सनातन संस्कृति

संस्कृति संग्रह 🚩
458 views
10 days ago
हज़ारों सालों से मनुष्य एक ही प्रश्न का उत्तर खोज रहा है— "मैं कौन हूँ?" उपनिषदों में ऋषियों ने इस प्रश्न का उत्तर 'महावाक्यों' के रूप में दिया है। महावाक्य केवल शब्द नहीं, बल्कि परम सत्य के द्वार हैं। आज हम अद्वैत वेदांत के उन चारों महावाक्यों को समझेंगे, जो बताते हैं कि आप और यह संपूर्ण ब्रह्मांड एक ही हैं। यहां आपसे तात्पर्य आपका शरीर नहीं बल्कि वह परम चैतन्य तत्व आत्मा से है। वीडियो में आगे बढ़ने से पहले हम सभी को यह ज्ञात होना चाहिए की वेदों के अनुसार उपनिषदों का किस प्रकार विभाजन किया गया है। मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार, मुख्य रूप से 108 उपनिषद माने गए हैं, जो चारों वेदों में इस प्रकार विभाजित हैं: ऋग्वेद के अंतर्गत 10 उपनिषद, शुक्ल यजुर्वेद के अंतर्गत 19, कृष्ण यजुर्वेद में 32, सामवेद में 16, और अथर्ववेद के अंतर्गत 31 उपनिषद आते हैं। प्रथम महावाक्य है प्रज्ञानं ब्रह्म यह वाक्य ऐतरेय उपनिषद से लिया गया है। 'प्रज्ञानं ब्रह्म' का अर्थ है, "चेतना ही ब्रह्म है।" यह हमें सिखाता है कि हमारे भीतर जो देखने, सुनने और अनुभव करने वाली शुद्ध चेतना है, वही ईश्वर है, वही परम सत्य है। ज्ञान का सर्वोच्च शिखर इसी 'प्रज्ञान' को पहचानना है। द्वितीय महावाक्य है 'अहं ब्रह्मास्मि' यह बृहदारण्यक उपनिषद का एक प्रसिद्ध महावाक्य है, जिसका अर्थ है "मैं ब्रह्म हूँ"। यह अद्वैत वेदांत का मूल है, जो आत्मा और परमात्मा की एकता को दर्शाता है। यह ब्रह्म ज्ञान के माध्यम से अहंकार को मिटाकर शाश्वत स्वरूप से जोड़ता है। इस वाक्य में 'मैं' का अर्थ व्यक्ति का शरीर या नाम नहीं, बल्कि वह अनंत चेतना है जो कभी मरती नहीं। यह बोध हमें डर, मोह और तुच्छता से मुक्त कर देता है। तीसरा और सबसे प्रसिद्ध महावाक्य है, 'तत्त्वमसि' सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद में ऋषि आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को यह उपदेश नौ बार देते हैं। जिसमें तत्: का अर्थ वह है मतलब परमात्मा या सर्वोच्च सत्ता और त्वम्: का अर्थ तुम हैै अर्थात जीवात्मा असि: का मतलब हो, अर्थात, "वह तुम हो।" पुनः ऋषि आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को एक उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार सागर की हर बूंद में सागर का ही गुण होता है, उसी प्रकार तुम भी उस अनंत ईश्वर के ही प्रतिरूप हो। तुम्हारे भीतर वही सामर्थ्य और वही दिव्यता है जो इस सृष्टि के कण-कण में है। 'तत्त्वमसि' वह बीज है, जो बोए जाने पर 'अहं ब्रह्मास्मि' का फल देता है। चौथा महावाक्य है अयम् आत्मा ब्रह्म' यह माण्डूक्य उपनिषद से लिया गया है। इसका सरल अर्थ है: "यह आत्मा ही ब्रह्म है।" भीतर जो चेतन तत्व है, जिसे हम 'मैं' कहते हैं, वह इस विशाल ब्रह्मांड के मूल आधार अर्थात 'ब्रह्म' से अलग नहीं है। जैसे एक घड़े के भीतर का आकाश और बाहर का अनंत आकाश एक ही है, वैसे ही शरीर के भीतर विद्यमान आत्मा और संपूर्ण चराचर जगत में व्याप्त परमात्मा एक ही हैं। यह वाक्य हमारे अज्ञान को मिटाकर हमें आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष की ओर ले जाता है। जब एक साधक इस सत्य को गहराई से अनुभव करता है, तो उसके भीतर से गर्जना होती है 'अहं ब्रह्मास्मि' की। जब हम जान लेते हैं कि हम ही वह 'ब्रह्म' हैं, तब संसार का दुख और द्वेष समाप्त हो जाता है। स्वयं को पहचानिए, क्योंकि आप अनंत हैं। इन चारों महावाक्य‌ का वर्णन एक श्लोक रूप में शुकरहस्योपनिषद में इस प्रकार मिलता है। अथ महावाक्यानि चल्वारि। ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म ॐ अहं ब्रह्मास्मि ॐ तत्त्वमसि ॐ अयम् आत्मा ब्रह्म तत्त्वमसीत्यभेदवाचकमिदं ये जपन्ति ते शिवसायुज्यमुक्तिभाजो भवन्ति॥ "जो लोग इस अभेदवाचक (जीव और ब्रह्म में अंतर न करने वाले) 'तत्त्वमसि' महावाक्य का जप करते हैं, वे भगवान शिव के सायुज्य मोक्ष (शिव के साथ पूर्ण रूप से एक हो जाने वाली मुक्ति) को प्राप्त करते हैं।" अद्वैत वेदांत के इन चार महावाक्यों के विषय में अपनी राय कमेंट में अवश्य बताएं। हरि ओम् #सनातन संस्कृति
sn vyas
592 views
1 months ago
#सनातन संस्कृति #सनातन संस्कृति कट्टर हिन्दू जुड़े #🕉️सनातन धर्म🚩 लेख सार : जीव का प्रभु से ही एकमात्र सनातन संबंध है । जीव को प्रभु पूरी आजादी देकर संसार में भेजते हैं । पर जो जीव संसार और माया में न उलझकर भक्ति द्वारा प्रभु प्राप्ति का ही लक्ष्‍य जीवन में रखता है वह प्रभु को अति प्रिय होता है । पूरा लेख नीचे पढ़ें - एक चिड़िया जो कि पिंजरे में कैद है और उस पिंजरे का द्वार खोल दिया जाए तो वह बाहर उड़ जाएगी । पर वह चिड़िया हमारे पास बहुत समय से रहती थी और हम उसे प्यार करते, खाना देते थे । इस प्यार के कारण उड़ जाने के बाद भी कुछ समय के बाद वह वापस पिंजरे में स्वतः ही आ जाए तो हमें कितना अच्छा लगेगा । हम सोचेंगे कि चिड़िया हमसे कितना प्यार करती है जिस कारण आजाद होने के बाद भी वह वापस पिंजरे में अपनी इच्छा से स्वतः आ गई । आजाद होने के बाद भी वह हमारे प्रेम बंधन में रहना चाहती है । ऐसे ही प्रभु ने हमें संसार में भेजकर आजाद कर दिया और अगर हम माया में न उलझकर प्रभु के प्रेम पिंजरे में स्वतः वापस आ जाते हैं तो प्रभु को कितना अच्छा लगेगा । प्रभु ने हमें सच्ची आजादी देकर संसार में भेजा है । हम संसार में, माया में अपना जीवन व्यतीत कर सकते हैं । अधिकतर लोग ऐसा करते भी हैं । पर कुछ बिरले जो कि प्रभु के सच्चे प्रेमी भक्त होते हैं वे इस संसार और माया को त्यागकर भक्ति के द्वारा प्रभु के सानिध्य में वापस आ जाते हैं । सच्चे भक्‍तों को कभी संसार और माया प्रभावित नहीं कर पाती । वे संसार और माया को लाँघकर प्रभु सानिध्य में वापस आ जाते हैं । भगवती मीराबाई की जीवनी में इसका जीवंत उदाहरण देखने को मिलता है । एक राजघराने में विवाह होने के बाद भी महल, दास, दासी, वस्त्र, आभूषण का सुख उन्‍हें बांध नहीं सका । वे प्रभु प्रेम में अपना जीवन व्यतीत करना चाहती थी और सब कुछ त्यागकर वे श्री वृंदावनजी आ गई । उन्होंने संसार और माया को त्यागकर प्रभु प्रेम में अपना जीवन व्यतीत किया । रानियों का और महल का सुख छोड़ना बड़ी परीक्षा थी पर वे भक्ति के कारण इसमें उत्तीर्ण हुई । उनकी भक्ति परिपक्व थी और अंत समय प्रभु दर्शन देकर सशरीर उन्हें अपने धाम ले गए । हम भी संसार में उड़ने के लिए स्वतंत्र हैं पर फिर भी माया से प्रभावित न होकर अगर हम प्रभु सानिध्य में रहने का मानस बनाते हैं तो प्रभु हमसे अति प्रसन्न होते हैं । जीवात्मा परमात्मा का अंश है । प्रभु चाहते हैं कि अंशी और अंश का साथ रहे पर माया बीच में आकर अंश को अंशी से दूर कर देती है । माया का यही कार्य है जो वह बड़ी निपुणता से करती है । पर जीव अगर अपने विवेक और बुद्धि से संभल जाए और माया के प्रभाव से बचकर प्रभु सानिध्य में आ जाए तो उसका निश्चित कल्याण हो जाता है । जैसे पिंजरे से मुक्त हुई चिड़िया के पिंजरे में वापस आने से हमें अच्छा लगता है क्योंकि हमें समझते देर न लगती है कि उसका हमसे सच्‍चा प्रेम है । इसी प्रकार संसार और माया को त्यागकर जो प्रभु सानिध्य में वापस आ जाता है प्रभु को वह जीव अत्‍यन्‍त प्रिय लगता है क्योंकि प्रभु जान लेते हैं कि वह जीव प्रभु से सच्चा प्रेम करता है । इसलिए जीव को चाहिए कि वह संसार और माया से प्रभावित न हो अपना रुझान सदैव प्रभु की तरफ रखे । ऐसे जीवों की प्रभु प्रतीक्षा करते हैं, उनकी बाट जोहते हैं । प्रभु हर जीव से प्रेम करते हैं पर जब वह जीव भी प्रभु से प्रेम करे तो प्रभु को सबसे ज्यादा प्रसन्नता होती है ।
Aayush Gupta
4.4K views
3 months ago
AI indicator
जय शिव शक्ति 🪬🔱 True love samajh na aaye… par agar ho, toh Shiv Shakti jaisa ho ❤️‍🔥 shaant ✨ shaktishaali 💫 aur anant Save karo ❤️ #Shivshakti #harharmahadev #DivineLove #bhakti #सनातन संस्कृति