#🙏🙏जय सियाराम 🙏🙏
🌸 "मैं" की समाप्ति और "राम" की प्राप्ति!🌸
14 वर्षों के कठिन वनवास और रावण वध के पश्चात, अयोध्या में आनंद का सागर उमड़ रहा था। श्रीराम राजसिंहासन पर विराजमान थे। चारों ओर उल्लास था, परन्तु राजमाता कैकेयी के अंतर्मन में एक गहरा अंधकार छाया हुआ था। पश्चाताप की अग्नि उन्हें पल-पल जला रही थी।
दृश्य 1: क्षमा और मार्गदर्शन
एक दिन, अपने अपराधबोध से व्याकुल होकर माता कैकेयी श्रीराम के कक्ष में पहुंचीं। उनकी आँखें डबडबाई हुई थीं। श्रीराम ने जैसे ही माता को देखा, वे सिंहासन से उठ खड़े हुए और आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम किया।
कैकेयी का स्वर कांप रहा था, "राम! मैंने पुत्र-मोह में अंधा होकर तुम्हें वनवास भेजकर घोर अनर्थ किया है। मेरा अपराध अक्षम्य है। यद्यपि तुम उदार हो, परन्तु मेरा मन मुझे धिक्कारता है। हे रघुनंदन! मुझे अपनी शरण में ले लो। मुझे कोई ऐसा मार्ग दिखाओ जिससे मेरे इस अज्ञान का नाश हो और मुझे इस आत्मग्लानि से मुक्ति मिल सके।"
श्रीराम ने अत्यंत स्नेह से माता के हाथ थामे और बोले, "माते! आप व्यर्थ ही स्वयं को दोषी मान रही हैं। उस समय तो स्वयं माँ सरस्वती आपकी जिह्वा पर विराजित थीं। यह सब विधि का विधान था, इसमें आपका कोई दोष नहीं। मेरे मन में आपके प्रति लेशमात्र भी रोष नहीं है।"
परंतु कैकेयी का मन शांत न हुआ। वे मोक्ष का, आत्म-ज्ञान का मार्ग चाहती थीं। श्रीराम कुछ क्षण मौन रहे, उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान तैर गई। उन्होंने कहा, "माते! आपके प्रश्न का उत्तर और आपके मन की शांति का उपाय मैं नहीं, बल्कि लक्ष्मण कल आपको दिला देंगे।"
दृश्य 2: विचित्र निर्देश
श्रीराम ने लक्ष्मण को बुलाया और आदेश दिया, "लक्ष्मण! कल प्रात:काल माता कैकेयी को नगर के बाहर सरयू तट पर ले जाना। वहां जहां भेड़ें (sheep) चरती हैं, वहां माता को खड़ा करना और भेड़ों के मुख से थोड़ा 'उपदेश' सुनवाकर वापस ले आना।"
लक्ष्मण यह सुनकर हतप्रभ रह गए। वे सोचने लगे, "भैया राम भी क्या लीला करते हैं? वेदों और शास्त्रों का ज्ञान छोड़कर माता को भेड़ों का उपदेश सुनवाना चाहते हैं? भला एक पशु क्या ब्रह्मज्ञान देगा?" किन्तु श्रीराम की आज्ञा शिरोधार्य थी।
दृश्य 3: सरयू तट और भेड़ों का झुंड
अगले दिन सूर्योदय के समय, लक्ष्मण रथ में माता कैकेयी को लेकर सरयू के हरे-भरे तट पर पहुंचे। वहां प्रकृति शांत थी, केवल दूर से कुछ ध्वनियां आ रही थीं।
लक्ष्मण ने रथ रोका और संकोचपूर्वक कहा, "माते, भैया राम का आदेश है कि आप यहाँ इन भेड़ों के पास खड़ी हों और उनके उपदेश को ध्यान से सुनें।"
कैकेयी को एक पल के लिए गहरा आघात लगा। उन्हें लगा कि राम ने उनका उपहास किया है। "क्या मैं इतनी गिर गयी हूँ कि अब मुझे जानवरों से सीखना पड़ेगा?" उनके मन में क्रोध और अपमान के विचार उठने लगे। तभी, वहां भेड़ों का एक विशाल झुंड घास चरते हुए आ पहुंचा।
वातावरण में एक ही ध्वनि गूंजने लगी— "में... में... में...!"
सैकड़ों भेड़ें एक साथ मिमिया रही थीं। कैकेयी ने जाने की सोची, तभी उन्हें श्रीराम की सौम्य छवि याद आई। उन्होंने सोचा, "राम कभी किसी का उपहास नहीं करते। यदि उन्होंने भेजा है, तो इस साधारण दृश्य में अवश्य कोई असाधारण सत्य छिपा होगा।"
यह सोचकर कैकेयी ने अपने नेत्र बंद कर लिए और उस शोर को 'शब्द' मानकर सुनने का प्रयास करने लगीं।
दृश्य 4: आत्मज्ञान की प्राप्ति
जैसे ही कैकेयी ने एकाग्रचित्त होकर सुना, भेड़ों की वह "में... में..." की ध्वनि उनके कानों को भेदकर सीधे आत्मा में उतर गयी।
उन्हें प्रतीत हुआ कि ये भेड़ें केवल मिमिया नहीं रही हैं, बल्कि वे निरंतर "मैं... मैं..." (अर्थात 'मैं' और 'मेरा') चिल्ला रही हैं।
सहसा कैकेयी के भीतर का अज्ञान का पर्दा गिर गया। उन्हें समझ आ गया कि श्रीराम क्या समझाना चाहते थे। यह जीव (भेड़) जीवन भर "मैं-मैं" चिल्लाता है, लेकिन अंत में कसाई के हाथों मारा जाता है या काल का ग्रास बन जाता है। उसकी यह 'मैं' (अहंकार) ही उसके बंधन का कारण है।
दृश्य 5: राजभवन में वापसी
ज्ञान चक्षु खुलने के बाद कैकेयी के चेहरे पर एक अलौकिक शांति थी। उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "वत्स! चलो, मुझे मेरा उत्तर मिल गया। अब राम के पास चलते हैं।"
राजभवन पहुंचकर कैकेयी ने श्रीराम के चरण स्पर्श किए। राम ने पूछा, "माते! क्या आपको उपदेश प्राप्त हुआ?"
कैकेयी ने गदगद कंठ से कहा, "हाँ राम! तुम्हारी कृपा से आज मुझे भेड़ों ने सबसे बड़ा गूढ़ ज्ञान दे दिया है।"
श्रीराम ने पूछा, "क्या ज्ञान मिला माते?"
कैकेयी ने उत्तर दिया:
> "राम! वो भेड़ें निरंतर 'में-में' यानी 'मैं-मैं' कर रही थीं। यही 'मैं' (अहंकार) और 'मेरा' (ममता) ही सारे दुखों की जड़ है।
> मैंने जीवन भर यही किया— 'मेरा पुत्र', 'मेरा वचन', 'मेरा अधिकार'। इसी 'मैं' के कारण मैंने तुम्हें वन भेजा और वैधव्य का दुख भोगा।
> भेड़ों ने मुझे सिखा दिया कि जब तक जीव के भीतर 'मैं-मैं' की रट लगी रहती है, तब तक वह विपत्तियों में फंसा रहता है। जिस दिन यह 'मैं' मिट जाएगी, केवल 'तू' (परमात्मा) शेष रह जाएगा। अब मैंने अपनी 'मैं' और 'ममता' का त्याग कर दिया है।"
श्रीराम मुस्कुराए और बोले, "सत्य है माते। 'मैं' (अहंकार) का मिटना ही ईश्वर से मिलन का द्वार है। जब 'मैं' नहीं रहता, तभी 'हरि' आते हैं।
संसार में दुःख का मूल कारण हमारी आसक्ति (Attachment) और अहंकार (Ego) है— "यह मेरा घर, यह मेरा परिवार, यह मेरा धन।" जिस प्रकार भेड़ 'मैं-मैं' करती है, वैसे ही मनुष्य भी 'मैं' में उलझा रहता है। शांति और मोक्ष तभी संभव है जब हम 'मैं' को त्यागकर सब कुछ परमात्मा को समर्पित कर दें।
।। जय श्री राम ।।
#महाभारत
दुर्योधन में कोई अच्छा गुण नहीं था। दुर्योधन असल मे एक डरपोक व्यक्ति था। उसने भीम को विष देकर मारने का प्रयत्न किया,पांडवों को जला कर मारने का प्रयत्न किया, जुए में धोखा करके पांडवों को वन भेज दिया,द्रौपदी जैसी विदुषी नारी पर झूठा आरोप लगाया कि उसने अंधे का पुत्र अंधा कहा इत्यादि।
इन सब मौकों पर उसके पास विकल्प था कि वो ललकार कर पांडवों से युद्ध कर लेता पर उसने नही किया। लोग शकुनि को दोष देते हैं पर अंततः व्यक्ति स्वयं ही जिम्मेदार होता है।
दुर्योधन को शुरू से पता था कि भीष्म और द्रोण पांडवों को नही मारेंगे और बिना पांडवों का वध किये उसका काम नही होगा। इसलिए उसने कर्ण को बहुत महत्व देना शुरू किया।
कर्ण डींगें हांकने में निपुण था। उसने कभी कोई युद्ध नही जीता था। उसने एक दिग्विजय की थी जो हस्तिनापुर के ध्वज के तले थी, मतलब अगर कोई राजा कर्ण को हरा कर पकड़ता या मारता तो फिर भीष्म और द्रोण युद्ध के लिए आते।इनसे लड़ना कौन चाहता? इसलिए ये दिग्विजय अकेले कर्ण की नही कही जा सकती।बाकी सब जगह कर्ण भाग जाता था।
खुद दुर्योधन ने कभी कोई युद्ध नही लड़ा था। इनकी शिक्षा समाप्त होने पर द्रोण ने गुरु दक्षिणा में द्रुपद को हराने की बात की थी तब दुर्योधन ,कर्ण,दुशासन को अकेले द्रुपद ने हरा कर भगा दिया था। गन्धर्वों से युद्ध मे भी दुर्योधन बंदी हो गया था,कर्ण भाग गया था।
पूरे 18 दिन के महाभारत युद्ध मे दुर्योधन की वीरता का कोई वर्णन नही है। उसने किसी बड़े योद्धा को मारा हो ये भी नही लिखा।यहां तक कि युधिस्ठिर ने भी एक बड़े वीर शल्य को मारा पर दुर्योधन से कुछ न हुआ।
" सुई की नोक बराबर भूमि नही दूंगा" की डींगें मारने वाला दुर्योधन युद्ध की हार के बाद सामने से लड़ने के बजाय युद्धभूमि से भागकर छिप गया। पांडवों ने उसको ढूंढकर ललकारा तो उसने कहा कि मुझे नही लड़ना,तुम लोग राज करो 😂
दुर्योधन जैसे लोग विक्टिम कार्ड खेलने में माहिर होते हैं, पूरे जीवन उसने यही किया। उसने पांडवों को उन्ही के धर्म से बांध दिया। अच्छे लोगों की तब और अब भी यही समस्या है कि" किसी ने हमारे साथ बुरा किया और अगर हमने भी उसके साथ बुरा किया तो उसमें और हममें क्या अंतर रह जायेगा"। श्री कृष्ण ने यही समझाया कि ये अंतर होना भी नही चाहिए। जब रावण ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगाई तो वो ये नही सोचते बैठे कि अगर मैं लंका में आग लगा दूँ तो इसमे और मुझमें क्या अंतर रह जायेगा।
ऐसे ही किसी जाहिल ने किसी समय अयोध्या में मन्दिर गिरकर मस्जिद बना दी थी तो उचित समय पर फिर से मंदिर बने यही न्याय है। इसमे किसी को कोई अपराध बोध नही होना चाहिए।
इसी तरह जीवन भर षड्यंत्र रचने वाले दुर्योधन की जांघ तोड़कर मारने में कुछ भी गलत नही था।
#अयोध्या
श्री अयोध्या जी में एक उच्च कोटि के संत रहते थे, इन्हें रामायण का श्रवण करने का व्यसन था, जहां भी कथा चलती वहाँ बड़े प्रेम से कथा सुनते, कभी किसी प्रेमी अथवा संत से कथा कहने की विनती करते।
एक दिन राम कथा सुनाने वाला कोई मिला नहीं, वहीं पास से एक पंडित जी रामायण की पोथी लेकर जा रहे थे, पंडित जी ने संत को प्रणाम् किया और पूछा की महाराज ! क्या सेवा करे ? संत ने कहा - पंडित जी, रामायण की कथा सुना दो परंतु हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रुपया नहीं है, हम तो फक्कड़ साधु है, माला, लंगोटी और कमंडल के अलावा कुछ है नहीं और कथा भी एकांत में सुनने का मन है हमारा।
पंडित जी ने कहा - ठीक है महाराज, संत और कथा सुनाने वाले पंडित जी दोनों सरयू जी के किनारे कुंजो में जा बैठे।
पंडित जी और संत रोज सही समय पर आकर वहाँ विराजते और कथा चलती रहती। संत बड़े प्रेम से कथा श्रवण करते थे और भाव विभोर होकर कभी नृत्य करने लगते तो कभी रोने लगते। जब कथा समाप्त हुई तब संत में पंडित जी से कहा - पंडित जी, आपने बहुत अच्छी कथा सुनायी ।
हम बहुत प्रसन्न है, हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रूपया तो नहीं है परंतु आज आपको जो चाहिए वह आप मांगो।
संत सिद्ध कोटि के प्रेमी थे, श्री सीताराम जी उनसे संवाद भी किया करते थे। पंडित जी बोले- महाराज हम बहुत गरीब है, हमें बहुत सारा धन मिल जाये।
संत ने प्रार्थना की प्रभु इसे कृपा कर के धन दे दीजिये।
भगवान् जी मुस्कुराने लगे, संत बोले - तथास्तु ।
फिर संत ने पूछा - मांगो और क्या चाहते हो ?
पंडित जी बोले - हमारे घर पुत्र का जन्म हो जाए ।
संत ने पुनः प्रार्थना की और श्रीराम जी मुस्कुरा दिए ।
संत बोले - तथास्तु, तुम्हे बहुत अच्छा ज्ञानी पुत्र होगा ।
फिर संत बोले और कुछ माँगना है तो मांग लो।
पंडित जी बोले - श्री सीतारामजी की अखंड भक्ति, प्रेम हमें प्राप्त हो।
संत बोले नहीं, यह नहीं मिलेगा।
पंडित जी आश्चर्य में पड़ गए कि महात्मा क्या बोल गए। पंडित जी ने पूछा - संत भगवान् ! यह बात समझ नहीं आयी..? संत बोले तुम्हारे मन में प्रथम प्राथमिकता धन, सम्मान, घर की है । दूसरी प्राथमिकता पुत्र की है और अंतिम प्राथमिकता भगवान् के भक्ति की है । जब तक हम संसार को, परिवार, धन, पुत्र आदि को प्राथमिकता देते है तब तक भक्ति नहीं मिलती ।
भगवान् ने जब केवट से पूछा की तुम्हे क्या चाहिए ? केवट ने कुछ नहीं माँगा ।
उतरि ठाढ़ भए सुरसरि रेता।
सीय रामुगुह लखन समेता॥
केवट उतरि दंडवत कीन्हा।
प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा॥
#भावार्थ:- निषादराज और लक्ष्मणजी सहित श्री सीताजी और श्री रामचन्द्रजी (नाव से) उतरकर गंगाजी की रेत (बालू) में खड़े हो गए। तब केवट ने उतरकर दण्डवत की। (उसको दण्डवत करते देखकर) प्रभु को संकोच हुआ कि इसको कुछ दिया नहीं॥
पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी॥
कहेउ कृपाल लेहि उतराई।
केवट चरन गहे अकुलाई॥
#भावार्थ:-पति के हृदय की जानने वाली सीताजी ने आनंद भरे मन से अपनी रत्न जडि़त अँगूठी (अँगुली से) उतारी। कृपालु श्री रामचन्द्रजी ने केवट से कहा, नाव की उतराई लो। केवट ने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिए॥
नाथ आजु मैं काह न पावा।
मिटे दोष दुख दारिद दावा॥
बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी।
आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी॥
#भावार्थ:-(उसने कहा-) हे नाथ! आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुःख और दरिद्रता की आग आज बुझ गई है। मैंने बहुत समय तक मजदूरी की। विधाता ने आज बहुत अच्छी भरपूर मजदूरी दे दी॥
प्रभु के बार बार कहने पर भी केवट ने कुछ नहीं लिया तब जाकर प्रभु ने उसे भक्ति प्रदान की। हनुमान जी को जानकी माता ने अनेको वरदान दिए - बल, बुद्धि, सिद्धि, अमरत्व आदि परंतु उन्होंने कुछ प्रसन्नता नहीं दिखाई।
अंत में जानकी जी और प्रभु श्रीराम ने अपने प्रेम और अखंड भक्ति का वर दिया।
प्रभु की भक्ति में ही शक्ति है और शक्ति से ही जीवन में मोक्ष प्राप्त हो सकता है। अगर मन में लगन है तो हम क्या कुछ नहीं पा सकते हैं।
#जय_श्री_रामजी 🚩
#जय_श्री_हनुमानजी 🚩
#👫 हमारी ज़िन्दगी #❤️जीवन की सीख
🏺 जब जीवन में कष्ट बढ़ जाएँ, तो इस मिट्टी के घड़े की कहानी याद कर लेना...
संतों की एक सभा में एक घड़े में शीतल गंगाजल भरकर रखा गया था। बाहर खड़ा एक व्यक्ति उस घड़े को देखकर सोचने लगा, "अहा! यह घड़ा कितना भाग्यशाली है। इसमें साक्षात गंगाजल भरा है और अब यह संतों की सेवा में काम आएगा। ऐसी किस्मत किसी-किसी की ही होती है!"
घड़े ने उसके मन के भाव पढ़ लिए और बोल पड़ा:
"बंधु! आज तुम्हें मेरी किस्मत दिख रही है, पर इसके पीछे का संघर्ष नहीं। मैं तो मिट्टी के रूप में शून्य पड़ा था। फिर एक दिन कुम्हार आया। उसने फावड़े मार-मारकर मुझे खोदा, रौंदा, और गूंथा। फिर चाक पर चढ़ाकर तेजी से घुमाया, मेरा गला काटा और थापी मार-मारकर पीटा।
बात यहीं नहीं रुकी, मुझे आग की भट्टी में झोंक दिया गया। मैं हर पल यही सोचता था कि हे ईश्वर! सारे अन्याय मेरे ही साथ क्यों?
लेकिन... जब किसी सज्जन ने मुझे खरीदा और मुझमें गंगाजल भरकर संतों की सभा में भेज दिया, तब मुझे आभास हुआ।
✨ कुम्हार का वह फावड़ा चलाना भी कृपा थी।
✨ वह गूंथना, चाक पर घुमाना भी कृपा थी।
✨ और आग में तपाना भी भगवान की कृपा ही थी!
अगर मैं उन कष्टों से न गुजरता, तो आज गंगाजल धारण करने और संतों की सेवा करने योग्य न बनता।"
जीवन का सार:
मित्रों, कई बार हम जीवन की परेशानियों से टूट जाते हैं और ईश्वर को कोसने लगते हैं। हम यह नहीं समझ पाते कि यह ईश्वर द्वारा हमें 'तैयार' करने की प्रक्रिया है।
जिस प्रकार हम अपनी गाड़ी किसी अनाड़ी ड्राइवर को नहीं देते, वैसे ही ईश्वर अपनी विशेष कृपा उस व्यक्ति को कैसे सौंप सकते हैं जो अभी मन से पक्का न हुआ हो?
🔥 परीक्षा की घड़ी में धैर्य रखें। जो प्राप्त है, उसमें संतोष रखें। याद रखें, ईश्वर आपको तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि 'गढ़ने' के लिए संघर्ष देता है।
जय श्री राम 🙏
#☝आज का ज्ञान
|| जीवन में पवित्रता रखें ||
🌞असत्य का आश्रय व्यक्ति को भीतर से कमजोर बना देता है। जिह्वा में सत्यता रहे, चेहरे में प्रसन्नता रहे और हृदय में पवित्रता रहे तो इससे बढ़कर सुखद एवं श्रेष्ठ जीवन कुछ और नहीं हो सकता है। निश्चित ही असत्य हमें भीतर से कमजोर बना देता है। असत्य भाषित करने वालों का आत्मबल भी बड़ा कमजोर होता है। जो लोग अपनी जिम्मेदारियों से बचना चाहते हैं वही सबसे अधिक असत्य का भाषण भी करते हैं। हमें सत्य का आश्रय लेकर एक जिम्मेदार व्यक्ति बनने का सतत प्रयास करना चाहिए।
🌞उदासीन मन से किये गये प्रत्येक कर्म में पूर्णता एवं कुशलता का अभाव पाया जाता है। इसलिए सदैव प्रयास करना चाहिए कि हमारे द्वारा प्रत्येक कर्म को प्रसन्नता के साथ सम्पन्न किया जाए। निष्कपट, निर्दोष और निर्वैर भाव ही हृदय की पवित्रता है। यदि जीवन में कोई बहुत बड़ी उपलब्धि है तो वह हमारे हृदय की पवित्रता है। पवित्र हृदय से किये गये कार्य भी पवित्र ही होते हैं। जिनका हृदय पवित्र होता है, उनका जीवन भी पवित्र बन जाता है।
जय श्री राधे
🙏🏻💐🙏🏻🌹🙏🏻☘️🙏🏻🪻🙏🏻🌻🙏🏻🍁🙏🏻🌺🙏🏻🌼🙏🏻🌷🙏🏻🌞🙏🏻🌸🙏🏻🪷🙏🏻❤️🙏🏻
#🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏गीता ज्ञान🛕
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानां सा निशा पश्यतो मुने: ॥
[ श्रीमद्भगवद्गीता - २/६९ ]
अर्थात् 👉🏻 जो सभी प्राणियों की रात्रि होती है , उसमे संयमी मनुष्य जागते हैं , तथा जिस अवस्था मे सभी प्राणी जागते हैं , वह तत्वज्ञ मुनि की रात्रि होती है ।
🌄🌄 प्रभातवन्दन 🌄🌄
महाभारत में द्रोपदी की भूमिका बहुत ही अहम थी | द्रोपदी पांचाल देश के राजा द्रुपद की कन्या थी इसलिए उन्हें ' पांचाली ' भी कहा जाता था | राजा द्रुपद ने द्रोपदी को कुरु वंश के नाश के लिए यज्ञ से उत्पन्न करवाया था इसलिए उन्हें याज्ञनिक भी कहा जाता है | द्रोपदी के जीवन से जुड़े ऐसे कई रहस्य है जिसे हममें से अधिकतर लोग नहीं जानते होंगे |
द्रौपदी के पुण्य कार्य : लोककथाओं के अनुसार मान्यता है कि जब द्रौपदी का चीरण हरण हो रहा था तब उनके 2 पुण्य कर्म काम आए थे। पहला यह कि जब एक बार द्रौपदी गंगा में स्नान कर रही थी उसी समय एक साधु वहां स्नान करने आया। स्नान करते समय साधु की लंगोट पानी में बह गई और वह इस संकोच में पड़ गया की अब वो इस अवस्था में बाहर कैसे निकले? इस कारण वह एक झाड़ी के पीछे छिप गया। द्रोपदी ने साधु को इस अवस्था में देख अपनी साड़ी से लंगोट के बराबर कोना फाड़कर उसे दे दिया। साधु ने प्रसन्न होकर द्रौपदी को आशीर्वाद दिया।
दूसरा यह कि एक अन्य कथा के अनुसार जब श्रीकृष्ण द्वारा सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया गया, तब उस समय श्रीकृष्ण की अंगुली भी कट गई थी। अंगुली कटने पर श्रीकृष्ण का रक्त बहने लगा। तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़कर श्रीकृष्ण की अंगुली पर बांधी थी। इस कर्म के बदले श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को आशीर्वाद देकर कहा था कि एक दिन अवश्य तुम्हारी साड़ी की कीमत अदा करुंगा। इन कर्मों की वजह से श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की साड़ी को इस पुण्य के बदले ब्याज सहित इतना बढ़ाकर लौटा दिया और द्रौपदी की लाज बच गई।
2. द्रौपदी के पति : महाभारत से अलग एक अन्य कथा के अनुसार द्रौपदी के 5 पति थे, लेकिन वो अधिकतम 14 पतियों की पत्नी भी बन सकती थी। इसका कारण द्रौपदी के पूर्व जन्म में छिपा था। पूर्व जन्म में द्रौपदी राजा नल और उनकी पत्नी दमयंती की पुत्री थीं। उस जन्म में द्रौपदी का नाम नलयनी था। नलयनी ने भगवान शिव से आशीर्वाद पाने के लिए कड़ी तपस्या की। भगवान शिव जब प्रसन्न होकर प्रकट हुए तो नलयनी ने उनसे आशीर्वाद मांगा कि अगले जन्म में उसे 14 इच्छित गुणों वाला पति मिले।
यद्यपि भगवान शिव नलयनी की तपस्या से प्रसन्न थे, परंतु उन्होंने उसे समझाया कि इन 14 गुणों का एक व्यक्ति में होना असंभव है। किंतु जब नलयनी अपनी जिद पर अड़ी रही तो भगवान शिव ने उसकी इच्छा पूर्ण होने का वरदान दे दिया। इस वरदान में अधिकतम 14 पति होना और प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद पुन: कुंआरी होना भी शामिल था। इस प्रकार द्रौपदी भी पंचकन्या में एक बन गईं।
नलयनी का पुनर्जन्म द्रौपदी के रूप में हुआ। द्रौपदी के इच्छित 14 गुण पांचों पांडवों में थे। युधिष्ठिर धर्म के ज्ञानी थे। भीम 1,000 हाथियों की शक्ति से पूर्ण थे। अर्जुन अद्भुत योद्धा और वीर पुरुष थे। सहदेव उत्कृष्ट ज्ञानी थे व नकुल कामदेव के समान सुन्दर थे।
3. कर्ण, कृष्ण और द्रौपदी में समानता : द्रौपदी का मूल नाम कृष्णा था। द्रौपदी का नाम कृष्णा इसलिए था क्योंकि वह भी सांवली थीं। भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी अच्छे मित्र थे। कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण की मांसपेशियां मृदु परंतु युद्ध के समय विस्तॄत हो जाती थीं इसलिए सामान्यत: लड़कियों के समान दिखने वाला उनका लावण्यमय शरीर युद्ध के समय अत्यंत कठोर दिखाई देने लगता था। कहते हैं कि यही खासियत कर्ण और द्रौपदी के शरीर में भी थी।
4. द्रोपदी चाहती थी श्रीकृष्ण को : एक ऐसी भी किंवदंती है कि पांडव और कर्ण से पूर्व द्रौपदी कृष्ण को चाहती थी और वह उनसे शादी करना चाहती थी। पर इसमें सचाई नहीं है। द्रौपदी की एक दासी थी जिसका नाम नितंबिनी था। वह कृष्ण की सारी खबरें उनके पास ले आती थीं और कृष्ण खुद जानते थे कि द्रौपदी उनको चाहती है, लेकिन एक दिन एक भेंट में श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को समझाया और उन्हें अर्जुन के बारे में बताया। कहा कि अर्जुन इंद्र का पुत्र है अर्थात वह देवपुत्र है। वह आर्योपुत्रों में सर्वश्रेष्ठ है। इस तरह द्रौपदी का मन श्रीकृष्ण ने अर्जुन की ओर मोड़ दिया और दोनों मित्र बन गए।
यह भी कहते हैं कि द्रुपद चाहते थे कि उनकी पुत्री द्रोपदी का विवाह आर्यावर्त के सर्वश्रेष्ठ योद्धा से हो, जो द्रोण को पराजित कर सके। उन्होंने सबसे पहले अर्जुन के बारे में सोचा। परन्तु उनको पता चला कि अर्जुन की मृत्यु वारणावत में अग्निकांड में हो गयी है, इसलिए उन्होंने दूसरे योद्धाओं के बारे में विचार किया। तब उनका ध्यान यादवों के एकछत्र नेता कृष्ण की ओर गया। उन्होंने कृष्ण को पांचाल आमंत्रित किया और उनके आने पर उनसे अपनी पुत्री द्रोपदी से विवाह करने की प्रार्थना की। लेकिन जब कृष्ण को पता चला कि द्रुपद का असली उद्देश्य द्रोण से अपने अपमान का बदला लेना है और इसके लिए अपने जामाता का उपयोग करना चाहते हैं, तो कृष्ण ने उनकी पुत्री के साथ विवाह करने से विनम्रतापूर्वक मना कर दिया, क्योंकि वे स्वयं को किसी के व्यक्तिगत प्रतिशोध का मोहरा नहीं बनने देना चाहते थे।
कृष्ण के अस्वीकार से द्रुपद बहुत निराश हुए। उनकी निराशा को देखते हुए कृष्ण ने उनसे कहा कि मैं द्रोपदी के योग्य सर्वश्रेष्ठ वर का चुनाव करने में आपकी सहायता कर सकता हूं। द्रपुद ने उनका प्रस्वाव स्वीकार कर लिया और उन्होंने कहा की मुझे एक ऐसा वर चाहिए जो गुरु द्रोण को पराजीत कर सके । तब उन्होंने सलाह दी की द्रोपदी के स्वयंवर में धनुर्वेद की एक बहुत कठिन प्रतियोगिता रखिए। जो उस प्रतियोगिता में विजयी होगा, वह सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होगा। उसके साथ द्रोपदी का विवाह करके आप अपनी इच्छा पूर्ण कर सकते हैं। इसके बाद की कहानी तो आपको पता ही है।
कहते हैं कि ''महाभारत के नायक श्री कृष्ण और नायिका कृष्णा (द्रौपदी) थी | द्रोपदी तो कृष्ण के लायक ही थी। अर्जुन समेत पांचों पांडव उसके सामने फीके थे। कृष्ण और कृष्णा का यह संबंध राधा और कृष्ण के संबंध से कम नहीं था।'' राधा तो कृष्ण के साथ बचपन में ही रही थी इसके बाद तो उसका कृष्ण से कोई संबंध नहीं रहा। कहते हैं कि वर्षों बाद राधा बस एक बार वह द्वारिका आई थी, फिर उसके बाद उनकी कभी मुलाकात नहीं हुई। द्रौपदी का श्रीकृष्ण से संबंध बहुत ही आत्मीय था। लेकिन भक्ति काल के कवियों ने इसकी उपेक्षा की और राधा को ज्यादा महत्व दिया।
*आध्यात्मिक ज्ञान*
#महाभारत
#जय पशुपति नाथ, ॐ नमो शिवाय
पशुपतिनाथ मंदिर मे नंदी के दर्शन नही करना चाहिए,आइये जानते है क्यो...?
भारत सहित पूरी दुनिया में भोलेनाथ के सैकड़ो मंदिर और तीर्थ स्थान मौजूद है। जो अपने चमत्कारों और धार्मिकता के कारण विश्व प्रसिद्ध है। वैसे तो भोलेनाथ के अनेको नाम है। उन्ही में से एक नाम है पशुपति मंदिर के बारें में कहा जाता है कि आज भी यहां पर भगवान शिव विराजमान है..पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल की राजधानी काठमांडू से 3 किमी उत्तर-पश्चिम देवपाटन गांव में बागमती नदी के तट पर स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव के पशुपति स्वरूप को समर्पित है। यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में शामिल भगवान पशुपतिनाथ का मंदिर नेपाल में शिव का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है। यह मंदिर हिन्दू धर्म के आठ सबसे पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है। नेपाल में यह भगवान शिव का सबसे पवित्र मंदिर है। जानिए इस मंदिर से जुड़े कुछ रहस्यों के बारें में। जिन्हें जानकर आप आश्चर्य चकित हो जाएगे..
1- भगवान शिव के पशुपति स्वरूप को समर्पित इस मंदिर में दर्शन के लिए हर साल हजारों संख्या में भक्त यहां पर आते है। इस मंदिर में भारतीय पुजारियों की सबसे अधिक संख्या है। सदियों से यह परंपरा चलती चली आ रही है कि मंदिर में चार पुजारी और एक मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के ब्राह्मणों में से रखे जाते हैं।
2 - पशुपति मंदिर को 12 ज्योतिर्लिगों में से एक केदारनाथ का आधा भाग माना जाता है। जिसके कारण इस मंदिर का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। साथ ही शक्ति और बढ़ जाती है।
3- इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग के पांचो मुखों के गुण अलग-अलग हैं। जो मुख दक्षिण की और है उसे अघोर मुख कहा जाता है, पश्चिम की ओर मुख को सद्योजात, पूर्व और उत्तर की ओर मुख को तत्वपुरुष और अर्धनारीश्वर कहा जाता है। जो मुख ऊपर की ओर है उसे ईशान मुख कहा जाता है। यह निराकार मुख है। यही भगवान पशुपतिनाथ का श्रेष्ठतम मुख है।
4- यह शिवलिंग बहुत ही कीमती और चमत्कारी है। माना जाता है कि यह शिवलिंग पारस के पत्थर से बना है। पारस का पत्थर ऐसा होता है कि लोह को भी सोना बना देता है।
5 - पशुपति मंदिर में चारों दिशाओं में एक मुख और एक मुख ऊपर की और है। हर मुख के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल मौजूद है।
6 - इस मंदिर में बाबा का प्रकट होने के पीछे भी पौराणिक कथा है। इसके अनुसार जब महाभारत के युद्ध में पांडवों द्वारा अपने ही रिश्तेदारों का रक्त बहाया गया तब भगवान शिव उनसे बेहद क्रोधित हो गए थे। श्रीकृष्ण के कहने पर वे भगवान शिव से मांफी मांगने के लिए निकल पड़े। गुप्त काशी में पांडवों को देखकर भगवान शिव वहां से विलुप्त होकर एक अन्य स्थान पर चले गए। आज इस स्थान को केदारनाथ के नाम से जाना जाता है।
7 - शिव का पीछा करते हुए पांडव केदारनाथ भी पहुंच गए लेकिन भगवान शिव उनके आने से पहले ही भैंस का रूप लेकर वहां खड़े भैंसों के झुंड में शामिल हो गए। पांडवों ने महादेव को पहचान तो लिया लेकिन भगवान शिव भैंस के ही रूप में भूमि में समाने लगे। इस पर भीम ने अपनी ताकत के बल पर भैंस रूपी महादेव को गर्दन से पकड़कर धरती में समाने से रोक दिया। भगवान शिव को अपने असल रूप में आना पड़ा और फिर उन्होंने पांडवों को क्षमादान दे दिया। लेकिन भगवान शिव का मुख तो बाहर था लेकिन उनका देह केदारनाथ पहुंच गया था। जहां उनका देह पहुंचा वह स्थान केदारनाथ और उनके मुख वाले स्थान पशुपतिनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
8- इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि अगर आपने पशुपति मंदिर के दर्शन किए तो पूरा पुण्यपाने के लिए आपको केदार मंदिर में भी भोले के दर्शन करने जाना पडेगा। क्योंकि पशुपतिनाथ में भैंस के सिर और केदारनाथ में भैंस की पीठ के रूप में शिवलिंग की पूजा होती है।
9- पशुपति मंदिर को लेकर मान्यता है कि अगर कोई व्यक्ति यहां पर दर्शन के लिए आता है तो उसे किसी जन्म में पशु की योनि नहीं मिलती है।
10- इस मंदिर को लेकर एक दूसरी मान्यता यह भी है कि अगर आपने पशुपति के दर्शन किएं तो आप नंदी के दर्शन न करें। नहीं तो आपको दूसरे जन्म में पशु का जन्म मिलेगा। केदारनाथ जी के दर्शन करने के बाद अगर आपको नंदी दर्शन होता है, तो दोष नही लगता।
11- इस मंदिर के बाहर एक घाट बना हुआ है जिसे आर्य घाट के नाम से जाना जाता है। इस घाट के बारें में कहा जाता है कि सिर्फ इस घाटका ही पानी मंदिर के अंदर जाता है। और किसी जगह के पानी को ले जाना वर्जित है।
पशुपतिनाथ की जय हो, हर-हर महादेव, जय महाकाल, जय गोविंदा ✨🙏🕉️💖
#जय श्री राम
महाराजा दशरथ को जब संतान प्राप्ति नहीं हो रही थी तब वो बड़े दुःखी रहते थे...
पर ऐसे समय में उनको एक ही बात से हौंसला मिलता था जो कभी उन्हें आशाहीन नहीं होने देता था...
और वह था श्रवण के पिता का श्राप....!!
दशरथ जब-जब दुःखी होते थे तो उन्हें श्रवण के पिता का दिया श्राप याद आ जाता था... (कालिदास ने रघुवंशम में इसका वर्णन किया है)
श्रवण के पिता ने ये श्राप दिया था कि ''जैसे मैं पुत्र वियोग में तड़प-तड़प के मर रहा हूँ वैसे ही तू भी तड़प-तड़प कर मरेगा.....''
दशरथ को पता था कि ये श्राप अवश्य फलीभूत होगा और इसका मतलब है कि मुझे इस जन्म में तो जरूर पुत्र प्राप्त होगा.... (तभी तो उसके शोक में मैं तड़प के मरूँगा)
यानि यह श्राप दशरथ के लिए संतान प्राप्ति का सौभाग्य लेकर आया...!!
ऐसी ही एक घटना सुग्रीव के साथ भी हुई....!
वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि सुग्रीव जब माता सीता की खोज में वानर वीरों को पृथ्वी की अलग - अलग दिशाओं में भेज रहे थे.... तो उसके साथ-साथ उन्हें ये भी बता रहे थे कि किस दिशा में तुम्हें कौन सा स्थान या देश मिलेगा और किस दिशा में तुम्हें जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिये....
प्रभु श्रीराम सुग्रीव का ये भगौलिक ज्ञान देखकर हतप्रभ थे...!
उन्होंने सुग्रीव से पूछा कि सुग्रीव तुमको ये सब कैसे पता...?
तो सुग्रीव ने उनसे कहा कि... ''मैं बाली के भय से जब मारा-मारा फिर रहा था तब पूरी पृथ्वी पर कहीं शरण न मिली... और इस चक्कर में मैंने पूरी पृथ्वी छान मारी और इसी दौरान मुझे सारे भूगोल का ज्ञान हो गया....''
अब अगर सुग्रीव पर ये संकट न आया होता तो उन्हें भूगोल का ज्ञान नहीं होता और माता जानकी को खोजना कितना कठिन हो जाता...
इसीलिए किसी ने बड़ा सुंदर ही कहा है :-
"अनुकूलता भोजन है, प्रतिकूलता विटामिन है और चुनौतियाँ वरदान है और जो उनके अनुसार व्यवहार करें....वही पुरुषार्थी है...."
ईश्वर की तरफ से मिलने वाला हर एक पुष्प अगर वरदान है.......तो हर एक काँटा भी वरदान ही समझें....!
मतलब.....अगर आज मिले सुख से आप खुश हो...तो कभी अगर कोई दुःख विपदा, अड़चन आ जाए...तो घबरायें नहीं.... क्या पता वो अगले किसी सुख की तैयारी हो!!🙏
#🙏रामायण🕉
आखिर कौन थे काकभुशुण्डि और क्या है उनकी कथा ?
किसने और क्यों दिया था उन्हें श्राप ?
माता सीता को रावण के चंगुल से छुटाने में कैसे की थी काकभुशुण्डि ने भगवान राम की सहायता ?
आखिर क्यों लेना पड़ा था उन्हें 1000 बार जन्म ?
क्यों काकभुशुण्डि पर क्रोधित हुए थे भगवान शिव ?
‼️काकभुशुण्डि गरुड़ संवाद‼️
संत तुलसीदास ने रामचरण मानस के उत्तर काण्ड में लिखा है कि काकभुशण्डि परमज्ञानी राम भक्त हैं।
जब भगवान राम माता को रावण से बचाने के लिए लंका आए थे, तब रावण के पुत्र मेघनाथ से उनका युद्ध किया था। युद्ध के दौरान एक ऐसा समय आया जब मेघनाथ ने भगवान राम को नागपाश से बांध दिया था।
देवर्षि नारद के कहने पर गरुड़ जो कि सर्वभख्शी थे, जिन्होंने नागपाश के सभी नागों को प्रताड़ित कर भगवान राम को नागों के बंधन से छुटाया, लेकिन वहीं भगवान राम के नागपाश से बंध जाने के कारण गरुड़ को भगवान राम के परमब्रह्म होने पर संदेह हो गया। गरुड़ के इस संदेह को दूर करने के लिए देवर्षि नारद ने गरुड़ को भगवान ब्रह्म जी के पास भेजा, वहीं ब्रह्म जी ने कहा कि तुम्हारा संदेह भगवान शिव दूर सकते है।
वहीं भगवान शिव ने भी गरुड़ को उनका संदेह मिटाने के लिए काकभुशण्डि के पास भेज दिया।
अंत में काकभुशुण्डि जी ने भगवान राम जी के चरित्र पवित्र कथा गरुड़ को सुनाई और गरुड़ के संदेह को दूर किया। भगवान राम के प्रति उनके संदहे को समाप्त करने के बाद काकभुशुण्डि जी ने गरुड़ को स्वयं की कथा सुनाई।
‼️काकभुशुण्डि की कहानी? ‼️
काकभूषुण्डि जी का प्रथम जन्म अयोध्यापुरी में क्षुद्र के घर हुआ, अपने उस जन्म में वह भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे, किंतु अभिमानपूर्वक अन्य देवताओं की निंदा करते थे। एक बार अयोध्या में अकाल पड़ गया।
उस समय काकभुशुण्डि जी अयोध्या छोड़ उज्जेन चले गए। वहां वह एक दयालु ब्रह्माण की सेवा करने लगे और उनके ही साथ रहने लगे। उन्होंने काकभुशुण्डि को भगवान शिव जी का मंत्र दे दिया। भगवान शिव जी का मंत्र पाकर उसका अभिमान और बढ़ गया और वह भगवान विष्णु से द्रोह करने लगा। उनके गुरू ब्रह्माण ने इस बात से दुखी होकर काकभुशुण्डि को भगवान श्री राम की भक्ति का उपदेश दिया। एक बार उस क्षुद्र ने भगवान शिव के मंदिर में अपने ही गुरू का अपमान कर दिया। जिसके बाद भगवान शिव ने आकाशवाणी कर उसे श्राप दिया और कहा कि हे पापी तूने अपने गुरू का अपमान किया है इसलिए तू सर्प की अधम योनि में चला जा, सर्प योनि के बाद तुझे एक हजार बार अन्य योनियों में जन्म लेना पड़ेगा।
गुरू बड़े दयालु थे, इसलिए भगवान शिव से अपने शिष्य के लिए क्षमा प्रार्थना की, गुरू द्वारा क्षमा याचना करने पड़ भगवान शिव ने आकाशवाणी कर कहा कि हे ब्रह्माण मेरा श्राप व्यर्थ नहीं जाएगा।
इस क्षुद्र को एक हजार बार जन्म अवश्य ही लेना पडे़गा, किंतु प्रत्येक जन्म में और मरने पर जो कष्ट होता है वो इसे नहीं होगा और ज्ञान भी नहीं मिटेगा।
इसे अपने प्रत्येक जन्म का स्मरण बना रहेगा, जगत में इससे कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा, मेरी कृपा से इसे श्री राम के चरणों के प्रति भक्ति भी प्राप्त होगी, इसके बाद उस क्षुद्र ने विध्यांचल में जाकर सर्प योनि प्राप्त की।
कुछ काल बीतने पर उसने उस शरीर को बिना किसी कष्ट के त्याग दिया। वो जब भी कोई भी शरीर त्यागता था उसे बिना किसी कष्ट के त्याग सकता था, अपने प्रत्येक जन्म की याद उसे बनी रहती थी प्रभु श्रीराम के प्रति भक्ति भी उसमें उत्पन्न हो गई थी।
अंतिम जन्म उसने ब्रह्माण का पाया, ब्रह्माण हो जाने पर ज्ञान प्राप्ति के लिए लोमस ऋषि के पास गया। जब लोमस ऋषि उसे ज्ञान देते थे देते थे तो वो उनसे अनेक प्रकार के तर्क-विर्तक करते थे, उसके इस व्यवहार से क्रोधित होकर लोमस ऋृषि ने उसे श्राप दे दिया, कि जा तू चंडाल पक्षी कौआ हो जा।
तब वह तत्काल कौआ बनकर उड़ गया।
श्राप देने के बाद लोमस ऋृषि को अपने इस श्राप पर पश्चताप हुआ और उन्होंने इस कौआ को वापस बुलाकर राम मंत्र दिया। इसी के साथ इच्छा मुक्ति का वरदान भी दिया, कौआ का शरीर पाने पर और भगवान श्री राम का मंत्र मिलने पर उसे अपने कौआ के शरीर से प्यार हो गया, और वह कौआ के रूप में ही रहने लगा, इसी के साथ वह काकभुशुण्डि के नाम से विख्यात हुए।
‼️महाभारत को 16 बार किसने देखा था ? ‼️
वेदों और पुराणों के अनुसार काकभुशुण्डि ने 11 बार रामायण और 16 बार महाभारत देखी हैं।
वह कल्प के अंत तक अपने शाश्वत स्वरूप में जीवित रहेगा, भगवान राम ने ही काकभुशुण्डि को अमर बनाया था। कौए के रूप में अपने एक जन्म के दौरान काकभुशुण्डि की मुलाकात बालक राम से हुई।
प्रभु खेल रहे थे और उसने उसे पकड़ने की कोशिश की। समय आने पर काकभुशुण्डि को भगवान के मुख के दर्शन हुए। अपने मुख में आकाशगंगाओं और ब्रह्मांड को देखने के बाद, काकभुशुण्डि ने भगवान राम से दूर उड़ना बंद कर दिया और उनके पास लौट आए। काकभुशुण्डि ने जगन्नाथ, भगवान राम को न पहचानने के लिए क्षमा मांगी, भगवान ने उन्हें दिव्य मुस्कान दी और काकभुशुण्डि से उनकी इच्छा पूछी, काकभुशुण्डि ने कहा कि वह भगवान राम के प्रति अपनी भक्ति हमेशा-हमेशा के लिए प्रदान करना चाहते हैं। काकभुशुण्डि के प्रेम और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि काल (समय) काकभुशुण्डि को नहीं मार सकता और वह इस कल्प के अंत तक जीवित रहेंगे। संत द्वारा प्राप्त शाश्वत आनंद को “काकभुशुण्डि समय यात्रा” कहा जाता है।
‼️काकभुशुण्डि अब कहाँ हैं?‼️
वह चला गया और सृष्टि के सत्ताईस चक्रों तक जीवित रहा। उन्हें अमरता का वरदान प्राप्त था, वे कौवे के रूप में जीवित रहे क्योंकि उन्हें भगवान राम के निकट रहने का अवसर मिलता। जब भी, भगवान राम का जन्म होता है, वह अयोध्या जाते हैं और भगवान राम को एक बच्चे के रूप में बड़े होते और खेलते हुए देखते हैं।













