#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣0️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
शततमोऽध्यायः
शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 310)
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वैशम्पायन उवाच
(इत्युक्त्वा सा महाभागा तत्रैवान्तरधीयत ।)
तयैवं समनुज्ञातः पुत्रमादाय शान्तनुः ।। ४० ।।
भ्राजमानं यथादित्यमाययौ स्वपुरं प्रति । पौरवस्तु पुरीं गत्वा पुरन्दरपुरोपमाम् ।। ४१ ।।
सर्वकामसमृद्धार्थ मेने सोऽऽत्मानमात्मना । पौरवेषु ततः पुत्रं राज्यार्थमभयप्रदम् ।। ४२ ।।
गुणवन्तं महात्मानं यौवराज्येऽभ्यषेचयत् । पौरवाञ्छान्तनोः पुत्रः पितरं च महायशाः ।। ४३ ।।
राष्ट्रं च रञ्जयामास वृत्तेन भरतर्षभ । स तथा सह पुत्रेण रममाणो महीपतिः ।। ४४ ।।
वर्तयामास वर्षाणि चत्वार्यमितविक्रमः । स कदाचिद् वनं यातो यमुनामभितो नदीम् ।। ४५ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- ऐसा कहकर महाभागा गंगादेवी वहीं अन्तर्धान हो गयीं। गंगाजीके इस प्रकार आज्ञा देनेपर महाराज शान्तनु सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले अपने पुत्रको लेकर राजधानीमें आये। उनका हस्तिनापुर इन्द्रनगरी अमरावतीके समान सुन्दर था। पूरुवंशी राजा शान्तनु पुत्रसहित उसमें जाकर अपने-आपको सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न एवं सफलमनोरथ मानने लगे। तदनन्तर उन्होंने सबको अभय देनेवाले महात्मा एवं गुणवान् पुत्रको राजकाजमें सहयोग करनेके लिये समस्त पौरवोंके बीचमें युवराज-पदपर अभिषिक्त कर दिया। जनमेजय ! शान्तनुके उस महायशस्वी पुत्रने अपने आचार-व्यवहारसे पिताको, पौरवसमाजको तथा समूचे राष्ट्रको प्रसन्न कर लिया। अमितपराक्रमी राजा शान्तनु ने वैसे गुणवान् पुत्र के साथ आनन्दपूर्वक रहते हुए चार वर्ष व्यतीत किये। एक दिन वे यमुना नदीके निकटवर्ती वनमें गये ।। ४०-४५ ।।
महीपतिरनिर्देश्यमाजिघ्रद् गन्धमुत्तमम् ।
तस्य प्रभवमन्विच्छन् विचचार समन्ततः ।। ४६ ।।
वहाँ राजाको अवर्णनीय एवं परम उत्तम सुगन्धका अनुभव हुआ। वे उसके उद्गमस्थानका पता लगाते हुए सब ओर विचरने लगे ।। ४६ ।।
स ददर्श तदा कन्यां दाशानां देवरूपिणीम् ।
तामपृच्छत् स दृष्ट्वैव कन्यामसितलोचनाम् ।। ४७ ।।
घूमते-घूमते उन्होंने मल्लाहोंकी एक कन्या देखी, जो देवांगनाओंके समान रूपवती थी। श्याम नेत्रोंवाली उस कन्याको देखते ही राजाने पूछा- ।। ४७ ।।
कस्य त्वमसि का चासि किं च भीरु चिकीर्षसि । साब्रवीद् दाशकन्यास्मि धर्मार्थ वाहये तरिम् ।। ४८ ।।
पितुर्नियोगाद् भद्रं ते दाशराज्ञो महात्मनः । रूपमाधुर्यगन्धैस्तां संयुक्तां देवरूपिणीम् ।। ४९ ।।
समीक्ष्य राजा दाशेयीं कामयामास शान्तनुः ।
स गत्वा पितरं तस्या वरयामास तां तदा ।। ५० ।।
'भीरु! तू कौन है, किसकी पुत्री है और क्या करना चाहती है?' वह बोली- 'राजन् ! आपका कल्याण हो। मैं निषादकन्या हूँ और अपने पिता महामना निषादराजकी आज्ञासे धर्मार्थ नाव चलाती हूँ।' राजा शान्तनुने रूप, माधुर्य तथा सुगन्धसे युक्त देवांगनाके तुल्य उस निषादकन्याको देखकर उसे प्राप्त करनेकी इच्छा की। तदनन्तर उसके पिताके समीप जाकर उन्होंने उसका वरण किया ।। ४८-५० ।।
पर्यपूच्छत् ततस्तस्याः पितरं सोऽऽत्मकारणात् ।
स च तं प्रत्युवाचेदं दाशराजो महीपतिम् ।। ५१ ।।
उन्होंने उसके पितासे पूछा- 'मैं अपने लिये तुम्हारी कन्या चाहता हूँ।' यह सुनकर निषादराजने राजा शान्तनुको यह उत्तर दिया- ।। ५१ ।।
जातमात्रैव मे देया वराय वरवर्णिनी ।
हृदि कामस्तु मे कश्चित् तं निबोध जनेश्वर ।। ५२ ।।
'जनेश्वर ! जबसे इस सुन्दरी कन्याका जन्म हुआ है, तभीसे मेरे मनमें यह चिन्ता है कि इसका किसी श्रेष्ठ वरके साथ विवाह करना चाहिये; किंतु मेरे हृदयमें एक अभिलाषा है, उसे सुन लीजिये ।। ५२ ।।
यदीमां धर्मपत्नीं त्वं मत्तः प्रार्थयसेऽनघ ।
सत्यवागसि सत्येन समयं कुरु मे ततः ।। ५३ ।।
'पापरहित नरेश! यदि इस कन्याको अपनी धर्मपत्नी बनानेके लिये आप मुझसे माँग रहे हैं, तो सत्यको सामने रखकर मेरी इच्छा पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कीजिये; क्योंकि आप सत्यवादी हैं ।। ५३ ।।
समयेन प्रदद्यां ते कन्यामहमिमां नृप । न हि मे त्वत्समः कश्चिद् वरो जातु भविष्यति ।। ५४ ।।
'राजन्! मैं इस कन्याको एक शर्तके साथ आपकी सेवामें दूँगा। मुझे आपके समान दूसरा कोई श्रेष्ठ वर कभी नहीं मिलेगा' ।। ५४ ।।
शान्तनुरुवाच
श्रुत्वा तव वरं दाश व्यवस्येयमहं तव । दातव्यं चेत् प्रदास्यामि न त्वदेयं कथंचन ।। ५५ ।।
शान्तनुने कहा- निषाद ! पहले तुम्हारे अभीष्ट वरको सुन लेनेपर मैं उसके विषयमें कुछ निश्चय कर सकता हूँ। यदि देनेयोग्य होगा, तो दूँगा और देनेयोग्य नहीं होगा, तो कदापि नहीं दे सकता ।। ५५ ।।
दाश उवाच
अस्यां जायेत यः पुत्रः स राजा पृथिवीपते ।
त्वदूर्ध्वमभिषेक्तव्यो नान्यः कश्चन पार्थिव ।। ५६ ।।
निषाद बोला- पृथ्वीपते ! इसके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हो, आपके बाद उसीका राजाके पदपर अभिषेक किया जाय, अन्य किसी राजकुमारका नहीं ।। ५६ ।।
वैशम्पायन उवाच
नाकामयत तं दातुं वरं दाशाय शान्तनुः । शरीरजेन तीव्रेण दह्यमानोऽपि भारत ।। ५७ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! राजा शान्तनु प्रचण्ड कामाग्निसे जल रहे थे, तो भी उनके मनमें निषादको वह वर देनेकी इच्छा नहीं हुई ।। ५७ ।।
स चिन्तयन्नेव तदा दाशकन्यां महीपतिः । प्रत्ययाद्धास्तिनपुरं कामोपहतचेतनः ।। ५८ ।।
कामकी वेदनासे उनका चित्त चंचल था। वे उस निषादकन्याका ही चिन्तन करते हुए उस समय हस्तिनापुरको लौट गये ।। ५८ ।।
ततः कदाचिच्छोचन्तं शान्तनुं ध्यानमास्थितम् । पुत्रो देवव्रतोऽभ्येत्य पितरं वाक्यमब्रवीत् ।। ५९ ।।
तदनन्तर एक दिन राजा शान्तनु ध्यानस्थ होकर कुछ सोच रहे थे- चिन्तामें पड़े थे। इसी समय उनके पुत्र देवव्रत अपने पिताके पास आये और इस प्रकार बोले- ।। ५९ ।।
सर्वतो भवतः क्षेमं विधेयाः सर्वपार्थिवाः । तत् किमर्थमिहाभीक्ष्णं परिशोचसि दुःखितः ।। ६० ।।
'पिताजी! आपका तो सब ओरसे कुशल-मंगल है, भू-मण्डलके सभी नरेश आपकी आज्ञाके अधीन हैं; फिर किसलिये आप निरन्तर दुःखी होकर शोक और चिन्तामें डूबे रहते हैं ।। ६० ।।
ध्यायन्निव च मां राजन्नाभिभाषसि किंचन । न चाश्वेन विनिर्यासि विवर्णो हरिणः कृशः ।। ६१ ।।
'राजन् ! आप इस तरह मौन बैठे रहते हैं, मानो किसीका ध्यान कर रहे हों; मुझसे कोई बातचीततक नहीं करते। घोड़ेपर सवार हो कहीं बाहर भी नहीं निकलते। आपकी कान्ति मलिन होती जा रही है। आप पीले और दुबले हो गये हैं ।। ६१ ।।
व्याधिमिच्छामि ते ज्ञातुं प्रतिकुर्यां हि तत्र वै । एवमुक्तः स पुत्रेण शान्तनुः प्रत्यभाषत ।। ६२ ।।
'आपको कौन-सा रोग लग गया है, यह मैं जानना चाहता हूँ, जिससे मैं उसका प्रतीकार कर सकूँ।' पुत्रके ऐसा कहनेपर शान्तनुने उत्तर दिया ।। ६२ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#महाभारत
#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१५९
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्ड
अठहत्तरवाँ सर्ग
शत्रुघ्नका रोष, उनका कुब्जाको घसीटना और भरतजीके कहनेसे उसे मूर्च्छित अवस्थामें छोड़ देना
तेरहवें दिनका कार्य पूर्ण करके श्रीरामचन्द्रजीके पास जानेका विचार करते हुए शोकसंतप्त भरतसे लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्नने इस प्रकार कहा—॥१॥
'भैया! जो दुःखके समय अपने तथा आत्मीयजनोंके लिये तो बात ही क्या है, समस्त प्राणियोंको भी सहारा देनेवाले हैं, वे सत्त्वगुणसम्पन्न श्रीराम एक स्त्रीके द्वारा वनमें भेज दिये गये (यह कितने खेदकी बात है)॥२॥
'तथा वे जो बल और पराक्रमसे सम्पन्न लक्ष्मण नामधारी शूरवीर हैं, उन्होंने भी कुछ नहीं किया। मैं पूछता हूँ कि उन्होंने पिताको कैद करके भी श्रीरामको इस संकटसे क्यों नहीं छुड़ाया?॥३॥
'जब राजा एक नारीके वशमें होकर बुरे मार्गपर आरूढ़ हो चुके थे, तब न्याय और अन्यायका विचार करके उन्हें पहले ही कैद कर लेना चाहिये था'॥४॥
लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्न जब इस प्रकार रोषमें भरकर बोल रहे थे, उसी समय कुब्जा समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो उस राजभवनके पूर्वद्वारपर आकर खड़ी हो गयी॥५॥
उसके अङ्गों में उत्तमोत्तम चन्दनका लेप लगा हुआ था तथा वह राजरानियोंके पहनने योग्य विविध वस्त्र धारण करके भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे सज धजकर वहाँ आयी थी॥६॥
करधनीको विचित्र लड़ियों तथा अन्य बहुसंख्यक सुन्दर अलंकारोंसे अलंकृत हो वह बहुत-सी रस्सियोंमें बँधी हुई वानरीके समान जान पड़ती थी॥७॥
वही सारी बुराइयोंकी जड़ थी। वही श्रीरामके वनवासरूपी पापका मूल कारण थी। उसपर दृष्टि पड़ते ही द्वारपालने उसे पकड़ लिया और बड़ी निर्दयताके साथ घसीट लाकर शत्रुघ्न के हाथमें देते हुए कहा—॥८॥
'राजकुमार! जिसके कारण श्रीरामको वनमें निवास करना पड़ा है और आपलोगोंके पिताने शरीरका परित्याग किया है, वह क्रूर कर्म करनेवाली पापिनी यही है। आप इसके साथ जैसा बर्ताव उचित समझें करें'॥९॥
द्वारपालकी बातपर विचार करके शत्रुघ्नका दुःख और बढ़ गया। उन्होंने अपने कर्तव्यका निश्चय किया और अन्तःपुरमें रहनेवाले सब लोगोंको सुनाकर इस प्रकार कहा—॥१०॥
'इस पापिनीने मेरे भाइयों तथा पिताको जैसा दुःसह दुःख पहुँचाया है, अपने उस क्रूर कर्मका वैसा ही फल यह भी भोगे'॥११॥
ऐसा कहकर शत्रुघ्नने सखियोंसे घिरी हुई कुब्जाको तुरंत ही बलपूर्वक पकड़ लिया। वह डरके मारे ऐसा चीखने-चिल्लाने लगी कि वह सारा महल गूँज उठा॥१२॥
फिर तो उसकी सारी सखियाँ अत्यन्त संतप्त हो उठीं और शत्रुघ्नको कुपित जानकर सब ओर भाग चलीं॥१३॥
उसकी सम्पूर्ण सखियोंने एक जगह एकत्र होकर आपसमें सलाह की कि 'जिस प्रकार इन्होंने बलपूर्वक कुब्जाको पकड़ा है, उससे जान पड़ता है, ये हमलोगोंमेंसे किसीको जीवित नहीं छोड़ेंगे॥१४॥
'अतः हमलोग परम दयालु, उदार, धर्मज्ञ और यशस्विनी महारानी कौसल्याकी शरणमें चलें। इस समय वे ही हमारी निश्चल गति हैं'॥१५॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले शत्रुघ्न रोषमें भरकर कुब्जाको जमीनपर घसीटने लगे। उस समय वह जोर-जोरसे चीत्कार कर रही थी॥१६॥
जब मन्थरा घसीटी जा रही थी, उस समय उसके नाना प्रकारके विचित्र आभूषण टूट-टूटकर पृथ्वीपर इधर-उधर बिखरे जाते थे॥१७॥
आभूषणोंके उन टुकड़ोंसे वह शोभाशाली विशाल राजभवन नक्षत्रमालाओंसे अलंकृत शरत्कालके आकाशकी भाँति अधिक सुशोभित हो रहा था॥१८॥
बलवान् नरश्रेष्ठ शत्रुघ्न जिस समय रोषपूर्वक मन्थराको जोरसे पकड़कर घसीट रहे थे, उस समय उसे छुड़ानेके लिये कैकेयी उनके पास आयी। तब उन्होंने उसे धिक्कारते हुए उसके प्रति बड़ी कठोर बातें कहीं—उसे रोषपूर्वक फटकारा॥१९॥
शत्रुघ्नके वे कठोर वचन बड़े ही दुःखदायी थे। उन्हें सुनकर कैकेयीको बहुत दुःख हुआ। वह शत्रुघ्नके भयसे थर्रा उठी और अपने पुत्रकी शरणमें आयी॥२०॥
शत्रुघ्नको क्रोधमें भरा हुआ देख भरतने उनसे कहा- 'सुमित्राकुमार! क्षमा करो। स्त्रियाँ सभी प्राणियोंके लिये अवध्य होती हैं॥२९॥
'यदि मुझे यह भय न होता कि धर्मात्मा श्रीराम मातृघाती समझकर मुझसे घृणा करने लगेंगे तो मैं भी इस दुष्ट आचरण करनेवाली पापिनी कैकेयीको मार डालता॥२२॥
'धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी तो इस कुब्जाके भी मारे जानेका समाचार यदि जान लें तो वे निश्चय ही तुमसे और मुझसे बोलना भी छोड़ देंगे'॥२३॥
भरतजीकी यह बात सुनकर लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्न मन्थराके वधरूपी दोषसे निवृत्त हो गये और उसे मूर्च्छित अवस्थामें ही छोड़ दिया॥२४॥
मन्थरा कैकेयीके चरणोंमें गिर पड़ी और लंबी साँस खींचती हुई अत्यन्त दुःखसे आर्त हो करुण विलाप करने लगी॥२५॥
शत्रुघ्नके पटकने और घसीटनेसे आर्त एवं अचेत हुई कुब्जाको देखकर भरतकी माता कैकेयी धीरे-धीरे उसे आश्वासन देने—होशमें लानेकी चेष्टा करने लगी। उस समय कुब्जा पिजड़ेंमें बँधी हुई क्रौञ्चीकी भाँति कातर दृष्टिसे उसकी ओर देख रही थी॥२६॥
*इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अठहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥७८॥*
###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
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‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼
🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩
*की प्रस्तुति*
🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴
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*मानव जीवन में समय समय पर अनेकों समस्यायें उत्पन्न होती रहती हैं ! कुछ समस्यायें तो ऐसी होती हैं जो स्वयं मनुष्य के द्वारा ही उत्पन्न कर ली जाती हैं | यदि किसीने कह दिया कि हमने तो ऐसा सुना है तो मनुष्य को उसे तब तक सत्य सत्य नहीं मानना चाहिए जब तक स्वयं न देख ले | बिना विषय की सच्चाई जाने ही यदि उस पर विश्वास कर लिया जाता है तो मनुष्य को व्यर्थ में भय , आशंका और चिन्ता एक नवीन समस्या के रूप में घेर लेती हैं | मानव जीवन की समस्त समस्याओं का समाधान हमारे शास्त्रों में देखने को मिलता है | हमारे महापुरुषों ने मानवोपयोगी सूक्तियां इन शास्त्रों वर्णित कर दी हैं आवश्यकता है उनका अध्ययन करने की | हमारे शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है :- "कुश्रुतं कुपरिज्ञातं कुदृष्टं कुपरिक्षितं ! तन्नरेण न कर्तव्यो नापितो नात्र यत्कृतं !!" अर्थात् :- बिना ढंग से सुने , बिना ढंग से जाने , बिना स्वयं भली भाँति देखे और बिना परीक्षा लिए किसी भी निर्णय पर पहुँचना मनुष्य का कर्तव्य नहीं है | विचार कीजिए कि हमारे महापुरुषों ने कितनी सूक्ष्मता से इन दो लाईनों में सम्पूर्ण जीवन का सार लिख दिया है परंतु हम अपने शास्त्रों से अनभिज्ञ होने के कारण अनेक अनचाही समस्याओं से स्वयं को घिरा पा रहे हैं | किसी के कुछ भी कह देने पर तिरंत विश्वास न करके पहले उस विषय के तह तक जाकर ही उसके विषय में कुछ निर्णय लेने वाला ही विद्वान एवं बुद्धिमान कहा जा सकता है | लंकाधिराज रावण ने अपनी बहन सूर्पणखा से राम - लक्ष्मण के कृत्य सुनकर बिना सच्चाई जाने ही सीता हरण का निर्णय ले लिया तो उसका परिणाम भी जगविदित ही है | इतिहास - पुराणों में ऐसे कई अन्य कथानक भी देखने एवं पढ़ने को मिलते हैं ! इसलिए प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य होना चाहिए कि किसी के द्वारा किसी व्यक्ति की बुराई सुनने के बाद तब तक उस पर विश्वास न करें जब तक स्वयं उसे बुराई करते हुए देख न ले | किसी वस्तु के विषय में तब तक न माने जब तक परीक्षण न कर ले | ऐसा करके मनुष्य अनेक प्रकार की समस्याओं से स्वयं को बचा सकता है |*
*आज के युग में समस्याओं का अंबार दिखाई पड़ रहा है | कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसके पास समस्यायें न हों , और यह भी सत्य है की अनेक समस्याएं मनुष्य ने स्वयं प्रकट की हैं जिसका निदान वह जीवन भर नहीं कर पाता | आज मनुष्य किसी भी विषय की गहराई में नहीं जाना चाहता ! सुनी सुनाई बातों पर विश्वास करके वह जीवन भर उसके तत्व को खोजने का प्रयास करता है | किसी भी विषय पर कोई वार्ता सुनकर वह उसके विषय में जिज्ञासु हो जाता है , जिज्ञासु हो जाना तो उचित है परंतु उस विषय को बिना जाने उसके विषय में चिंतन करते रहना उचित नहीं कहा जा सकता | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इतना ही कहना चाहता हूं कि किसी भी विषय को हमारे शास्त्रों में छोड़ा नहीं गया है जिसका वर्णन न हो | यदि कोई भी विषय ऐसा मिल जाए जिसके विषय में हमें ज्ञान नहीं है तो उसके विषय में खोजने का प्रयास हमें अपने शास्त्रों में करना चाहिए क्योंकि संसार का कोई भी ऐसा ज्ञान नहीं है जो हमारे शास्त्रों में ना हो , परंतु आज हमने अपने शास्त्रों का अध्ययन करना लगभग बंद कर दिया है | सुनी सुनाई बातें एवं सोशल मीडिया के माध्यम से पढ़ी हुई बातों को ही हम सत्य मानने लगे हैं | हमने किसी से सुना या गूगल पर पढ़ा कि मोर ब्रह्मचारी होता है तो हमने सही मान लिया | ब्रह्मचर्य का अर्थ क्या होता है इससे मतलब नहीं रखते , न जानना चाहते हैं | यही कारण है कि आज समस्याएं मुंह फैलाए खड़ी है इन समस्याओं से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है कि हम संसार में रहकर संसार को जानने का प्रयास करें और यह प्रयास तभी सफल होगा जब हम अपने ग्रंथों का अध्ययन करेंगे अन्यथा जीवन इसी प्रकार समस्याओं से ग्रसित होकर व्यतीत हो जाएगा | आज जन जागरण की आवश्यकता है क्योंकि आज भ्रांतियां चारों ओर फैली हुई है इन भ्रांतियों को समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए जिससे कि हमारा जीवन सुखमय व्यतीत हो सके |*
*जीवन में सदैव चिंतन करके सच्चाई जानने के लिए उसकी गहराई में जाना चाहिए ऐसा करने वाले ही अपने जीवन में लक्ष्य का भेदन करते हुए सफलता का कीर्तिमान स्थापित कर पाते हैं |*
🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺
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सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹
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आचार्य अर्जुन तिवारी
प्रवक्ता
श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा
संरक्षक
संकटमोचन हनुमानमंदिर
बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी
(उत्तर-प्रदेश)
9935328830
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#☝आज का ज्ञान
गलती और प्रसन्नता
गलती तो हर व्यक्ति से हो सकती है पर गलती इरादे से नहीं होनी चाहिए, इंसान आखिर इंसान ही होता है।
कितना भी मजबूत हो इंसान, पर अपने कमजोर वक्त में वह मानसिक तौर पर परेशान हो ही जाता है !!
प्रसन्नता इस बात पर निर्भर करती है कि हम परिस्थितियों को कैसे स्वीकार करते हैं, समझते हैं और समर्पण करते हैं? बहुत सी चीज़ेँ इसलिए अच्छी लगती है क्योंकि वे प्राप्त नहीं है जैसे ही प्राप्त होती है उसका मुल्य घट जाता है !!
🌹जय जय श्री राधे 🌹
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#❤️जीवन की सीख
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जय श्री कृष्ण
हमारी पूजा प्रार्थना स्वर्ग नर्क के भय और कामनाओं से ग्रस्त है,
जबकि ईश्वर हमसे केवल प्रेम चाहते हैं।
🙏सुप्रभात🙏
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#☝आज का ज्ञान
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣0️⃣9️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
शततमोऽध्यायः
शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 309)
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तदद्भुतं ततो दृष्ट्वा तत्र राजा स शान्तनुः । शङ्कमानः सुतं गङ्गामब्रवीद् दर्शयेति ह ।। ३० ।।
यह अद्भुत बात देखकर राजा शान्तनुको कुछ संदेह हुआ और उन्होंने गंगासे अपने पुत्रको दिखानेको कहा ।। ३० ।।
दर्शयामास तं गङ्गा बिभ्रती रूपमुत्तमम् ।
गृहीत्वा दक्षिणे पाणी तं कुमारमलंकृतम् ।। ३१ ।।
तब गंगाजी परम सुन्दर रूप धारण करके अपने पुत्रका दाहिना हाथ पकड़े सामने आयीं और दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कुमार देवव्रतको दिखाया ।। ३१ ।।
अलंकृतामाभरणैर्विरजोऽम्बरसंवृताम् । दृष्टपूर्वामपि स तां नाभ्यजानात् स शान्तनुः ।। ३२ ।।
गंगा दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत हो स्वच्छ सुन्दर साड़ी पहने हुई थीं। इससे उनका अनुपम सौन्दर्य इतना बढ़ गया था कि पहलेकी देखी होनेपर भी राजा शान्तनु उन्हें पहचान न सके ।। ३२ ।।
गङ्गोवाच
यं पुत्रमष्टमं राजंस्त्वं पुरा मय्यविन्दथाः । स चायं पुरुषव्याघ्र सर्वास्त्रविदनुत्तमः ।। ३३ ।।
गंगाजीने कहा-महाराज! पूर्वकालमें आपने अपने जिस आठवें पुत्रको मेरे गर्भसे प्राप्त किया था, यह वही है। पुरुषसिंह ! यह सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें अत्यन्त उत्तम है ।। ३३ ।।
गृहाणेमं महाराज मया संवर्धितं सुतम् । आदाय पुरुषव्याघ्र नयस्वैनं गृहं विभो ।। ३४ ।।
राजन! मैंने इसे पाल-पोसकर बड़ा कर दिया है। अब आप अपने इस पुत्रको ग्रहण कीजिये। नरश्रेष्ठ ! स्वामिन् ! इसे घर ले जाइये ।। ३४ ।।
वेदानधिजगे साङ्गान् वसिष्ठादेष वीर्यवान् । कृतास्त्रः परमेष्वासो देवराजसमो युधि ।। ३५ ।।
आपका यह बलवान् पुत्र महर्षि वसिष्ठसे छहों अंगोंसहित समस्त वेदोंका अध्ययन कर चुका है। यह अस्त्र-विद्याका भी पण्डित है, महान् धनुर्धर है और युद्धमें देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी है ।। ३५ ।।
सुराणां सम्मतो नित्यमसुराणां च भारत । उशना वेद यच्छास्त्रमयं तद् वेद सर्वशः ।। ३६ ।।
भारत ! देवता और असुर भी इसका सदा सम्मान करते हैं। शुक्राचार्य जिस (नीति) शास्त्रको जानते हैं, उसका यह भी पूर्णरूपसे जानकार है ।। ३६ ।।
तथैवाङ्गिरसः पुत्रः सुरासुरनमस्कृतः । यद् वेद शास्त्रं तच्चापि कृत्स्नमस्मिन् प्रतिष्ठितम् ।। ३७ ।।
तव पुत्रे महाबाहौ साङ्गोपाङ्ग महात्मनि ।
ऋषिः परैरनाधृष्यो जामदग्न्यः प्रतापवान् ।। ३८ ।।
यदस्त्रं वेद रामश्च तदेतस्मिन् प्रतिष्ठितम् । महेष्वासमिमं राजन् राजधर्मार्थकोविदम् ।। ३९ ।।
मया दत्तं निजं पुत्रं वीरं वीर गृहं नय ।
इसी प्रकार अंगिरा के पुत्र देव-दानव-वन्दित बृहस्पति जिस शास्त्रको जानते हैं, वह भी आपके इस महाबाहु महात्मा पुत्रमें अंग और उपांगोंसहित पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित है। जो दूसरोंसे परास्त नहीं होते, वे प्रतापी महर्षि जमदग्निनन्दन परशुराम जिस अस्त्र-विद्याको जानते हैं, वह भी मेरे इस पुत्रमें प्रतिष्ठित है। वीरवर महाराज! यह कुमार राजधर्म तथा अर्थशास्त्रका महान् पण्डित है। मेरे दिये हुए इस महाधनुर्धर वीर पुत्रको आप घर ले जाइये ।। ३७-३९३
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#महाभारत
#श्री बालाजी
कलियुग के प्रत्यक्ष भगवान
वेंकटेश्वर बालाजी!!!!!!!!
कलियुग में साक्षात् विष्णु ही भगवान वेंकटेश्वर बालाजी के रूप में स्थित हैं, क्या है उनके अवतार का रहस्य ? माता यशोदा और भगवान वेंकटेश्वर का क्या है सम्बन्ध ?
भगवान श्रीहरि जगत के कल्याण के लिए भूलोक आए थे केवल दो स्त्रियों की रक्षा के लिए नहीं; इसलिए चुपचाप वे सात कदम पीछे चले । तभी एक भयंकर ध्वनि हुई और वे शिलाविग्रह में परिवर्तित हो गए । तभी आकाशवाणी हुई—‘अब से मैं कलियुग के अंत तक वेंकटेश्वर स्वामी के नाम से इसी रूप में रहूंगा । अपने भक्तजनों की मनोकामना पूरी करना ही मेरा व्रत है ।’
वेंकटेश्वर का अर्थ—‘वें’ का अर्थ है पाप और ‘कट’ का अर्थ है दूर करने वाला अर्थात् ‘वेंकट’ का अर्थ है पापों को दूर करने वाला और ‘ईश्वर’ का अर्थ है भगवान; इसलिए ‘वेंकटेश्वर’ का अर्थ है पापों को दूर करने वाले भगवान । कलियुग में भगवान विष्णु तिरुपति में वेंकटेश्वर स्वामी के नाम से अवतरित होकर भक्तों पर कृपा बरसाते हैं । उत्तर भारतीय भगवान वेंकटेश्वर को ‘बालाजी’ कहते हैं ।
भगवान वेंकटेश्वर बालाजी के अवतार धारण करने का कथा-प्रसंग!!!!!!!
हर युग में भगवान विष्णु के अवतार हुए और प्रत्येक अवतार के पीछे एक कहानी है । भगवान के वेंकटेश्वर अवतार की कथा इस प्रकार है!
द्वापर युग की समाप्ति और कलियुग के आरम्भ होने पर एक बार ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा—‘कलियुग में सारा संसार अशांति और असत्य में डूब जाएगा । कलियुग में भगवान नारायण ने अवतार धारण नहीं किया है; इसलिए तुम अपने कौशल से ऐसा कोई उपाय करो जिससे भगवान भूलोक में अवतार धारण करें । तब मानव भक्ति-युक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करेगा ।’
पिता की बात सुन कर नारदजी भूलोक में गंगा किनारे आए जहां समस्त ऋषि-गण एकत्रित होकर जन-कल्याण के लिए एक विशाल यज्ञ कर रहे थे । नारदजी ने मुनियों से पूछा—‘संसार की भलाई के लिए किया जाने वाला यज्ञ साधारण नहीं होता; इसलिए इसका फल पाने वाला भी साधारण नहीं होना चाहिए । इस यज्ञ का फल आप किसे दे रहे हैं ? सबसे पहले यह जानने का प्रयत्न कीजिए कि त्रिमूर्तियों में से कौन सत्वगुण-संपन्न है और कौन मोक्ष फल का दाता है, अत: यज्ञ का फल किसे देना चाहिए ?’’
मुनियों ने कहा—‘नारद ! तुम बहुत बुद्धिशाली हो, अत: तुम ही बताओ, ब्रह्मा, विष्णु और महेश में से किसको यज्ञ का फल देना चाहिए । एक सृष्टि करता है, दूसरा पालन करता है और तीसरा रुद्रमूर्ति है । तीनों ही एक-दूसरे से कम नहीं है । अत: इनकी परीक्षा कर लेनी चाहिए । इस कार्य के लिए भृगु ऋषि ही श्रेष्ठ हैं क्योंकि जैसे भगवान शिव का तीसरा नेत्र ललाट पर है, इनका तृतीय तपोनेत्र पाद (चरण) में है ।’ त्रिमूर्ति में कौन श्रेष्ठ है—इसकी परीक्षा करने के लिए भृगु ऋषि मान गए ।
भृगु ऋषि द्वारा ब्रह्मा, शिव और विष्णु की परीक्षा!!!!!!!
सर्वप्रथम भृगु ऋषि सत्यलोक गए, जहां ब्रह्माजी वरुण, अग्नि आदि दिक्पालकों से सृष्टि के सम्बन्ध में चर्चा कर रहे थे । भृगु ऋषि काफी देर तक ब्रह्मसभा में खड़े रहे परन्तु किसी ने भी उनकी ओर ध्यान नहीं दिया । क्रोधित होकर भृगु ऋषि ने कहा—‘ब्रह्मदेव ! तुम स्रष्टा होने के गर्व में इतने अंधे हो रहे हो कि चार सिर और आठ आंखों के होते हुए भी तुम्हें अतिथि दिखाई नहीं देता । तुममें रजोगुण की प्रधानता है । अतिथि के अपमान के लिए मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि ‘पृथ्वी पर कहीं भी न तो तुम्हारी पूजा होगी और न ही मंदिर होगा ।’
इसके बाद भृगु ऋषि कैलास गए, जहां भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती के साथ अंत:पुर में भोगानुभव कर रहे थे । बाहर गणेश, कार्तिकेय और समस्त शिवगण कोई उत्सव मना रहे थे । किसी ने भी भृगु ऋषि को नहीं पहचाना । क्रोधित होकर भृगु ऋषि सीधे अंत:पुर में प्रवेश कर गए जिस पर शिव भी उन पर क्रोधित हो उठे । भृगु ऋषि ने सोचा इनमें तामस गुण ही है; इसलिए शिवजी को शाप देते हुए कहा—‘तुम्हारी किसी भी मंदिर में मूर्ति नहीं होगी, सब जगह तुम लिग ही लिंग हो जाओ ।’
अब भृगु ऋषि वैकुण्ठ लोक में पहुंचे, जहां भगवान विष्णु शेषशय्या पर शयन कर रहे थे और लक्ष्मीजी उनकी पाद सेवा कर रही थीं । यह देखकर भृगु ऋषि का पारा और चढ़ गया । उन्होंने भगवान विष्णु के वक्ष पर पदाघात करते हुए कहा—‘हमारे आने पर भी तुम सोते हो, उठो !’
भृगु ऋषि के पदाघात से विष्णुजी ने शेषशय्या से उतर कर उनके चरण पकड़ लिए और लक्ष्मीजी को उनके लिए पाद्य-अर्घ्य आदि लाने के लिए कहा । भगवान विष्णु ने कहा—‘क्षमा करो महात्मन् ! कौस्तुभ आदि से युक्त हारों को पहनने से मेरी छाती बहुत कठोर है, इस पर पदाघात से आपके सुकुमार चरण को कितना कष्ट हुआ होगा । मुझे अपना दास समझ कर क्षमा करना । मैं आपके चरण छूता हूँ ।’
भगवान विष्णु ने भृगु ऋषि का पांव हाथ में लेकर उनके तपोनेत्र को अपनी ऊंगलियों से खींचकर सागर में फेंक दिया जिससे भृगु ऋषि का सारा गर्व जाता रहा । भृगु ऋषि ने कहा—‘आपको लात मार कर मैंने बड़ा पाप किया, मेरे दोष को क्षमा करें ।’ भगवान विष्णु ने कहा—‘तुम दु:खी मत हो, तुम्हारे मन की बात और आने का कारण मैं जानता हूँ । तुम्हारे कारण हमारा महत्व संसार में विदित होगा ।’
भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु से यज्ञ का फल स्वीकार करने की प्रार्थना की, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया । भृगु ऋषि ने भूलोक में जाकर समस्त ऋषियों को भगवान विष्णु का महत्व बता कर यज्ञ फल उन्हें समर्पित करने के लिए कहा ।
लक्ष्मीजी का रूठ कर भूलोक में जाना
भृगु ऋषि के कार्य से भगवान विष्णु के वक्ष:स्थल में रहने वाली लक्ष्मीजी क्रुद्ध हो गईं और बोली—‘चौदह भुवनों के स्वामी और समस्त देवताओं से पूजित आप को लात मारने का उस ब्राह्मण का साहस ! यही नहीं यह वक्ष:स्थल मेरा निवासस्थान है । इस पर लात मारने का मतलब है, मुझे लात मारना । उसे दण्ड देने की जगह आपने उनसे क्षमा मांगी, यह देखकर मेरा तो दिल जल रहा है । पर-पुरुष से अपमानित होकर जीवित रहने की अपेक्षा नाक बंद करके तपस्या कर लेना अच्छा है ।’
भगवान विष्णु ने लक्ष्मीजी को बहुत समझाया कि ‘भक्तों के मन की बात को जानना बहुत कठिन है । वे किसी महान कार्य के लिए यहां आए थे । संतान के कार्य से माता-पिता क्यों नाराज होंगे ? तुमको शांत हो जाना चाहिए ।’ परन्तु लक्ष्मीजी ने कहा—‘मैं उसे क्षमा नहीं कर सकती । अगर आप उसे दण्ड नहीं दे सकते तो मैं वैकुण्ठ में नहीं रहूंगी । उस दुष्ट ने हम दोनों को अलग किया है; इसलिए मैं समस्त ब्राह्मण जाति को शाप देती हूँ कि ‘ब्राह्मण भूलोक में वेदोक्त कर्मों से हीन और दरिद्र बन कर विद्याओं को बेचते हुए जीवन यापन करेंगे ।’
लक्ष्मीजी भूलोक में आकर गोदावरी नदी के किनारे कोल्हापुर में एक पर्णकुटी बनाकर तपस्या करने लगीं ।
पत्नी वियोग में भगवान विष्णु का पृथ्वी पर आना!!!!!!!!
लक्ष्मीजी के वैकुण्ठ छोड़ते ही वहां की शोभा जाती रही, चारों ओर दरिद्रदेव का राज्य हो गया । पत्नी के वियोग में भगवान विष्णु भी एक दिन वैकुण्ठ छोड़कर भूलोक आ गए और पत्नी को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते शेषाद्रि (शेषाचल) पहुंच गए । इसे शेषाचल इसलिए कहते हैं क्योंकि भगवान शेष यहां पर्वत रूप में स्थित हैं । इस पर्वत को तिरुमलै या तिरुमाला भी कहते हैं, जिसका अर्थ है श्रीयुक्त पर्वत ।
धरती पर पैर रखते ही भगवान विष्णु को भी भूख-प्यास आदि मानवीय तत्त्व प्रभावित करने लगे । एक दिन थकान के कारण वे एक इमली के पेड़ के नीचे वल्मीक (खोडर) में शयन करने के उद्देश्य से जा छिपे ।
वैकुण्ठ उजड़ गया—यह जानकर नारदजी ने ब्रह्माजी से कहा—‘आप के कहे अनुसार मैंने कार्य कर दिया । लक्ष्मीजी और विष्णु दोनों ही भूलोक चले गए हैं । निद्रा और आहार के बिना भगवान विष्णु सूख कर कांटा हो गए हैं; इसलिए आप उन्हें आहार देने की व्यवस्था कीजिए ।’
ब्रह्माजी भगवान शंकर को साथ लेकर लक्ष्मीजी के पास पहुंचे और बोले—‘निद्रा और आहार के बिना भगवान विष्णु आजकल शेषाद्रि पर एक पेड़ के खोडर में रह रहे हैं, उनकी रक्षा होनी चाहिए । हम दोनों गाय और बछड़े का रूप धारण करेंगे और आप ग्वालिन बन कर हमें चोल देश के राजा को बेच दीजिए । हम उस राजा की गायों के साथ रहकर श्रीहरि को प्रतिदिन दुग्धपान कराएंगे ।’ लक्ष्मीजी ने बात मान ली । शेषाद्रि (वेकटाचलम्) उन दिनों चोल राजा के अधीन था ।
उसी क्षण ब्रह्मा गाय, शिवजी बछड़ा और लक्ष्मीजी ग्वालिन बनकर चोलराजा के पास पहुंचीं । गाय और बछड़े के सौंदर्य से आकर्षित होकर राजा-रानी ने उन्हें खरीद लिया । लक्ष्मीजी का काम पूरा हो गया । चोलराजा ने ग्वाले से कहा कि नई गाय का दूध दुह कर राजकुमार के लिए लाया करो ।
चोलराजा के पास हजारों गायें थीं । ग्वाला उस गाय और बछड़े को भी अन्य गायों के साथ शेषाचल पर चरने के लिए ले जाता पर वह गाय घास न चर कर अकेले ही उस वल्मीक पर जाकर दूध की धार डालने लगी । इससे सोते हुए विष्णु जाग गए और गाय को ब्रह्मा जानकर दूध पीने लगे । वह गाय गोशाला में आकर दूध नहीं देती थी । इस पर राजा ने ग्वाले को चोर कहते हुए दण्ड देने की बात कही । राजदण्ड से भयभीत ग्वाले को गाय पर शंका होने लगी ।
एक दिन जब वह गाय बछड़े के साथ वल्मीक पर जाकर दूध की धार देने लगीं, तो ग्वाले ने छुप कर उन्हें ऐसा करते हुए देख लिया । उसने क्रोध में आकर गाय को मारने के लिए अपनी कुल्हाड़ी उठाई, तभी उस परोपकारी गाय को बचाने के लिए भगवान विष्णु बीच में आ गए और कुल्हाड़ी उनके सिर पर जा लगी जिससे रक्त बहने लगा । यह देखकर ग्वाला बेहोश हो गया । किसी ने राजा को इस घटना की खबर दी । राजा ने जाकर देखा कि वल्मीक से रक्त बह रहा है । राजा को देखकर विष्णुजी खोडर से बाहर आ गए और बोले—‘सेवकों के पाप का फल राजा को भोगना पड़ता है । आज से तुम पिशाच हो जाओ ।’
चोलराजा भगवान के चरणों पर गिर कर गिड़गिड़ाने लगा । तब करुणा करके भगवान विष्णु ने कहा—‘मेरा शाप व्यर्थ नहीं जाएगा, लेकिन तुम इस देह को छोड़कर इसी चोलवंश में ‘आकाशराज’ के रूप में जन्म लोगे और अपनी पुत्री पद्मावती का मेरे साथ विवाह कराओगे । उस अवसर पर तुम मुझे एक वज्रकिरीट भेंट करोगे, उसे मैं प्रत्येक शुक्रवार को धारण करुंगा । उस दिन तुम शाप से मुक्त हो जाओगे ।’
तभी ग्वाले की मूर्च्छा टूटी किंतु वह अंधा हो गया । वह भी भगवान के चरणों पर गिर पड़ा । तब दया करके भगवान ने कहा—‘मैं कुछ समय बाद इस पर्वत पर मूर्तरूप धारण करुंगा । तब तक तू यहीं अंधा बन कर रह । मेरे अवतार लेते ही तेरी आंखें ठीक हो जाएंगी ।’
कलियुग में भगवान विष्णु का वेंकटेश्वर अवतार!!!!!!!!
ग्वाले के कारण श्रीहरि के सिर पर चोट लगी थी, वे शेषाद्रि पर ही घूम-घूम कर औषधि की खोज कर रहे थे कि देवलोक से देवगुरु बृहस्पति ने आकर उनसे कहा—‘आप भक्तों के कल्याण के लिए कितने कष्टों का सामना कर रहे हैं । इस घाव की सर्वोत्तम औषधि है कि मदार की रुई को गूलर के पेड़ के दूध में भिगोकर घाव पर लगा दीजिए । ऐसा करने पर वह एक सप्ताह में ठीक हो जाएगा ।’
भगवान विष्णु औषधि की खोज करते हुए शेषाद्रि पर वराहस्वामी के आश्रम में पहुंचे । वराहस्वामी ने उनका आदर-सत्कार कर वेंकटाचल पर ही रहने को जगह दे दी और कहा—‘मेरे पास वकुलादेवी नाम की भक्तिन है । वह माता की तरह आपकी सेवा करती रहेगी । उसे आप अपने पास रहने दीजिए ।’
वकुलादेवी!!!!!!!
वकुलादेवी कृष्णावतार में माता यशोदा थीं जो श्रीकृष्ण का विवाह न देख सकीं थीं । श्रीकृष्ण ने उन्हें वर दिया था कि कलियुग में मैं एक नौजवान के रूप में तुम्हारे पास आऊंगा, तब तुम मेरी शादी देखोगी ।’
वकुलादेवी ने कहा—‘आज से तुम मेरे पुत्र हो । मैं तुम्हें ‘श्रीनिवास’ के नाम से पुकारुंगी ।’ वकुलादेवी ने जड़ी-बूटियां लाकर भगवान श्रीनिवास के घावों पर लगा दीं । वे अच्छे-अच्छे फल, कन्द-मूल आदि जंगल से लाकर श्रीनिवासजी को खिलातीं ।
चोल राज्य के राजा का नाम आकाशराज और उनकी पत्नी का नाम धरणीदेवी था । आकाश राजा के छोटे भाई का नाम तोंडमान था । दोनों भाइयों के कोई संतान नहीं थी; इसलिए उन्होंने यज्ञ करने के लिए जमीन जोती तो एक स्थान पर हल अटक गया । जब जमीन खोदी तो वहां उन्हें एक सोने का संदूक मिला ।
संदूक को खोलने पर उसमें सहस्त्र दलों वाला एक कमल और उस पर लेटी हुई विद्युत के समान दीप्तमान एक बालिका मिली । उस बालिका को पाकर राजा रानी के हर्ष का पारावार न रहा । पद्म में मिलने के कारण ब्राह्मणों ने उसका नाम ‘पद्मावती’ रखा । पद्मावती के मिलने के बाद धरणीदेवी को ‘वसुदान’ नामक पुत्र हुआ ।
पद्मावती दिनोंदिन शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा के समान बढ़ने लगी । एक दिन नारदजी आकाशराज से मिलने आए तो राजा ने उन्हें पद्मावती के लिए योग्य वर बताने के लिए कहा । नारदजी ने कहा—‘आपको दामाद की खोज करने की आवश्यकता नहीं है । आपकी पुत्री लक्ष्मीजी के अंश को लेकर पैदा हुई है । रामावतार में वेदवती को भगवान राम द्वारा दिए गए वर के अनुसार वही वेदवती आपके यहां पद्मावती के रूप में अवतरित हुई है । भगवान विष्णु के साथ ही पद्मावती का विवाह होगा । वह शुभ घड़ी बहुत ही निकट आ रही है ।’
एक दिन भगवान श्रीनिवास वकुलादेवी की आज्ञा लेकर आखेट के लिए वन में गए । वहां एक हाथी का पीछा करते हुए वे दूर निकल गए । कुछ ही देर बाद हाथी तो ओझल हो गया और पानी की तलाश में श्रीनिवासजी एक सरोवर के समीप आए । वहां उद्यान में पद्मावती अपनी सखियों के साथ खेल रही थी । पद्मावती और श्रीनिवासजी एक-दूसरे को देखकर प्यार में पड़ गए । श्रीनिवासजी के चले जाने पर महल में पद्मावती न खाती, न पीती और न ही सोती थी । इधर आश्रम में श्रीनिवास की हालत भी ऐसी ही थी । एक दिन श्रीनिवास ने अपने दिल की बात वकुलादेवी को बता दी और उन्हें आकाशराज के पास जाकर पद्मावती से विवाह करा देने की प्रार्थना की ।
वकुलादेवी के जाने बाद आकाशराज अपने गुरु शुक योगी के पास श्रीनिवास और पद्मावती के विवाह के बारे में सलाह लेने गए । शुक योगी ने कहा—‘शेषाद्रि पर रहने वाला श्रीनिवास साधारण मानव नहीं है, वह तो साक्षात् श्रीहरि हैं । तुम्हारे पूर्व जन्म के पुण्यों के कारण वे तुम्हारे दामाद बनने जा रहे हैं । उन्हीं के दर्शन के लिए हम जैसे लोग कई जन्मों से तपस्या कर रहे हैं ।’ राजा ने तुरंत देवगुरु बृहस्पति को बुलाकर शादी के लिए लग्न पत्रिका लिखवाई ।
वैशाख शुक्ल दशमी शुक्रवार को हुआ श्रीनिवास और पद्मावती का कल्याण (विवाह) महोत्सव!!!!!!!
वैशाख शुक्ल दशमी शुक्रवार को श्रीनिवास और पद्मावती के कल्याण महोत्सव के लिए आदिशेष, गरुत्मान (गरुड़), ब्रह्मा, शंकर नारद, कुबेर आदि सभी देवता आ गए । श्रीनिवास ने नारदजी से कहा—‘लक्ष्मी मुझे छोड़कर चली गई हैं इसलिए मैं बड़ी निर्धन अवस्था हूँ । आप कृपा करके कोई ऐसा उपाय सोचिए जिससे मैं अपने विवाह के लिए धन जुटा सकूँ ।’
जब सभी देवताओं की सभा बैठी थी, तब नारदजी ने कुबेर से कहा—‘आप श्रीनिवास और पद्मावती के विवाह के लिए पर्याप्त धन देकर सहायता कीजिए । स्वामी उस धन को सूद के साथ चुका देंगे ।’ कुबेर ने तुरंत नारदजी की बात मान ली ।
भगवान श्रीनिवास ने एक पत्र लिखा कि मैंने कुबेर से अपने विवाह खर्च के लिए एक करोड़ चौदह लाख निष्क लिए हैं जिन्हें मैं सूद सहित लौटा दूंगा ।’ ब्रह्मा, शंकर और अश्वत्थ ने उस पत्र पर साक्षी के रूप में हस्ताक्षर किए ।
शुभ मुहुर्त में विवाह की समस्त विधियां सम्पन्न हुईं । देवताओं ने नव-दंपति पर पुष्प वर्षा की और महामुनियों ने आशीर्वाद दिया ।
विदा के समय श्रीनिवास ने आकाशराज से कहा—‘आपने मुझे सदा के लिए अपना आभारी बनाया है, अत: कोई वर मांग लीजिए ।’ आकाशराज ने कहा—‘मुझे यह वर दीजिए कि मैं कभी भी आपके नाम-स्मरण को न भूलूँ ।’ भगवान श्रीनिवास ने कहा—‘मैं आपको सायुज्य मोक्ष प्रदान करता हूँ ।’
सबसे विदा लेकर भगवान श्रीनिवास और पद्मावतीजी अगस्त्य मुनि के आश्रम में आए । विवाह के बाद नव-दम्पत्ति को छ: मास तक पर्वत पर नहीं चढ़ना चाहिए; इसलिए भगवान श्रीनिवास और पद्मावतीजी छ: मास तक अगस्त्याश्रम में रहे । सभी देवता अपने-अपने लोक को चले गए ।
आकाशराज की मृत्यु के बाद एक दिन तोंडमान अगस्त्याश्रम आए और श्रीनिवास से कोई सेवा बताने के लिए कहा । श्रीनिवास ने कहा—‘शेषाद्रि पर वराहस्वामी ने जो स्थान मुझे दिया है वहां मेरे लिए ऐसे मंदिर का निर्माण कराओ जिसमें लक्ष्मी और पद्मावती के रहने की योग्यता हो । इसमें गोपुर, शिखर, सिंहद्वार, ध्वजा मण्डप, धान्यशालाएं, पाकशालाएं, गोशाला व फूलो की बावली बनवाओ ।’
भगवान की आज्ञा मानकर तोंडमान ने शेषाद्रि को ‘दूसरा वैकुण्ठ’ बना दिया । शुभ मुहुर्त में श्रीनिवास और पद्मावतीजी ने ‘आनन्द निलय’ में प्रवेश किया । उस समय ब्रह्माजी ने कहा—‘स्वामी ! लोक कल्याण के लिए आप वर दीजिए कि जो भक्त आपके निवास शेषाद्रि पर आएं, उनके पाप दूर हो जाएं । मैं आपकी संनिधि में दो अखण्ड ज्योतियां जलाऊंगा । ये ज्योतियां लोक-कल्याण के लिए सदा आपकी संनिधि में जलती रहेंगी। आप कलियुग के अंत तक इसी वेंकटाचल पर निवास कीजिए और अपने भक्तों को दर्शन देते रहिएगा । अब मैं जो ब्रह्मोत्सव करुंगा उसे स्वीकार कीजिएगा ।’
भगवान श्रीनिवास ने ब्रह्माजी की बात स्वीकार कर ली । उस दिन से उस स्थान का नाम वेंकटाचलम् हो गया ।
लक्ष्मीजी और भगवान विष्णु में कलह का कारण नारदजी ही थे । अब नारदजी लक्ष्मीजी के पास कोल्हापुर पहुंचे और कहा—‘क्यों आप आनन्दधाम वैकुण्ठ को छोड़ कर इन जंगलों में निद्रा और आहार के बिना धूप-जाड़ा सहते हुए कब तक तपस्या करती रहेंगी ?’ नारदजी ने उन्हें भगवान श्रीनिवास और देवी पद्मावती के विवाह की बात बताई । यह सुनते ही लक्ष्मीजी को मानो काठ मार गया । वे नारदजी सहित वेंकटाचलम् पहुंची ।
भगवान श्रीनिवास ने अचानक लक्ष्मीजी को देखा तो समझ नहीं पाए कि यह स्वप्न है या सत्य । पद्मावतीजी को भी समझ नहीं आया कि यह स्त्री कौन है ?
दोनों सौतों में झगड़ा होने लगा । भगवान श्रीनिवास की दशा जाल में फंसे पक्षी के समान थी, न इधर चैन, न उधर चैन । थोड़ी देर में दिव्यज्ञान से लक्ष्मीजी को सारी बात समझ आ गई और उन्होंने कहा—‘अब हम सगी बहनों की तरह रहेगी ।’
भगवान श्रीनिवास ने लक्ष्मीजी को कुबेर से लिए कर्ज की बात बताई और कहा—‘कलियुग में तुम मेरे भक्तों को धन-सम्पत्ति प्रदान करती रहो जिससे वे अनेक पाप करके विपत्तियों में फंस जाएंगे । फिर मैं उन्हें स्वप्न में उपाय बताऊंगा जिससे वे मेरी मनौती करके भेंट चढ़ाएंगे । वह धन मैं कुबेर को सूद के रूप में दे दूंगा । यह तुमको कलियुग के अंत तक करना पड़ेगा । फिर हम वैकुण्ठ जाकर सुख से रह सकते हैं । तब तक तुम पद्म सरोवर में स्थित रह कर भक्तों की रक्षा करती रहो । किन्तु तुम अपने एक स्वरूप से मेरे बांये वक्ष:स्थल में रहो । पद्मावती को दक्षिण वक्ष पर रहने दो ।’
भगवान ने लक्ष्मीजी व पद्मावतीजी को अपने आलिंगन में लेकर अपने दांये और बायें वक्ष:स्थल में रख लिया । भगवान श्रीहरि जगत के कल्याण के लिए भूलोक आए थे केवल दो स्त्रियों की रक्षा के लिए नहीं; इसलिए वे सात कदम पीछे चले । तभी एक भयंकर ध्वनि हुई और वे शिलाविग्रह में परिवर्तित हो गए । तभी आकाशवाणी हुई—‘अब से मैं कलियुग के अंत तक वेंकटेश्वर स्वामी के नाम से इसी रूप में रहूंगा । अपने भक्तजनों की मनोकामना पूरी करना ही मेरा व्रत है ।’
स्कन्दपुराण के अनुसार—‘उन वेंकटाचल निवासी भगवान श्रीहरि का दो घड़ी भी चिन्तन करने वाला मनुष्य अपनी इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार करके विष्णुलोक में सम्मानित होता है।’
ॐ नमो नारायणाय💐
धर्म ग्रंथों के ज्ञान का सार :........
1.ईश्वर के बारे में :
ब्रह्म (परमात्मा) एक ही है जिसे कुछ लोग सगुण (साकार) कुछ लोग निर्गुण (निराकार) कहते हैं। हालांकि वह अजन्मा, अप्रकट है। उसका न कोई पिता है और न ही कोई उसका पुत्र है। वह किसी के भाग्य या कर्म को नियंत्रित नहीं करता। ना कि वह किसी को दंड या पुरस्कार देता है। उसका न तो कोई प्रारंभ है और ना ही अंत। वह अनादि और अनंत है। उसकी उपस्थिति से ही संपूर्ण ब्रह्मांड चलायमान है। सभी कुछ उसी से उत्पन्न होकर अंत में उसी में लीन हो जाता है। ब्रह्मलीन।
2.ब्रह्मांड के बारे में :
यह दिखाई देने वाला जगत फैलता जा रहा है और दूसरी ओर से यह सिकुड़ता भी जा रहा है। लाखों सूर्य, तारे और धरतीयों का जन्म है तो उसका अंत भी। जो जन्मा है वह मरेगा। सभी कुछ उसी ब्रह्म से जन्में और उसी में लीन हो जाने वाले हैं। यह ब्रह्मांड परिवर्तनशील है। इस जगत का संचालन उसी की शक्ति से स्वत: ही होता है। जैसे कि सूर्य के आकर्षण से ही धरती अपनी धूरी पर टिकी हुई होकर चलायमान है। उसी तरह लाखों सूर्य और तारे एक महासूर्य के आकर्षण से टिके होकर संचालित हो रहे हैं। उसी तरह लाखों महासूर्य उस एक ब्रह्मा की शक्ति से ही जगत में विद्यमान है।
3.आत्मा के बारे में :
आत्मा का स्वरूप ब्रह्म (परमात्मा) के समान है। जैसे सूर्य और दीपक में जो फर्क है उसी तरह आत्मा और परमात्मा में फर्क है। आत्मा के शरीर में होने के कारण ही यह शरीर संचालित हो रहा है। ठीक उसी तरह जिस तरह कि संपूर्ण धरती, सूर्य, ग्रह नक्षत्र और तारे भी उस एक परमपिता की उपस्थिति से ही संचालित हो रहे हैं।
आत्मा का ना जन्म होता है और ना ही उसकी कोई मृत्यु है। आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर धारण करती है। यह आत्मा अजर और अमर है। आत्मा को प्रकृति द्वारा तीन शरीर मिलते हैं एक वह जो स्थूल आंखों से दिखाई देता है। दूसरा वह जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं जो कि ध्यानी को ही दिखाई देता है और तीसरा वह शरीर जिसे कारण शरीर कहते हैं उसे देखना अत्यंत ही मुश्लिल है। बस उसे वही आत्मा महसूस करती है जो कि उसमें रहती है। आप और हम दोनों ही आत्मा है हमारे नाम और शरीर अलग अलग हैं लेकिन भीतरी स्वरूप एक ही है।
4.स्वर्ग और नरक के बारे में :
वेदों के अनुसार पुराणों के स्वर्ग या नर्क को गतियों से समझा जा सकता है। स्वर्ग और नर्क दो गतियां हैं। आत्मा जब देह छोड़ती है तो मूलत: दो तरह की गतियां होती है:- 1.अगति और 2. गति।
1.अगति: अगति में व्यक्ति को मोक्ष नहीं मिलता है उसे फिर से जन्म लेना पड़ता है।
2.गति :गति में जीव को किसी लोक में जाना पड़ता है या वह अपने कर्मों से मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
अगति के चार प्रकार है-
1.क्षिणोदर्क, 2.भूमोदर्क, 3. अगति और 4.दुर्गति।
क्षिणोदर्क : क्षिणोदर्क अगति में जीव पुन: पुण्यात्मा के रूप में मृत्यु लोक में आता है और संतों सा जीवन जीता है।
भूमोदर्क :भूमोदर्क में वह सुखी और ऐश्वर्यशाली जीवन पाता है।
अगति :अगति में नीच या पशु जीवन में चला जाता है।
दुर्गति :दुर्गति में वह कीट, कीड़ों जैसा जीवन पाता है।
गति के भी 4 प्रकार :-
गति के अंतर्गत चार लोक दिए गए हैं:- 1.ब्रह्मलोक, 2.देवलोक, 3.पितृलोक और 4.नर्कलोक। जीव अपने कर्मों के अनुसार उक्त लोकों में जाता है।
तीन मार्गों से यात्रा :
जब भी कोई मनुष्य मरता है या आत्मा शरीर को त्यागकर यात्रा प्रारंभ करती है तो इस दौरान उसे तीन प्रकार के मार्ग मिलते हैं। ऐसा कहते हैं कि उस आत्मा को किस मार्ग पर चलाया जाएगा यह केवल उसके कर्मों पर निर्भर करता है। ये तीन मार्ग हैं- अर्चि मार्ग, धूम मार्ग और उत्पत्ति-विनाश मार्ग। अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक और देवलोक की यात्रा के लिए होता है, वहीं धूममार्ग पितृलोक की यात्रा पर ले जाता है और उत्पत्ति-विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है।
5.धर्म और मोक्ष के बारे में :
धर्मग्रंथों के अनुसार धर्म का अर्थ है यम और नियम को समझकर उसका पालन करना। नियम ही धर्म है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से मोक्ष ही अंतिम लक्ष्य होता है। हिंदु धर्म के अनुसार व्यक्ति को मोक्ष के बारे में विचार करना चाहिए। मोक्ष क्या है? स्थितप्रज्ञ आत्मा को मोक्ष मिलता है। मोक्ष का भावर्थ यह कि आत्मा शरीर नहीं है इस सत्य को पूर्णत: अनुभव करके ही अशरीरी होकर स्वयं के अस्तित्व को पूख्ता करना ही मोक्ष की प्रथम सीढ़ी है।
6.व्रत और त्योहार के बारे में :
हिन्दु धर्म के सभी व्रत, त्योहार या तीर्थ सिर्फ मोक्ष की प्राप्त हेतु ही निर्मित हुए हैं। मोक्ष तब मिलेगा जब व्यक्ति स्वस्थ रहकर प्रसन्नचित्त और खुशहाल जीवन जीएगा। व्रत से शरीर और मन स्वस्थ होता है। त्योहार से मन प्रसन्न होता है और तीर्थ से मन और मस्तिष्क में वैराग्य और आध्यात्म का जन्म होता है।
मौसम और ग्रह नक्षत्रों की गतियों को ध्यान में रखकर बनाए गए व्रत और त्योहार का महत्व अधिक है। व्रतों में चतुर्थी, एकादशी, प्रदोष, अमावस्या, पूर्णिमा, श्रावण मास और कार्तिक मास के दिन व्रत रखना श्रेष्ठ है। यदि उपरोक्त सभी नहीं रख सकते हैं तो श्रावण के पूरे महीने व्रत रखें। त्योहारों में मकर संक्रांति, महाशिवरात्रि, नवरात्रि, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी और हनुमान जन्मोत्सव ही मनाएं। पर्व में श्राद्ध और कुंभ का पर्व जरूर मनाएं।
व्रत करने से काया निरोगी और जीवन में शांति मिलती है। सूर्य की 12 और 12 चंद्र की संक्रांति होती है। सूर्य संक्रांतियों में उत्सव का अधिक महत्व है तो चंद्र संक्रांति में व्रतों का अधिक महत्व है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, अषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, अगहन, पौष, माघ और फाल्गुन। इसमें से श्रावण मास को व्रतों में सबसे श्रेष्ठ मास माना गया है। इसके अलावा प्रत्येक माह की एकादशी, चतुर्दशी, चतुर्थी, पूर्णिमा, अमावस्या और अधिमास में व्रतों का अलग-अलग महत्व है। सौरमास और चंद्रमास के बीच बढ़े हुए दिनों को मलमास या अधिमास कहते हैं। साधुजन चतुर्मास अर्थात चार महीने श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक माह में व्रत रखते हैं।
उत्सव, पर्व और त्योहार सभी का अलग-अलग अर्थ और महत्व है। प्रत्येक ऋतु में एक उत्सव है। उन त्योहार, पर्व या उत्सव को मनाने का महत्व अधिक है जिनकी उत्पत्ति स्थानीय परम्परा या संस्कृति से न होकर जिनका उल्लेख वैदिक धर्मग्रंथ, धर्मसूत्र, स्मृति, पुराण और आचार संहिता में मिलता है। चंद्र और सूर्य की संक्रांतियों अनुसार कुछ त्योहार मनाएं जाते हैं। 12 सूर्य संक्रांति होती हैं जिसमें चार प्रमुख है:- मकर, मेष, तुला और कर्क। इन चार में मकर संक्रांति महत्वपूर्ण है। सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ, संक्रांति और कुंभ। पर्वों में रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, गुरुपूर्णिमा, वसंत पंचमी, हनुमान जयंती, नवरात्री, शिवरात्री, होली, ओणम, दीपावली, गणेशचतुर्थी और रक्षाबंधन प्रमुख हैं। हालांकि सभी में मकर संक्रांति और कुंभ को सर्वोच्च माना गया है।
7.तीर्थ के बारे में :
तीर्थ और तीर्थयात्रा का बहुत पुण्य है। जो मनमाने तीर्थ और तीर्थ पर जाने के समय हैं उनकी यात्रा का सनातन धर्म से कोई संबंध नहीं। तीर्थों में चार धाम, ज्योतिर्लिंग, अमरनाथ, शक्तिपीठ और सप्तपुरी की यात्रा का ही महत्व है। अयोध्या, मथुरा, काशी और प्रयाग को तीर्थों का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जबकि कैलाश मानसरोवर को सर्वोच्च तीर्थ माना है। बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम और जगन्नाथ पुरी ये चार धान है। सोमनाथ, द्वारका, महाकालेश्वर, श्रीशैल, भीमाशंकर, ॐकारेश्वर, केदारनाथ विश्वनाथ, त्र्यंबकेश्वर, रामेश्वरम, घृष्णेश्वर और बैद्यनाथ ये द्वादश ज्योतिर्लिंग है। काशी, मथुरा, अयोध्या, द्वारका, माया, कांची और अवंति उज्जैन ये सप्तपुरी। उपरोक्त कहे गए तीर्थ की यात्रा ही धर्मसम्मत है।
8.संस्कार के बारे में :
संस्कारों के प्रमुख प्रकार सोलह बताए गए हैं जिनका पालन करना हर हिंदू का कर्तव्य है। इन संस्कारों के नाम है-गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुंडन, कर्णवेधन, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, सम्वर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। प्रत्येक हिन्दू को उक्त संस्कार को अच्छे से नियमपूर्वक करना चाहिए। यह मनुष्य के सभ्य और हिन्दू होने
की निशानी है। उक्त संस्कारों को वैदिक नियमों के द्वारा ही संपन्न किया जाना चाहिए।
9.पाठ करने के बारे में :
वेदो, उपनिषद या गीता का पाठ करना या सुनना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है। उपनिषद और गीता का स्वयंम अध्ययन करना और उसकी बातों की किसी जिज्ञासु के समक्ष चर्चा करना पुण्य का कार्य है, लेकिन किसी बहसकर्ता या भ्रमित व्यक्ति के समक्ष वेद वचनों को कहना निषेध माना जाता है। प्रतिदिन धर्म ग्रंथों का कुछ पाठ करने से देव शक्तियों की कृपा मिलती है। हिन्दू धर्म में वेद, उपनिषद और गीता के पाठ करने की परंपरा प्राचीनकाल से रही है। वक्त बदला तो लोगों ने पुराणों में उल्लेखित कथा की परंपरा शुरू कर दी, जबकि वेदपाठ और गीता पाठ का अधिक महत्व है।
10.धर्म, कर्म और सेवा के बारे में :
धर्म-कर्म और सेवा का अर्थ यह कि हम ऐसा कार्य करें जिससे हमारे मन और मस्तिष्क को शांति मिले और हम मोक्ष का द्वार खोल पाएं। साथ ही जिससे हमारे सामाजिक और राष्ट्रिय हित भी साधे जाते हों। अर्थात ऐसा कार्य जिससे परिवार, समाज, राष्ट्र और स्वयं को लाभ मिले। धर्म-कर्म को कई तरीके से साधा जा सकता है, जैसे- 1.व्रत, 2.सेवा, 3.दान, 4.यज्ञ, 5.प्रायश्चित, दीक्षा देना और मंदिर जाना आदि।
सेव का मतलब यह कि सर्व प्रथम माता-पिता, फिर बहन-बेटी, फिर भाई-बांधु की किसी भी प्रकार से सहायता करना ही धार्मिक सेवा है। इसके बाद अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना पुण्य का कार्य माना गया है। इसके अलवा सभी प्राणियों, पक्षियों, गाय, कुत्ते, कौए, चींटी आति को अन्न जल देना। यह सभी यज्ञ कर्म में आते हैं।
11.दान के बारे में :
दान से इंद्रिय भोगों के प्रति आसक्ति छूटती है। मन की ग्रथियां खुलती है जिससे मृत्युकाल में लाभ मिलता है। देव आराधना का दान सबसे सरल और उत्तम उपाय है। वेदों में तीन प्रकार के दाता कहे गए हैं- 1.उक्तम, 2.मध्यम और 3.निकृष्ट। धर्म की उन्नति रूप सत्यविद्या के लिए जो देता है वह उत्तम। कीर्ति या स्वार्थ के लिए जो देता है तो वह मध्यम और जो वेश्यागमनादि, भांड, भाटे, पंडे को देता वह निकृष्ट माना गया है। पुराणों में अन्नदान, वस्त्रदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान को ही श्रेष्ठ माना गया है, यही पुण्य भी है।
12.यज्ञ के बारे में :
यज्ञ के प्रमुख पांच प्रकार हैं- ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ और अतिथि यज्ञ। यज्ञ पालन से ऋषि ऋण, देव ऋण, पितृ ऋण, धर्म ऋण, प्रकृति ऋण और मातृ ऋण समाप्त होता है। नित्य संध्या वंदन, स्वाध्याय तथा वेदपाठ करने से ब्रह्म यज्ञ संपन्न होता है। देवयज्ञ सत्संग तथा अग्निहोत्र कर्म से सम्पन्न होता है। अग्नि जलाकर होम करना अग्निहोत्र यज्ञ है। पितृयज्ञ को श्राद्धकर्म भी कहा गया है। यह यज्ञ पिंडदान, तर्पण और सन्तानोत्पत्ति से सम्पन्न होता है। वैश्वदेव यज्ञ को भूत यज्ञ भी कहते हैं। सभी प्राणियों तथा वृक्षों के प्रति करुणा और कर्त्तव्य समझना उन्हें अन्न-जल देना ही भूत यज्ञ कहलाता है। अतितिथ यज्ञ से अर्थ मेहमानों की सेवा करना। अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना ही अतिथि यज्ञ है। इसके अलावा अग्निहोत्र, अश्वमेध, वाजपेय, सोमयज्ञ, राजसूय और अग्निचयन का वर्णण यजुर्वेद में मिलता है।
13.मंदिर जाने के बारे में :
प्रति गुरुवार को मंदिर जाना चाहिए: घर में मंदिर नहीं होना चाहिए। पूजास्थल हो सकता है। प्रति गुरुवार को मंदिर जाना चाहिए। मंदिर में जाकर परिक्रमा करना चाहिए। भारत में मंदिरों, तीर्थों और यज्ञादि की परिक्रमा का प्रचलन प्राचीनकाल से ही रहा है। मंदिर की 7 बार (सप्तपदी) परिक्रमा करना बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह 7 परिक्रमा विवाह के समय अग्नि के समक्ष भी की जाती है। इसी प्रदक्षिण को इस्लाम धर्म ने परंपरा से अपनाया जिसे तवाफ कहते हैं। प्रदक्षिणा षोडशोपचार पूजा का एक अंग है। प्रदक्षिणा की प्रथा अतिप्राचीन है। हिन्दू सहित जैन, बौद्ध और सिख धर्म में भी परिक्रमा का महत्व है। इस्लाम में मक्का स्थित काबा की 7 परिक्रमा का प्रचलन है। पूजा-पाठ, तीर्थ परिक्रमा, यज्ञादि पवित्र कर्म के दौरान बिना सिले सफेद या पीत वस्त्र पहनने की परंपरा भी प्राचीनकाल से हिन्दुओं में प्रचलित रही है। मंदिर जाने या संध्यावंदन के पूर्व आचमन या शुद्धि करना जरूरी है। इसे इस्लाम में वुजू कहा जाता है।
14.संध्यावंदनके बारे में :
संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। मंदिर में जाकर संधि काल में ही संध्या वंदन की जाती है। वैसे संधि आठ वक्त की मानी गई है। उसमें भी पांच महत्वपूर्ण है। पांच में से भी सूर्य उदय और अस्त अर्थात दो वक्त की संधि महत्वपूर्ण है। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना की जाती है।
संध्योपासना के चार प्रकार है-
1.प्रार्थना, 2.ध्यान,
3.कीर्तन और 4.पूजा-आरती।
व्यक्ति की जिस में जैसी श्रद्धा है वह वैसा करता है।
15..धर्म की सेवा के बारे में :
धर्म की प्रशंसा करना और धर्म के बारे में सही जानकारी को लोगों तक पहुंचाना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य होता है। धर्म प्रचार में वेद, उपनिषद और गीता के ज्ञान का प्रचार करना ही उत्तम माना गया है। धर्म प्रचारकों के कुछ प्रकार हैं। हिन्दू धर्म को पढ़ना और समझना जरूरी है। हिन्दू धर्म को समझकर ही उसका प्रचार और प्रसार करना जरूरी है। धर्म का सही ज्ञान होगा, तभी उस ज्ञान को दूसरे को बताना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को धर्म प्रचारक होना जरूरी है। इसके लिए भगवा वस्त्र धारण करने या संन्यासी होने की जरूरत नहीं। स्वयं के धर्म की तारीफ करना और बुराइयों को नहीं सुनना ही धर्म की सच्ची सेवा है।
16.मंत्र के बारे में :
वेदों में बहुत सारे मंत्रों ल्लेख मिलता है, लेकिन जपने के लिए सिर्फ प्रणव और गायत्री मंत्र ही कहा गया है बाकी मंत्र किसी विशेष अनुष्ठान और धार्मिक कार्यों के लिए है। वेदों में गायत्री नाम से छंद है जिसमें हजारों मंत्र है किंतु प्रथम मंत्र को ही गायत्री मंत्र माना जाता है। उक्त मंत्र के अलावा किसी अन्य मंत्र का जाप करते रहने से समय और ऊर्जा की बर्बादी है। गायत्री मंत्र की महिमा सर्वविदित है। दूसरा मंत्र है महामृत्युंजय मंत्र, लेकिन उक्त मंत्र के जप और नियम कठिन है इसे किसी जानकार से पूछकर ही जपना चाहिए।
17.प्रायश्चित के बार में :-प्राचीनकाल से ही हिन्दु्ओं में मंदिर में जाकर अपने पापों के लिए प्रायश्चित करने की परंपरा रही है। प्रायश्चित करने के महत्व को स्मृति और पुराणों में विस्तार से समझाया गया है। गुरु और शिष्य परंपरा में गुरु अपने शिष्य को प्रायश्चित करने के अलग-अलग तरीके बताते हैं। दुष्कर्म के लिए प्रायश्चित करना , तपस्या का एक दूसरा रूप है। यह मंदिर में देवता के समक्ष 108 बार साष्टांग प्रणाम , मंदिर के इर्दगिर्द चलते हुए साष्टांग प्रणाम और कावडी अर्थात वह तपस्या जो भगवान मुरुगन को अर्पित की जाती है, जैसे कृत्यों के माध्यम से की जाती है। मूलत: अपने पापों की क्षमा भगवान शिव और वरूणदेव से मांगी जाती है, क्योंकि क्षमा का अधिकार उनको ही है।
18.दीक्षा देने के बारे में :
दीक्षा देने का प्रचलन वैदिक ऋषियों ने प्रारंभ किया था। प्राचीनकाल में पहले शिष्य और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। माता-पिता अपने बच्चों को जब शिक्षा के लिए भेजते थे तब भी दीक्षा दी जाती थी। हिन्दू धर्मानुसार दिशाहीन जीवन को दिशा देना ही दीक्षा है। दीक्षा एक शपथ, एक अनुबंध और एक संकल्प है। दीक्षा के बाद व्यक्ति द्विज बन जाता है। द्विज का अर्थ दूसरा जन्म। दूसरा व्यक्तित्व। सिख धर्म में इसे अमृत संचार कहते हैं।
यह दीक्षा देने की परंपरा जैन धर्म में भी प्राचीनकाल से रही है, हालांकि दूसरे धर्मों में दीक्षा को अपने धर्म में धर्मांतरित करने के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। धर्म से इस परंपरा को ईसाई धर्म ने अपनाया जिसे वे बपस्तिमा कहते हैं। अलग-अलग धर्मों में दीक्षा देने के भिन्न-भिन्न तरीके हैं।
#🕉️सनातन धर्म🚩
“जहाँ गणेश जी का वास होता है,
वहाँ हर कार्य सरल और सफल होता है।”
भगवान गणेश अन्नदाता के रूप में विराजमान हैं। वे हरे-भरे खेतों के बीच बैठे हैं, जो खेती, समृद्धि और प्रकृति से जुड़ाव को दर्शाता है।
गणेश जी के शरीर और आसन में फल, अनाज, सब्ज़ियाँ और पत्तियाँ दिखाई दे रही हैं, जो यह संकेत देता है कि अन्न ही जीवन है और भगवान स्वयं अन्न का रूप हैं।
उनके चारों ओर गाँव के किसान, महिलाएँ और बच्चे हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे हैं, जिससे ग्रामीण संस्कृति, आस्था और कृतज्ञता झलकती है।
गणेश जी के एक हाथ में आशीर्वाद मुद्रा, दूसरे में मोडक/अन्न, और अन्य हाथों में अस्त्र व पाश हैं — जो रक्षा, संतुलन और शुभता का प्रतीक हैं।
नीचे उनका वाहन मूषक भी दिख रहा है, जो विनम्रता और जागरूकता का प्रतीक है।
पूरा वातावरण शांत, पवित्र और सुनहरी रोशनी से भरा हुआ है, जैसे सुबह का समय हो — जो नई शुरुआत का संकेत देता है।
#जय श्री गणेश
#❤️जीवन की सीख
यह दुनिया अगर नरक है तो केवल उनके लिए जो नारायण को भूले हुए हैं। यह दुनिया स्वर्ग अवश्य है मगर वो भी केवल उनके लिए जिनका प्रभु से प्रेम रुपी सम्बन्ध बन चुका है। जिसे प्रभु की सत्ता पर जितना कम विश्वास होगा वह उतना ही दुखी होगा।
हमारा सुख इस बात पर निर्भर नही करता कि हमारे पास कितनी सम्पत्ति है अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे पास कितनी सन्मति है। स्वर्ग का अर्थ वह स्थान नही जहाँ सब सुख हों अपितु वह स्थान है जहाँ सभी खुश रहते हों।
भक्ति हमें सम्पत्ति तो नहीं देती पर प्रसन्नता जरुर देती है। प्रसन्नता से बढकर कोई स्वर्ग नही और निराशा से बढकर दूसरा कोई नरक भी तो नही है।
जय श्री राधे 👏🏻👏🏻.













