sn vyas
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`नारायण🪷`
*_॥ अथ मार्कण्डेयमहापुराणे सप्ताधिकशततमोऽध्यायः — विश्वकर्मा कृतं सूर्यस्तोत्रम् ॥_*
`सन्दर्भ: — मार्कण्डेयमहापुराण , अध्याय १०७ — संज्ञा–विवस्वान् विवाह प्रसङ्ग । सूर्य का तेज असह्य होने पर उनकी पत्नी संज्ञा छाया को रखकर पिता के घर चली गईं । तब त्वष्टा विश्वकर्मा अपनी पुत्री संज्ञा के सुख हेतु एवं लोकहित के लिए सूर्य के तेज को शाण ( खराद ) पर चढ़ाकर क्षीण करने लगे ।`
`प्रसङ्ग: — जब प्रजापति विश्वकर्मा सूर्य को शाण यंत्र पर लिख ( घिस ) रहे थे , तब सूर्य का तेज छिलने से रोमांचित होकर , भय तथा भक्ति से भरकर उन्होंने विवस्वान् भगवान की यह स्तुति की । यह स्तोत्र सूर्य के स्वरूप का सर्वश्रेष्ठ निरूपण है ।`
*_लिख्यमाने ततो भानौ विश्वकर्मा प्रजापतिः ।_*
*_उद्भूतपुलकस्तोत्रमिदमूचे विवस्वतः ॥१॥_*
`श्लोकार्थ 👉🏻 तब भानु के शाण पर लिखे जाते समय पुलकित शरीर वाले प्रजापति विश्वकर्मा ने विवस्वान् के इस स्तोत्र का उच्चारण किया ।`
`भावार्थ 👉🏻 तेज को घटाना भी एक महान कार्य है , किन्तु विश्वकर्मा भय औऱ भक्ति से रोमांचित हैं — यह दर्शाता है कि सूर्य का तेज केवल भौतिक ही नहीं , अपितु चिन्मय भी है ।`
*_विवस्वते प्रणतहितानुकम्पिने महात्मने समजवसप्तसप्तये ।_*
*_सुतेजसे कमलकुलावबोधिने नमस्तमः पटलपटावपाटिने ॥२॥_*
`श्लोकार्थ 👉🏻 प्रणतों के हितैषी , कृपालु , सात अश्व वाले , उत्तम तेजस्वी , कमल–समूह के प्रबोधक , अंधकार–पटल के विदारक महात्मा विवस्वान् को नमस्कार ।`
`भावार्थ 👉🏻 सूर्य केवल प्रकाशक ही नहीं हैं , अपितु करुणा से झुके भक्तों पर अनुकम्पा करने वाले हैं । सप्तसप्ति — सात घोड़े — गायत्री आदि सात छन्द ही उनके अश्व हैं ।`
*_पावनातिशयपुण्य कर्मणे नैककामविषयप्रदायिने ।_*
*_भास्वरानलमयूखशायिने सर्वलोकहितकारिणे नमः ॥३॥_*
`श्लोकार्थ 👉🏻 अतिशय पावन पुण्य कर्मों के कारण , अनेक काम्य विषयों के दाता , देदीप्यमान अग्नि–किरणों के आश्रय , सर्वलोक हितकारी को नमस्कार ।`
`भावार्थ 👉🏻 सूर्य यज्ञ आदि पुण्य कर्मों के प्रवर्तक हैं , बिना सूर्य के कोई काम्य कर्म सिद्ध नहीं होता है ।`
*_अजाय लोकत्रयकारणाय भूतात्मने गोपतये वृषाय ।_*
*_नमो महाकारुणिकोत्तमाय सूर्याय चक्षुः प्रभवालयाय ॥४॥_*
`श्लोकार्थ 👉🏻 अजन्मा , तीनों लोकों के कारण , भूतों की आत्मा , रश्मिपति ( गो—किरण ) , धर्मस्वरूप , महाकारुणिकों में उत्तम , चक्षु इन्द्रिय के उत्पत्ति–स्थान सूर्य को नमस्कार ।`
`भावार्थ 👉🏻 सूर्य अज हैं परन्तु सबके जनक हैं । वृष — धर्म , गोपति — इन्द्रियों के स्वामी/पति भी हैं । आँखें उन्हीं से देखती हैं ।`
*_विवस्वते ज्ञानभृतामन्तरात्मने जगत्प्रतिष्ठाय जगद्धितैषिणे ।_*
*_स्वयम्भुवे लोकसमस्तचक्षुषे सुरोत्तमायामिततेजसे नमः ॥५॥_*
`श्लोकार्थ 👉🏻 ज्ञानियों की अन्तरात्मा , जगत् की प्रतिष्ठा , जगत्–हितैषी , स्वयम्भू , समस्त लोकों के नेत्र , देवश्रेष्ठ , अमित तेज वाले विवस्वान् को नमस्कार ।`
`भावार्थ 👉🏻 ज्ञानियों के हृदय में स्फुरित होने वाला आत्मप्रकाश सूर्य ही हैं , वे किसी से उत्पन्न नहीं , अपितू स्वयं भू हैं ।`
*_क्षणमुदयाचलमौलिमणिः सुरगणमहित हितो जगतः ।_*
*_त्वमुरुमयूखसहस्रवपुर्जगति विभासि तमांसि नुदन् ॥६॥_*
`श्लोकार्थ 👉🏻 क्षण भर के लिए उदयाचल के शिखर के मुकुटमणि बनकर, देवताओं से पूजित हो , जगत् के हित के लिए सहस्र किरण–वपु से अंधकार नाशते/मिटाते हुए आप शोभित होते हो ।`
`भावार्थ 👉🏻 उदयकाल ही सूर्यदेव का सर्वाधिक मनोहर रूप है — जैसे मुकुट की मणि ।`
*_भव तिमिरासवपानमदात् भवति विलोहित विग्रहात् ।_*
*_मिहिर विभासि यतः सुतरां त्रिभुवनभावनभानुभिः ॥७॥_*
`श्लोकार्थ 👉🏻 हे मिहिर ! अंधकाररूपी मदिरा पान के मद से आपके विग्रह का लोहित वर्ण होता है , जिससे आप त्रिभुवन को भावित करने वाली किरणों से औऱ अधिक शोभित होते हो ।`
`भावार्थ 👉🏻 प्रातःकाल एवं संध्या के समय की लाली कवि–उत्प्रेक्षा से तम–आसव का मद है — सुन्दर अलंकार का प्रयोग है ।`
*_रथमधिरुह्य समावयवं चारु विकम्पितमुरुरुचिरम् ।_*
*_सततमखिलहये भगवन् ! चरसि जगद्धिताय विततम् ॥८॥_*
`श्लोकार्थ 👉🏻 हे भगवन् ! समान अवयव वाले , सुन्दर , अत्यंत रुचिर , विकम्पित रथ पर आरूढ़ होकर सम्पूर्ण अश्वों के साथ निरन्तर जगत्–हित के लिए विचरण करते हो ।`
`भावार्थ 👉🏻 सूर्य का रथ संवत्सर–मय है — एक चक्र , सात अश्व । वे कभी रुकते नहीं — इसमें सतत लोकहित का भाव समाहित है ।`
*_अमृत सुधांशुरसेन समं विबुध ! पितॄनपि तर्पयसे ।_*
*_अरिगणसूदन ! तेन तव प्रणिपत्य लिखामि जगद्धिताय ॥९॥_*
`श्लोकार्थ 👉🏻 हे विबुध ! अमृतमय चन्द्र–रस के साथ देवताओं तथा पितरों को भी तृप्त करते हो , हे अरिसूदन ! इसलिए जगत्–हित के लिए प्रणाम कर तुम्हें लिख ( घिस ) रहा हूँ ।`
`भावार्थ 👉🏻 सूर्य शुक्ल पक्ष में देवताओं को , कृष्ण पक्ष में सुधाकिरणों से पितरों को तृप्त करते हैं । तेज कम करना भी जगत्–हित है — इसलिए क्षमा मांग रहे हैं ।`
*_शुकसमवर्णहयप्रथितंतव पदपांशुपवित्रतलम् ।_*
*_नत जनवत्सल! मां प्रणतं त्रिभुवनपावन ! पाहि रवे ! ॥१०॥_*
`श्लोकार्थ 👉🏻 शुक ( तोते ) के समान वर्ण वाले अश्वों के कारण प्रसिद्ध , तुम्हारी चरणधूलि ( किरण ) से पवित्र तल वाला मैं हूँ । हे नत–जन–वत्सल , त्रिभुवनपावन रवि ! इस प्रणत की रक्षा करो ।`
`भावार्थ 👉🏻 विश्वकर्मा कहते हैं — तुम्हारे घोड़ों के वर्ण का मैं निर्माता हूँ ( शुक–वर्ण–हरित अश्व ) , तथा तुम्हारी ही किरणों से पवित्र हूँ ।`
*_इति सकलजगत्प्रसूतिभूतंत्रिभुवनभावनधाम हेतुमेकम् ।_*
*_रविमखिलजगत्प्रदीपभूतं देवं प्रणतोऽस्मि विश्वकर्माणम् ॥११॥_*
`श्लोकार्थ 👉🏻 इस प्रकारसे सम्पूर्ण जगत् के प्रसूतिभूत , त्रिभुवन को पवित्र करने वाले तेज के एकमात्र हेतु , अखिल जगत् के प्रदीपभूत रवि देव को मैं प्रणाम करता हूँ ।`
`भावार्थ 👉🏻 उपसंहार — सूर्य ही जगत् की उत्पत्ति , पवित्रता औऱ प्रकाश के एकमात्र कारण हैं ।`
`आदित्याय नमो नमः☀️🚩`
`आप समस्त को सूर्यदेव की कृपा से तेजस्वी , आरोग्यमय प्रभात की मङ्गलकामना💐💐💐`
`शुभ रविवार ☀️ सूर्यदेव की कृपा आप समस्त पर बनी रहे💐💐💐`
`ॐ घृणि सूर्याय नमः🌹`
`ॐ भास्कराय नमः🌞`
`हर हर महादेव🔱`
`हर हर शङ्कर🚩`
`जय जय शङ्कर🚩`
`~सर्वज्ञ शङ्कर🚩`
`🌄🌄 प्रभात वन्दन 🌄🌄`
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