#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣0️⃣5️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
नवनवतितमोऽध्यायः
महर्षि वसिष्ठ द्वारा वसुओं को शाप प्राप्त होने की कथा...(दिन 305)
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आनयस्वामरश्रेष्ठ त्वरितं पुण्यवर्धन । यावदस्याः पयः पीत्वा सा सखी मम मानद ।। २४ ।।
मानुषेषु भवत्वेका जरारोगविवर्जिता । एतन्मम महाभाग कर्तुमर्हस्यनिन्दित ।। २५ ।।
'सुरश्रेष्ठ! आप पुण्यकी वृद्धि करनेवाले हैं। इस गायको शीघ्र ले आइये। मानद ! जिससे इसका दूध पीकर मेरी वह सखी मनुष्यलोकमें अकेली ही जरावस्था एवं रोग-व्याधिसे बची रहे। महाभाग ! आप निन्दारहित हैं; मेरे इस मनोरथको पूर्ण कीजिये ।। २४-२५ ।।
प्रियं प्रियतरं ह्यस्मान्नास्ति मेऽन्यत् कथंचन । एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्या देव्याः प्रियचिकीर्षया ।। २६ ।।
पृथ्वाद्यैर्भातृभिः सार्धं द्यौस्तदा तां जहार गाम् । तया कमलपत्राक्ष्या नियुक्तो द्यौस्तदा नृप ।। २७ ।।
ऋषेस्तस्य तपस्तीत्रं न शशाक निरीक्षितुम् । हृता गौः सा सदा तेन प्रपातस्तु न तर्कितः ।। २८ ।।
'मेरे लिये किसी तरह भी इससे बढ़कर प्रिय अथवा प्रियतर वस्तु दूसरी नहीं है।'
उस देवीका यह वचन सुनकर उसका प्रिय करनेकी इच्छासे द्यो नामक वसुने पृथु आदि अपने भाइयोंकी सहायतासे उस गौका अपहरण कर लिया। राजन्! कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाली पत्नीसे प्रेरित होकर द्योने गौका अपहरण तो कर लिया; परंतु उस समय उन महर्षि वसिष्ठकी तीव्र तपस्याके प्रभावकी ओर वे दृष्टिपात नहीं कर सके और न यही सोच सके कि ऋषिके कोपसे मेरा स्वर्गसे पतन हो जायगा ।। २६-२८ ।।
अथाश्रमपदं प्राप्तः फलान्यादाय वारुणिः । न चापश्यत् स गां तत्र सवत्सां काननोत्तमे ।। २९ ।।
कुछ समयके बाद वरुणनन्दन वसिष्ठजी फल-मूल लेकर आश्रमपर आये; परंतु उस सुन्दर काननमें उन्हें बछड़ेसहित अपनी गाय नहीं दिखायी दी ।। २९ ।।
ततः स मृगयामास वने तस्मिंस्तपोधनः ।
नाध्यगच्छच्च मृगयंस्तां गां मुनिरुदारधीः ।। ३० ।।
तब तपोधन वसिष्ठजी उस वनमें गायकी खोज करने लगे; परंतु खोजनेपर भी वे
उदारबुद्धि महर्षि उस गायको न पा सके ।। ३० ।।
ज्ञात्वा तथापनीतां तां वसुभिर्दिव्यदर्शनः । ययौ क्रोधवशं सद्यः शशाप च वसूंस्तदा ।। ३१ ।।
तब उन्होंने दिव्य दृष्टिसे देखा और यह जान गये कि वसुओंने उसका अपहरण किया है। फिर तो वे क्रोधके वशीभूत हो गये और तत्काल वसुओंको शाप दे दिया ।। ३१ ।।
यस्मान्मे वसवो जहुर्गा वै दोग्ध्रीं सुवालधिम् ।
तस्मात् सर्वे जनिष्यन्ति मानुषेषु न संशयः ।। ३२ ।।
'वसुओंने सुन्दर पूँछवाली मेरी कामधेनु गायका अपहरण किया है, इसलिये वे सब-के-सब मनुष्य-योनिमें जन्म लेंगे, इसमें संशय नहीं है' ।। ३२ ।।
एवं शशाप भगवान् वसूंस्तान् भरतर्षभ ।
वशं क्रोधस्य सम्प्राप्त आपवो मुनिसत्तमः ।। ३३ ।।
भरतर्षभ ! इस प्रकार मुनिवर भगवान् वसिष्ठने क्रोधके आवेशमें आकर उन वसुओंको शाप दिया ।। ३३ ।।
शप्त्वा च तान् महाभागस्तपस्येव मनो दधे । एवं स शप्तवान् राजन् वसूनष्टौ तपोधनः ।। ३४ ।।
महाप्रभावो ब्रह्मर्षिर्देवान् क्रोधसमन्वितः । अथाश्रमपदं प्राप्तास्ते वै भूयो महात्मनः ।। ३५ ।।
शप्ताः स्म इति जानन्त ऋषिं तमुपचक्रमुः । प्रसादयन्तस्तमृषिं वसवः पार्थिवर्षभ ।। ३६ ।।
लेभिरे न च तस्मात् ते प्रसादमृषिसत्तमात् ।
आपवात् पुरुषव्याघ्र सर्वधर्मविशारदात् ।। ३७ ।।
उन्हें शाप देकर उन महाभाग महर्षिने फिर तपस्यामें ही मन लगाया। राजन् ! तपस्याके धनी ब्रह्मर्षि वसिष्ठका प्रभाव बहुत बड़ा है। इसीलिये उन्होंने क्रोधमें भरकर देवता होनेपर भी उन आठों वसुओंको शाप दे दिया। तदनन्तर हमें शाप मिला है, यह जानकर वे वसु पुनः महामना वसिष्ठके आश्रमपर आये और उन महर्षिको प्रसन्न करनेकी चेष्टा करने लगे। नृपश्रेष्ठ! महर्षि आपव समस्त धर्मोंके ज्ञानमें निपुण थे। महाराज ! उनको प्रसन्न करनेकी पूरी चेष्टा करने-पर भी वे वसु उन मुनिश्रेष्ठसे उनका कृपाप्रसाद न पा सके ।। ३४-३७ ।।
उवाच च स धर्मात्मा शप्ता यूयं धरादयः ।
अनुसंवत्सरात् सर्वे शापमोक्षमवाप्स्यथ ।। ३८ ।।
उस समय धर्मात्मा वसिष्ठने उनसे कहा- 'मैंने धर आदि तुम सभी वसुओंको शाप दे दिया है; परंतु तुमलोग तो प्रति वर्ष एक-एक करके सब-के-सब शापसे मुक्त हो जाओगे ।। ३८ ।।
अयं तु यत्कृते यूयं मया शप्ताः स वत्स्यति ।
द्यौस्तदा मानुषे लोके दीर्घकालं स्वकर्मणा ।। ३९ ।।
'किंतु यह द्यो, जिसके कारण तुम सबको शाप मिला है, मनुष्यलोकमें अपने कर्मानुसार दीर्घकालतक निवास करेगा ।। ३९ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#☝आज का ज्ञान
|| संकल्प से समाधान ||
🌞 जीवन की किसी भी समस्या का समाधान भागने से नहीं अपितु संकल्प पूर्वक उसका सामना करने से ही निकलने वाला है। दुनिया का कोई भी लक्ष्य व्यक्ति के संकल्प से बड़ा नहीं होता है। जीवन में सदैव अनुकूलता बनी रहना संभव ही नहीं इसलिए प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदलने वाले ही जीवन का वास्तविक आनंद उठा पाते हैं। प्रतिकूलताएं हमारे मार्ग में उतनी बाधक नहीं बनती हैं, जितना हम स्वयं के मार्ग में बाधा उपस्थित करते हैं।
🌞 जीवन है तो समस्याएं तो अवश्य आयेंगी क्योंकि प्रति क्षण परिवर्तन ही जीवन का स्वभाव है। समस्या उपस्थित होने से पहले ही उससे भयभीत होना मनुष्य को विवेकशून्य बनाकर उसके निर्णय लेने की क्षमता को बाधित कर देता है। प्रसन्नतापूर्वक प्रत्येक स्थिति का सामना करना सीखिए। समाधान हमारे ही पास है, बस हौसला बनाये रखना होगा। जीवन में एक बात सदैव याद रखना कि समस्या मुकरने से नहीं, मुकाबला करने से ही दूर होगी।
*जय जय श्री राधे*
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#🙏 प्रेरणादायक विचार
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सुप्रभातम्
छल से हासिल की गई चीजे सिर्फ कब्जा कहलाती है आपकी काबिलियत नहीं..!
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लोग बस इतना जानने के लिए हाल पूछते हैं कि कही आप उनसे आगे तो नहीं बढ़ गए..
जय श्री कृष्ण
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#कर्मफल तो #भोगना पड़ेगा
⚖️ जब प्रभु श्रीराम के दरबार में कुत्ते ने माँगा अनोखा न्याय! 🐕
...और ब्राह्मण के लिए 'सजा' के रूप में माँगी 'मठाधीश' की गद्दी! 😲
बाल्मीकि रामायण में कर्मफल के सिद्धांत को दर्शाती एक अत्यंत आश्चर्यजनक कथा का वर्णन है।
एक बार भगवान श्रीराम के दरबार में न्याय की गुहार लेकर एक कुत्ता पहुँचा। लक्ष्मण जी के पूछने पर उसने कहा, "मुझे प्रभु श्रीराम से न्याय चाहिए।"
क्या था मामला?
भगवान श्रीराम के समक्ष कुत्ते ने अपनी व्यथा सुनाई: "प्रभु! मैं खेत की मेड़ के किनारे चुपचाप लेटा था। तभी वहाँ से गुजर रहे एक ब्राह्मण ने मुझ पर अनावश्यक डंडे से प्रहार किया और मुझे चोटिल कर दिया। मेरा कोई अपराध नहीं था, फिर भी मुझे पीटा गया। मुझे न्याय चाहिए।"
ब्राह्मण का तर्क:
श्रीराम ने उस ब्राह्मण को दरबार में बुलवाया। ब्राह्मण ने सफाई दी, "प्रभु, मैं स्नान के लिए नदी जा रहा था। मुझे लगा कि यह कुत्ता कहीं मेरे वस्त्र छूकर मुझे अपवित्र न कर दे, इसलिए इसे दूर भगाने के लिए मैंने डंडा मारा।"
दण्ड का निर्णय:
भगवान ने कुत्ते से ही पूछा, "तुम ही बताओ, इन्हें क्या दण्ड दिया जाए?"
कुत्ते ने पहले तो प्रभु पर ही निर्णय छोड़ा, किन्तु जब श्रीराम ने आग्रह किया, तो कुत्ते ने जो कहा उसे सुनकर पूरा राजदरबार सन्न रह गया।
कुत्ते ने कहा: "प्रभु, इन ब्राह्मण देव को कालिंजर मठ का मठाधीश बना दिया जाए।" 🏰💰
दरबारियों का आश्चर्य:
सभी अवाक् थे! कालिंजर का मठ असीम वैभव, ऐश्वर्य और अकूत धन-सम्पदा के लिए प्रसिद्ध था। उसका मठाधीश बनना तो बहुत बड़े गर्व और सम्मान की बात थी। यह सजा थी या पुरस्कार?
भगवान राम ने भी पूछा, "यह तुम दण्ड दे रहे हो या इनका उपहास कर रहे हो?"
कुत्ते का रहस्योद्घाटन (चौंकाने वाला सत्य): 😥
तब कुत्ते ने अपनी दर्दभरी कहानी सुनाई:
"नहीं प्रभु, मैं दण्ड ही दे रहा हूँ। पिछले जन्म में, मैं ही उस कालिंजर मठ का मठाधीश था।"
"उस मठ के अपार ऐश्वर्य, समृद्धि और धन ने मेरी बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी। सत्य और तप के मार्ग से हटकर मैं भोग-विलास और गलत कर्मों में लिप्त हो गया। मुझे लगा वही जीवन का असली आनंद है। मेरा सारा तप-तेज नष्ट हो गया। मेरे कर्म इतने दूषित हो गए कि मृत्यु के पश्चात मुझे दोबारा मनुष्य जन्म भी नहीं मिला और मुझे यह कुत्ते की योनि प्राप्त हुई।"
कुत्ते ने अंतिम बात कही: "प्रभु, मैं जानता हूँ कि ये ब्राह्मण भी मठाधीश बनते ही उस ऐश्वर्य में खो जायेंगे। इनका तप भी क्षीण हो जाएगा और निश्चित रूप से इनकी अगली गति भी मेरी तरह ही होगी।"
🔥 जीवन की सीख 🔥
यह प्रसंग सिखाता है कि कर्मों का फल हर किसी को भोगना ही पड़ता है। पद, प्रतिष्ठा और धन का अहंकार अक्सर मनुष्य के आध्यात्मिक पतन का कारण बनता है। सच्चा सुख ऐश्वर्य में नहीं, बल्कि सत्कर्मों और तप में है।
कर्म की गति गहन है!
🙏 जय सिया राम 🙏
#महाभारत
🔥 महाभारत प्रसंग: जब भीमसेन ने किया बकासुर का अंत! 🔥
लाक्षागृह से बचने के बाद, पांडव एकचक्रा नगरी में एक ब्राह्मण के घर भिक्षा मांगकर अज्ञातवास काट रहे थे। लेकिन उस नगरी पर एक काला साया था...
👹 बकासुर का आतंक:
नगर के बाहर बक नाम का एक क्रूर दैत्य रहता था। उसकी शर्त थी कि प्रतिदिन नगर से एक व्यक्ति उसके लिए भोजन लेकर जाएगा, और वह भोजन के साथ उस व्यक्ति को भी खा जाता था।
🙏 माता कुंती का त्याग:
एक दिन उस ब्राह्मण परिवार की बारी आई जहाँ पांडव रुके थे। घर में विलाप सुनकर माता कुंती ने कहा, "आपने हमें आश्रय दिया है, आपके संकट को दूर करना हमारा कर्तव्य है। आपकी जगह मेरा पुत्र जाएगा।" ब्राह्मणी के मना करने पर कुंती ने आश्वस्त किया कि उनका पुत्र बहुत शक्तिशाली है।
💪 भीम का पराक्रम:
भीमसेन गाड़ी भर भोजन लेकर राक्षस के पास पहुंचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने दैत्य को बुलाने के बजाय, आराम से उसका भोजन खाना शुरू कर दिया!
अपने भोजन को कोई और खाता देख बकासुर क्रोध से पागल हो गया और भीम पर टूट पड़ा। भीम ने पहले डकार ली और फिर बोले, "तूने बहुतों का रक्त चूसा है, आज तुझे फल मिलेगा।"
⚔️ महायुद्ध और अंत:
महाबली भीम ने उस विशाल दैत्य को उठाकर हवा में घुमाया और वेग से जमीन पर पटक दिया। धरती पर गिरते ही बकासुर के प्राण पखेरू उड़ गए। भीम ने उसकी लाश को नगर द्वार पर लटका दिया।
सुबह जब नगरवासियों ने यह दृश्य देखा, तो एकचक्रा नगरी में आनंद की लहर दौड़ गई।
जय महाबली भीमसेन! 🙏
#🙏🌺जय यमुना मैया मथुरा🌺🙏
सूर्य पुत्री कालिंदी हीं यमुना देवी थीं। जब ब्रज में श्रीकृष्ण रास रचाते थे, तो यमुना यानी कालिंदी भी गोते खाती थी, और श्रीकृष्ण के माधुर्य में नृत्य किया करती थी।
जब श्रीकृष्ण को अक्रूर जी मथुरा ले गए, तब उनका विरह सहन नहीं कर पाने में एक गोपी, यमुना अर्थात कालिंदी भी थी।जो अपना बहाव मोड़कर वह द्वारावती चली गयी।
एक बार कृष्ण और अर्जुन जंगल में साथ जा रहे थे। अर्जुन शिकार खलते-खेलते थक गये थे। अब वे प्यास लगने पर यमुनाजी के किनारे गये । भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों ने यमुनाजी में हाथ-पैर धोकर उनका निर्मल जल पिया और देखा कि एक परम सुन्दरी कन्या वहाँ तपस्या कर रही है ।
कृष्ण ने अर्जुन से कहा- अर्जुन! जाओ, पता करो की ये तप करती देवी कौन हैं? और किसका ध्यान कर रही है?
अर्जुन उसके पास गये पूछे— ‘देवी! तुम कौन हो ? किसकी पुत्री हो ? कहाँ से आयी हो ? और क्या करना चाहती हो ?
उस सुंदर युवती ने कहा- मेरा नाम कालिंदी है। ‘मैं भगवान सूर्यदेव की पुत्री हूँ। मैं श्रेष्ठतम भगवान कृष्ण को पति के रूप में प्राप्त करना चाहती हूँ और इसीलिये यह कठोर तपस्या कर रही हूँ ।मैं भगवान के आलावा और किसी को अपना पति नहीं बना सकती। भगवान श्रीकृष्ण मुझ पर प्रसन्न हों । यमुना जल में मेरे पिता सूर्य ने मेरे लिये एक भवन भी बनवा दिया है। मैं उसी में रहती हूँ। जब तक भगवान का दर्शन नहीं होगा, मैं यहीं रहूँगी’ ।
अर्जुन ने जाकर भगवान श्रीकृष्ण से सारी बातें कहीं। वे तो पहले से ही यह सब कुछ जानते थे, अब उन्होंने कालिदी के पास जाकर कहा, “तुम ब्रज में थी! यहां कैसे?”
कालिंदी ने कहा, “यह विरह मुझसे सहा नहीं गया प्रभु। इसीलिए मैं यहां आईं हूँ। आप मुझे स्वीकार्य करें।”
श्री कृष्ण ने उसे अपने रथ पर बैठा लिया और धर्मराज युधिष्ठिर के पास ले आये।
कुछ दिनों के बाद भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन की अनुमति एवं अन्य सम्बन्धियों का अनुमोदन प्राप्त करके सात्यकि आदि के साथ द्वारका लौट आये।
वहाँ आकर उन्होंने विवाह के योग्य ऋतु और ज्यौतिष-शास्त्र के अनुसार प्रशंसित पवित्र लग्न में कालिन्दीजी का पाणिग्रहण किया। इससे उनके स्वजन-सम्बन्धियों को परम मंगल और परमानन्द की प्राप्ति हुई ।
कालिंदी कृष्ण की अष्ट मुख्य भार्याओं में छठी भार्या है।
जय प्रभु श्री कृष्ण! जय श्री हरि ॥
(((( प्यास जो बुझ न सकी ))))
. #जय श्री कृष्ण
श्रीकृष्ण स्वयं भी महाभारत रोक न सके। इस बात पर महामुनि उत्तंक को बड़ा क्रोध आ रहा था।
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दैवयोग से भगवान श्रीकृष्ण उसी दिन द्वारिका जाते हुए मुनि उत्तंक के आश्रम में आ पहुँचे।
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मुनि ने उन्हें देखते ही कटु शब्द कहना प्रारंभ किया.. आप इतने महाज्ञानी और सामर्थ्यवान होकर भी युद्ध नहीं रोक सके। आपको उसके लिये शाप दे दूँ तो क्या यह उचित न होगा?
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भगवान कृष्ण हंसे और बोले- महामुनि! किसी को ज्ञान दिया जाये, समझाया-बुझाया और रास्ता दिखाया जाये तो भी वह विपरीत आचरण करे, तो इसमें ज्ञान देने वाले का क्या दोष?
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यदि मैं स्वयं ही सब कुछ कर लेता, तो संसार के इतने सारे लोगों की क्या आवश्यकता थी?
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मुनि का क्रोध शाँत न हुआ। लगता था वे मानेंगे नहीं- शाप दे ही देंगे।
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तब भगवान कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाकर कहा-महामुनि! मैंने आज तक किसी का अहित नहीं किया। निष्पाप व्यक्ति चट्टान की तरह सुदृढ़ होता है। आप शाप देकर देख लें, मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा।
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हाँ, आपको किसी वरदान की आवश्यकता हो तो हमसे अवश्य माँग लें।
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उत्तंक ने कहा- तो फिर आप ऐसा करें कि इस मरुस्थल में भी जल-वृष्टि हो और यहाँ भी सर्वत्र हरा-भरा हो जाये। कृष्ण ने कहा ‘तथास्तु’ और वहाँ से आगे बढ़ गये।
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महामुनि उत्तंक एक दिन प्रातःकालीन भ्रमण में कुछ दूर तक निकल गये। दिन चढ़ते ही धूल भरी आँधी आ गई और मुनि मरुस्थल में भटक गये।
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जब मरुद्गणों का कोप शाँत हुआ, तब उत्तंक ने अपने आपको निर्जन मरुस्थल में पड़ा पाया। धूप तप रही थी, प्यास के मारे उत्तंक के प्राण निकलने लगे।
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तभी महामुनि उत्तंक ने देखा.. चमड़े के पात्र में जल लिये एक चाँडाल सामने खड़ा है और पानी पीने के लिए कह रहा है।
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उत्तंक उत्तेजित हो उठे और बिगड़ कर बोले, शूद्र! मेरे सामने से हट जा, नहीं तो अभी शाप देकर भस्म कर दूँगा। चाँडाल होकर तू मुझे पानी पिलाने आया है।
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उनके साथ-साथ कृष्ण पर भी क्रोध आ गया। मुझे उस दिन मूर्ख बनाकर चले गये। पर आज उत्तंक के क्रोध से बचना कठिन है।
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जैसे ही शाप देने के लिए उन्होंने मुख खोला कि सामने भगवान श्रीकृष्ण दिखाई दिये।
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कृष्ण ने पूछा- नाराज न हों महामुनि! आप तो कहा करते हैं कि आत्मा ही आत्मा है, आत्मा ही इन्द्र और आत्मा ही साक्षात परमात्मा है।
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फिर आप ही बताइये कि इस चाँडाल की आत्मा में क्या इन्द्र नहीं थे? यह इन्द्र ही थे, जो आपको अमृत पिलाने आये थे, पर आपने उसे ठुकरा दिया।
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बताइये, अब मैं आपकी कैसे सहायता कर सकता हूँ। यह कहकर भगवान कृष्ण भी वहाँ से अदृश्य हो गये और वह चाण्डाल भी।
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मुनि को बड़ा पश्चाताप हुआ। उन्होंने अनुभव किया कि जाति, कुल और योग्यता के अभिमान में डूबे हुए मेरे जैसे व्यक्ति ने शास्त्र-ज्ञान को व्यावहारिक नहीं बनाया..
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तो फिर यदि कौरवों-पाँडवों ने श्रीकृष्ण की बात को नहीं माना तो इसमें उनका क्या दोष?
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महापुरुष केवल मार्ग दर्शन कर सकते हैं। यदि कोई उस प्राप्त ज्ञान को आचरण में न लाये और यथार्थ लाभ से वंचित रहे, तो इसमें उनका क्या दोष?
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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#🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🕉️ क्या आप जानते हैं? आपकी हर सांस एक महामंत्र गा रही है! 🕉️
हम अक्सर ईश्वर को बाहर मंदिरों में खोजते हैं, लेकिन हमारे भीतर चौबीस घंटे एक 'अजपा-जप' चल रहा है— "सोऽहम्"।
✨ "सोऽहम्" का दिव्य अर्थ:
🔹 'सो' (So): वह (परमात्मा/ब्रह्म)
🔹 'हम्' (Hum): मैं (आत्मा)
जब हम सांस अंदर लेते हैं तो ध्वनि होती है 'सो', और जब सांस बाहर छोड़ते हैं तो ध्वनि होती है 'हम्'।
अर्थात्— "मैं वही हूँ" (I am That)।
यह मंत्र हमें हर पल याद दिलाता है कि हम और परमात्मा अलग नहीं हैं। हमारी आत्मा उसी परम ज्योति का एक अंश है। 🌟
🧘♂️ साधना का रहस्य:
जब आप ध्यान में 'सोऽहम्' की लय पर टिकते हैं, तो मन शांत हो जाता है और अहंकार मिटने लगता है। बस शेष रह जाता है—शुद्ध अस्तित्व।
अगली बार जब आप सांस लें, तो याद रखें—आप केवल हवा नहीं ले रहे, आप परमात्मा के साथ एक हो रहे हैं।
हर हर महादेव! 🙏
#☝आज का ज्ञान #महाभारत
व्यास-रचित मूल महाभारत के अनुसार कुरुक्षेत्र युद्ध केवल एक राजनीतिक या वंशगत युद्ध नहीं था, बल्कि धर्म, कर्म और मोक्ष की दिव्य योजना का भाग था। इसी कारण युद्ध में भाग लेने वाले सभी योद्धाओं की गति को सामान्य मृत्यु से ऊपर माना गया है।
1️⃣ कुरुक्षेत्र युद्ध और मोक्ष
महाभारत में स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि कुरुक्षेत्र धर्मक्षेत्र था।
यहाँ युद्ध करते हुए प्राण त्यागने वाले योद्धा—
व्यक्तिगत द्वेष से नहीं
बल्कि अपने स्वधर्म के पालन में
श्रीकृष्ण की उपस्थिति में
युद्धरत थे।
इसलिए उन्हें पापबंधन से मुक्ति और उच्च लोकों की प्राप्ति हुई। कई आचार्य इसे सद्यः मोक्ष या उत्तम लोकगति मानते हैं।
2️⃣ अर्जुन को “उत्तम गति” क्यों मिली?
अर्जुन की स्थिति अन्य योद्धाओं से अलग थी, क्योंकि—
वे स्वयं श्रीकृष्ण के सखा और शरणागत थे
उन्हें गीता का उपदेश प्रत्यक्ष मिला
उन्होंने युद्ध अहंकार से नहीं, बल्कि ईश्वर की आज्ञा से किया
इस कारण अर्जुन को केवल स्वर्ग ही नहीं, बल्कि ईश्वर-सान्निध्य प्राप्त हुआ — जिसे ग्रंथों में उत्तम गति कहा गया है।
3️⃣ युधिष्ठिर का स्वर्ग दर्शन
महाभारत के स्वर्गारोहण पर्व में वर्णन आता है कि जब
युधिष्ठिर स्वर्ग पहुँचे, तो उन्होंने देखा—
अर्जुन दिव्य रूप में
श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न हैं
वहाँ अर्जुन न तो योद्धा हैं, न राजा
बल्कि भक्त और सेवक हैं
#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान
यह देश सभी देशों में उत्तम है। बहुत पुण्य से प्राणी का जन्म भारतवर्ष में होता है। इस देश में जन्म पाकर जो अपने कल्याणvके लिये सत्कर्म करता है वही बुद्धिमान है। जिसने ऐसा नहीं किया, उसने अपने आत्मा के साथ वञ्चना की। जबतक यह शरीर स्वस्थ है, तबतक जो कुछ पुण्य बन सके, कर लेना चाहिये, बाद में कुछ भी नहीं हो सकता।
दिन-रात के बहाने नित्य आयु के ही अंश खण्डित हो रहे हैं। फिर भी मनुष्यों को बोध नहीं होता कि एक दिन मृत्यु आ पहुँचेगी और इन सभी सामग्रीयों को छोड़कर अकेले चला जाना पड़ेगा। फिर अपने हाथ से ही अपनी सम्पत्ति सत्पात्रों को क्यों नहीं बाँट देते? मनुष्य के लिये दान ही पाथेय अर्थात रास्ते के लिये भोजन है। जो दान करते हैं वे सुखपूर्वक जाते हैं। दान-हीन मार्ग में अनेक दुःख पाते हैं। भूखे मरते जाते हैं, इन सब यत्नों को विचार कर पुण्य कर्म ही करना चाहिये।
पुण्य कमाने से देवत्व प्राप्त होता है और पाप करने से नरक में वास होता है। जो सत्पुरुष सर्वात्मभाव से श्रीपरमात्म-प्रभु की शरण में जाते हैं, वे पद्मपत्र पर स्थित जल की तरह पापों से लिप्त नहीं होते, इसलिये द्वन्द से छूट कर भक्तिपूर्वक ईश्वर की आराधना करनी चाहिये तथा सभी प्रकार के पापों से निरन्तर बचना चाहिये।
- भविष्य पुराण













