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जैसे व्यापक अग्नि काष्ठ आदि भिन्न-भिन्न आश्रयों में रहनेपर भी उनसे अलग नहीं जान पड़ती, परन्तु मन्थन करने पर वह प्रकट हो जाती है- वैसे ही परमात्मा सभी शरीरों में रहते हैं, अलग नहीं जान पड़ते। परन्तु विचारशील पुरुष हृदयमन्थन करके- उनके अतिरिक्त सभी वस्तुओं का बाध करके अन्ततः अपने हृदय में ही अन्तर्यामी रूपसे उन्हें प्राप्त कर लेते हैं। श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१/९ श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/1/9 #bhavishypuran #vedpuran #puranam #puranikyatra #mbapanditji #upanishads #shrimadbhagwat #shrimadbhagwatkatha #bhagwatkatha #bhagwat #bhagwatkathalive #भागवत #भागवतकथा #श्रीमद्भगवद्गीता #MBAPanditJi #PuranikYatra
MBAPanditJi - ShareChat
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