मण जी ने उसके नाक और कान काट दिए। 5. कथा का आध्यात्मिक रहस्य शिव पुराण में इस कथा के माध्यम से समझाया गया है कि शूर्पणखा की नाक-कान कटना केवल रामायण की एक घटना नहीं थी, बल्कि उसके पूर्वजन्म के अशुद्ध मनोरथ का परिणाम था। यदि उसने अपने पूर्वजन्म में शिव जी से 'सुंदर पति' के स्थान पर 'सच्ची भक्ति' माँगी होती, तो उसका उद्धार हो जाता। कथा का संदेश: ईश्वर की भक्ति सदैव निष्काम और पवित्र भाव से करनी चाहिए। यदि भक्ति में केवल भौतिक सुख, काम-वासना या शारीरिक सौंदर्य की कामना होगी, तो वह फल तो देती है, किंतु वह फल अंततः विनाश और कष्ट का कारण बनता है।
sn vyas
1.1K views
11 days ago
#🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #शिव पुराण 🌺 🕉️*महादेव की महिमा: 🕉️ ‼️रुद्र, शंकर और रुद्राभिषेक का रहस्य।*_ ‼️ 🧘भगवान श्री कृष्ण भगवद्गीता के विभूति योग में घोषणा करते हैं -🧘 *रुद्राणां शंकर: अस्मि* ✍️अर्थात् ग्यारह रुद्रों में मैं शंकर (शिव) हूं। यह उक्ति भगवान शिव एवं भगवान श्री कृष्ण की अभेदता का प्रमाण है। इसका अर्थ यह हुआ कि दोनों एक ही हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं -✍️ *शिवेति शब्दमुच्चार्य प्राणांस्त्यजति यो नर:।* *कोटिजन्मार्जितात् पापान्मुक्तो मुक्तिं प्रयाति स:।।* ✍️अर्थात् जो मनुष्य "शिव" शब्द का उच्चारण कर शरीर छोड़ता है , वह करोड़ों जन्मों के संचित पापों से मुक्त होकर (छुटकारा पाकर) मुक्ति को प्राप्त हो जाता है।✍️ 📕हरिवंश पुराण में एकादश (ग्यारह) रुद्र कह गए हैं -📕 *हरश्च बहुरूपश्च त्र्यंबकश्चापराजित:।* *वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा।।* *मृगव्याधश्च शर्वश्च कपाली च विशांपते।* *एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वरा:।।* 🌄इन 11 रूद्रों में सर्वश्रेष्ठ शंकर जी (शिव जी) में भगवान का विशेष प्रकाश है। ग्यारह रुद्र शंकर के ही विभिन्न रूप हैं। भक्त के सारे कष्टों का हरण कर उसकी कामनाएं सहज में पूरी कर देते हैं, इसलिए शंकर को "रूद्र" भी कहा जाता है - 🌄 *रुतम्-दु:खम् , द्रावयति - नाशयति इति रुद्र:* ✍️अर्थात् भक्तों के दुःखों से द्रवित होकर ही भोलेनाथ सभी दुःखों को नष्ट कर देते हैं।✍️ निरुक्तकार यास्क ने कहा है - *शेते अनेन इति शिवम् कल्याणमित्यर्थ:* ✍️अर्थात् सृष्टि में नित्य सुखमय आह्लाद व सहज विश्रांति के प्रदाता को शिव कहा गया है। कल्याण-प्रदाता एवं कल्याण कारक होने के कारण शंकर को शिव कहा गया है -✍️ *शिवं कल्याणं नित्यम्ऽस्येति शिव:।* 🕉️शिव तत्व की साकार मूर्ति को शंकर या हर जैसे अनेक संकट हर्ता नामों से संबोधित किया जाता है। ' शंकर ' शब्द की निरूक्ति - " शं तनोतु इति शंकर: " है। इसका अर्थ है संकटों का जो हरण करे , वह " शंकर " है। संकटों का हरणकर्ता होने के कारण ही उन्हें " हर - हर महादेव " कहा जाता है।🕉️ 🖼️रुद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है -🖼️ सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा शिवत्मिका ✍️अर्थात् सभी देवताओं की आत्मा में रुद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रुद्र की आत्मा हैं, इसलिए शिवजी को महादेव कहा जाता है। भगवान शंकर को इसलिए भी महादेव कहा जाता है क्योंकि वे देव, दानव, यक्ष, किन्नर , नाग, मनुष्य सभी के द्वारा पूजे जाते हैं।✍️ ‼️रुद्राभिषेक -‼️ 🤹किसी विशेष मनोरथ की पूर्ति के लिए तद्नुसार पूजन सामग्री तथा विधि से रुद्राभिषेक किया जाता है। जल से अभिषेक करने पर समय पर उत्तम वर्षा होती है तथा भक्त के रोग-शोक , दुःख - दारिद्र्य सभी नष्ट हो जाते हैं। असाध्य रोगों को शांत करने के लिए कुशायुक्त जल से रुद्राभिषेक किया जाता है।। भवन एवं वाहन प्राप्ति के लिए दही से रुद्राभिषेक होता है। लक्ष्मी प्राप्ति के लिए गन्ने के रस से, धन वृद्धि के लिए एवं पारिवारिक समृद्धि के लिए शहद एवं घी से रुद्राभिषेक किया जाता है। तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। इत्र मिले जल से अभिषेक करने से बीमारी नष्ट होती है और शरीर पुष्ट होता है। पुत्र प्राप्ति के लिए गो-दुग्ध से रुद्राभिषेक करना चाहिए। ज्वर की शांति हेतु शीतल गंगाजल से रुद्राभिषेक करें। सहस्त्रनाम मंत्रों का उच्चारण करते हुई घृत की धारा से रुद्राभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है। शक्कर मिले दूध से अभिषेक करने पर जड़ बुद्धि वाला (मूर्ख) भी विद्वान हो जाता है। सरसों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु पराजित होता है।🤹 🚩शिव पूजा में निषेध 🚩 🎇भगवान शिव की पूजा में हल्दी नहीं चढ़ाई जाती। शिव जी ने शंखचूड़ नामक असुर का वध किया था , इसलिए शंकर भगवान की पूजा में शंख वर्जित माना गया है। नारियल पानी से कभी भगवान शिव का अभिषेक नहीं करना चाहिए क्योंकि नारियल लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। तुलसी भी भगवान शिव को नहीं चढ़ाने चाहिए। रुद्र-अर्चना एवं रुद्राभिषेक से हमारे सभी कष्ट, दुःख एवं पाप निर्मूल होते हैं।🎇 🛐जब भक्त पूजा में भक्ति के साथ भाग लेते हैं, तो माना जाता है कि सामंजस्यपूर्ण ऊर्जा उनके जीवन में संतुलन, शांति और कल्याण की भावना लाती है। दिव्य आशीर्वाद की प्राप्ति: भगवान शिव का दिव्य आशीर्वाद पाने के लिए रुद्राभिषेक पूजा की जाती है।🛐 🙏भगवान भोलेनाथ की कृपा से संपूर्ण सृष्टि का कल्याण हो, सभी का जीवन संकट मुक्त, सुख- समृद्धि एवं आरोग्यता से परिपूर्ण हो, यही प्रार्थना है 🙏। 🙏 *हर हर महादेव* 🙏
sn vyas
742 views
13 days ago
यह कथा शिव पुराण के रुद्र संहिता (सृष्टि खंड) में विस्तार से आती है। यह कथा पवित्रता, पश्चाताप और भक्ति की एक अनुपम मिसाल है। #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #शिव पुराण 🌺 #प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏 #शिव पार्वती 1. कथा की पृष्ठभूमि और संध्या का पश्चाताप सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा जी ने अपने मन से कई मानस पुत्रों और एक अत्यंत सुंदर कन्या 'संध्या' की रचना की। एक बार कामदेव के प्रभाव से ब्रह्मा जी और उनके मानस पुत्रों के मन में संध्या को देखकर विकार उत्पन्न हो गया। यद्यपि यह स्थिति क्षणिक थी, लेकिन संध्या को जब इस बात का अहसास हुआ, तो उन्हें अत्यंत ग्लानि और पश्चाताप हुआ। संध्या ने विचार किया: "मेरे कारण मेरे पिता और भाइयों के मन में काम-विकार उत्पन्न हुआ। ऐसा रूप और शरीर किस काम का? मैं इस शरीर का त्याग करूँगी और तपस्या के बल से यह मर्यादा स्थापित करूँगी कि इस संसार में जन्म लेने वाला कोई भी जीव काम-वासना से अंधा होकर अपनी माँ, बहन या बेटी पर बुरी दृष्टि न डाले।" 2. चंद्रभाग पर्वत पर घोर तपस्या संध्या अपने शरीर का त्याग करने और मन की शुद्धि के लिए चंद्रभाग पर्वत (जहाँ से चंद्रभागा नदी निकलती है) पर चली गईं। वहाँ उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या शुरू की। संध्या को तपस्या की सही विधि ज्ञात नहीं थी, इसलिए भगवान शिव की प्रेरणा से महर्षि वशिष्ठ (जो ब्रह्मचारी के रूप में आए थे) ने उन्हें शिव-आराधना की उचित विधि और मंत्र सिखाया। संध्या ने निराहार रहकर और केवल जल-वायु का सेवन करते हुए हजारों वर्षों तक भगवान शिव की कठिन साधना की। 3. भगवान शिव का प्रकट होना और वरदान संध्या की निश्छल भक्ति और कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके समक्ष प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। संध्या ने शिवजी से तीन वरदान माँगे: काम-मर्यादा की स्थापना: "हे प्रभु! इस संसार में मनुष्य जन्मांध या अबोध बालक के रूप में तो काम-रहित रहता ही है, लेकिन जब वह युवा हो, तभी उसमें काम-भावना जागे। बाल्यकाल और वृद्धावस्था में काम-विकार किसी को पीड़ित न करे।" पतिव्रता धर्म की श्रेष्ठता: "त्रिलोक में मेरी जैसी कोई दूसरी पतिव्रता स्त्री न हो और जो भी मनुष्य मेरे इस चरित्र का स्मरण करे, वह पाप-मुक्त हो जाए।" शरीर का त्याग: "चूंकि इस शरीर पर काम-दृष्टि पड़ी थी, इसलिए मैं इसे त्यागना चाहती हूँ। मैं जिस पुरुष को अपने पति रूप में विचारूँ, वही मेरा पति बने।" भगवान शिव ने उनकी सभी इच्छाएँ स्वीकार कीं और कहा: "हे संध्या! तुम्हारी तपस्या से संसार में काम-मर्यादा स्थापित होगी। तुमने जिस अग्नि में शरीर त्यागने का संकल्प लिया है, वही अग्नि तुम्हें नया और परम पवित्र रूप प्रदान करेगी।" 4. यज्ञ कुंड में आत्म-दाह और अरुंधति के रूप में पुनर्जन्म शिवजी के अन्तर्ध्यान होने के बाद, संध्या उस समय चंद्रभाग पर्वत पर चल रहे महर्षि मेधातिथि के दिव्य यज्ञ के पास पहुँचीं। भगवान शिव के वरदान के अनुसार, संध्या ने मन ही मन महर्षि वशिष्ठ (जिन्होंने उन्हें तपस्या का मार्ग दिखाया था) को अपना पति स्वीकार किया। इसके बाद वे निर्भय होकर प्रज्वलित यज्ञ-कुंड की अग्नि में प्रविष्ट हो गईं। अग्निदेव ने उनके शरीर को दिव्य तेज में परिवर्तित कर दिया। सूर्यदेव ने उनके उस दिव्य तेज को ग्रहण कर अपने रथ के मंडलों में स्थापित किया, जिसे हम 'प्रातः संध्या' और 'सायं संध्या' (दिन और रात का मिलन काल) के रूप में पूजते हैं। यज्ञ-कुंड से संध्या एक परम पवित्र, निष्पाप और दिव्य कन्या के रूप में पुनः प्रकट हुईं। महर्षि मेधातिथि ने उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया और उनका नाम 'अरुंधति' (जिसका अर्थ है - जिसकी भक्ति और पतिव्रता धर्म को कोई रोक न सके) रखा। 5. महर्षि वशिष्ठ से विवाह और सप्तऋषि मंडल में स्थान आगे चलकर देवी अरुंधति का विवाह महर्षि वशिष्ठ के साथ संपन्न हुआ। वे अपने पतिव्रता धर्म और तपोबल के लिए समस्त ब्रह्मांड में पूजनीय हुईं। उनकी पवित्रता का मान रखते हुए उन्हें आकाश में सप्तऋषि मंडल (Seven Sages constellation) में महर्षि वशिष्ठ के ठीक बगल में स्थान दिया गया, जो आज भी 'वशिष्ठ-अरुंधति' नक्षत्र के रूप में चमकते हैं। 📖 पौराणिक सीख संध्या की यह कथा यह संदेश देती है कि आत्म-शुद्धि, पश्चाताप और कठोर संकल्प से व्यक्ति अपने जीवन के किसी भी कलंक या संकट को मिटाकर अमरता और सर्वोच्च सम्मान प्राप्त कर सकता है।
sn vyas
752 views
13 days ago
#प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏 #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #शिव पुराण 🌺 #शिव पुराण रुद्रसंहिता अंधकासुर का वध और उसका उद्धार यह कथा शिव पुराण के रुद्र संहिता (युद्ध खंड) में आती है, जो अंधकासुर के जन्म, उसके अहंकार, भगवान शिव के साथ युद्ध और अंततः उसके उद्धार (मुक्ति) की गाथा है। 1. अंधकासुर का दिव्य जन्म एक बार कैलाश पर्वत पर भगवान शिव ध्यान में मग्न थे। क्रीड़ा-कौतुक में देवी पार्वती ने पीछे से आकर भगवान शिव के दोनों नेत्रों को अपनी हथेलियों से ढक लिया। भगवान शिव के नेत्र बंद होते ही संपूर्ण ब्रह्मांड में अंधकार छा गया। उनके त्रिनेत्रों के तेज से देवी पार्वती के हाथों में पसीना आ गया। उस दिव्य पसीने की बूंदों से एक अत्यंत भयंकर, अंधा और अंधकारमय बालक प्रकट हुआ। अंधकार में जन्म लेने और अंधा होने के कारण उसका नाम 'अंधक' पड़ा। बाद में, जब दैत्यराज हिरण्याक्ष ने पुत्र-प्राप्ति के लिए तपस्या की, तो भगवान शिव ने अंधक को हिरण्याक्ष को दे दिया। 2. ब्रह्मा जी का वरदान और अहंकार हिरण्याक्ष के संरक्षण में बड़ा होकर अंधक दैत्यों का राजा बना। उसने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की। प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दिया: "कोई भी देव, दानव या मानव तुम्हारा वध नहीं कर सकेगा। तुम्हारी मृत्यु केवल तभी संभव होगी जब तुम अपनी ही माता के समान पूजनीय देवी पर कुदृष्टि डालोगे।" वरदान के अहंकार में अंधक ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। 3. माता पार्वती पर कुदृष्टि और शिव-अंधक युद्ध अहंकार में अंधे होकर अंधकासुर ने कैलाश पर आक्रमण कर दिया और देवी पार्वती को प्राप्त करने की दुष्ट चेष्टा की। यह देखकर भगवान शिव का क्रोध प्रज्वलित हो उठा। भगवान शिव और अंधकासुर के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। अंधकासुर के पास एक विशेष शक्ति थी—जैसे ही उसके रक्त की एक बूंद पृथ्वी पर गिरती, उससे सैकड़ों नए अंधकासुर पैदा हो जाते थे। इस समस्या का अंत करने के लिए भगवान शिव ने 'मातृकाओं' (सप्तमातृका) और देवी चामुंडा का सृजन किया, जिन्होंने अंधकासुर के रक्त की हर बूंद को पृथ्वी पर गिरने से पहले ही पी लिया। 4. त्रिशूल से प्रहार और अंधकासुर का उद्धार जब अंधकासुर का रक्त गिरना बंद हो गया, तब भगवान शिव ने अपने दिव्य त्रिशूल से अंधकासुर के वक्षस्थल पर प्रहार किया और उसे त्रिशूल की नोक पर उठा लिया। हजारों वर्षों तक अंधकासुर शिवजी के त्रिशूल पर टंगा रहा। त्रिशूल के दिव्य स्पर्श, शिवजी के सानिध्य और अपने सारे पापों के नष्ट हो जाने के बाद अंधकासुर का अज्ञान समाप्त हो गया। उसने त्रिशूल पर तड़पते हुए अपनी भूल स्वीकार की और भगवान शिव की स्तुति (शिव स्तोत्र) करना शुरू कर दिया: "हे महादेव! मैं अंधकार में था। मुझे क्षमा करें और अपने चरणों में स्थान दें।" भगवान शिव तो आशुतोष (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) हैं। अंधकासुर की सच्ची भक्ति और पश्चाताप देखकर शिवजी ने उसे अपने त्रिशूल से नीचे उतारा, उसके सारे पाप क्षमा किए और उसे अपने गणों का अध्यक्ष (गणपति) बनाकर 'भृंगी' नाम दिया।
sn vyas
621 views
15 days ago
#🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏 #शिव पुराण 🌺 #🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #🔱बम बम भोले🙏 1. अवंतिका (उज्जैन) और दुःशासन का अत्याचार शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता के अनुसार, अवंतिकापुरी (आधुनिक उज्जैन) में एक परम ज्ञानी और शिवभक्त वेदप्रिय नाम के ब्राह्मण अपने चार पुत्रों—देवप्रिय, प्रियमेध, संस्कृत और सुव्रत के साथ रहते थे। वे सभी परिवार सहित नित्य पार्थिव शिव लिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना करते थे। उसी काल में दुःशासन नाम का एक उग्र और अत्याचारी दैत्य था। ब्रह्मा जी से वरदान पाकर वह अत्यंत अहंकार से भर गया। उसने धार्मिक अनुष्ठानों को बंद करवा दिया और अंत में अवंतिकापुरी पर आक्रमण कर दिया। 2. ब्राह्मणों की भक्ति और दुःशासन का अंत दुःशासन अपने राक्षसों के साथ वेदप्रिय ब्राह्मण के घर में घुसा और चिल्लाया—"शिव पूजन बंद करो और मेरी पूजा करो, अन्यथा मैं तुम्हारा वध कर दूंगा!" ब्राह्मण पुत्रों ने बिना किसी भय के अपनी आंखें बंद कर लीं और शिवजी के ध्यान में लीन रहकर "ॐ नमः शिवाय" का जाप जारी रखा। जब दुःशासन ने तलवार उठाकर ब्राह्मणों पर वार करना चाहा, तभी पार्थिव शिवलिंग के स्थान पर एक भयंकर गड्ढा (कुंड) बन गया और उसमें से स्वयं भगवान शिव 'महाकाल' रूप में प्रकट हुए। भगवान शिव ने केवल अपनी 'हुंकार' (एक गर्जना) से दुःशासन और उसकी राक्षसी सेना को क्षण भर में भस्म कर दिया। 3. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना ब्राह्मणों और नगरवासियों की प्रार्थना पर भगवान शिव अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदा-सदा के लिए वहीं निवास करने लगे। वही पावन स्थल आज उज्जैन का प्रसिद्ध 'महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग' कहलाता है। 🚩 ऋषि वेदधर्म और उनके शिष्य प्रियमेध (गुरुभक्ति परीक्षा) 1. वेदधर्म की उग्र परीक्षा शिव पुराण के उमा संहिता / शतरुद्र संहिता के अंतर्गत गुरु-भक्ति की एक अद्भुत कथा आती है। ऋषि वेदधर्म (जिन्हें कई संदर्भों में वेदधर्म/वेदप्रिया भी कहा गया है) अपने शिष्यों की परीक्षा लेना चाहते थे। उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाया और कहा: "मैंने अपने पूर्वजन्मों के पाप कर्मों के कारण शरीर में भयानक कुष्ठ रोग और दरिद्रता का फल भोगने का निश्चय किया है। जो शिष्य 10 वर्षों तक मेरी इस अवस्था में निःस्वार्थ सेवा करेगा, वही मेरी विद्या का सच्चा अधिकारी होगा।" अधिकांश शिष्य कठिन परीक्षा के डर से चले गए, परंतु प्रियमेध नाम के शिष्य (जिन्हें कुछ कथाओं में मुंज या सत्यरथ भी कहा गया है) ने अपने गुरुदेव के चरणों में शीश नवाया और कहा कि वे जीवन भर उनकी सेवा करेंगे। 2. प्रियमेध की कठिन गुरु-सेवा ऋषि वेदधर्म काशी चले गए। वहाँ प्रियमेध ने अपने गुरु की हर संभव सेवा की: गुरुदेव का शरीर गल रहा था, तीव्र दुर्गंध आती थी और उनका स्वभाव अत्यधिक क्रोधी व चिड़चिड़ा हो गया था। गुरुदेव प्रियमेध पर कारण ही क्रोध करते, उन्हें मारते-पीटते और भोजन भी न देते। इसके बावजूद प्रियमेध नित्य मांगकर (भिक्षा से) गुरु के लिए भोजन लाते, उनके घावों को धोते और दिन-रात पैर दबाते रहते। 3. भगवान शिव का प्रकट होना और फल प्रियमेध की इस अलौकिक गुरु-भक्ति को देखकर स्वयं भगवान शिव और माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुए। शिवजी ने प्रियमेध को प्रत्यक्ष दर्शन दिए और कहा—"हे वत्स! तुम्हारी गुरु-भक्ति से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें मनचाहा वरदान देने आया हूँ।" प्रियमेध ने हाथ जोड़कर कहा: "हे महादेव! यदि आप प्रसन्न हैं, तो मेरे गुरुदेव का यह कुष्ठ रोग दूर कर दीजिए और उन्हें संपूर्ण आरोग्य प्रदान कीजिए।" तभी ऋषि वेदधर्म हँस पड़े और अपने दिव्य स्वरूप में आ गए। उन्होंने प्रियमेध को गले लगाया और कहा कि वे बीमार नहीं थे, बल्कि यह केवल उनकी भक्ति और धैर्य की परीक्षा थी। भगवान शिव के आशीर्वाद से प्रियमेध को संपूर्ण शास्त्रों का ज्ञान और परम पद प्राप्त हुआ। 📖 शिव पुराण संदर्भ दुःशासन वध प्रसंग: शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता (अध्याय 16-17)। वेदधर्म-प्रियमेध प्रसंग: शिव पुराण की उमा संहिता / शतरुद्र संहिता (गुरु-भक्ति माहात्म्य)।
sn vyas
1K views
19 days ago
#प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏 #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #शिव पुराण 🌺 वेश्या महानंदा और भगवान शिव की कथा 1. महानंदा का परिचय और उसका नियम प्राचीन काल में चंपकवती नगरी में महानंदा नाम की एक रूपवती वेश्या रहती थी। भले ही उसका व्यवसाय वेश्यावृत्ति था, लेकिन उसके मन में भगवान शिव के प्रति अटूट निष्ठा थी। महानंदा ने अपने जीवन में तीन कड़े नियम बना रखे थे: वह प्रतिदिन भगवान शिव का पूजन और रुद्राभिषेक करती थी। वह शिवभक्तों, संन्यासियों और अतिथियों का यथोचित आदर-सत्कार करती थी। वह प्रति सोमवार को किसी एक शिवभक्त को अपने घर आमंत्रित कर उसकी निःस्वार्थ सेवा करती थी और उसके बदले कोई मूल्य (धन) नहीं लेती थी। 2. भगवान शिव द्वारा परीक्षा महानंदा की निष्काम भक्ति की परीक्षा लेने के लिए भगवान शिव ने एक धनी वैश्य (व्यापारी) का रूप धारण किया। वे महानंदा के भवन पहुँचे। महानंदा ने उनका भव्य स्वागत किया। छद्मवेशी शिवजी ने महानंदा के सामने एक शर्त रखी: "मैं तुम्हारे यहाँ तभी ठहरूँगा जब तुम मेरे सबसे प्रिय आभूषण को अपने पास सुरक्षित रखोगी।" भगवान शिव ने अपने हाथ से एक अति दुर्लभ और बहुमूल्य कंगन (रत्नजटिल कड़ा) निकालकर महानंदा को सौंप दिया। महानंदा ने उस कंगन को अत्यंत सावधानी से अपने तिजोरी कक्ष में रख दिया। 3. कंगन की चोरी और महानंदा का संकट रात के समय, भगवान शिव ने अपनी माया से उस कंगन को वहाँ से गायब कर दिया। अगले दिन प्रातःकाल जब 'व्यापारी' (शिवजी) जाने लगे और उन्होंने अपना कंगन वापस माँगा, तो महानंदा कंगन लेने अंदर गई। परंतु कंगन वहाँ नहीं था! उसने पूरा घर छान मारा, लेकिन कंगन गायब हो चुका था। महानंदा घबराकर बाहर आई और सत्य स्वीकार करते हुए बोली कि कंगन चोरी हो गया है। उसने व्यापारी से प्रार्थना की कि वह उसके बदले अपनी सारी धन-दौलत, घर और संपत्ति लेने के लिए तैयार है। परंतु व्यापारी रूपी शिवजी ने क्रोध का नाटक करते हुए कहा: "मुझे तुम्हारी संपत्ति नहीं चाहिए! वह कंगन मेरी कुल-परंपरा की धरोहर थी। यदि तुम उसे नहीं लौटा सकती, तो तुम्हें शास्त्र के नियम के अनुसार अपने वचन की रक्षा के लिए मेरे साथ अग्नि में प्रवेश (अग्निपरीक्षा) करना होगा!" 4. महानंदा का त्याग और सत्यनिष्ठा महानंदा अपने सत्य धर्म और अतिथि-सेवा के वचन से पीछे नहीं हटी। उसने सहर्ष अग्नि में प्रवेश करना स्वीकार कर लिया। महानंदा ने विशाल चिता तैयार करवाई। उसने भगवान शिव का ध्यान किया और कहा—"हे महादेव! यदि मैंने जीवन में सच्चे मन से आपकी भक्ति की है और अतिथि धर्म का पालन किया है, तो मेरी यह सत्यनिष्ठा स्वीकार करें।" यह कहकर महानंदा निष्कंप भाव से जलती हुई अग्नि में कूद पड़ी। 5. भगवान शिव का प्रकट होना और मोक्ष जैसे ही महानंदा ने चिता में प्रवेश किया, वह अग्नि शीतल चंदन के समान बन गई! उसी क्षण भगवान शिव अपने वास्तविक चतुर्भुज रूप में प्रकट हो गए। उनके हाथ में वही 'गुम हुआ' कंगन शोभा पा रहा था। भगवान शिव ने महानंदा को उठाकर गले से लगाया और कहा: "हे महानंदे! मैं तुम्हारी भक्ति, सत्यनिष्ठा और अतिथि-धर्म से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुमने संसार को यह दिखा दिया कि भक्ति के मार्ग में जाति, कुल या अतीत का कोई बंधन नहीं होता।" भगवान शिव ने महानंदा को दिव्य देह प्रदान की और उसे अपने साथ कैलाश धाम ले गए। शिव पुराण संदर्भ यह कथा शिव पुराण की शतरुद्र संहिता और कोटिरुद्र संहिता के अंतर्गत आती है। यह प्रसंग यह संदेश देता है कि भगवान शिव के दरबार में बाहरी आवरण की नहीं, बल्कि केवल 'भाव और निष्ठा' की पूजा होती है।