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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#☝आज का ज्ञान जामवंत रामायण के एक ऐसे पात्र हैं जिनके विषय में बहुत विस्तार से नहीं लिखा गया है। हालाँकि रामायण में ही उनके विषय में केवल एक-दो चीजें ऐसी बताई गयी है जिनसे आप उनके बल के बारे में अनुमान लगा सकते हैं। आइये उन्हें देखते हैं। पहली बात तो जामवंत सतयुग के व्यक्ति थे। अब सतयुग में निःसंदेह योद्धा अन्य युगों की अपेक्षा बहुत अधिक शक्तिशाली होते थे। उनकी उत्पत्ति सीधे ब्रह्माजी से बताई गयी है। अब परमपिता ब्रह्मा से जो जन्मा हो उसकी शक्ति के बारे में तो केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। रामचरितमानस में उनके पराक्रम के बारे में दो घटना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन दोनों स्थानों पर जामवंत का युद्ध रावण और मेघनाद के साथ हुआ था जिसमें दोनों को जामवंत ने अपने पाद प्रहार से मूर्छित कर दिया था। मेघनाद की शक्ति तो उन्होंने अपने हाथों से ही पकड़ कर पलट दी थी। अत्यंत वृद्धावस्था में भी जो रावण और मेघनाद जैसे योद्धाओं को अपने घात से मूर्छित कर दे, जरा सोचिये युवावस्था में उसका बल क्या होगा। जब द्वापर आया और जामवंत और अधिक बूढ़े हो गए, उस समय उनका युद्ध श्रीकृष्ण से हुआ था। जनमवंत को परास्त करने के लिए श्रीकृष्ण को उनसे एक-दो नहीं बल्कि 28 दिनों तक युद्ध करना पड़ा। स्वयं परमेश्वर कृष्ण को जिसे परास्त करने में अट्ठाइस दिन लग गए हों, वो भी वृद्धावस्था में, जवानी में उनके बल के बारे में हम केवल अनुमान ही लगा सकते हैं। जब सीता माता को खोजने के लिए समुद्र लांघने की बात चल रही थी उस समय जामवंत कहते हैं कि "मैं तो अब बहुत बूढ़ा हो गया हूँ, फिर भी इस समुद्र में मैं 90 योजन तक जा सकता हूँ।" हनुमान जी अपनी युवावस्था में 100 योजन छलांग गए, जामवंत की आयु उस समय 6 मन्वन्तर की बताई गयी है। एक मन्वन्तर तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्षों का होता है, फिर भी वे 90 योजन तक जाने की क्षमता रखते थे, इसी से उनके बल का पता चलता है। इस वार्तालाप के दौरान उन्होंने युवावस्था में अपने बल के बारे में दो बातें बताई जिसे ध्यान से सुनना आवश्यक है। इससे आपको जामवंत की वास्तविक शक्ति का पता चलेगा। पहली घटना तब की है जब समुद्र मंथन चल रहा था जिसे देवता और दैत्य मिलकर बड़ी मुश्किल से कर पा रहे थे। उस समय जामवंत ने अपनी जवानी के जोश में एक बार अकेले ही सम्पूर्ण मंदराचल पर्वत को घुमा दिया था। मंदराचल को अकेले घुमाने के लिए कितनी शक्ति चाहिए होगी, क्या आपको अंदाजा है? दूसरी घटना भगवान विष्णु के वामन अवतार की है। जब श्रीहरि ने विराट स्वरुप लिया और एक पैर से स्वर्ग को नाप लिया। फिर जब उन्होंने अपना पैर पृथ्वी को नापने के लिए उठाया, उस दौरान जामवंत ने केवल 7 पल में पृथ्वी की सात परिक्रमा कर ली थी। जरा सोचिये महावीर हनुमान एक ही रात में लंका से सैकड़ों योजन दूर से पर्वत शिखर उखाड़ कर ले आये लेकिन जामवंत ने केवल सात पल में पृथ्वी की सात परिक्रमा कर ली थी। एक पल लगभग 24 सेकंड का होता है। क्या आप उनकी गति का अनुमान लगा सकते हैं? उस उनके बल का ऐसा वर्णन सुनकर जब अंगद उनसे पूछते हैं कि उनका बल क्षीण कैसे हुआ? तब वे बताते हैं कि जब वे पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे थे तो अंतिम परिक्रमा के समय उनके पैर के अंगूठे का नाख़ून महामेरु पर्वत से छू गया, जिससे उसका शिखर खंडित हो गया। इसे अपना अपमान मानते हुए मेरु ने जामवंत को ये श्राप दे दिया कि वो सदा के लिए बूढ़ा हो जाएगा और उसका बल क्षीण हो जाएगा। आशा है आपको जामवंत की शक्ति का कुछ अंदाजा हो गया होगा। किन्तु इतने शक्तिशाली होने के बाद भी उनमें लेश मात्र भी घमंड नहीं था। जय श्रीराम।🙏🏻
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#🕉️सनातन धर्म🚩 🌸🌹🌸🌹🌸~पांच प्रकार के यज्ञ~🌸🌹🌸🌹🌸 ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव । यद् भद्रं तन्न आ सुव ॥ 🔥 यजुभावार्थ : हे सब सुखों के दाता ज्ञान के प्रकाशक सकल जगत के उत्पत्तिकर्ता एवं समग्र ऐश्वर्ययुक्त परमेश्वर! आप हमारे सम्पूर्ण दुर्गुणों, दुर्व्यसनों और दुखों को दूर कर दीजिए, और जो कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव, सुख और पदार्थ हैं, उसको हमें भलीभांति प्राप्त कराइये। ☘️ वेदानुसार पांच प्रकार के यज्ञ होते हैं 1. ब्रह्मयज्ञ, 2. देवयज्ञ, 3. पितृयज्ञ, 4. वैश्वदेव यज्ञ, 5. अतिथि यज्ञ। उक्त पांच यज्ञों को पुराणों और अन्य ग्रंथों में विस्तार दिया गया है। वेदज्ञ सार को पकड़ते हैं विस्तार को नहीं। 🌼 1.ब्रह्मयज्ञ:---जड़ और प्राणी जगत से बढ़कर है मनुष्य। मनुष्य से बढ़कर है पितर, अर्थात माता-पिता और आचार्य। पितरों से बढ़कर हैं देव, अर्थात प्रकृति की पांच शक्तियां, देवी-देवता और देव से बढ़कर है- ईश्वर और हमारे ऋषिगण। ईश्वर अर्थात ब्रह्म। यहब्रह्म यज्ञसंपन्न होता है नित्य संध्यावंदन, स्वाध्याय तथा वेदपाठ करने से। इसके करने से ऋषियों का ऋण अर्थात 'ऋषि ऋण' चुकता होता है। इससे ब्रह्मचर्य आश्रम का जीवन भी पुष्ट होता है। ☘️ 2.देवयज्ञ:---देवयज्ञ जो सत्संग तथा अग्निहोत्र कर्म से सम्पन्न होता है। इसके लिए वेदी में अग्नि जलाकर होम किया जाता है यही अग्निहोत्र यज्ञ है। यह भी संधिकाल में गायत्री छंद के साथ किया जाता है। इसे करने के नियम हैं। इससे 'देव ऋण' चुकता होता है।हवन करने को 'देवयज्ञ' कहा जाता है। हवन में सात पेड़ों की समिधाएं (लकड़ियां) सबसे उपयुक्त होतीं हैं- आम, बड़, पीपल, ढाक, जांटी, जामुन और शमी। हवन से शुद्धता और सकारात्मकता बढ़ती है। रोग और शोक मिटते हैं। इससे गृहस्थ जीवन पुष्ट होता है। 🔥 3.पितृयज्ञ:---सत्य और श्रद्धा से किए गए कर्म श्राद्ध और जिस कर्म से माता, पिता और आचार्य तृप्त हो वह तर्पण है। वेदानुसार यह श्राद्ध-तर्पण हमारे पूर्वजों, माता-पिता और आचार्य के प्रति सम्मान का भाव है। यह यज्ञ सम्पन्न होता है सन्तानोत्पत्ति से। इसी से 'पितृ ऋण' भी चुकता होता है। ☘️ 4.वैश्वदेवयज्ञ:---इसे भूत यज्ञ भी कहते हैं। पंच महाभूत से ही मानव शरीर है। सभीप्राणियों तथा वृक्षों के प्रति करुणा और कर्त्तव्य समझना उन्हें अन्न-जल देनाही भूत यज्ञ या वैश्वदेव यज्ञ कहलाता है। अर्थात जो कुछ भी भोजन कक्ष में भोजनार्थ सिद्ध हो उसका कुछ अंश उसी अग्नि में होम करें जिससे भोजन पकाया गया है। फिर कुछ अंश गाय, कुत्ते और कौवे को दें। ऐसा वेद-पुराण कहते हैं। 🌼 5.अतिथि यज्ञ:---अतिथि से अर्थ मेहमानों की सेवा करना उन्हें अन्न-जल देना। अपंग,महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना ही अतिथि यज्ञ है। इससे संन्यास आश्रम पुष्ट होता है। यही पुण्य है। यही सामाजिक कर्त्तव्य है। ☘️ अंतत: उक्त पांच यज्ञों के ही पुराणों में अनेक प्रकार और उप-प्रकार हो गए हैं जिनके अलग-अलग नाम हैं और जिन्हें करने की विधियां भी अलग-अलग हैं किंतु मुख्यत: यह पांच यज्ञ ही माने गए हैं। इसके अलावा अग्निहोत्र, अश्वमेध, वाजपेय, सोमयज्ञ, राजसूय और अग्निचयन का वर्णण यजुर्वेद में मिलता है किंतु इन्हें आज जिस रूप में किया जाता है पूर्णत: अनुचित है। यहां लिखे हुए यज्ञ के अलावा अन्य किसी प्रकार के यज्ञ नहीं होते। यज्ञकर्म को कर्त्तव्य व नियम के अंतर्गत माना गया है। 🔥 'यज्ञ' का अर्थ आग में घी डालकर मंत्र पढ़ना नहीं होता। यज्ञ का अर्थ है- शुभ कर्म। श्रेष्ठ कर्म। सतकर्म। वेदसम्मत कर्म। सकारात्मक भाव से ईश्वर-प्रकृति तत्वों से किए गए आह्वान से जीवन की प्रत्येक इच्छा पूरी होती है। मांगो, विश्वास करो और फिर पा लो। यही है यज्ञ का रहस्य। ☘️🙏🏻🌼☘️🙏🏻🌼☘️🙏🏻🌼☘️🙏🏻🌼☘️🙏🏻🌼☘️
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#🕉️सनातन धर्म🚩 🧘आत्म-दर्शन के भाव🧘 🕉️ईश्वर का संकेत : मौन में उतरती दिव्यता🕉️ 👩‍❤️‍👩मनुष्य प्रायः ईश्वर की उपस्थिति को बाह्य घटनाओं, शब्दों और चमत्कारों में खोजता है। उसे प्रतीत होता है कि यदि ईश्वर कुछ कहना चाहते हैं, तो वह स्पष्ट, ऊँचे स्वर में और सबके सामने होगा। किंतु भारतीय आध्यात्मिक परंपरा एक भिन्न सत्य की ओर संकेत करती है। ईश्वर का संवाद न तो भीड़ में होता है और न ही शोर में। वह संकेतों के रूप में आता है, और वे संकेत तभी पहचाने जाते हैं जब मन शांत हो, अहं शिथिल हो और चित्त भीतर की ओर उन्मुख हो। ईश्वर का संकेत शोर नहीं करता, वह भीतर उतरता है। जो संकेत सबके लिए होते हैं, वे स्वतः साझा हो जाते हैं और समाज, शास्त्र तथा परंपरा में उनका स्वरूप स्पष्ट दिखाई देता है। करुणा, सत्य, संयम, क्षमा और सेवा जैसे मूल्य किसी एक व्यक्ति की खोज नहीं हैं; वे सार्वभौमिक हैं और मानवता की सामूहिक चेतना में पहले से विद्यमान हैं।👩‍❤️‍👩 🛐किन्तु जो संकेत केवल किसी एक साधक के लिए होते हैं, वे उसकी आत्मा की निजी निधि होते हैं। उन्हें अनावश्यक रूप से व्यक्त करना या प्रमाणित करने का प्रयास करना, उन्हें अहंकार के क्षेत्र में ले जाना है। जैसे बीज को यदि समय से पहले मिट्टी से निकाल दिया जाए, तो वह नष्ट हो जाता है, वैसे ही व्यक्तिगत ईश्वरीय संकेत भी तभी सुरक्षित रहते हैं जब वे मौन में सँजोए जाएँ।🛐 📕भारतीय दर्शन ईश्वर को अंतर्यामी कहता है जो बाहर नहीं, भीतर निवास करता है। उपनिषद बार-बार स्मरण कराते हैं कि सत्य शब्दों से नहीं पकड़ा जाता; वह अनुभूति है। जब चित्त की वृत्तियाँ शांत होती हैं और मन अपेक्षाओं के भार से मुक्त होता है, तभी ईश्वर का संकेत स्पष्ट होता है। शोर अहं का स्वभाव है और मौन आत्मा की पहचान। जैसे-जैसे साधक मौन में स्थिर होना सीखता है, वैसे-वैसे संकेत जीवन में उतरकर कर्म का स्वरूप ग्रहण करते हैं।🛐 🧘जो साधक अपने अनुभवों को भीतर धारण कर सकता है, वही उन्हें जीवन में साकार कर पाता है। ईश्वर का सान्निध्य बाहरी स्वीकृति या सामाजिक मान्यता से सिद्ध नहीं होता; वह आंतरिक निष्ठा, विवेक और मौन-साधना से प्रकट होता है।🧘 🤹ईश्वर की कृपा से आपके जीवन में ऐसा मौन उतरे, जिसमें आप अपने भीतर उठते दिव्य संकेतों को पहचान सकें, उन्हें सुरक्षित रख सकें और अहंकार से मुक्त होकर उन्हें अपने आचरण में उतार सकें। आपकी साधना शब्दों से नहीं, जीवन से बोले यही सच्ची भक्ति और यही आत्म-दर्शन है। अंततः यही बोध स्थिर होता है कि ईश्वर का मार्ग बाहर की चमक, प्रदर्शन और घोषणाओं से नहीं गुजरता। वह भीतर की शांति, सजगता और मौन से होकर जाता है। जो इस मौन में टिक जाता है, वही संकेतों की भाषा समझ पाता है; और जो संकेतों की भाषा समझ लेता है, उसका जीवन स्वयं एक मौन उपदेश बन जाता है।🤹 ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु । यद्दीदयच्दवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम् ॥ वृंदा, वृन्दावनी, विश्वपुजिता, विश्वपावनी । पुष्पसारा, नंदिनी च तुलसी, कृष्णजीवनी ॥ एत नाम अष्टकं चैव स्तोत्र नामार्थ संयुतम् । यः पठेत् तां सम्पूज्य सौभाग्यं मेघफलं लभेत् ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः। 🙏🚩 शुभ गुरुवार 🌹 शुभ प्रभात वंदन 🌹🙏
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#❤️जीवन की सीख #👫 हमारी ज़िन्दगी ‘सुखों की परछाई’ एक रानी अपने गले का हीरों का हार निकाल कर खूँटी पर टाँगने वाली ही थी कि एक बाज आया और झपटा मारकर हार ले उड़ा। चमकते हीरे देखकर बाज ने सोचा कि खाने की कोई चीज होगी। वह नाले के किनारे एक पेड़ पर जा बैठा और खाने की कोशिश करने लगा। हीरे तो कठोर होते हैं, उसने चोंच मारी तो दर्द से कराह उठा। उसे समझ में आ गया कि यह उसके काम की चीज नहीं है। वह हार को उसी पेड़ पर लटकता छोड़ उड़ गया। रानी को वह हार प्राणों सा प्यारा था। उसने राजा से कह दिया कि हार का तुरन्त पता लगवाइए वरना वह खाना-पीना छोड़ देगी। राजा ने कहा कि दूसरा हार बनवा देगा लेकिन उसने जिद पकड़ ली कि उसे वही हार चाहिए। सब ढूँढ़ने लगे पर किसी को हार मिला ही नहीं। रानी तो कोप भवन में चली गई थी। हारकर राजा ने यहाँ तक कह दिया कि जो भी वह हार खोज निकालेगा उसे वह आधे राज्य का अधिकारी बना देगा। अब तो होड़ लग गई। राजा के अधिकारी और प्रजा सब आधे राज्य के लालच में हार ढूँढ़ने लगे। अचानक वह हार किसी को एक गन्दे नाले में दिखा। हार दिखाई दे रहा था, पर उसमें से बदबू आ रही थी, फिर भी राज्य के लोभ में एक सिपाही कूद गया। बहुत हाथ-पांव मारा, पर हार नहीं मिला। फिर सेनापति ने देखा और वह भी कूद गया। दोनों को देख कुछ उत्साही प्रजा जन भी कूद गए, फिर मंत्री भी कूद गये। इस तरह जितने नाले से बाहर थे उससे ज्यादा नाले के भीतर खड़े उसका मंथन कर रहे थे। लोग आते रहे और कूदते रहे परन्तु हार मिला किसी को नहीं। जैसे ही कोई नाले में कूदता वह हार दिखना बन्द हो जाता, थककर वह बाहर आकर दूसरी तरफ खड़ा हो जाता। आधे राज्य का लालच ऐसा कि बड़े-बड़े ज्ञानी, राजा के प्रधानमंत्री सब कूदने को तैयार बैठे थे। सब लड़ रहे थे कि पहले मैं नाले में कूदूँगा तो पहले मैं। अजीब सी होड़ थी। इतने में राजा को खबर लगी, राजा को भय हुआ कि आधा राज्य हाथ से निकल जाए, क्यों न मैं ही कूद जाऊँ उसमें ? राजा भी कूद गया। एक सन्त गुजरे उधर से, उन्होंने राजा, प्रजा, मंत्री, सिपाही सबको कीचड़ में सना देखा तो चकित हुए और वह पूछ बैठे–‘क्या इस राज्य में नाले में कूदने की कोई परम्परा है ?’ लोगों ने सारी बात कह सुनाई। संत हंसने लगे–‘भाई ! किसी ने ऊपर भी देखा ? ऊपर देखो, वह टहनी पर लटका हुआ है। नीचे जो तुम देख रहे हो, वह तो उसकी परछाई है।’ राजा सहित सभी जन बहुत शर्मिंदा हुए। हम सब भी उस राज्य के लोगों की तरह बर्ताव कर रहे हैं। हम जिस सांसारिक चीज में सुख-शांति और आनन्द देखते हैं दरअसल वह उसी हार की तरह है जो क्षणिक सुखों के रूप में परछाई की तरह दिखाई देता है। हम भ्रम में रहते हैं कि यदि अमुक चीज मिल जाए तो जीवन बदल जाए, सब अच्छा हो जाएगा। लेकिन यह सिलसिला तो अंतहीन है। सांसारिक चीजें सम्पूर्ण सुख दे ही नहीं सकतीं। सुख शांति हीरों का हार तो है लेकिन वह परमात्मा में लीन होने से मिलेगा। बाकी तो सब उसकी परछाई है। ~~~०~~~ ‘जय जय श्री राधे’ ***********************************************
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#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣0️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) शततमोऽध्यायः शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 310) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच (इत्युक्त्वा सा महाभागा तत्रैवान्तरधीयत ।) तयैवं समनुज्ञातः पुत्रमादाय शान्तनुः ।। ४० ।। भ्राजमानं यथादित्यमाययौ स्वपुरं प्रति । पौरवस्तु पुरीं गत्वा पुरन्दरपुरोपमाम् ।। ४१ ।। सर्वकामसमृद्धार्थ मेने सोऽऽत्मानमात्मना । पौरवेषु ततः पुत्रं राज्यार्थमभयप्रदम् ।। ४२ ।। गुणवन्तं महात्मानं यौवराज्येऽभ्यषेचयत् । पौरवाञ्छान्तनोः पुत्रः पितरं च महायशाः ।। ४३ ।। राष्ट्रं च रञ्जयामास वृत्तेन भरतर्षभ । स तथा सह पुत्रेण रममाणो महीपतिः ।। ४४ ।। वर्तयामास वर्षाणि चत्वार्यमितविक्रमः । स कदाचिद् वनं यातो यमुनामभितो नदीम् ।। ४५ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- ऐसा कहकर महाभागा गंगादेवी वहीं अन्तर्धान हो गयीं। गंगाजीके इस प्रकार आज्ञा देनेपर महाराज शान्तनु सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले अपने पुत्रको लेकर राजधानीमें आये। उनका हस्तिनापुर इन्द्रनगरी अमरावतीके समान सुन्दर था। पूरुवंशी राजा शान्तनु पुत्रसहित उसमें जाकर अपने-आपको सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न एवं सफलमनोरथ मानने लगे। तदनन्तर उन्होंने सबको अभय देनेवाले महात्मा एवं गुणवान् पुत्रको राजकाजमें सहयोग करनेके लिये समस्त पौरवोंके बीचमें युवराज-पदपर अभिषिक्त कर दिया। जनमेजय ! शान्तनुके उस महायशस्वी पुत्रने अपने आचार-व्यवहारसे पिताको, पौरवसमाजको तथा समूचे राष्ट्रको प्रसन्न कर लिया। अमितपराक्रमी राजा शान्तनु ने वैसे गुणवान् पुत्र के साथ आनन्दपूर्वक रहते हुए चार वर्ष व्यतीत किये। एक दिन वे यमुना नदीके निकटवर्ती वनमें गये ।। ४०-४५ ।। महीपतिरनिर्देश्यमाजिघ्रद् गन्धमुत्तमम् । तस्य प्रभवमन्विच्छन् विचचार समन्ततः ।। ४६ ।। वहाँ राजाको अवर्णनीय एवं परम उत्तम सुगन्धका अनुभव हुआ। वे उसके उद्गमस्थानका पता लगाते हुए सब ओर विचरने लगे ।। ४६ ।। स ददर्श तदा कन्यां दाशानां देवरूपिणीम् । तामपृच्छत् स दृष्ट्वैव कन्यामसितलोचनाम् ।। ४७ ।। घूमते-घूमते उन्होंने मल्लाहोंकी एक कन्या देखी, जो देवांगनाओंके समान रूपवती थी। श्याम नेत्रोंवाली उस कन्याको देखते ही राजाने पूछा- ।। ४७ ।। कस्य त्वमसि का चासि किं च भीरु चिकीर्षसि । साब्रवीद् दाशकन्यास्मि धर्मार्थ वाहये तरिम् ।। ४८ ।। पितुर्नियोगाद् भद्रं ते दाशराज्ञो महात्मनः । रूपमाधुर्यगन्धैस्तां संयुक्तां देवरूपिणीम् ।। ४९ ।। समीक्ष्य राजा दाशेयीं कामयामास शान्तनुः । स गत्वा पितरं तस्या वरयामास तां तदा ।। ५० ।। 'भीरु! तू कौन है, किसकी पुत्री है और क्या करना चाहती है?' वह बोली- 'राजन् ! आपका कल्याण हो। मैं निषादकन्या हूँ और अपने पिता महामना निषादराजकी आज्ञासे धर्मार्थ नाव चलाती हूँ।' राजा शान्तनुने रूप, माधुर्य तथा सुगन्धसे युक्त देवांगनाके तुल्य उस निषादकन्याको देखकर उसे प्राप्त करनेकी इच्छा की। तदनन्तर उसके पिताके समीप जाकर उन्होंने उसका वरण किया ।। ४८-५० ।। पर्यपूच्छत् ततस्तस्याः पितरं सोऽऽत्मकारणात् । स च तं प्रत्युवाचेदं दाशराजो महीपतिम् ।। ५१ ।। उन्होंने उसके पितासे पूछा- 'मैं अपने लिये तुम्हारी कन्या चाहता हूँ।' यह सुनकर निषादराजने राजा शान्तनुको यह उत्तर दिया- ।। ५१ ।। जातमात्रैव मे देया वराय वरवर्णिनी । हृदि कामस्तु मे कश्चित् तं निबोध जनेश्वर ।। ५२ ।। 'जनेश्वर ! जबसे इस सुन्दरी कन्याका जन्म हुआ है, तभीसे मेरे मनमें यह चिन्ता है कि इसका किसी श्रेष्ठ वरके साथ विवाह करना चाहिये; किंतु मेरे हृदयमें एक अभिलाषा है, उसे सुन लीजिये ।। ५२ ।। यदीमां धर्मपत्नीं त्वं मत्तः प्रार्थयसेऽनघ । सत्यवागसि सत्येन समयं कुरु मे ततः ।। ५३ ।। 'पापरहित नरेश! यदि इस कन्याको अपनी धर्मपत्नी बनानेके लिये आप मुझसे माँग रहे हैं, तो सत्यको सामने रखकर मेरी इच्छा पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कीजिये; क्योंकि आप सत्यवादी हैं ।। ५३ ।। समयेन प्रदद्यां ते कन्यामहमिमां नृप । न हि मे त्वत्समः कश्चिद् वरो जातु भविष्यति ।। ५४ ।। 'राजन्! मैं इस कन्याको एक शर्तके साथ आपकी सेवामें दूँगा। मुझे आपके समान दूसरा कोई श्रेष्ठ वर कभी नहीं मिलेगा' ।। ५४ ।। शान्तनुरुवाच श्रुत्वा तव वरं दाश व्यवस्येयमहं तव । दातव्यं चेत् प्रदास्यामि न त्वदेयं कथंचन ।। ५५ ।। शान्तनुने कहा- निषाद ! पहले तुम्हारे अभीष्ट वरको सुन लेनेपर मैं उसके विषयमें कुछ निश्चय कर सकता हूँ। यदि देनेयोग्य होगा, तो दूँगा और देनेयोग्य नहीं होगा, तो कदापि नहीं दे सकता ।। ५५ ।। दाश उवाच अस्यां जायेत यः पुत्रः स राजा पृथिवीपते । त्वदूर्ध्वमभिषेक्तव्यो नान्यः कश्चन पार्थिव ।। ५६ ।। निषाद बोला- पृथ्वीपते ! इसके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हो, आपके बाद उसीका राजाके पदपर अभिषेक किया जाय, अन्य किसी राजकुमारका नहीं ।। ५६ ।। वैशम्पायन उवाच नाकामयत तं दातुं वरं दाशाय शान्तनुः । शरीरजेन तीव्रेण दह्यमानोऽपि भारत ।। ५७ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! राजा शान्तनु प्रचण्ड कामाग्निसे जल रहे थे, तो भी उनके मनमें निषादको वह वर देनेकी इच्छा नहीं हुई ।। ५७ ।। स चिन्तयन्नेव तदा दाशकन्यां महीपतिः । प्रत्ययाद्धास्तिनपुरं कामोपहतचेतनः ।। ५८ ।। कामकी वेदनासे उनका चित्त चंचल था। वे उस निषादकन्याका ही चिन्तन करते हुए उस समय हस्तिनापुरको लौट गये ।। ५८ ।। ततः कदाचिच्छोचन्तं शान्तनुं ध्यानमास्थितम् । पुत्रो देवव्रतोऽभ्येत्य पितरं वाक्यमब्रवीत् ।। ५९ ।। तदनन्तर एक दिन राजा शान्तनु ध्यानस्थ होकर कुछ सोच रहे थे- चिन्तामें पड़े थे। इसी समय उनके पुत्र देवव्रत अपने पिताके पास आये और इस प्रकार बोले- ।। ५९ ।। सर्वतो भवतः क्षेमं विधेयाः सर्वपार्थिवाः । तत् किमर्थमिहाभीक्ष्णं परिशोचसि दुःखितः ।। ६० ।। 'पिताजी! आपका तो सब ओरसे कुशल-मंगल है, भू-मण्डलके सभी नरेश आपकी आज्ञाके अधीन हैं; फिर किसलिये आप निरन्तर दुःखी होकर शोक और चिन्तामें डूबे रहते हैं ।। ६० ।। ध्यायन्निव च मां राजन्नाभिभाषसि किंचन । न चाश्वेन विनिर्यासि विवर्णो हरिणः कृशः ।। ६१ ।। 'राजन् ! आप इस तरह मौन बैठे रहते हैं, मानो किसीका ध्यान कर रहे हों; मुझसे कोई बातचीततक नहीं करते। घोड़ेपर सवार हो कहीं बाहर भी नहीं निकलते। आपकी कान्ति मलिन होती जा रही है। आप पीले और दुबले हो गये हैं ।। ६१ ।। व्याधिमिच्छामि ते ज्ञातुं प्रतिकुर्यां हि तत्र वै । एवमुक्तः स पुत्रेण शान्तनुः प्रत्यभाषत ।। ६२ ।। 'आपको कौन-सा रोग लग गया है, यह मैं जानना चाहता हूँ, जिससे मैं उसका प्रतीकार कर सकूँ।' पुत्रके ऐसा कहनेपर शान्तनुने उत्तर दिया ।। ६२ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत
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#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१५९ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण अयोध्याकाण्ड अठहत्तरवाँ सर्ग शत्रुघ्नका रोष, उनका कुब्जाको घसीटना और भरतजीके कहनेसे उसे मूर्च्छित अवस्थामें छोड़ देना तेरहवें दिनका कार्य पूर्ण करके श्रीरामचन्द्रजीके पास जानेका विचार करते हुए शोकसंतप्त भरतसे लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्नने इस प्रकार कहा—॥१॥ 'भैया! जो दुःखके समय अपने तथा आत्मीयजनोंके लिये तो बात ही क्या है, समस्त प्राणियोंको भी सहारा देनेवाले हैं, वे सत्त्वगुणसम्पन्न श्रीराम एक स्त्रीके द्वारा वनमें भेज दिये गये (यह कितने खेदकी बात है)॥२॥ 'तथा वे जो बल और पराक्रमसे सम्पन्न लक्ष्मण नामधारी शूरवीर हैं, उन्होंने भी कुछ नहीं किया। मैं पूछता हूँ कि उन्होंने पिताको कैद करके भी श्रीरामको इस संकटसे क्यों नहीं छुड़ाया?॥३॥ 'जब राजा एक नारीके वशमें होकर बुरे मार्गपर आरूढ़ हो चुके थे, तब न्याय और अन्यायका विचार करके उन्हें पहले ही कैद कर लेना चाहिये था'॥४॥ लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्न जब इस प्रकार रोषमें भरकर बोल रहे थे, उसी समय कुब्जा समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो उस राजभवनके पूर्वद्वारपर आकर खड़ी हो गयी॥५॥ उसके अङ्गों में उत्तमोत्तम चन्दनका लेप लगा हुआ था तथा वह राजरानियोंके पहनने योग्य विविध वस्त्र धारण करके भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे सज धजकर वहाँ आयी थी॥६॥ करधनीको विचित्र लड़ियों तथा अन्य बहुसंख्यक सुन्दर अलंकारोंसे अलंकृत हो वह बहुत-सी रस्सियोंमें बँधी हुई वानरीके समान जान पड़ती थी॥७॥ वही सारी बुराइयोंकी जड़ थी। वही श्रीरामके वनवासरूपी पापका मूल कारण थी। उसपर दृष्टि पड़ते ही द्वारपालने उसे पकड़ लिया और बड़ी निर्दयताके साथ घसीट लाकर शत्रुघ्न के हाथमें देते हुए कहा—॥८॥ 'राजकुमार! जिसके कारण श्रीरामको वनमें निवास करना पड़ा है और आपलोगोंके पिताने शरीरका परित्याग किया है, वह क्रूर कर्म करनेवाली पापिनी यही है। आप इसके साथ जैसा बर्ताव उचित समझें करें'॥९॥ द्वारपालकी बातपर विचार करके शत्रुघ्नका दुःख और बढ़ गया। उन्होंने अपने कर्तव्यका निश्चय किया और अन्तःपुरमें रहनेवाले सब लोगोंको सुनाकर इस प्रकार कहा—॥१०॥ 'इस पापिनीने मेरे भाइयों तथा पिताको जैसा दुःसह दुःख पहुँचाया है, अपने उस क्रूर कर्मका वैसा ही फल यह भी भोगे'॥११॥ ऐसा कहकर शत्रुघ्नने सखियोंसे घिरी हुई कुब्जाको तुरंत ही बलपूर्वक पकड़ लिया। वह डरके मारे ऐसा चीखने-चिल्लाने लगी कि वह सारा महल गूँज उठा॥१२॥ फिर तो उसकी सारी सखियाँ अत्यन्त संतप्त हो उठीं और शत्रुघ्नको कुपित जानकर सब ओर भाग चलीं॥१३॥ उसकी सम्पूर्ण सखियोंने एक जगह एकत्र होकर आपसमें सलाह की कि 'जिस प्रकार इन्होंने बलपूर्वक कुब्जाको पकड़ा है, उससे जान पड़ता है, ये हमलोगोंमेंसे किसीको जीवित नहीं छोड़ेंगे॥१४॥ 'अतः हमलोग परम दयालु, उदार, धर्मज्ञ और यशस्विनी महारानी कौसल्याकी शरणमें चलें। इस समय वे ही हमारी निश्चल गति हैं'॥१५॥ शत्रुओंका दमन करनेवाले शत्रुघ्न रोषमें भरकर कुब्जाको जमीनपर घसीटने लगे। उस समय वह जोर-जोरसे चीत्कार कर रही थी॥१६॥ जब मन्थरा घसीटी जा रही थी, उस समय उसके नाना प्रकारके विचित्र आभूषण टूट-टूटकर पृथ्वीपर इधर-उधर बिखरे जाते थे॥१७॥ आभूषणोंके उन टुकड़ोंसे वह शोभाशाली विशाल राजभवन नक्षत्रमालाओंसे अलंकृत शरत्कालके आकाशकी भाँति अधिक सुशोभित हो रहा था॥१८॥ बलवान् नरश्रेष्ठ शत्रुघ्न जिस समय रोषपूर्वक मन्थराको जोरसे पकड़कर घसीट रहे थे, उस समय उसे छुड़ानेके लिये कैकेयी उनके पास आयी। तब उन्होंने उसे धिक्कारते हुए उसके प्रति बड़ी कठोर बातें कहीं—उसे रोषपूर्वक फटकारा॥१९॥ शत्रुघ्नके वे कठोर वचन बड़े ही दुःखदायी थे। उन्हें सुनकर कैकेयीको बहुत दुःख हुआ। वह शत्रुघ्नके भयसे थर्रा उठी और अपने पुत्रकी शरणमें आयी॥२०॥ शत्रुघ्नको क्रोधमें भरा हुआ देख भरतने उनसे कहा- 'सुमित्राकुमार! क्षमा करो। स्त्रियाँ सभी प्राणियोंके लिये अवध्य होती हैं॥२९॥ 'यदि मुझे यह भय न होता कि धर्मात्मा श्रीराम मातृघाती समझकर मुझसे घृणा करने लगेंगे तो मैं भी इस दुष्ट आचरण करनेवाली पापिनी कैकेयीको मार डालता॥२२॥ 'धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी तो इस कुब्जाके भी मारे जानेका समाचार यदि जान लें तो वे निश्चय ही तुमसे और मुझसे बोलना भी छोड़ देंगे'॥२३॥ भरतजीकी यह बात सुनकर लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्न मन्थराके वधरूपी दोषसे निवृत्त हो गये और उसे मूर्च्छित अवस्थामें ही छोड़ दिया॥२४॥ मन्थरा कैकेयीके चरणोंमें गिर पड़ी और लंबी साँस खींचती हुई अत्यन्त दुःखसे आर्त हो करुण विलाप करने लगी॥२५॥ शत्रुघ्नके पटकने और घसीटनेसे आर्त एवं अचेत हुई कुब्जाको देखकर भरतकी माता कैकेयी धीरे-धीरे उसे आश्वासन देने—होशमें लानेकी चेष्टा करने लगी। उस समय कुब्जा पिजड़ेंमें बँधी हुई क्रौञ्चीकी भाँति कातर दृष्टिसे उसकी ओर देख रही थी॥२६॥ *इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अठहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥७८॥* ###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
##श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५ - !! ओम नमो नारायणाय !! यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार श्री रघुनाथ नाम तजि नाहिन आन अधार गोस्वामी जी कहते है कि अरे मन! विचार करके देख! यह इसमें श्री रघुनाथजी के नाम कलिकाल पापों का घर है का छोड़कर पापों से बचने के लिए दूसरा कोई आधार नहीं है अर्थात सिर्फ राम नाम ही एक मात्र सहारा है श्रीरामचरितमानस, लंकाकाण्ड १२१ख॰ !! ओम नमो नारायणाय !! यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार श्री रघुनाथ नाम तजि नाहिन आन अधार गोस्वामी जी कहते है कि अरे मन! विचार करके देख! यह इसमें श्री रघुनाथजी के नाम कलिकाल पापों का घर है का छोड़कर पापों से बचने के लिए दूसरा कोई आधार नहीं है अर्थात सिर्फ राम नाम ही एक मात्र सहारा है श्रीरामचरितमानस, लंकाकाण्ड १२१ख॰ - ShareChat
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘ *मानव जीवन में समय समय पर अनेकों समस्यायें उत्पन्न होती रहती हैं ! कुछ समस्यायें तो ऐसी होती हैं जो स्वयं मनुष्य के द्वारा ही उत्पन्न कर ली जाती हैं | यदि किसीने कह दिया कि हमने तो ऐसा सुना है तो मनुष्य को उसे तब तक सत्य सत्य नहीं मानना चाहिए जब तक स्वयं न देख ले | बिना विषय की सच्चाई जाने ही यदि उस पर विश्वास कर लिया जाता है तो मनुष्य को व्यर्थ में भय , आशंका और चिन्ता एक नवीन समस्या के रूप में घेर लेती हैं | मानव जीवन की समस्त समस्याओं का समाधान हमारे शास्त्रों में देखने को मिलता है | हमारे महापुरुषों ने मानवोपयोगी सूक्तियां इन शास्त्रों वर्णित कर दी हैं आवश्यकता है उनका अध्ययन करने की | हमारे शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है :- "कुश्रुतं कुपरिज्ञातं कुदृष्टं कुपरिक्षितं ! तन्नरेण न कर्तव्यो नापितो नात्र यत्कृतं !!" अर्थात् :- बिना ढंग से सुने , बिना ढंग से जाने , बिना स्वयं भली भाँति देखे और बिना परीक्षा लिए किसी भी निर्णय पर पहुँचना मनुष्य का कर्तव्य नहीं है | विचार कीजिए कि हमारे महापुरुषों ने कितनी सूक्ष्मता से इन दो लाईनों में सम्पूर्ण जीवन का सार लिख दिया है परंतु हम अपने शास्त्रों से अनभिज्ञ होने के कारण अनेक अनचाही समस्याओं से स्वयं को घिरा पा रहे हैं | किसी के कुछ भी कह देने पर तिरंत विश्वास न करके पहले उस विषय के तह तक जाकर ही उसके विषय में कुछ निर्णय लेने वाला ही विद्वान एवं बुद्धिमान कहा जा सकता है | लंकाधिराज रावण ने अपनी बहन सूर्पणखा से राम - लक्ष्मण के कृत्य सुनकर बिना सच्चाई जाने ही सीता हरण का निर्णय ले लिया तो उसका परिणाम भी जगविदित ही है | इतिहास - पुराणों में ऐसे कई अन्य कथानक भी देखने एवं पढ़ने को मिलते हैं ! इसलिए प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य होना चाहिए कि किसी के द्वारा किसी व्यक्ति की बुराई सुनने के बाद तब तक उस पर विश्वास न करें जब तक स्वयं उसे बुराई करते हुए देख न ले | किसी वस्तु के विषय में तब तक न माने जब तक परीक्षण न कर ले | ऐसा करके मनुष्य अनेक प्रकार की समस्याओं से स्वयं को बचा सकता है |* *आज के युग में समस्याओं का अंबार दिखाई पड़ रहा है | कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसके पास समस्यायें न हों , और यह भी सत्य है की अनेक समस्याएं मनुष्य ने स्वयं प्रकट की हैं जिसका निदान वह जीवन भर नहीं कर पाता | आज मनुष्य किसी भी विषय की गहराई में नहीं जाना चाहता ! सुनी सुनाई बातों पर विश्वास करके वह जीवन भर उसके तत्व को खोजने का प्रयास करता है | किसी भी विषय पर कोई वार्ता सुनकर वह उसके विषय में जिज्ञासु हो जाता है , जिज्ञासु हो जाना तो उचित है परंतु उस विषय को बिना जाने उसके विषय में चिंतन करते रहना उचित नहीं कहा जा सकता | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इतना ही कहना चाहता हूं कि किसी भी विषय को हमारे शास्त्रों में छोड़ा नहीं गया है जिसका वर्णन न हो | यदि कोई भी विषय ऐसा मिल जाए जिसके विषय में हमें ज्ञान नहीं है तो उसके विषय में खोजने का प्रयास हमें अपने शास्त्रों में करना चाहिए क्योंकि संसार का कोई भी ऐसा ज्ञान नहीं है जो हमारे शास्त्रों में ना हो , परंतु आज हमने अपने शास्त्रों का अध्ययन करना लगभग बंद कर दिया है | सुनी सुनाई बातें एवं सोशल मीडिया के माध्यम से पढ़ी हुई बातों को ही हम सत्य मानने लगे हैं | हमने किसी से सुना या गूगल पर पढ़ा कि मोर ब्रह्मचारी होता है तो हमने सही मान लिया | ब्रह्मचर्य का अर्थ क्या होता है इससे मतलब नहीं रखते , न जानना चाहते हैं | यही कारण है कि आज समस्याएं मुंह फैलाए खड़ी है इन समस्याओं से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है कि हम संसार में रहकर संसार को जानने का प्रयास करें और यह प्रयास तभी सफल होगा जब हम अपने ग्रंथों का अध्ययन करेंगे अन्यथा जीवन इसी प्रकार समस्याओं से ग्रसित होकर व्यतीत हो जाएगा | आज जन जागरण की आवश्यकता है क्योंकि आज भ्रांतियां चारों ओर फैली हुई है इन भ्रांतियों को समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए जिससे कि हमारा जीवन सुखमय व्यतीत हो सके |* *जीवन में सदैव चिंतन करके सच्चाई जानने के लिए उसकी गहराई में जाना चाहिए ऐसा करने वाले ही अपने जीवन में लक्ष्य का भेदन करते हुए सफलता का कीर्तिमान स्थापित कर पाते हैं |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵 *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟 #☝आज का ज्ञान
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गलती और प्रसन्नता गलती तो हर व्यक्ति से हो सकती है पर गलती इरादे से नहीं होनी चाहिए, इंसान आखिर इंसान ही होता है। कितना भी मजबूत हो इंसान, पर अपने कमजोर वक्त में वह मानसिक तौर पर परेशान हो ही जाता है !! प्रसन्नता इस बात पर निर्भर करती है कि हम परिस्थितियों को कैसे स्वीकार करते हैं, समझते हैं और समर्पण करते हैं? बहुत सी चीज़ेँ इसलिए अच्छी लगती है क्योंकि वे प्राप्त नहीं है जैसे ही प्राप्त होती है उसका मुल्य घट जाता है !! 🌹जय जय श्री राधे 🌹 🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷 #❤️जीवन की सीख
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🪷💫🪷💫🪷💫🪷💫🪷💫🪷 जय श्री कृष्ण हमारी पूजा प्रार्थना स्वर्ग नर्क के भय और कामनाओं से ग्रस्त है, जबकि ईश्वर हमसे केवल प्रेम चाहते हैं। 🙏सुप्रभात🙏 🪷💫🪷💫🪷💫🪷💫🪷 #☝आज का ज्ञान
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#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣0️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) शततमोऽध्यायः शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 309) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ तदद्भुतं ततो दृष्ट्वा तत्र राजा स शान्तनुः । शङ्कमानः सुतं गङ्गामब्रवीद् दर्शयेति ह ।। ३० ।। यह अद्भुत बात देखकर राजा शान्तनुको कुछ संदेह हुआ और उन्होंने गंगासे अपने पुत्रको दिखानेको कहा ।। ३० ।। दर्शयामास तं गङ्गा बिभ्रती रूपमुत्तमम् । गृहीत्वा दक्षिणे पाणी तं कुमारमलंकृतम् ।। ३१ ।। तब गंगाजी परम सुन्दर रूप धारण करके अपने पुत्रका दाहिना हाथ पकड़े सामने आयीं और दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कुमार देवव्रतको दिखाया ।। ३१ ।। अलंकृतामाभरणैर्विरजोऽम्बरसंवृताम् । दृष्टपूर्वामपि स तां नाभ्यजानात् स शान्तनुः ।। ३२ ।। गंगा दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत हो स्वच्छ सुन्दर साड़ी पहने हुई थीं। इससे उनका अनुपम सौन्दर्य इतना बढ़ गया था कि पहलेकी देखी होनेपर भी राजा शान्तनु उन्हें पहचान न सके ।। ३२ ।। गङ्गोवाच यं पुत्रमष्टमं राजंस्त्वं पुरा मय्यविन्दथाः । स चायं पुरुषव्याघ्र सर्वास्त्रविदनुत्तमः ।। ३३ ।। गंगाजीने कहा-महाराज! पूर्वकालमें आपने अपने जिस आठवें पुत्रको मेरे गर्भसे प्राप्त किया था, यह वही है। पुरुषसिंह ! यह सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें अत्यन्त उत्तम है ।। ३३ ।। गृहाणेमं महाराज मया संवर्धितं सुतम् । आदाय पुरुषव्याघ्र नयस्वैनं गृहं विभो ।। ३४ ।। राजन! मैंने इसे पाल-पोसकर बड़ा कर दिया है। अब आप अपने इस पुत्रको ग्रहण कीजिये। नरश्रेष्ठ ! स्वामिन् ! इसे घर ले जाइये ।। ३४ ।। वेदानधिजगे साङ्गान् वसिष्ठादेष वीर्यवान् । कृतास्त्रः परमेष्वासो देवराजसमो युधि ।। ३५ ।। आपका यह बलवान् पुत्र महर्षि वसिष्ठसे छहों अंगोंसहित समस्त वेदोंका अध्ययन कर चुका है। यह अस्त्र-विद्याका भी पण्डित है, महान् धनुर्धर है और युद्धमें देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी है ।। ३५ ।। सुराणां सम्मतो नित्यमसुराणां च भारत । उशना वेद यच्छास्त्रमयं तद् वेद सर्वशः ।। ३६ ।। भारत ! देवता और असुर भी इसका सदा सम्मान करते हैं। शुक्राचार्य जिस (नीति) शास्त्रको जानते हैं, उसका यह भी पूर्णरूपसे जानकार है ।। ३६ ।। तथैवाङ्गिरसः पुत्रः सुरासुरनमस्कृतः । यद् वेद शास्त्रं तच्चापि कृत्स्नमस्मिन् प्रतिष्ठितम् ।। ३७ ।। तव पुत्रे महाबाहौ साङ्गोपाङ्ग महात्मनि । ऋषिः परैरनाधृष्यो जामदग्न्यः प्रतापवान् ।। ३८ ।। यदस्त्रं वेद रामश्च तदेतस्मिन् प्रतिष्ठितम् । महेष्वासमिमं राजन् राजधर्मार्थकोविदम् ।। ३९ ।। मया दत्तं निजं पुत्रं वीरं वीर गृहं नय । इसी प्रकार अंगिरा के पुत्र देव-दानव-वन्दित बृहस्पति जिस शास्त्रको जानते हैं, वह भी आपके इस महाबाहु महात्मा पुत्रमें अंग और उपांगोंसहित पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित है। जो दूसरोंसे परास्त नहीं होते, वे प्रतापी महर्षि जमदग्निनन्दन परशुराम जिस अस्त्र-विद्याको जानते हैं, वह भी मेरे इस पुत्रमें प्रतिष्ठित है। वीरवर महाराज! यह कुमार राजधर्म तथा अर्थशास्त्रका महान् पण्डित है। मेरे दिये हुए इस महाधनुर्धर वीर पुत्रको आप घर ले जाइये ।। ३७-३९३ क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत
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