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दृश्य: वातावरण शांत है, लेकिन वायु में एक अजीब सी उदासी घुली हुई है। महाबली हनुमान, जो सदैव उत्साह और भक्ति से भरे रहते थे, आज अत्यंत व्यथित हैं। वे माता सीता के कक्ष में प्रवेश करते हैं। 1. हनुमान की व्याकुलता: हनुमान जी माता सीता के चरणों में आकर बैठ गए। उनका सिर झुका हुआ था और नेत्रों से अविरल अश्रु धारा बह रही थी। पृथ्वी पर वज्र के समान कठोर शरीर वाले हनुमान का हृदय आज मोम की तरह पिघल रहा था। माता सीता ने जब अपने लाडले पुत्र समान हनुमान की यह दशा देखी, तो वे विचलित हो उठीं। उन्होंने स्नेहपूर्वक पूछा, "कहो लाडले, आज यह कैसा रूप धरा है? तुम्हारे मुख पर यह कैसी उदासी छाई है? जिन नेत्रों में सदैव राम की छवि चमकती थी, आज उनमें यह नीर (आंसू) क्यों भरा है?" 2. अमरता का अस्वीकार: हनुमान जी ने रुंधे गले से उत्तर दिया, "हे माते! आपने मुझे लंका में अजर-अमर होने का वरदान दिया था। आपने मुझे अष्टसिद्धि और नवनिधि का स्वामी बनाया। किंतु माँ, आज मैं उन सभी वरदानों को लौटाने आया हूँ। मुझे यह अमरता नहीं चाहिए। मुझे अजर होने का वरदान नहीं चाहिए।" हनुमान जी सिसकते हुए बोले, "जिस जीवन में, जिस कालखंड में मुझे श्री राम के चरणों से दूर रहना पड़े, वह जीवन मुझे स्वीकार नहीं है। अमर रहकर मैं क्या करूँगा यदि मेरे राम ही मेरे पास न हों?" माता सीता मुस्कुराईं और आश्चर्य से बोलीं, "बेटा, यह तुम कैसी अबोध बालकों जैसी बात कर रहे हो? जिस अमृत और अमरता के लिए देवता भी तरसते हैं, असुर कठोर तपस्या करते हैं, तुम उसे ठुकरा रहे हो?" 3. प्रभु श्रीराम का आगमन: संवाद चल ही रहा था कि तभी प्रभु श्रीराम कक्ष में पधारे। माँ और बेटे के बीच गंभीर चर्चा देखकर वे रुक गए और स्नेह से बोले, "यहाँ माँ-बेटे में किस गंभीर विषय पर चर्चा चल रही है?" माता सीता ने प्रभु की ओर देखा और कहा, "ना जाने हनुमान को क्या हो गया है नाथ! यह अपना 'अजर-अमर' होने का वरदान मुझे लौटाने आया है। यह कहता है इसे अमरता नहीं चाहिए।" श्रीराम ने मुस्कुराते हुए हनुमान की ओर देखा और छेड़ते हुए कहा, "क्यों बजरंगी? यह कैसी नई लीला है? तीनों लोकों में कौन ऐसा होगा जो अमृत की कमाई और अमरता का सुख छोड़ेगा?" 4. विरह की वेदना: प्रभु के वचन सुनकर हनुमान जी का धैर्य टूट गया। वे फूट-फूट कर रो पड़े। उन्होंने कहा, "प्रभु! आप मुझे बहलाइए मत। मैं जानता हूँ कि आप अपनी लीला समाप्त कर साकेत धाम (वैकुंठ) पधार रहे हैं। आप मुझे इस धरती पर अकेला छोड़कर जा रहे हैं।" हनुमान जी ने अत्यंत करुण स्वर में कहा, "हे नाथ! आपके बिना यह अमरता मेरे लिए अभिशाप है। आपके बिना युगों-युगों तक जीवित रहना अमृत पीना नहीं, अपितु रोज विष पीने के समान होगा। इस विरह की अग्नि में तड़प-तड़प कर जीने से तो मृत्यु भली है। मुझे अपने साथ ले चलिए प्रभु।" हनुमान जी का यह प्रेम देखकर श्रीराम का हृदय भर आया। उन्होंने गंभीर होकर कहा, "हनुमान! तुम्हें रोकना मेरा स्वार्थ नहीं, संसार की आवश्यकता है। सीता का वह वरदान केवल तुम्हारे लिए नहीं, बल्कि समस्त जगत के कल्याण के लिए था। जब तक यह धरती रहेगी, धर्म की रक्षा के लिए तुम्हें यहाँ रहना होगा।" 5. अद्भुत वरदान: जहाँ राम कथा, वहाँ हनुमान: प्रभु ने कहा, "मांगो हनुमान! अपनी व्यथा दूर करने के लिए जो भी वरदान मांगना है, मांग लो।" हनुमान जी ने आँसू पोंछे और हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु, यदि मुझे यहाँ रहना ही है, तो मेरा एक ही वरदान है। जहाँ-जहाँ आपकी कथा हो, जहाँ-जहाँ आपका कीर्तन हो, जहाँ आपका नाम लिया जाए, वहाँ-वहां मुझे उपस्थित रहने का अधिकार मिले। मुझे उस कथा में, उस कीर्तन में वही आनंद मिले जो आपके सानिध्य में मिलता है।" माता सीता ने तुरंत कहा, "दे दो प्रभु! यह वरदान इन्हें दे दो।" भगवान राम ने हँसकर कहा, "सीते! तुम समझ नहीं रही हो कि यह क्या मांग रहा है। यह अनगिनत शरीर मांग रहा है। एक ही समय पर हज़ारों जगहों पर राम-कथा होगी, और यह हर जगह मौजूद रहने का वरदान मांग रहा है।" सीता जी ने वात्सल्य भाव से कहा, "तो दे दीजिये नाथ! आपका परम भक्त है, और क्या मांगेगा आपसे?" 6. कलयुग के देवता: तब प्रभु श्रीराम ने हनुमान जी के सिर पर हाथ रखा और कहा: > "तथास्तु! तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी बजरंगी। जहाँ भी मेरी चर्चा होगी, जहाँ भी रामायण का पाठ होगा, वहाँ तुम अदृश्य रूप में अवश्य विराजोगे। जहाँ मेरा चिंतन होगा, वहाँ तुम्हारा जिक्र अनिवार्य होगा।" प्रभु ने आगे एक और अद्भुत बात कही: "कलयुग में, हे हनुमान, मुझसे भी अधिक तुम्हारी पूजा होगी। जो कोई भी तुम्हारी शरण में आएगा, उसे मेरी भक्ति स्वतः प्राप्त हो जाएगी। तुम मेरे हर मंदिर की शोभा बढ़ाओगे। तुम भक्तों के रक्षक बनोगे और राम नाम की धुन पर सुध-बुध खोकर नाचोगे।" यह सुनते ही हनुमान जी का सारा दुख कपूर की तरह उड़ गया। वे आनंद से भर उठे और प्रभु के चरणों में शीश नवाया। उन्हें ज्ञात हो गया कि राम कहीं नहीं जा रहे, वे तो 'राम-नाम' और 'राम-कथा' के रूप में सदैव उनके पास ही रहेंगे। 🙏🏻जय सिया राम! जय हनुमान!🚩 #जय श्री राम
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