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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान #☝अनमोल ज्ञान [ शारीरिक रूप से सक्षम होते हुए भी ] सवारी पर बैठ कर तीर्थयात्रा करने वालो को शास्त्रों में अधम बताया गया है । नारायण 🪷🌷🪷
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#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान गुरु,आचार्य,पुरोहित,पंडित और पुजारी का फर्क जानिए। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 अक्सर लोग पुजारी को पंडितजी या पुरोहित को आचार्य भी कह देते हैं और सुनने वाले भी उन्हें सही ज्ञान नहीं दे पाता है। यह विशेष पदों के नाम हैं जिनका किसी जाति विशेष से कोई संबंध नहीं। आओ हम जानते हैं कि उक्त शब्दों का सही अर्थ क्या है ताकि आगे से हम किसी पुजारी को पंडित न कहें। गुरु👉 गु का अर्थ अंधकार और रु का अर्थ प्रकाश। अर्थात जो व्यक्ति आपको अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए वह गुरु होता है। गुरु का अर्थ अंधकार का नाश करने वाला। अध्यात्मशास्त्र अथवा धार्मिक विषयों पर प्रवचन देने वाले व्यक्तियों में और गुरु में बहुत अंतर होता है। गुरु आत्म विकास और परमात्मा की बात करता है। प्रत्येक गुरु संत होते ही हैं; परंतु प्रत्येक संत का गुरु होना आवश्यक नहीं है। केवल कुछ संतों में ही गुरु बनने की पात्रता होती है। गुरु का अर्थ ब्रह्म ज्ञान का मार्गदर्शक। आचार्य👉 आचार्य उसे कहते हैं जिसे वेदों और शास्त्रों का ज्ञान हो और जो गुरुकुल में विद्यार्थियों को शिक्षा देने का कार्य करता हो। आचार्य का अर्थ यह कि जो आचार, नियमों और सिद्धातों आदि का अच्छा ज्ञाता हो और दूसरों को उसकी शिक्षा देता हो। वह जो कर्मकाण्ड का अच्छा ज्ञाता हो और यज्ञों आदि में मुख्य पुरोहित का काम करता हो उसे भी आचार्य कहा जाता था। आजकल आचार्य किसी महाविद्यालय के प्रधान अधिकारी और अध्यापक को कहा जाता है। पुरोहित👉 पुरोहित दो शब्दों से बना है:- 'पर' तथा 'हित', अर्थात ऐसा व्यक्ति जो दुसरो के कल्याण की चिंता करे। प्राचीन काल में आश्रम प्रमुख को पुरोहित कहते थे जहां शिक्षा दी जाती थी। हालांकि यज्ञ कर्म करने वाले मुख्य व्यक्ति को भी पुरोहित कहा जाता था। यह पुरोहित सभी तरह के संस्कार कराने के लिए भी नियुक्त होता है। प्रचीनकाल में किसी राजघराने से भी पुरोहित संबंधित होते थे। अर्थात राज दरबार में पुरोहित नियुक्त होते थे, जो धर्म-कर्म का कार्य देखने के साथ ही सलाहकार समीति में शामिल रहते थे। पुजारी👉 पूजा और पाठ से संबंधित इस शब्द का अर्थ स्वत: ही प्रकाट होता है। अर्थात जो मंदिर या अन्य किसी स्थान पर पूजा पाठ करता हो वह पुजारी। किसी देवी-देवता की मूर्ति या प्रतिमा की पूजा करने वाले व्यक्ति को पुजारी कहा जाता है। पंडित👉 पंडः का अर्थ होता है विद्वता। किसी विशेष ज्ञान में पारंगत होने को ही पांडित्य कहते हैं। पंडित का अर्थ होता है किसी ज्ञान विशेष में दश या कुशल। इसे विद्वान या निपुण भी कह सकते हैं। किसी विशेष विद्या का ज्ञान रखने वाला ही पंडित होता है। प्राचीन भारत में, वेद शास्त्रों आदि के बहुत बड़े ज्ञाता को पंडित कहा जाता था। इस पंडित को ही पाण्डेय, पाण्डे, पण्ड्या कहते हैं। आजकल यह नाम ब्रह्मणों का उपनाम भी बन गया है। कश्मीर के ब्राह्मणों को तो कश्मीरी पंडितों के नाम से ही जाना जाता है। पंडित की पत्नी को देशी भाषा में पंडिताइन कहने का चलन है। ब्राह्मण👉 ब्राह्मण शब्द ब्रह्म से बना है। जो ब्रह्म (ईश्वर) को छोड़कर अन्य किसी को नहीं पूजता, वह ब्राह्मण कहा गया है। जो पुरोहिताई करके अपनी जीविका चलाता है, वह ब्राह्मण नहीं, याचक है। जो ज्योतिषी या नक्षत्र विद्या से अपनी जीविका चलाता है वह ब्राह्मण नहीं, ज्योतिषी है। पंडित तो किसी विषय के विशेषज्ञ को कहते हैं और जो कथा बांचता है वह ब्राह्मण नहीं कथावाचक है। इस तरह वेद और ब्रह्म को छोड़कर जो कुछ भी कर्म करता है वह ब्राह्मण नहीं है। जिसके मुख से ब्रह्म शब्द का उच्चारण नहीं होता रहता, वह ब्राह्मण नहीं। स्मृतिपुराणों में ब्राह्मण के 8 भेदों का वर्णन मिलता है- मात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनुचान, भ्रूण, ऋषिकल्प, ऋषि और मुनि। 8 प्रकार के ब्राह्मण श्रुति में पहले बताए गए हैं। इसके अलावा वंश, विद्या और सदाचार से ऊंचे उठे हुए ब्राह्मण ‘त्रिशुक्ल’ कहलाते हैं। ब्राह्मण को धर्मज्ञ विप्र और द्विज भी कहा जाता है जिसका किसी जाति या समाज से कोई संबंध नहीं। साभार~ पं देव शर्मा💐 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸
🕉️सनातन धर्म🚩 - गुरु, आचार्य, पुरोहित, पंडित और पुजारी में अंतर गुरु, आचार्य, पुरोहित, पंडित और पुजारी में अंतर - ShareChat
#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान नूपुर तिलक का प्रचलन कैसे हुआ? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के एक भक्त थे श्रील दु:खी कृष्ण दास जी। आप श्रील हृदय चैतन्य जी के शिष्य थे। गुरुजी के आदेश के अनुसार आप वृन्दावन में जाकर भजन करने लगे। वहाँ जाकर आप श्रील जीव गोस्वामी जी से शास्त्रों का अध्ययन करने लगे। जब श्रील हृदय चैतन्यजी ने दुःखी कृष्ण दासजी की भजन निष्ठा की बात सुनी तो उन्होंने श्रील जीव गोस्वामीजी को पत्र लिखा कि वे दुःखी कृष्ण दास को अपना शिष्य समझ कर उसका पालन करें। श्रील जीव गोस्वामी जी ने आपको श्यामानन्द नाम प्रदान किया था। एक दिन श्रील श्यामानन्द प्रभु श्रीकृष्ण-प्रेम के आवेश में रास-मण्डल में झाड़ू से सफाई कर रहे थे कि उसी समय आपको राधारानी जी की अलौकिक कृपा से वहाँ पर राधारानी जी के श्रीचरणों का एक नूपुर मिला। श्रील श्यामानन्द प्रभुजी ने अत्यन्त उल्लास से साथ उस नुपुर को अपने मस्तक से स्पर्श किया, जिससे उनके ललाट पर नूपुर जैसा ही तिलक प्रकट हो गया। यहीं से श्रीश्यामानन्द प्रभुजी के परिवार (सम्प्रदाय) में नूपुर तिलक का प्रवर्तन हुआ। साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
🕉️सनातन धर्म🚩 - 4 10 নুভ্তৎ নিলব্ধ ব্রূা प्रचलन कैसे हुआ? 4 10 নুভ্তৎ নিলব্ধ ব্রূা प्रचलन कैसे हुआ? - ShareChat
#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝अनमोल ज्ञान 🔹🔹🔸🔸 प्रश्न 👉 जातिव्यवस्था इन्सान के द्वारा बनाई गयी हे या ईश्वर के द्वारा ? उत्तर 👉 निश्चित रूप से ईश्वर द्वारा बनाई गयी है ! प्रश्न 👉 क्या इसे तर्क के द्वारा समझा सकते हे ? उत्तर 👉 हां क्यों नहीं बिलकुल समझा सकता हूँ ! प्रश्नकर्ता 👉 लेकिन न तो मुझे संस्कृत का ज्ञान हे ना ही में शास्त्रों का ज्ञाता हु, हा अंग्रेजी से मैंने ऍम.ए .किया है ! उत्तर 👉 कोई बात नहीं संस्कृत ,या शास्त्रों का ज्ञान नहीं होगा चलेगा किन्तु कॉमनसेंस होना जरुरी है! प्रश्नकर्ता 👉 जी वो तो है ! उत्तर 👉 अब हम शुरुआत करते हे ,कृपया बताए कि इस पृथ्वी पर कितने प्रकार के जीव रहते है? प्रश्नकर्ता 👉 मनुष्य ,पशु ,पक्षी जलचर ,पेड़, पोधे इत्यादि ! उत्तर 👉 बिलकुल सही अब एक बात बताओ पशु कहने से सभी पशु शेर हो गए क्या........ ,पक्षी कहने से सभी पक्षी तोता हो गए क्या... ,जलचर कहने से सभी शार्क मछली हो गए क्या ,पेड़ कहने से सभी आम हो गए क्या ? प्रश्नकर्ता 👉 नहीं...... शेर जानवरों की जाति है.., तोता पक्षियों की जाति हे,... और आम पेड़ की जाति है ! उत्तर : तो क्या इन्हें इन्सान ने बनाया है ? प्रश्नकर्ता 👉 नहीं.....ये तो ईश्वर की बनाई व्यवस्था है। उत्तर 👉 ठीक उसी प्रकार मनुष्य कहने से सभी ब्राह्मण हो गए क्या ? नहीं..... ये तो मनुष्यों की जाति व्यवस्था हे जो की ईश्वर द्वारा बनाई गयी हे जैसे जानवर शब्द से हजारो जानवरों का होना समझा जाता हे पक्षी शब्द से हजारो प्रकार के पक्षी होने का बोध होता हे फल शब्द से हजारो प्रकार के फलो का होना सुनिश्चित होता है उसी प्रकार मनुष्य शब्द से हजारो प्रकार के मनुष्यों का होना सिद्ध होता हे..... साथ ही साथ इन सभी की जाति के साथ साथ प्रजाति का होना भी पाया जाता है !और सुनो जातिव्यवस्था केवल इन्सान के लिए ही नहीं अपितु यह संसार अनेक प्रकार की विविधताओ से भरा पड़ा है !आप स्वयं देखिये आम की कितनी प्रजातिया होती हे...नीम की कितनी प्रजाति होती हे...शेर की जाति प्रजाति...बन्दर ,घोडा ,तोता ,सर्प ,गेंहू चना ,चावल ,इत्यादि !अतः अब आप ही बताए कि इसमें इन्सान द्वारा जातिव्यवस्था का निर्धारण करना कहा सिद्ध होता है ! प्रश्नकर्ता 👉 मै आपकी बात से सहमत हूँ कृपया आप जातिव्यवस्था के विज्ञानं को सरल भाषा में विस्तार से समझाने का कष्ट करे ! उत्तर 👉 ब्रम्हाजी ने स्रष्टि रचना के समय अपने मुख से ब्राह्मण को उत्पन्न किया ,भुजाओ से क्षत्रियो को उत्पन्न किया ,अपने उदर से वेश्यो को प्रकट किया तथा अपने चरणों से शुद्रो की उत्पत्ति की.....आर्थात मुख से मेधाशक्ति .भुजाओ से रक्षाशक्ति ,उदर से अर्थशक्ति ,एवं चरणों से श्रमशक्ति को उत्पन्न किया ,.......इसका अर्थ यह हुआ की ब्राह्मणों के पास जो शक्ति हे उसका सम्बन्ध सिर से हे यानि ब्राह्मण के पास देखने,सुनने ,बोलने ,बताने ,सूंघने,तथा किसी को भी खा जाने की शक्ति होती है,प्राचीन काल में किसी भी राज्य में जो राजा होता था वह मार्गदर्शक के रूप में किसी ब्राह्मण को जरुर नियुक्त करता था तथा उन्ही के परामर्श से अपनी प्रजा का पालन करता था क्योकि वह जानता था की मेरे पास शक्ति हे ज्ञान नहीं....,क्षत्रियो को भुजाओ से उत्पन्न किया तो स्वाभाविक हे की उनके पास भुजाओ का बल अत्यधिक पाया जाता हे और किसी भी राज्य की रक्षा का दायित्व क्षत्रियो का होता है ,उसी प्रकार वेश्यो की उत्पत्ति उदर से हुई तो उनके पास संग्रह तथा वितरण की कुशलता पाई जाती हे यही उसकी शक्ति का आधार है ,ठीक उसी प्रकार शुद्रो को पैरो से उत्पन्न किया याने शुद्रो के पास श्रम शक्ति होती जो श्रम वे कर सकते है वह अन्य कोई वर्ण या जाती का व्यक्ति नहीं कर सकता इसीलिए भगवान् कहते हे सभी की धर्मो सिद्धि का मूल सेवा है...... सेवा किये बिना किसी का भी धर्म सिद्ध नहीं होता अतः सब धर्मो की मुलभुत सेवा ही जिसका धर्म है... वह शुद्र सब वर्णों में महान हे.. ब्राह्मण का धर्म मोक्ष के लिए हे.. ,क्षत्रिय का धर्म भोग केलिए...,वेश्य का धर्म अर्थ के लिए है... ,और शुद्र का धर्म -धर्म के लिए है.., इस प्रकार अन्य तीन वर्णों के धर्म अन्य तीन पुरषार्थ के लिए है किन्तु शुद्र का धर्म स्व पुरषार्थ के लिए है अतः इसकी वृति से ही भगवन प्रसन्न हो जाते है अस्तु अब आगे सुनिए यह जो ब्रम्हाजी की स्रष्टि हे यह भगवान का शारीर ही हे इसी में सारा ब्रम्हाण्ड बसा हुआ हे सारे लोक इसी शारीर में है ! यह विराट शारीर ही हमारा संसार हे !अब आप बताइए की किस किस अंग से कोन सा कार्य होता है......... सिर का कार्य हाथो द्वारा संभव है... ,नहीं....हाथो का कार्य उदर द्वारा संभव है, नहीं......उदर का कार्य पैरो द्वारा संभव है, नहीं........ जातिगत व्यवस्था को कदाचित भंग कर दिया जाए तो क्या स्थिति उत्पन्न होगी विचार कीजिए................विचार क्या कीजिए अरे देख ही लीजिए वर्तमान में जो शिक्षा पद्धति व् जीविका पद्धति हमारे ऊपर थोपी गयी है उसका परिणाम क्या हो रहा है वर्णसंकरता, कर्मसंकरता.........और ऊपर से आरक्षण... हमारे यहाँ कभी भी किसी के लिए भी रोजी रोटी का संकट था क्या ?कभी नहीं प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाती तथा वर्ण के अनुसार अपना जीवन यापन करता था !कोई भी किसी के कर्म का अतिक्रमण नहीं कर सकता था अपितु एक दुसरे के सामंजस्य से सारे कार्य होते थे,........कोई भी समाज अपने को हिन् नहीं समझता था !प्रत्येक समाज अपनी जाति पर गर्व महसूस करता था क्योकि वो जानते थे की जो गुण योग्यता उनमे है वह अन्य के पास नहीं है यह ईश्वर का उस समाज के लिए वरदान हुआ या नहीं ? अब मै आपको दुसरे रूप में समझाता हु ,कल्पना कीजिए कि आप स्वयं भगवान् विराट है यह शारीर जो आपको प्राप्त हुआ है यह आपका संसार है और इस शारीर के मालिक या भगवान आप है एवं इस संसार में आपको मुख के रूप में ब्राह्मण ,भुजाओ के रूप में क्षत्रिय ,उदर के रूप में वेश्य ,और पैरो के रूप में शुद्र ,प्राप्त हुए है !अब इनसे आपको इस संसार रूपी शारीर का संचालन करना हे कैसे करेंगे ?अब आप कहे की मै जातिव्यवस्था में विश्वास नहीं करता बल्कि सबको सामान दृष्टि से देखता हु... कोई ब्राह्मण नहीं ,कोई क्षत्रिय नहीं ,कोई वेश्य नहीं ,कोई शुद्र नहीं ,आर्थात सभी अंगो को सामान मानता हु किसी भी अंग से कोई भी कार्य करा सकता हु !और तो और अब मै अपने चरणों को यानि की शुद्रो को मुख्य धारा में लाने का प्रयास करूँगा और ब्राह्मणों से वो कार्य करवाऊंगा जो आजतक श्रमशक्ति {शुद्र}द्वारा किये जाते थे !वेश्यो के कार्य क्षत्रिय करेंगे ,क्षत्रिय के कार्य वेश्यो से ,आर्थात सभी वर्णों को सभी कार्य का अधिकार होगा !अब फिर से आप कल्पना करके बताओ की आपके संसार रूपी शारीर की स्थिति क्या होगी ?.....................वही स्थिति आज हमारे समाज की हो रही है उदाहरण लीजिए जब से आरक्षण आया हे तब से हमारे चरण {श्रमशक्ति}जमीं से ऊपर उठ गए क्या मतलब निकला...... चरणों का स्थान वाहनों ने ले लिया या नहीं... आज कितने व्यक्ति संसार में अपने पैरो का उपयोग करते हे आवागमन में…… अब पैरो का उपयोग केवल विशेष परिस्थिति में ही किया जाता है ताकि इन्हें किसी प्रकार का कष्ट न हो !और तो और टी.वी.का चेनल बदलने के लिए भी पैरो को कष्ट देना उचित नहीं रह गया विकल्प के तौर पर अब हमारे पास रिमोट कण्ट्रोल जो आ गया है !अब जब पैरो द्वारा श्रम ही नहीं होगा तो क्या होगा .......मोटापा बढ़ जाएगा पेट बाहर निकल आएगा....मतलब संसार की सारी संपत्ति का वेश्य {उदर}संग्रहण तो करेंगे किन्तु वितरण नहीं होगा......वितरण क्यों नहीं होगा क्योकि श्रम नहीं हो रहा......अब बारी आती है ब्राह्मणों की यानि मुख की.........क्या स्थिति है आज मुख {ब्राह्मण}की जितनी सफाई इसकी की जाती है शायद ही किसी अंग को इतना चमकाया जाता हो जितना चेहरे को चमकाया जाता हे !सबसे ज्यादा जिम्मेदारी भी इसी की है...क्योकि संसार रूपी शारीर के सञ्चालन में इसकी भूमिका सबसे अहम् होती है....बगैर पैरो के शारीर जीवित रह सकता हे ........बगैर हाथो के शारीर जीवित रह सकता है ....किन्तु सिर को अगर धड से अलग कर दिया जाए तो कोई जीवित रह सकता है ....कल्पना कीजिए महोदय......एसा हे की हम कोई समानता के विरोधी नहीं है सभी को समानता का अधिकार निश्चित ही प्राप्त होना चाहिए इसमें कुछ भी गलत नहीं है किन्तु समानता का मतलब किसी के अधिकारों का अतिक्रमण करना नहीं है !आप ही बताईए आप अपने किस अंग से भेदभाव करते है... किसी से नहीं... क्योकि वे सब आपके अंग है ! अभी कुछ समय पहले एक पोस्ट फेसबुक पर पढ़ रहा था उसमे एक सज्जन ने जातिव्यवस्था के बारे में लिखा की ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण, क्षत्रीय का बेटा क्षत्रिय........ ,एसा कैसे संभव हो सकता है...इस प्रकार तो डॉक्टर का बेटा डोक्टर ,मास्टरजी का बेटा मास्टर यह तो गलत है ..................अब मै उन सज्जन से कहूँगा की मान्यवर आप जिस व्यवस्था के अनतेरगत बात कर रहे वह मैकाले महोदय की शिक्षा पद्धति के डॉक्टर व् ,मास्टरजी हे न कि सनातन व्यवस्था के…. हमारे यहाँ तो वैद्य का बेटा वैध ,सुतार का बेटा सुतार ,लोहार का बेटा लोहार ,सुनार का बेटा सुनार ,ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण ,और क्षत्रिय का बेटा क्षत्रिय ही होता है !उन्हें कुछ सिखने कही बाहर नहीं जाना होता अपितु अपनी परम्परा प्राप्त आजीविका का ज्ञान उसके DNA यानि संचित कर्म में रचा बसा होता है !आवश्यकता है तो अपने वर्ण या जाति के गुणों को निखारने की क्योकि हीरे को जब तक तराशा नहीं जावेगा तब तक वह किसी के मुकुट की शोभा नहीं बढ़ा सकता। साभार~ पं देव शर्मा💐 🔹🔹🔸🔸🔹🔹🔸🔸🔹🔹🔸🔸🔹🔹🔸🔸
🕉️सनातन धर्म🚩 - আনিত্নথো विषयक प्रश्नोत्तरी আনিত্নথো विषयक प्रश्नोत्तरी - ShareChat
#मंदिर दर्शन शनि पर्वत, मुरैना 〰〰🌼〰〰 हनुमान जी ने लंका से फेंका तो यहां गिरे शनिदेव, मौजूद हैं गिरने के निशान हनुमान जी ने लंका से फेंका तो यहां गिरे शनिदेव, मौजूद हैं गिरने के निशान – मध्य प्रदेश में ग्वालियर के नजदीकी एंती गांव में शनिदेव मंदिर का देश में विशेष महत्व है। देश के सबसे प्राचीन त्रेतायुगीन शनि मंदिर में प्रतिष्ठत शनिदेव की प्रतिमा भी विशेष है। माना जाता है कि ये प्रतिमा आसमान से टूट कर गिरे एक उल्कापिंड से निर्मित है। ज्योतिषी व खगोलविद मानते है कि शनि पर्वत पर निर्जन वन में स्थापित होने के कारण यह स्थान विशेष प्रभावशाली है। महाराष्ट्र के सिगनापुर शनि मंदिर में प्रतिष्ठित शनि शिला भी इसी शनि पर्वत से ले जाई गई है। त्रेतायुग में आकर विराजे थे शनिदेव माना जाता है कि शनिश्चरा स्थित श्री शनि देव मंदिर का निर्माण राजा विक्रमादित्य ने करवाया था। सिंधिया शासकों द्वारा इसका जीर्णोद्धार कराया गया। रियातसकालीन दस्तावेजों के मुताबिक 1808 में ग्वालियर के तत्कालीन महाराज दौलतराव सिंधिया ने मंदिर की व्यवस्था के लिए जागीर लगवाई। तत्कालीन शासक जीवाजी राव सिंधिया ने 1945 में जागीर को जप्त कर यह देवस्थान औकाफ बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज ग्वालियर के प्रबंधन में सौंप दिया तबसे इस देवस्थान का प्रबंधन औकाफ बोर्ड (मध्य प्रदेश सरकार के अंतर्गत) के प्रबंधन में है। वर्तमान में इसका प्रबंधन जिला प्रशासन मुरैना द्वारा किया जाता है। महाबली हनुमान ने यहां भेजा था शनिदेव को प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है कि कई दूसरे देवताओं के साथ रावण ने शनिदेव को भी कैद कर रखा था। जब हनुमान जी लंका जलाने की जुगत में थे तो शनि देव ने इशारा कर आग्रह किया कि उन्हें आजाद कर दें तो रावण का नाश करने में मददगार होंगे। बजरंगबली ने शनिदेव को रावण की कैद से छुड़ाया तो उस वक्त दुर्बल हो चुके शनिदेव ने उनसे दोबारा ताकत पाने के लिए सुरक्षित स्थान दिलाने का अनुरोध किया। हनुमान जी ने उन्हें लंका से प्रक्षेपित किया तो शनिदेव इस क्षेत्र में आकर प्रतिष्ठित हो गए। तब से यह क्षेत्र शनिक्षेत्र के नाम से विख्यात हो गया। देश भर से श्रद्धालु न्याय के देवता से इंसाफ की गुहार लगाने हर शनिश्चरी अमावस्या को यहां आते हैं। कहा जाता है कि लंका से प्रस्थान करते हुए शनिदेव की तिरछी नजरों के वार ने न सिर्फ सोने की लंका को हनुमान जी के द्वारा खाक में मिलवा दिया, साथ ही रावण का कुल के साथ विनाश करा कर शनि न्याय को प्रतिस्थापित किया। शनिदेव के लंका से आकर गिरने से बना गड्ढा आज भी मौजूद हैं उल्कापात के निशान जब हनुमान जी के प्रक्षेपित शनिदेव यहां आ कर गिरे तो उल्कापास सा हुआ। शिला के रूप में वहां शनिदेव के प्रतिष्ठत होने से एक बड़ा गड्ढा बन गया, जैसा कि उल्का गिरने से होता है। ये गड्ढा आज भी मौजूद है। शनि मंदिर में उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़ शनिदेव के आगमन से क्षेत्र बन गया था लौह प्रधान शनि क्षेत्र के तौर पर मशहूर इस इलाके में उस वक्त लौह अयस्क प्रचुर मात्रा में पाया जाता था। इतिहास में प्रमाण मिले है कि ग्वालियर के आसपास लोहे का धातुकर्म बड़े पैमाने पर होता रहा था। आज भी यहां के भू-गर्भ में लौह-अयस्क की प्रधानता है। साभार~ पं देव शर्मा💐 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰
मंदिर दर्शन - হনি এবন मुरैना হনি এবন मुरैना - ShareChat
#🕉️सनातन धर्म🚩 नाब्रह्म क्षत्रमृध्नोति नाक्षत्रं ब्रह्म वर्धते । ब्रह्म क्षत्रं संपृक्तमिह चामुत्र वर्धते ॥ [ श्रीमनुस्मृति , ०९.३२२ ] ~ ब्राह्मणके बिना क्षत्रिय एवं क्षत्रियके बिना ब्राह्मण समृद्धिको नहीं पा सकते , ( किन्तु ) मिले हुए ब्राह्मण तथा क्षत्रिय इस लोकमें तथा परलोकमें ( धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूप चतुर्विध पुरुषार्थको पानेसे ) समृद्धिको पाते हैं । नारायण 🪷🌷🪷
🕉️सनातन धर्म🚩 - क्षत्रमृध्नोति   नाक्षत्रं वर्धते। নানম্স ೩೯ संपृक्तमिह चामुत्र वर्धते।। ३२२।। সম্ম ৪প ব ब्राह्मणरहितक्षत्रियो वृद्धिं न याति, शान्तिकपौष्टिकव्यवहारेक्षणादिधर्मविरहात् 0 किंतु एवं क्षत्रियरहितोउपि ब्राह्मणो न वर्धते, रक्षां विना यागादिकर्मानिष्पत्तेः [ ब्राह्मणः क्षत्रियश्च परस्परसंबद्ध एवेह लोके परलोके च धर्मार्थकाममोक्षावाप्त्या वृद्धिमेति | दण्डप्रकरणे चेयं ब्राह्मणस्तुतिब्राह्मणानामपराधिनामपि लघुदण्डप्रयोगनिय- मार्था।। ३२२।। जिसप्रकार ब्राह्मणरहित क्षत्रिय वृद्धि को प्राप्त नहों होता है, ठीक उसीप्रकार क्षत्रियरहित ब्राह्मण भी वृद्धि को प्राप्त नहीं करता है। जबकि ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों ही मिलकर इसलोक एवं परलोक दोनों में वृद्धि प्राप्त करते हैं।। ३२२।।  क्षत्रमृध्नोति   नाक्षत्रं वर्धते। নানম্স ೩೯ संपृक्तमिह चामुत्र वर्धते।। ३२२।। সম্ম ৪প ব ब्राह्मणरहितक्षत्रियो वृद्धिं न याति, शान्तिकपौष्टिकव्यवहारेक्षणादिधर्मविरहात् 0 किंतु एवं क्षत्रियरहितोउपि ब्राह्मणो न वर्धते, रक्षां विना यागादिकर्मानिष्पत्तेः [ ब्राह्मणः क्षत्रियश्च परस्परसंबद्ध एवेह लोके परलोके च धर्मार्थकाममोक्षावाप्त्या वृद्धिमेति | दण्डप्रकरणे चेयं ब्राह्मणस्तुतिब्राह्मणानामपराधिनामपि लघुदण्डप्रयोगनिय- मार्था।। ३२२।। जिसप्रकार ब्राह्मणरहित क्षत्रिय वृद्धि को प्राप्त नहों होता है, ठीक उसीप्रकार क्षत्रियरहित ब्राह्मण भी वृद्धि को प्राप्त नहीं करता है। जबकि ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों ही मिलकर इसलोक एवं परलोक दोनों में वृद्धि प्राप्त करते हैं।। ३२२।। - ShareChat
#🕉️सनातन धर्म🚩 ‘ #क्षत्रिय’ शब्द की व्युत्पत्ति ' —- ~ ब्राह्मणों को क्षति से बचाने के कारण ही ( राजा पृथु ) क्षत्रिय कहलाये । ( King Pruthu ) was given the epithet ‘Kṣattṛya’ because he safeguarded Brāhmaṇa-s from harm. - भीष्म पितामह , महाभारत
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#☝आज का ज्ञान #कामदेव के रहस्य 〰️〰️🌼〰️〰️ हिन्दू धर्म में कामदेव, कामसूत्र, कामशास्त्र और चार पुरुषर्थों में से एक काम की बहुत चर्चा होती है। खजुराहो में कामसूत्र से संबंधित कई मूर्तियां हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या काम का अर्थ सेक्स ही होता है? नहीं, काम का अर्थ होता है कार्य, कामना और कामेच्छा से। वह सारे कार्य जिससे जीवन आनंददायक, सुखी, शुभ और सुंदर बनता है काम के अंतर्गत ही आते हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। आपने कामदेव के बारे में सुना या पढ़ा होगा। पौराणिक काल की कई कहानियों में कामदेव का उल्लेख मिलता है। जितनी भी कहानियों में कामदेव के बारे में जहां कहीं भी उल्लेख हुआ है, उन्हें पढ़कर एक बात जो समझ में आती है वह यह कि कि कामदेव का संबंध प्रेम और कामेच्छा से है। लेकिन असल में कामदेव हैं कौन? क्या वह एक काल्पनिक भाव है जो देव और ऋषियों को सताता रहता था या कि वह भी किसी देवता की तरह एक देवता थे?आजो जानते हैं कामदेव के बारे में रहस्य... कामदेव का परिवार👉 〰️〰️〰️〰️〰️〰️पौराणिक कथाओं के अनुसार कामदेव भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी के पुत्र हैं। उनका विवाह रति नाम की देवी से हुआ था, जो प्रेम और आकर्षण की देवी मानी जाती है। कुछ कथाओं में यह भी उल्लिखित है कि कामदेव स्वयं ब्रह्माजी के पुत्र हैं और इनका संबंध भगवान शिव से भी है। कुछ जगह पर धर्म की पत्नी श्रद्धा से इनका आविर्भाव हुआ माना जाता है। प्रेम के देवता👉 〰️〰️〰️〰️जिस तरह पश्चिमी देशों में क्यूपिड और यूनानी देशों में इरोस को प्रेम का प्रतीक माना जाता है, उसी तरह हिन्दू धर्मग्रंथों में कामदेव को प्रेम और आकर्षण का देवता कहा जाता है। कामदेव के अन्य नाम:👉 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 'रागवृंत', 'अनंग', 'कंदर्प', 'मनमथ', 'मनसिजा', 'मदन', 'रतिकांत', 'पुष्पवान' तथा 'पुष्पधंव' आदि कामदेव के प्रसिद्ध नाम हैं। कामदेव को अर्धदेव या गंधर्व भी कहा जाता है, जो स्वर्ग के वासियों में कामेच्छा उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी हैं। कहीं-कहीं कामदेव को यक्ष की संज्ञा भी दी गई है। कामदेव का स्वरूप👉 〰️〰️〰️〰️〰️〰️कामदेव को सुनहरे पंखों से युक्त एक सुंदर नवयुवक की तरह प्रदर्शित किया गया है जिनके हाथ में धनुष और बाण हैं। ये तोते के रथ पर मकर (एक प्रकार की मछली) के चिह्न से अंकित लाल ध्वजा लगाकर विचरण करते हैं। वैसे कुछ शास्त्रों में हाथी पर बैठे हुए भी बताया गया है। कामदेव के धनुष और बाण👉 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️उनका धनुष मिठास से भरे गन्ने का बना होता है जिसमें मधुमक्खियों के शहद की रस्सी लगी है। उनके धनुष का बाण अशोक के पेड़ के महकते फूलों के अलावा सफेद, नीले कमल, चमेली और आम के पेड़ पर लगने वाले फूलों से बने होते हैं। कामदेव के पास मुख्यत: 5 प्रकार के बाण हैं। कामदेव के 5 बाणों के नाम :1. मारण, 2. स्तम्भन, 3. जृम्भन, 4. शोषण, 5. उम्मादन (मन्मन्थ)। मदन-कामदेव मंदिर👉 〰️〰️〰️〰️〰️〰️मदन-कामदेव मंदिर को 'असम का खजुराहो' के नाम से जाना जाता है। वहां की मैथुन-प्रतिमाएं मध्यप्रदेश के खजुराहो की याद दिलाती हैं। सेक्स के देवता कामदेव और उनकी पत्नी रति की कथा को आज भी ये जीवंत बना रही हैं। यह मंदिर घने जंगलों के भीतर पेड़ों से छुपा हुआ है। कहते हैं कि भगवान शंकर द्वारा तृतीय नेत्र खोलने पर भस्म हो गए कामदेव का इस स्थान पर पुनर्जन्म तथा उनकी पत्नी रति के साथ पुन: मिलन हुआ था। कामदेव की ऋतु वसंत👉 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️वसंत पंचमी के दिन कामदेव की पूजा की जाती है। वसंत कामदेव का मित्र है इसलिए कामदेव का धनुष फूलों का बना हुआ है। इस धनुष की कमान स्वरविहीन होती है यानी जब कामदेव जब कमान से तीर छोड़ते हैं तो उसकी आवाज नहीं होती है। कामदेव का एक नाम 'अनंग' है यानी बिना शरीर के ये प्राणियों में बसते हैं। एक नाम 'मार' है यानी यह इतने मारक हैं कि इनके बाणों का कोई कवच नहीं है। वसंत ऋतु को प्रेम की ही ऋतु माना जाता रहा है। इसमें फूलों के बाणों से आहत हृदय प्रेम से सराबोर हो जाता है। यहां रहता है कामदेव का वास : 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ यौवनं स्त्री च पुष्पाणि सुवासानि महामते:। गानं मधुरश्चैव मृदुलाण्डजशब्दक:।। उद्यानानि वसन्तश्च सुवासाश्चन्दनादय:। सङ्गो विषयसक्तानां नराणां गुह्यदर्शनम्।। वायुर्मद: सुवासश्र्च वस्त्राण्यपि नवानि वै। भूषणादिकमेवं ते देहा नाना कृता मया।। मुद्गल पुराण के अनुसार कामदेव का वास यौवन, स्त्री, सुंदर फूल, गीत, पराग कण या फूलों का रस, पक्षियों की मीठी आवाज, सुंदर बाग-बगीचों, वसंत ऋ‍तु, चंदन, काम-वासनाओं में लिप्त मनुष्य की संगति, छुपे अंग, सुहानी और मंद हवा, रहने के सुंदर स्थान, आकर्षक वस्त्र और सुंदर आभूषण धारण किए शरीरों में रहता है। इसके अलावा कामदेव स्त्रियों के शरीर में भी वास करते हैं, खासतौर पर स्त्रियों के नयन, ललाट, भौंह और होठों पर इनका प्रभाव काफी रहता है। कामदेव और शिव👉 〰️〰️〰️〰️〰️〰️जब भगवान शिव की पत्नी सती ने पति के अपमान से आहत और पिता के व्यवहार से क्रोधित होकर यज्ञ की अग्नि में आत्मदाह कर लिया था तब सती ने ही बाद में पार्वती के रूप में जन्म लिया। सती की मृत्यु के पश्चात भगवान शिव संसार के सभी बंधनों को तोड़कर, मोह-माया को पीछे छोड़कर तप में लीन हो गए। वे आंखें खोल ही नहीं रहे थे। ऐसे में सभी देवों की अनुशंसा पर कामदेव ने उन पर अपना बाण चलाकर शिव के भीतर देवी पार्वती के लिए आकर्षण विकसित किया। शिव ने क्रोधित होकर जब आंखें खोलीं तो उससे कामदेव भस्म हो गए। हालांकि बाद में शिवजी ने उन्हें जीवनदान दे दिया था, लेकिन बगैर देह के। श्रीकृष्ण और कामदेव👉 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण को भी कामदेव ने अपने नियंत्रण में लाने का प्रयास किया था। कामदेव ने भगवान श्रीकृष्ण से यह शर्त लगाई कि वे उन्हें भी स्वर्ग की अप्सराओं से भी सुंदर गोपियों के प्रति आसक्त कर देंगे। श्रीकृष्ण ने कामदेव की सभी शर्त स्वीकार की और गोपियों संग रास भी रचाया लेकिन फिर भी उनके मन के भीतर एक भी क्षण के लिए वासना ने घर नहीं किया। रति ने पाला कामदेव को पुत्र की तरह फिर उनसे कर लिया विवाह :जब शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया तब ये देख रति विलाप करने लगी तब जाकर शिव ने कामदेव के पुनः कृष्ण के पुत्र रूप में धरती पर जन्म लेने की बात बताई। शिव के कहे अनुसार भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मणि को प्रद्युम्न नाम का पुत्र हुआ, जो कि कामदेव का ही अवतार था। कहते हैं कि श्रीकृष्ण से दुश्मनी के चलते राक्षस शंभरासुर नवराज प्रद्युम्न का अपहरण करके ले गया और उसे समुद्र में फेंक आया। उस शिशु को एक मछली ने निगल लिया और वो मछली मछुआरों द्वारा पकड़ी जाने के बाद शंभरासुर के रसोई घर में ही पहुंच गई। तब रति रसोई में काम करने वाली मायावती नाम की एक स्त्री का रूप धारण करके रसोईघर में पहुंच गई। वहां आई मछली को उसने ही काटा और उसमें से निकले बच्चे को मां के समान पाला-पोसा। जब वो बच्चा युवा हुआ तो उसे पूर्व जन्म की सारी याद दिलाई गई। इतना ही नहीं, सारी कलाएं भी सिखाईं तब प्रद्युम्न ने शंभरासुर का वध किया और फिर मायावती को ही अपनी पत्नी रूप में द्वारका ले आए। भगवान ब्रह्मा ने दिया वरदान👉 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय ब्रह्माजी प्रजा वृद्धि की कामना से ध्यानमग्न थे। उसी समय उनके अंश से तेजस्वी पुत्र काम उत्पन्न हुआ और कहने लगा कि मेरे लिए क्या आज्ञा है? तब ब्रह्माजी बोले कि मैंने सृष्टि उत्पन्न करने के लिए प्रजापतियों को उत्पन्न किया था किंतु वे सृष्टि रचना में समर्थ नहीं हुए इसलिए मैं तुम्हें इस कार्य की आज्ञा देता हूं। यह सुन कामदेव वहां से विदा होकर अदृश्य हो गए। यह देख ब्रह्माजी क्रोधित हुए और शाप दे दिया कि तुमने मेरा वचन नहीं माना इसलिए तुम्हारा जल्दी ही नाश हो जाएगा। शाप सुनकर कामदेव भयभीत हो गए और हाथ जोड़कर ब्रह्माजी के समक्ष क्षमा मांगने लगे। कामदेव की अनुनय-विनय से ब्रह्माजी प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि मैं तुम्हें रहने के लिए 12 स्थान देता हूं- स्त्रियों के कटाक्ष, केश राशि, जंघा, वक्ष, नाभि, जंघमूल, अधर, कोयल की कूक, चांदनी, वर्षाकाल, चैत्र और वैशाख महीना। इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी ने कामदेव को पुष्प का धनुष और 5 बाण देकर विदा कर दिया। ब्रह्माजी से मिले वरदान की सहायता से कामदेव तीनों लोकों में भ्रमण करने लगे और भूत, पिशाच, गंधर्व, यक्ष सभी को काम ने अपने वशीभूत कर लिया। फिर मछली का ध्वज लगाकर कामदेव अपनी पत्नी रति के साथ संसार के सभी प्राणियों को अपने वशीभूत करने बढ़े। इसी क्रम में वे शिवजी के पास पहुंचे। भगवान शिव तब तपस्या में लीन थे तभी कामदेव छोटे से जंतु का सूक्ष्म रूप लेकर कर्ण के छिद्र से भगवान शिव के शरीर में प्रवेश कर गए। इससे शिवजी का मन चंचल हो गया। उन्होंने विचार धारण कर चित्त में देखा कि कामदेव उनके शरीर में स्थित है। इतने में ही इच्छा शरीर धारण करने वाले कामदेव भगवान शिव के शरीर से बाहर आ गए और आम के एक वृक्ष के नीचे जाकर खड़े हो गए। फिर उन्होंने शिवजी पर मोहन नामक बाण छोड़ा, जो शिवजी के हृदय पर जाकर लगा। इससे क्रोधित हो शिवजी ने अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से उन्हें भस्म कर दिया। कामदेव को जलता देख उनकी पत्नी रति विलाप करने लगी। तभी आकाशवाणी हुई जिसमें रति को रुदन न करने और भगवान शिव की आराधना करने को कहा गया। फिर रति ने श्रद्धापूर्वक भगवान शंकर की प्रार्थना की। रति की प्रार्थना से प्रसन्न हो शिवजी ने कहा कि कामदेव ने मेरे मन को विचलित किया था इसलिए मैंने इन्हें भस्म कर दिया। अब अगर ये अनंग रूप में महाकाल वन में जाकर शिवलिंग की आराधना करेंगे तो इनका उद्धार होगा। तब कामदेव महाकाल वन आए और उन्होंने पूर्ण भक्तिभाव से शिवलिंग की उपासना की। उपासना के फलस्वरूप शिवजी ने प्रसन्न होकर कहा कि तुम अनंग, शरीर के बिन रहकर भी समर्थ रहोगे। कृष्णावतार के समय तुम रुक्मणि के गर्भ से जन्म लोगे और तुम्हारा नाम प्रद्युम्न होगा। कामदेव मंत्र👉 〰️〰️〰️〰️कामदेव के बाण ही नहीं, उनका 'क्लीं मंत्र' भी विपरीत लिंग के व्यक्ति को आकर्षित करता है। कामदेव के इस मंत्र का नित्य दिन जाप करने से न सिर्फ आपका साथी आपके प्रति शारीरिक रूप से आकर्षित होगा बल्कि आपकी प्रशंसा करने के साथ-साथ वह आपको अपनी प्राथमिकता भी बना लेगा। कहा जाता है कि प्राचीनकाल में वेश्याएं और नर्तकियां भी इस मंत्र का जाप करती थीं, क्योंकि वे अपने प्रशंसकों के आकर्षण को खोना नहीं चाहती थीं। ऐसा माना जाता है कि इस मंत्र का लगातार जाप करते रहने की वजह से उनका आकर्षण, सौंदर्य और कांति बरकरार रहती थी। साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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#☝अनमोल ज्ञान #🙏🏻मां सरस्वती 🌺 #🕉️सनातन धर्म🚩 🕉️ ब्रह्मा-सरस्वती संबंध: शास्त्र-प्रमाणित सत्य खंडन 🕉️ 🌟 प्रस्तावना ब्रह्मा जी एवं माँ सरस्वती पर विधर्मियों द्वारा लगाए गए लांछन पूर्णतः मिथ्या तथा कपोलकल्पित हैं । यह एक सुनियोजित षड्यंत्र है जो सनातन धर्म को बदनाम करने के लिए गढ़ा गया है । --- 📚 साहित्यिक खण्डन~ 🔍 भूमिका: तीन नाम , एक देवी~ #सरस्वती_गायत्री_सविता_त्रयमेकं_स्वरूपिणी । #विधर्मिभिः_कल्पितं_च_विभ्रमं_तत्_निराक्रियते ॥ 1. लक्षणं मीमांसा , अथर्ववेद विचेष्टितं ( श्लोक १२ ) #पूर्वा_भवति_गायत्री_मध्यमा_सावित्री_पश्चिमा_सन्ध्या_सरस्वती । #रक्ता_गायत्री_श्वेता_सावित्री_कृष्णा_सरस्वती ॥ हिंदी अर्थ~ "प्रातःकाल गायत्री , मध्याह्न सावित्री एवं सायंकाल सन्ध्या सरस्वती है । लाल वर्ण गायत्री , श्वेत सावित्री तथा कृष्ण वर्ण सरस्वती है ।" प्रमाण:~ ✅ अथर्ववेद की मीमांसा में स्पष्ट उल्लेख --- 2. वशिष्ठ संहिता का प्रमाण~ #पूषार्यम_मरुत्वाँश्च_ऋषयोऽपि_मुनीश्वराः । #पितरोनागयक्षाश्च_गन्धर्वाप्सरसा_गणाः ॥ #ऋगयजु_सामवेदाश्च_अथर्वांगिरसानि_च । #त्वमेव_पञ्च_भूतानि_तत्वानि_जगदीश्वरि ॥ #ब्राह्मी_सरस्वती_सन्ध्या_तुरीया_त्वं_महेश्वरी । #त्वमेव_सर्व_शास्त्राणि_त्वमेव_सर्व_संहिता ॥ #पुराणानि_च_तंत्राणि_महागम_मतानि_च । #तत्सद्_ब्रह्म_स्वरूपा_त्वं_किञ्चित्सद_सदात्मिका । #परात्परेशी_गायत्री_नमस्ते_मातरम्यिके ॥ अर्थात~ "हे महेश्वरी ! पूषा , अर्यमा , मरुत , ऋषि , मुनीश्वर , पितर , नाग , यक्ष , गंधर्व , अप्सरा , ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद , अथर्ववेद , अंगिरस , पंचभूत , ब्राह्मी , सरस्वती एवं संध्या - तुम ही हो । सर्व शास्त्र , संहिता , पुराण , तंत्र , आगम , निगम - हे ब्रह्मरूपिणी , पराशक्ति गायत्री तुम ही हो ।" प्रमाण:~ ✅ वशिष्ठ संहिता में स्पष्ट उल्लेख~ --- 📖 जन्म संबंधी भ्रम का निवारण~ 1. वृहदारण्यकोपनिषद् का स्पष्टीकरण~ #देवी_ह्यकोऽग्र_आसीत्_सैव_जगदण्डमसृजत् । #तस्या_एव_ब्रह्मा_अजीजनत्_विष्णुरजीजनत् । #सर्वमजीजनत्_सैषा_पराशक्तिः ॥ अर्थात~ "सृष्टि के आरम्भ में वह एक ही देवी शक्ति थी । उसी ने यह ब्रह्माण्ड बनाया । उसी से ब्रह्मा उपजे । उसीने विष्णु, रुद्र उत्पन्न किये । सब कुछ उसी से उत्पन्न हुआ । ऐसी है वह पराशक्ति ।" प्रमाण:~ ✅ वृहदारण्यकोपनिषद् में स्पष्ट~ --- 2. देवी भागवत (१-५) का प्रमाण #स्वं_भूमि_सर्व_भूतानां_प्राणः_प्राणवतां_तथा । #धीः_श्रीः_कान्तिः_क्षमा_शान्ति_श्रद्धा_मेधा_धृतिः_स्मृतिः । #स्व_मुद्गीथेऽर्धमात्रासि_गायत्री_व्याहृति_स्तथा ॥ अर्थात:~ "तुम्हीं सब प्राणियों को धारण करने वाली भूमि हो । प्राणवानों में प्राण हो । तुम्हीं धी , श्री , कान्ति , क्षमा , शान्ति , श्रद्धा , मेधा , धृति , स्मृति हो । तुम ही ओंकार की अर्धमात्रा , उद्गीथ हो , तुम ही गायत्री व्याहृति हो ।" प्रमाण:~ ✅ देवी भागवत पुराण में स्पष्ट~ --- ⚔️ भागवत पुराण के दुष्प्रचारित श्लोक का खंडन~~~>>> 👇🏻👇🏻👇🏻 कथित श्लोक: भागवत ३.१२.२८ #वाचं_दुहितरं_तन्वीं_स्वयम्भूर्हरतीं_मनः । #अकामां_चकमे_क्षत्तः_सकाम_इति_नः_श्रुतम् ॥ दुष्प्रचारित अर्थ:~ "ब्रह्मा जी ने अपनी पुत्री सरस्वती पर कामासक्त होकर उनका पीछा किया ।" --- 🔍 वास्तविक खंडन~~~>>> 👇🏼👇🏼👇🏼 📌 पहला प्रमाण:~ पुत्री होने का कोई उल्लेख नहीं #मानसी_सृष्टौ_सनकाद्याः_मरीच्याद्याः_दश_सुताः । #सरस्वत्याः_न_विद्यते_उल्लेखः_कुतः_दुहितृत्वम् ॥ तथ्य:~ भागवत में मानसी सृष्टि के उल्लेख में सनकादि से लेकर मरीचि आदि 10 पुत्रों का उल्लेख है , किन्तु सरस्वती जी का नहीं । --- 📌 दूसरा प्रमाण:~ ब्रह्मा जी का स्वयं कथन~ #न_मे_हृषीकाणि_पतन्त्यसत्पथे । #इति_ब्रह्मवचनात्_विरुद्धं_दुष्प्रचारितम् ॥ श्लोक: भागवत पुराण में ब्रह्मा स्वयं कहते हैं - "मेरी इन्द्रियां कभी भी कुमार्ग में नहीं जाती हैं ।" --- 📌 तीसरा प्रमाण:~ भगवान विष्णु का वरदान #एतन्मतं_समातिष्ठ_परमेण_समाधिना । #भवान्_कल्पविकल्पेषु_न_विमुह्यति_कर्हिचित् ॥ ( भागवत ३.१२.३६ ) अर्थात:~ "हे ब्रह्मा ! इस मत को परम् समाधि से धारण करो । आप विविध कल्पों में सृष्टि करते हुए कभी मोहित नहीं होंगे ।" --- ✅ सरस्वती के पत्नीरूप होने के प्रमाण~ 1. श्रीधर स्वामी की टीका #इरीशे_अतर्क्ये ( भागवत १०.१३.५७ ) श्रीधर स्वामी की व्याख्या:~ #इरा_सरस्वती_तस्या_ईशे_ब्रह्मणि । अर्थात:~ "इरा = सरस्वती , उनके ईश = पति ब्रह्मा जी में ।" --- 2. धरणिकोष का प्रमाण~ #इरा_सरस्वती_मद्य_जल_काम_प्रदेषु_च । प्रमाण:~ महामहोपाध्याय वंशीधर जी के धरणिकोष में "इरा" शब्द का अर्थ सर्वप्रथम "सरस्वती" बताया गया है । --- 3. पद्म पुराण का स्पष्ट उल्लेख~ #ब्रह्मणः_पत्नी_रूपेण_सरस्वती_प्रकीर्तिता । #पद्मपुराणे_स्पष्टं_तदुल्लेखः_प्रदर्शितः ॥ प्रमाण:~ पद्मपुराण में स्पष्टतः ब्रह्मा जी की पत्नीरूप में सरस्वती का उल्लेख है । --- 🔬 "दुहिता" शब्द का वास्तविक अर्थ~ वशींधरी कोष का प्रमाण~ #सुतानार्योऽथ_गवि_दुहिता_प्रोच्यते_बुधैः । अर्थात:~ "पुत्री, नारी एवं गौ - इन तीनों में दुहिता शब्द का प्रयोग विद्वान करते हैं ।" --- वास्तविक व्याख्या:~ #वाचं_दुहितरं_तन्वीं में "दुहितरं" का अर्थ पत्नीरूपा नारी है , पुत्री नहीं । #ब्रह्मा_दुहिता_उषा_प्रसंग~ १)#वैदिक_स्वरूप #प्रजापति: #स्वां_दुहितरमधिश्कन् प्रजापति ने अपनी पुत्री का घर्षण किया । ( ऋग्वेद १०.६१.६० ) #प्रजापतिर्वै_स्वां_दुहितरमभ्यध्यायद ! प्रजापति में अपनी पुत्री का अनुगमन किया । ( ऐत० ३/३३ ) #प्रजापतिर्वै_स्वांदुहितरमभिदध्यौ । प्रजापति ने अपनी पुत्री को चाहा । ( शत० १.७.४.१ ) #पिता_दुहितूगर्भमाधातू । पिता ने पुत्री में गर्भ स्थापित किया । ( अर्थवेद ६.१०.१३ ) #प्रजापतिर्वा_इदमासितस्य_वाग्_द्वितीयासितामिमथुनं_सभवतसागर्भमादधत्त प्रजापति अकेला था तथा वाक सरस्वती दूसरी थी उन दोनों ने संग किया वह गर्भवती हो गई । ( ताण्ड्य २०.१४.२ ) #प्रजापतिरुषसम्ध्यैत_स्वां_दुहितरं । प्रजापति ने अपनीं पुत्री उषा का गमन किया । ( ताण्ड्य ८.२.१० ) पौराणिक स्वरूप~ #वाचं_दुहितरं_तन्वीं_स्वयम्भूर्हरती_मनः । #अकामां_चकमे_क्षत्तः_सकाम #इति_नःश्रुतम्_वाचं_सरस्वती_दुहितरं ॥” #तमधर्मे_कृतमतिं_विलोक्य_पितरं_सुता: । #मरीचिमुख्या_मुनयो_विश्रम्भात्प्रत्यबोधयन् ॥ २९ ॥ ( ३.१२.२९ ) अर्थात:~ मैत्रेय ने कहा हे विदुर काम के वश होकर स्वयंभू ने कामना रहित वाक नाम वाली पुत्री को चाहा ऐसा हमने सुना है उस पिता की इस प्रकार अधर्म में बुद्धि देखकर मारीचि आदि पुत्रों ने हठाट समझाया कि आज तक ऐसा कर्म न किसी ने किया है एवं न अब तथा आगे को कोई ऐसा करेंगे । #स_इत्थं_गृणत:#पुत्रान्_पुरो_दृष्ट्वा_प्रजापतीन् । #प्रजापतिपतिस्तन्वं_तत्याज_व्रीडितस्तदा । #तां_दिशो_जगृहुर्घोरां_नीहारं_यद्विदुस्तम: ॥ ३३ ॥ प्रजापति ने इस प्रकार अपने सामने ही करो को कहते हुए सुनकर लज्जित हो अपना शरीर छोड़ दिया । ( भागवतमहापुराण ) उपयुक्त वेद प्रमाणों एवं पुराणों की श्लोक ध्यान पूर्वक पढ़ जाने मात्र से प्रत्येक संस्कृतज्ञ तक इसी परिणाम पर पहुंचेगा की श्रीमद् भागवत में जो कुछ लिखा है वह शब्दों के हेरफेर से वेद मंत्रों का ही सरल अनुवाद मात्र है , यदि इसमें कुछ अंतर है तो वह यही है की जहां वेदों ने सम्राट की तरह निधड़क होकर खुले शब्दों में पिता द्वारा पुत्री में गर्भ स्थापित कर देना लिखा है । महा पुराणों में इस स्पष्टता को वालिश जन भयावह जानकर सभ्यता पूर्वक केवल कामना मात्र करना बताया है आप इतने पर भी इस पाप रूप जचने वाले वैज्ञानिक भाव का सामंजस्य बिठलाने के लिए तथा लोक मर्यादा की श्रंखला को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए धर्मशास्त्रोंक्त प्रायश्चितानुष्ठानार्थ ब्रह्मा जी का शरीर त्यागना लिखा है । प्रतिवादी जन पुराणों पर आक्षेप करते समय शायद यह भूल जाया करते हैं कि कथा वेदों में भी ज्यो का त्यों कई स्थानों पर आती है अतः जो समर्थन वैदिक कथा का होगा वहींपौराणिक का भी हो जाएगा । अस्तु या हुई आक्षरीत समानता की बात इसका वास्तविक भाव भी समझिए । #आधिभौतिक_अर्थ_क्या_है ! यहां एक वैज्ञानिक कथा है आ गया है बताया गया है कि सर्दी के दिनों में सूर्योदय के समय जो कोहरा अच्छा जाया करता है आप लोगों ने प्राय देखा होगा कि हेमंत और शिशिर ऋतु के दिनों में प्रातःकाल सूर्य के चारों ओर भापो का पड़त बादलो की तरह छा जाया करते है , से निहार धुंध या कुहरा के नाम से पुकारते है । कभी-कभी या कुहरा इतना गहरा हो जाया करता है घंटो तक सूर्य भगवान के दर्शन नहीं होते और वृक्षो के पत्तों पर छोटे-छोटे जलकण कार खासी टपकन आरंभ हो जाती है बस इसे ही वैज्ञानिक रूप से बताना उस अलंकारिक कथा का तात्पर्य है । ब्रह्मा नाम सूर्य का है ताकि आगे चलकर स्वयं वेद भगवान स्पष्ट कर देते हैं यथा~~~>>> #यो_ह्येव_सविता_स_प्रजापति: । ( शतपथ १२.३.४.१ ) #प्रजापतिर्वै_सविता । ( ताण्ड्य ८.२.१० ) अर्थात~ प्रजापति नाम सूर्य का है । इसी प्रकार सूर्य से उत्पन्न होने के कारण उषा प्रातः कालीन प्रकाश में लालिमा ही उसकी पुत्री है प्रतिदिन आगे-आगे उषा ( पौ ) एवं पीछे पीछे सूर्य का उदय होना ही इसे ही अलंकारिक रूप से वेदों में पुराणों में पुत्री के पीछे पिता का जाना बताया है सूर्य के आकर्षण से खींचा हुआ जल वाष्प रूप में पृथ्वी पर पड़ने से ठिठुर जाता है तथा सिमट सिमट कर कुहरे के रूप में बरसता है । भागवत में इस कथा व उपसंहार में यह भाव स्पष्ट कर दिया गया #तां_दिशो_जगृहुर्घोरां_नीहारं_यद्विदुस्तमः । ब्रह्मा जी ने पुत्रों के समझाने पर जो शरीर त्याग किया उसे दिशाओं ने ग्रहण कर लिया घोर अंधकार निहार कुहरा कहा जाता है । ( भागवत ३.१२ ) तात्पर्य हुआ कि जब उषा के पीछे पीछे सूर्य रूप ब्रह्मा उसके पुत्र रूप किरणों ने समझाया, जिसे सूर्य ने अपने चारों ओर घिरे हुए वाष्प रूप शरीर का त्याग कर दिया और पूर्व आदि दिशाओं ने इसे ग्रहण किया अर्थात वह सब दिशाओ में छा गया , वही निहार है । वेदों में इसे ब्रह्मा रूप सूर्य द्वारा उषा में पुत्री रूप उषा में निहार रूप गर्भ का धारण कहा गया है । एवं पुराणों में शिष्टता की रक्षा के लिए ब्रह्मा रूप सूर्य का पुत्री रूप उषा के पीछे भागना तथा किरण रूप पुत्रों के समझाने पर अपने कलेवर रूप कुहरे का त्याग कर देना बताया गया है इसमें ना कोई अश्लीलता की बात है ना कोई अधर्म की गंध किंतु एक वैज्ञानिक सिद्धान्त की सरलता है । और वह भी वेदो तथा पुराणों में समान रूप से वर्णित है केवल पुराण शास्त्रों को ही व्यर्थ क्यों कोसा जाता है । #चलिए_कुमारिल_भट्ट_की_सम्म्मति_भी_पढ़_लीजिए #प्रजापतिस्तावत_प्रजा_पालनादधिकाराद #आदित्य_एवोच्यते_स_च_अरुणोदय_वेलायांउषसमुद्यन्नभ्यैत #स_तदा_गमना_देवो_पजायत_इति_तद्दुहित_तृत्वेन #व्यपदिश्यते_तस्यां_चारुणकिरणाख्य_बीज_निछेपात् #स्त्रीपुरुषयोग: #वदुपचार: । अर्थात:~ संसार का रक्षक होने के कारण सूर्य ही प्रजापति है वह अरुणोदय ( पौ फटने ) के समय उषा ( प्रभातकालीन श्वेतिमा ) के पीछे पीछे उदित हो जाता है वह उषा सूर्य से ही उत्पन्न होती है । अतः उसका पुत्रीवत वर्णन किया है , उसी उषा में वह सूर्य अपना लाल किरण रूप बीज डालता है जो उपचार से स्त्री पुरुष संयोग की तरह कहा जाता है । ( तंत्रवर्तिक १.३.७ ) ---------------------------- 🎯🎯🎯 📜 शास्त्रीय निष्कर्ष~ 1. सभी प्रमाणों का समन्वय · सरस्वती , गायत्री , सवित्री एक ही हैं · वे ब्रह्मा की पत्नी हैं , पुत्री नहीं · भागवत का दुष्प्रचारित श्लोक गलत व्याख्या पर आधारित 2. प्रजापति श्रुति की सही व्याख्या~ #प्रजापतिः_स्वां_दुहितरमगमत् इस श्रुति में भी "दुहितरम्" का अर्थ पत्नी ही है । --- ⚠️ भ्रान्ति के कारण~~~>>> मुख्य कारण:~ 1. अपर्याप्त संस्कृत ज्ञान वाले अनुवादकों की गलतियाँ 2. जल्दबाजी में किए गए सतही अनुवाद 3. शास्त्रों के गहन अध्ययन का अभाव 4. दुर्भावनापूर्ण इरादे से की गई गलत व्याख्या --- ✅ अंतिम सत्यापित निष्कर्ष~ #सरस्वती_ब्रह्मपत्नी_सिद्धा_शास्त्रप्रमाणतः । #दुहितृत्वं_कल्पितं_तत्_विधर्मिकुटिलबुद्धिभिः । #गायत्री_सावित्री_च_एकैव_सरस्वती_महेश्वरी । #सर्वप्रमाणैः_सिद्धं_तद्विरोधि_मिथ्या_कल्पितम् ॥ #सम्पूर्ण_प्रचारः_सुनियोजितः_षड्यंत्रः_सनातन_बदनाम_हेतोः । #शास्त्राणि_स्वयम्_वदन्ति_सत्यं_मिथ्याप्रचारं_निरस्यन्ति ॥ जय_माँ_सरस्वती! 🙏🏻💐 जय_सनातन_धर्म! 🙏🏻🚩
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#🙏रामायण🕉 #रामायण ज्ञान रामायण काल के 10 मायावी राक्षस 〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️ प्राचीनकाल में सुर, असुर, देव, दानव, दैत्य, रक्ष, यक्ष, दक्ष, किन्नर, निषाद, वानर, गंधर्व, नाग आदि जातियां होती थीं। राक्षसों को पहले ‘रक्ष’ कहा जाता था। ‘रक्ष’ का अर्थ, जो समाज की रक्षा करें। राक्षस लोग पहले रक्षा करने के लिए नियुक्त हुए थे, लेकिन बाद में इनकी प्रवृत्तियां बदलने के कारण ये अपने कर्मों के कारण बदनाम होते गए और आज के संदर्भ में इन्हें असुरों और दानवों जैसा ही माना जाता है। देवताओं की उत्पत्ति अदिति से, असुरों की दिति से, दानवों की दनु, कद्रू से नाग की मानी गई है। पुराणों के अनुसार कश्यप की सुरसा नामक रानी से यातुधान (राक्षस) उत्पन्न हुए, लेकिन एक कथा के अनुसार प्रजापिता ब्रह्मा ने समुद्रगत जल और प्राणियों की रक्षा के लिए अनेक प्रकार के प्राणियों को उत्पन्न किया। उनमें से कुछ प्राणियों ने रक्षा की जिम्मेदारी संभाली, तो वे राक्षस कहलाए और जिन्होंने यक्षण (पूजन) करना स्वीकार किया, वे यक्ष कहलाए। जल की रक्षा करने के महत्वपूर्ण कार्य को संभालने के लिए यह जाति पवित्र मानी जाती थी। राक्षसों का प्रतिनिधित्व इन दोनों लोगों को सौंपा गया- ‘हेति’ और ‘प्रहेति’। ये दोनों भाई थे। ये दोनों भी दैत्यों के प्रतिनिधि मधु और कैटभ के समान ही बलशाली और पराक्रमी थे। प्रहेति धर्मात्मा था तो हेति को राजपाट और राजनीति में ज्यादा रुचि थी। रामायणकाल में जहां विचित्र तरह के मानव और पशु-पक्षी होते थे वहीं उस काल में राक्षसों का आतंक बहुत ज्यादा बढ़ गया था। राक्षसों में मायावी शक्तियां होती थीं। वे अपनी शक्ति से देव और मानव को आतंकित करते रहते थे। रामायणकाल में संपूर्ण दक्षिण भारत और दंडकारण्य क्षेत्र (मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़) पर राक्षसों का आतंक था। दंड नामक राक्षस के कारण ही इस क्षेत्र का नाम दंडकारण्य पड़ा था। आओ जानते हैं राम के काल के वे 10 राक्षस, जिनका डंका बजता था। पहले राक्षस ‘हेति’ 〰️🌼〰️🌼〰️ और ‘प्रहेति’ : राक्षसों का प्रतिनिधित्व दो लोगों को सौंपा गया- ‘हेति’ और ‘प्रहेति’। ये दोनों भाई थे। हेति ने अपने साम्राज्य विस्तार हेतु ‘काल’ की पुत्री ‘भया’ से विवाह किया। भया से उसके विद्युत्केश नामक एक पुत्र का जन्म हुआ। उसका विवाह संध्या की पुत्री ‘सालकटंकटा’ से हुआ। माना जाता है कि ‘सालकटंकटा’ व्यभिचारिणी थी। इस कारण जब उसका पुत्र जन्मा तो उसे लावारिस छोड़ दिया गया। विद्युत्केश ने भी उस पुत्र की यह जानकर कोई परवाह नहीं की कि यह न मालूम किसका पुत्र है। बस यहीं से राक्षस जाति में बदलाव आया…। शिव और मां पार्वती की उस अनाथ बालक पर नजर पड़ी और उन्होंने उसको सुरक्षा प्रदान ‍की। उस अबोध बालक को त्याग देने के कारण मां पार्वती ने शाप दिया कि अब से राक्षस जाति की स्त्रियां जल्द गर्भ धारण करेंगी और उनसे उत्पन्न बालक तत्काल बढ़कर माता के समान अवस्था धारण करेगा। इस शाप से राक्षसों में शारीरिक आकर्षण कम, विकरालता ज्यादा रही। शिव और पार्वती ने उस बालक का नाम ‘सुकेश’ रखा। शिव के वरदान के कारण वह निर्भीक था। वह निर्भीक होकर कहीं भी विचरण कर सकता था। शिव ने उसे एक विमान भी दिया था। सुकेश के 3 पुत्र 〰️🌼〰️🌼〰️ सुकेश ने गंधर्व कन्या देववती से विवाह किया। देववती से सुकेश के 3 पुत्र हुए- 1. माल्यवान, 2. सुमाली और 3. माली। इन तीनों के कारण राक्षस जाति को विस्तार और प्रसिद्धि प्राप्त हुई। इन तीनों भाइयों ने शक्ति और ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए ब्रह्माजी की घोर तपस्या की। ब्रह्माजी ने इन्हें शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने और तीनों भाइयों में एकता और प्रेम बना रहने का वरदान दिया। वरदान के प्रभाव से ये तीनों भाई अहंकारी हो गए। तीनों भाइयों ने मिलकर विश्वकर्मा से त्रिकूट पर्वत के निकट समुद्र तट पर लंका का निर्माण कराया और उसे अपने शासन का केंद्र बनाया। इस तरह उन्होंने राक्षसों को एकजुट कर राक्षसों का आधिपत्य स्थापित किया और उसे राक्षस जाति का केंद्र भी बनाया। लंका को उन्होंने धन और वैभव की धरती बनाया और यहां तीनों राक्षसों ने राक्षस संस्कृति के लिए विश्व विजय की कामना की। उनका अहंकार बढ़ता गया और उन्होंने यक्षों और देवताओं पर अत्याचार करना शुरू किया जिससे संपूर्ण धरती पर आतंक का राज कायम हो गया। इन्हीं तीनों भाइयों के वंश में आगे चलकर राक्षस जाति का विकास हुआ। तीनों भाइयों के वंशज में माल्यवान के वज्र, मुष्टि, धिरूपार्श्व, दुर्मख, सप्तवहन, यज्ञकोप, मत्त, उन्मत्त नामक पुत्र और अनला नामक कन्या हुई। सुमाली के प्रहस्त, अकन्पन, विकट, कालिकामुख, धूम्राश, दण्ड, सुपार्श्व, सहादि, प्रधस, भास्कण नामक पुत्र तथा रांका, पुण्डपोत्कटा, कैकसी, कुभीनशी नामक पुत्रियां हुईं। इनमें से कैकसी रावण की मां थीं। माली रावण के नाना थे। रावण ने इन्हीं के बलबूते पर अपने साम्राज्य का विस्तार किया और शक्तियां बढ़ाईं। माली के अनल, अनिल, हर और संपात्ति नामक 4 पुत्र हुए। ये चारों पुत्र रावण की मृत्यु पश्चात विभीषण के मंत्री बने थे। रावण राक्षस जाति का नहीं था, उसकी माता राक्षस जाति की थी लेकिन उनके पिता यक्ष जाति के ब्राह्मण थे। राक्षसराज रावण 〰️🌼〰️🌼〰️ माली की पुत्री कैकसी रावण की माता थीं। रावण का अपने नाना की ओर झुकाव ज्यादा था इसलिए उसने देवों को छोड़कर राक्षसों की उन्नति के बारे में ज्यादा सोची। रावण एक कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति और वास्तुकला का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ ब्रह्मज्ञानी तथा बहु-विद्याओं का जानकार था। राक्षसों के प्रति उसके लगाव के चलते उसे राक्षसों का मुखिया घोषित कर दिया गया था। रावण ने लंका को नए सिरे से बसाकर राक्षस जाति को एकजुट किया और फिर से राक्षस राज कायम किया। उसने लंका को कुबेर से छीना था। उसे मायावी इसलिए कहा जाता था कि वह इंद्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह-तरह के जादू जानता था। उसके पास एक ऐसा विमान था, जो अन्य किसी के पास नहीं था। इस सभी के कारण सभी उससे भयभीत रहते थे। पौराणिक मान्यता अनुसार एक शाप के चलते असुरराज विष्णु के पार्षद जय और विजय ने ही रावण और कुंभकर्ण के रूप में फिर से जन्म लेकर धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया। द्वापर युग में यही दोनों शिशुपाल व दंतवक्त्र नाम के अनाचारी के रूप में पैदा हुए थे। इनको 3 जन्मों की सजा थी। रावण ने रक्ष संस्कृति का विस्तार किया था। रावण ने कुबेर से लंका और उनका विमान छीना। रावण ने राम की सीता का हरण किया और अभिमानी रावण ने शिव का अपमान किया था। विद्वान होने के बावजूद रावण क्रूर, अभिमानी, दंभी और अत्याचारी था। कालनेमि 〰️🌼〰️ कालनेमि राक्षस रावण का विश्वस्त अनुचर था। यह भयंकर मायावी और क्रूर था। इसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक थी। रावण ने इसे एक बहुत ही कठिन कार्य सौंप दिया था। जब राम-रावण युद्ध में लक्ष्मण को शक्ति लगने से वे बेहोश हो गए थे, तब हनुमान को तुरंत ही संजीवनी लाने का कहा गया था। हनुमानजी जब द्रोणाचल की ओर चले तो रावण ने उनके मार्ग में विघ्न उपस्थित करने के लिए कालनेमि को भेजा। कालनेमि ने अपनी माया से तालाब, मंदिर और सुंदर बगीचा बनाया और वह वहीं एक ऋषि का वेश धारण कर मार्ग में बैठ गया। हनुमानजी उस स्थान को देखकर वहां जलपान के लिए रुकने का मन बनाकर जैसे ही तालाब में उतरे तो तालाब में प्रवेश करते ही एक मगरी ने अकुलाकर उसी समय हनुमानजी का पैर पकड़ लिया। हनुमानजी ने उसे मार डाला। फिर उन्होंने अपनी पूंछ से कालनेमि को जकड़कर उसका वध कर दिया। सुबाहु 〰️🌼〰️ ताड़का के पिता का नाम सुकेतु यक्ष और पति का नाम सुन्द था। सुन्द एक राक्षस था इसलिए यक्ष होते हुए भी ताड़का राक्षस कहलाई। अगस्त्य मुनि के शाप के चलते इसका सुंदर चेहरा कुरूप हो गया था इसलिए उसने ऋषियों से बदला लेने की ठानी थी। वह आए दिन अपने पुत्रों के साथ मुनियों को सताती रहती थी। यह अयोध्या के समीप स्थित सुंदर वन में अपने पति और दो पुत्रों सुबाहु और मारीच के साथ रहती थी। ताड़का के शरीर में हजार हाथियों का बल था। उसके कारण ही सुंदर वन को पहले ताड़का वन कहा जाता था। सुबाहु भी भयंकर था और वह प्रतिदिन ऋषियों के यज्ञ में उत्पात मचाता था। उसी वन में विश्वामित्र सहित अनेक ऋषि-मुनि तपस्या करते थे। ये सभी राक्षसगण हमेशा उनकी तपस्या में बाधाएं खड़ी करते थे। विश्वामित्र एक यज्ञ के दौरान राजा दशरथ से अनुरोध कर एक दिन राम और लक्ष्मण को अपने साथ सुंदर वन ले गए। राम ने ताड़का का और विश्वामित्र के यज्ञ की पूर्णाहूति के दिन सुबाहु का भी वध कर दिया था। राम के बाण से मारीच आहत होकर दूर दक्षिण में समुद्र तट पर जा गिरा। मारीच 〰️🌼〰️ राम के तीर से बचने के बाद ताड़का पुत्र मारीच ने रावण की शरण ली। मारीच लंका के राजा रावण का मामा था। जब शूर्पणखा ने रावण को अपने अपमान की कथा सुनाई तो रावण ने सीताहरण की योजना बनाई। सीताहरण के दौरान रावण ने मारीच की मायावी बुद्धि की सहायता ली। रावण महासागर पार करके गोकर्ण तीर्थ में पहुंचा, जहां राम के डर के कारण मारीच छिपा हुआ था। वह रावण का पूर्व मंत्री रह चुका था। रावण को देखकर मारीच ने कहा कि राक्षसराज ऐसी क्या आवश्यकता आ पड़ी, जो आपको मेरे पास आना पड़ा। रावण ने गुस्से से भरकर कहा कि राम-लक्ष्मण ने शूर्पणखा के नाक-कान काट दिए और अब हमें उनसे बदला लेना होगा। मारीच ने कहा- हे रावण, श्रीरामचंद्रजी के पास जाने में तुम्हारा कोई लाभ नहीं है। मैं उनका पराक्रम जानता हूं। भला इस जगत में ऐसा कौन है, जो उनके बाणों के वेग को सह पाए। रावण ने मारीच पर क्रोधित होकर कहा कहा- रे मामा! तू मेरी बात नहीं मानेगा तो निश्चय ही तुझे अभी मौत के घाट उतार दूंगा। मारीच ने मन ही मन सोचा- यदि मृत्यु निश्चित है तो श्रेष्ठ पुरुष के ही हाथ से मरना अच्छा होगा। फिर मारीच ने पूछा- अच्छा बताओ, मुझे क्या करना होगा? रावण ने कहा- तुम एक सुंदर हिरण का रूप बनाओ जिसके सींग रत्नमय प्रतीत हो। शरीर भी चित्र-विचित्र रत्नों वाला ही प्रतीत हो। ऐसा रूप बनाओ कि सीता मोहित हो जाए। अगर वे मोहित हो गईं तो जरूर वो राम को तुम्हें पकड़ने भेजेंगी। इस दौरान मैं उसे हरकर ले जाऊंगा। मारीच ने रावण के कहे अनुसार ही कार्य किया और रावण अपनी योजना में सफल रहा। इधर राम के बाण से मारीच मारा गया। कुंभकर्ण 〰️🌼〰️ यह रावण का भाई था, जो 6 महीने बाद 1 द‌िन जागता और भोजन करके फ‌िर सो जाता, क्‍योंक‌ि इसने ब्रह्माजी से न‌िद्रासन का वरदान मांग ल‌िया था। युद्ध के दौरान क‌िसी तरह कुंभकर्ण को जगाया गया। कुंभकर्ण ने युद्घ में अपने व‌िशाल शरीर से वानरों पर प्रहार करना शुरू कर द‌िया इससे राम की सेना में हाहाकार मच गया। सेना का मनोबल बढ़ाने के ल‌िए राम ने कुंभकर्ण को युद्घ के ल‌िए ललकारा और भगवान राम के हाथों कुंभकर्ण वीरगत‌ि को प्राप्त हुआ। कबंध 〰️🌼〰️ सीता की खोज में लगे राम-लक्ष्मण को दंडक वन में अचानक एक विचित्र दानव दिखा जिसका मस्तक और गला नहीं थे। उसकी केवल एक ही आंख ही नजर आ रही थी। वह विशालकाय और भयानक था। उस विचित्र दैत्य का नाम कबंध था। कबंध ने राम-लक्ष्मण को एकसाथ पकड़ लिया। राम और लक्ष्मण ने कबंध की दोनों भुजाएं काट डालीं। कबंध ने भूमि पर गिरकर पूछा- आप कौन वीर हैं? परिचय जानकर कबंध बोला- यह मेरा भाग्य है कि आपने मुझे बंधन मुक्त कर दिया। कबंध ने कहा- मैं दनु का पुत्र कबंध बहुत पराक्रमी तथा सुंदर था। राक्षसों जैसी भीषण आकृति बनाकर मैं ऋषियों को डराया करता था इसीलिए मेरा यह हाल हो गया था। विराध 〰️🌼〰️ विराध दंडकवन का राक्षस था। सीता और लक्ष्मण के साथ राम ने दंडक वन में प्रवेश किया। वहां पर उन्हें ऋषि-मुनियों के अनेक आश्रम दृष्टिगत हुए। राम उन्हीं के आश्रम में रहने लगे। ऋषियों ने उन्हें एक राक्षस के उत्पात की जानकारी दी। राम ने उन्हें निर्भीक किया। वहां से उन्होंने महावन में प्रवेश किया, जहां नाना प्रकार के हिंसक पशु और नरभक्षक राक्षस निवास करते थे। ये नरभक्षक राक्षस ही तपस्वियों को कष्ट दिया करते थे। कुछ ही दूर जाने के बाद बाघम्बर धारण किए हुए एक पर्वताकार राक्षस दृष्टिगत हुआ। वह राक्षस हाथी के समान चिंघाड़ता हुआ सीता पर झपटा। उसने सीता को उठा लिया और कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया। उसने राम और लक्ष्मण पर क्रोधित होते हुए कहा- तुम धनुष-बाण लेकर दंडक वन में घुस आए हो। तुम दोनों कौन हो? क्या तुमने मेरा नाम नहीं सुना? मैं प्रतिदिन ऋषियों का मांस खाकर अपनी क्षुधा शांत करने वाला विराध हूं। तुम्हारी मृत्यु ही तुम्हें यहां ले आई है। मैं तुम दोनों का अभी रक्तपान करके इस सुन्दर स्त्री को अपनी पत्नी बनाऊंगा। विराध ने हंसते हुए कहा- यदि तुम मेरा परिचय जानना ही चाहते हो तो सुनो! मैं जय राक्षस का पुत्र हूं। मेरी माता का नाम शतह्रदा है। मुझे ब्रह्माजी से यह वर प्राप्त है कि किसी भी प्रकार का अस्त्र-शस्त्र न तो मेरी हत्या ही कर सकती है और न ही उनसे मेरे अंग छिन्न-भिन्न हो सकते हैं। यदि तुम इस स्त्री को मेरे पास छोड़कर चले जाओगे तो मैं तुम्हें वचन देता हूं कि मैं तुम्हें नहीं मारूंगा। राम और लक्ष्मण ने उससे घोर युद्ध किया और उसे हर तरह से घायल कर दिया। फिर उसकी भुजाएं भी काट दीं। तभी राम बोले- लक्ष्मण! वरदान के कारण यह दुष्ट मर नहीं सकता इसलिए यही उचित है कि हमें भूमि में गड्ढा खोदकर इसे बहुत गहराई में गाड़ देना चाहिए। लक्ष्मण गड्ढा खोदने लगे और राम विराध की गर्दन पर पैर रखकर खड़े हो गए। तब विराध बोला- हे प्रभु! मैं तुम्बुरू नाम का गंधर्व हूं। कुबेर ने मुझे राक्षस होने का शाप दिया था। मैं शाप के कारण राक्षस हो गया था। आज आपकी कृपा से मुझे उस शाप से मुक्ति मिल रही है। राम और लक्ष्मण ने उसे उठाकर गड्ढे में डाल दिया और गड्ढे को पत्थर आदि से पाट दिया। अहिरावण 〰️🌼〰️ अहिरावण एक असुर था। अहिरावण पाताल में स्थित रावण का मित्र था जिसने युद्ध के दौरान रावण के कहने से आकाश मार्ग से राम के शिविर में उतरकर राम-लक्ष्मण का अपहरण कर लिया था। जब अहिरावण श्रीराम और लक्ष्मण को देवी के समक्ष बलि चढ़ाने के लिए विभीषण के भेष में राम के शिविर में घुसकर अपनी माया के बल पर पाताल ले आया था, तब श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराने के लिए हनुमानजी पाताल लोक पहुंचे और वहां उनकी भेंट उनके ही पुत्र मकरध्वज से हुई। उनको मकरध्वज के साथ लड़ाई लड़ना पड़ी, क्योंकि मकरध्वज अहिरावण का द्वारपाल था। मकरध्वज ने कहा- अहिरावण का अंत करना है तो इन 5 दीपकों को एकसाथ एक ही समय में बुझाना होगा। यह रहस्य ज्ञात होते ही हनुमानजी ने पंचमुखी हनुमान का रूप धारण किया। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरूड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख। इन 5 मुखों को धारण कर उन्होंने एकसाथ सारे दीपकों को बुझाकर अहिरावण का अंत किया और श्रीराम-लक्ष्मण को मुक्त किया। हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया और मकरध्वज को पाताल लोक का राजा नियुक्त करते हुए उसे धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। खर और दूषण 〰️🌼〰️🌼〰️ ये दोनों रावण के ‘विमातृज’ (सौतेले भाई) थे। ऋषि विश्रवा की 2 और पत्नियां थीं। खर, पुष्पोत्कटा से और दूषण, वाका से उत्पन्न हुए थे जबकि कैकसी से रावण का जन्म हुआ था। खर-दूषण को भगवान राम ने मारा था। खर और दूषण के वध की घटना रामायण के अरण्यक कांड में मिलती है। शूर्पणखा की नाक काट देने के बाद वह खर और दूषण के पास गई थी। खर और दूषण ने अपनी- अपनी सेना तैयार कर वन में रह रहे राम और लक्ष्मण पर हमला कर दिया था, लेकिन दोनों भाइयों ने मिलकर अकेले ही खर और दूषण का ‍वध कर दिया। मेघनाद 〰️🌼〰️ मेघदाद को इंद्रजित भी कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने स्वर्ग पर आक्रमण करके उस पर अपना अधिकार जमा लिया था। मेघनाद बहुत ही शक्तिशाली और मायावी था। उसने हनुमानजी को बंधक बनाकर रावण के समक्ष प्रस्तुत कर दिया था।दिव्य शक्तियां : रावण के पुत्रों में मेघनाद सबसे पराक्रमी था। माना जाता है कि जब इसका जन्म हुआ तब इसने मेघ के समान गर्जना की इसलिए यह मेघनाद कहलाया। मेघनाद ने युवास्था में दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य की सहायता से ‘सप्त यज्ञ’ किए थे और शिव के आशीर्वाद से दिव्य रथ, दिव्यास्त्र और तामसी माया प्राप्त की थी।उसने राम की सेना से मायावी युद्ध किया था। कभी वह अंतर्धान हो जाता, तो कभी प्रकट हो जाता। विभीषण ने कुबेर की आज्ञा से गुह्यक जल श्वेत पर्वत से लाकर दिया था, जिससे नेत्र धोकर अदृश्य को भी देखा जा सकता था। श्रीराम की ओर के सभी प्रमुख योद्धाओं ने इस जल का प्रयोग किया था, जिससे मेघनाद से युद्ध किया जा सके।मेघनाद का वध : इसने राम लक्ष्मण पर दिव्य बाण चलाया जो नागपाश में बदल गया। इससे राम लक्ष्मण मूर्छित होकर गिर पड़े। राक्षस सेना में खुशी लहर छा गई जबकि वानर सेना का मनोबल टूटने लगा। विपरीत स्थिति देखकर हनुमान जी पवन वेग से उड़ते हुए गरूड़ जी को लेकर आए। गरूड़ जी ने नागपाश को काटकर राम-लक्ष्मण को बंधन मुक्ति किया। राम लक्ष्मण स्वस्थ होकर वानर सेनाका मनोबल बढ़ाने लगे मेघनाद को जब राम लक्ष्मण के जीवित होने की सूचना मिली तो वह अपनी सेना लेकर फिर युद्घ करने आया। इस बार लक्ष्मण और मेघनाद का प्रलंयकारी युद्घ आरंभ हुआ। दोनों एक दूसरे पर दिव्यास्त्रों का प्रयोग करने लगे। दोनों के युद्घ को देखकर आकश के देवता भी हैरान थे। तभी लक्ष्मण ने एक दिव्य वाण भगवान राम का नाम लेकर मेघनाद पर छोड़ दिया। वाण मेघनाद का सिर काटते हुए आकश में दूर तक लेकर चला गया। मेघनाद की इस स्थिति को देखकर राक्षस सेना का मनोबल पूरी तरह टूट गया और प्राण बचाकर नगर की ओर भागने लगे। रावण को जब मेघनाद की मृत्यु का समाचार मिलता तो शोक के कारण वह जड़वत अपने सिंहासन पर बैठ गया। साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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