#कर्मफल तो #भोगना पड़ेगा
⚖️ जब प्रभु श्रीराम के दरबार में कुत्ते ने माँगा अनोखा न्याय! 🐕
...और ब्राह्मण के लिए 'सजा' के रूप में माँगी 'मठाधीश' की गद्दी! 😲
बाल्मीकि रामायण में कर्मफल के सिद्धांत को दर्शाती एक अत्यंत आश्चर्यजनक कथा का वर्णन है।
एक बार भगवान श्रीराम के दरबार में न्याय की गुहार लेकर एक कुत्ता पहुँचा। लक्ष्मण जी के पूछने पर उसने कहा, "मुझे प्रभु श्रीराम से न्याय चाहिए।"
क्या था मामला?
भगवान श्रीराम के समक्ष कुत्ते ने अपनी व्यथा सुनाई: "प्रभु! मैं खेत की मेड़ के किनारे चुपचाप लेटा था। तभी वहाँ से गुजर रहे एक ब्राह्मण ने मुझ पर अनावश्यक डंडे से प्रहार किया और मुझे चोटिल कर दिया। मेरा कोई अपराध नहीं था, फिर भी मुझे पीटा गया। मुझे न्याय चाहिए।"
ब्राह्मण का तर्क:
श्रीराम ने उस ब्राह्मण को दरबार में बुलवाया। ब्राह्मण ने सफाई दी, "प्रभु, मैं स्नान के लिए नदी जा रहा था। मुझे लगा कि यह कुत्ता कहीं मेरे वस्त्र छूकर मुझे अपवित्र न कर दे, इसलिए इसे दूर भगाने के लिए मैंने डंडा मारा।"
दण्ड का निर्णय:
भगवान ने कुत्ते से ही पूछा, "तुम ही बताओ, इन्हें क्या दण्ड दिया जाए?"
कुत्ते ने पहले तो प्रभु पर ही निर्णय छोड़ा, किन्तु जब श्रीराम ने आग्रह किया, तो कुत्ते ने जो कहा उसे सुनकर पूरा राजदरबार सन्न रह गया।
कुत्ते ने कहा: "प्रभु, इन ब्राह्मण देव को कालिंजर मठ का मठाधीश बना दिया जाए।" 🏰💰
दरबारियों का आश्चर्य:
सभी अवाक् थे! कालिंजर का मठ असीम वैभव, ऐश्वर्य और अकूत धन-सम्पदा के लिए प्रसिद्ध था। उसका मठाधीश बनना तो बहुत बड़े गर्व और सम्मान की बात थी। यह सजा थी या पुरस्कार?
भगवान राम ने भी पूछा, "यह तुम दण्ड दे रहे हो या इनका उपहास कर रहे हो?"
कुत्ते का रहस्योद्घाटन (चौंकाने वाला सत्य): 😥
तब कुत्ते ने अपनी दर्दभरी कहानी सुनाई:
"नहीं प्रभु, मैं दण्ड ही दे रहा हूँ। पिछले जन्म में, मैं ही उस कालिंजर मठ का मठाधीश था।"
"उस मठ के अपार ऐश्वर्य, समृद्धि और धन ने मेरी बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी। सत्य और तप के मार्ग से हटकर मैं भोग-विलास और गलत कर्मों में लिप्त हो गया। मुझे लगा वही जीवन का असली आनंद है। मेरा सारा तप-तेज नष्ट हो गया। मेरे कर्म इतने दूषित हो गए कि मृत्यु के पश्चात मुझे दोबारा मनुष्य जन्म भी नहीं मिला और मुझे यह कुत्ते की योनि प्राप्त हुई।"
कुत्ते ने अंतिम बात कही: "प्रभु, मैं जानता हूँ कि ये ब्राह्मण भी मठाधीश बनते ही उस ऐश्वर्य में खो जायेंगे। इनका तप भी क्षीण हो जाएगा और निश्चित रूप से इनकी अगली गति भी मेरी तरह ही होगी।"
🔥 जीवन की सीख 🔥
यह प्रसंग सिखाता है कि कर्मों का फल हर किसी को भोगना ही पड़ता है। पद, प्रतिष्ठा और धन का अहंकार अक्सर मनुष्य के आध्यात्मिक पतन का कारण बनता है। सच्चा सुख ऐश्वर्य में नहीं, बल्कि सत्कर्मों और तप में है।
कर्म की गति गहन है!
🙏 जय सिया राम 🙏
#महाभारत
🔥 महाभारत प्रसंग: जब भीमसेन ने किया बकासुर का अंत! 🔥
लाक्षागृह से बचने के बाद, पांडव एकचक्रा नगरी में एक ब्राह्मण के घर भिक्षा मांगकर अज्ञातवास काट रहे थे। लेकिन उस नगरी पर एक काला साया था...
👹 बकासुर का आतंक:
नगर के बाहर बक नाम का एक क्रूर दैत्य रहता था। उसकी शर्त थी कि प्रतिदिन नगर से एक व्यक्ति उसके लिए भोजन लेकर जाएगा, और वह भोजन के साथ उस व्यक्ति को भी खा जाता था।
🙏 माता कुंती का त्याग:
एक दिन उस ब्राह्मण परिवार की बारी आई जहाँ पांडव रुके थे। घर में विलाप सुनकर माता कुंती ने कहा, "आपने हमें आश्रय दिया है, आपके संकट को दूर करना हमारा कर्तव्य है। आपकी जगह मेरा पुत्र जाएगा।" ब्राह्मणी के मना करने पर कुंती ने आश्वस्त किया कि उनका पुत्र बहुत शक्तिशाली है।
💪 भीम का पराक्रम:
भीमसेन गाड़ी भर भोजन लेकर राक्षस के पास पहुंचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने दैत्य को बुलाने के बजाय, आराम से उसका भोजन खाना शुरू कर दिया!
अपने भोजन को कोई और खाता देख बकासुर क्रोध से पागल हो गया और भीम पर टूट पड़ा। भीम ने पहले डकार ली और फिर बोले, "तूने बहुतों का रक्त चूसा है, आज तुझे फल मिलेगा।"
⚔️ महायुद्ध और अंत:
महाबली भीम ने उस विशाल दैत्य को उठाकर हवा में घुमाया और वेग से जमीन पर पटक दिया। धरती पर गिरते ही बकासुर के प्राण पखेरू उड़ गए। भीम ने उसकी लाश को नगर द्वार पर लटका दिया।
सुबह जब नगरवासियों ने यह दृश्य देखा, तो एकचक्रा नगरी में आनंद की लहर दौड़ गई।
जय महाबली भीमसेन! 🙏
#🙏🌺जय यमुना मैया मथुरा🌺🙏
सूर्य पुत्री कालिंदी हीं यमुना देवी थीं। जब ब्रज में श्रीकृष्ण रास रचाते थे, तो यमुना यानी कालिंदी भी गोते खाती थी, और श्रीकृष्ण के माधुर्य में नृत्य किया करती थी।
जब श्रीकृष्ण को अक्रूर जी मथुरा ले गए, तब उनका विरह सहन नहीं कर पाने में एक गोपी, यमुना अर्थात कालिंदी भी थी।जो अपना बहाव मोड़कर वह द्वारावती चली गयी।
एक बार कृष्ण और अर्जुन जंगल में साथ जा रहे थे। अर्जुन शिकार खलते-खेलते थक गये थे। अब वे प्यास लगने पर यमुनाजी के किनारे गये । भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों ने यमुनाजी में हाथ-पैर धोकर उनका निर्मल जल पिया और देखा कि एक परम सुन्दरी कन्या वहाँ तपस्या कर रही है ।
कृष्ण ने अर्जुन से कहा- अर्जुन! जाओ, पता करो की ये तप करती देवी कौन हैं? और किसका ध्यान कर रही है?
अर्जुन उसके पास गये पूछे— ‘देवी! तुम कौन हो ? किसकी पुत्री हो ? कहाँ से आयी हो ? और क्या करना चाहती हो ?
उस सुंदर युवती ने कहा- मेरा नाम कालिंदी है। ‘मैं भगवान सूर्यदेव की पुत्री हूँ। मैं श्रेष्ठतम भगवान कृष्ण को पति के रूप में प्राप्त करना चाहती हूँ और इसीलिये यह कठोर तपस्या कर रही हूँ ।मैं भगवान के आलावा और किसी को अपना पति नहीं बना सकती। भगवान श्रीकृष्ण मुझ पर प्रसन्न हों । यमुना जल में मेरे पिता सूर्य ने मेरे लिये एक भवन भी बनवा दिया है। मैं उसी में रहती हूँ। जब तक भगवान का दर्शन नहीं होगा, मैं यहीं रहूँगी’ ।
अर्जुन ने जाकर भगवान श्रीकृष्ण से सारी बातें कहीं। वे तो पहले से ही यह सब कुछ जानते थे, अब उन्होंने कालिदी के पास जाकर कहा, “तुम ब्रज में थी! यहां कैसे?”
कालिंदी ने कहा, “यह विरह मुझसे सहा नहीं गया प्रभु। इसीलिए मैं यहां आईं हूँ। आप मुझे स्वीकार्य करें।”
श्री कृष्ण ने उसे अपने रथ पर बैठा लिया और धर्मराज युधिष्ठिर के पास ले आये।
कुछ दिनों के बाद भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन की अनुमति एवं अन्य सम्बन्धियों का अनुमोदन प्राप्त करके सात्यकि आदि के साथ द्वारका लौट आये।
वहाँ आकर उन्होंने विवाह के योग्य ऋतु और ज्यौतिष-शास्त्र के अनुसार प्रशंसित पवित्र लग्न में कालिन्दीजी का पाणिग्रहण किया। इससे उनके स्वजन-सम्बन्धियों को परम मंगल और परमानन्द की प्राप्ति हुई ।
कालिंदी कृष्ण की अष्ट मुख्य भार्याओं में छठी भार्या है।
जय प्रभु श्री कृष्ण! जय श्री हरि ॥
(((( प्यास जो बुझ न सकी ))))
. #जय श्री कृष्ण
श्रीकृष्ण स्वयं भी महाभारत रोक न सके। इस बात पर महामुनि उत्तंक को बड़ा क्रोध आ रहा था।
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दैवयोग से भगवान श्रीकृष्ण उसी दिन द्वारिका जाते हुए मुनि उत्तंक के आश्रम में आ पहुँचे।
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मुनि ने उन्हें देखते ही कटु शब्द कहना प्रारंभ किया.. आप इतने महाज्ञानी और सामर्थ्यवान होकर भी युद्ध नहीं रोक सके। आपको उसके लिये शाप दे दूँ तो क्या यह उचित न होगा?
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भगवान कृष्ण हंसे और बोले- महामुनि! किसी को ज्ञान दिया जाये, समझाया-बुझाया और रास्ता दिखाया जाये तो भी वह विपरीत आचरण करे, तो इसमें ज्ञान देने वाले का क्या दोष?
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यदि मैं स्वयं ही सब कुछ कर लेता, तो संसार के इतने सारे लोगों की क्या आवश्यकता थी?
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मुनि का क्रोध शाँत न हुआ। लगता था वे मानेंगे नहीं- शाप दे ही देंगे।
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तब भगवान कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाकर कहा-महामुनि! मैंने आज तक किसी का अहित नहीं किया। निष्पाप व्यक्ति चट्टान की तरह सुदृढ़ होता है। आप शाप देकर देख लें, मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा।
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हाँ, आपको किसी वरदान की आवश्यकता हो तो हमसे अवश्य माँग लें।
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उत्तंक ने कहा- तो फिर आप ऐसा करें कि इस मरुस्थल में भी जल-वृष्टि हो और यहाँ भी सर्वत्र हरा-भरा हो जाये। कृष्ण ने कहा ‘तथास्तु’ और वहाँ से आगे बढ़ गये।
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महामुनि उत्तंक एक दिन प्रातःकालीन भ्रमण में कुछ दूर तक निकल गये। दिन चढ़ते ही धूल भरी आँधी आ गई और मुनि मरुस्थल में भटक गये।
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जब मरुद्गणों का कोप शाँत हुआ, तब उत्तंक ने अपने आपको निर्जन मरुस्थल में पड़ा पाया। धूप तप रही थी, प्यास के मारे उत्तंक के प्राण निकलने लगे।
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तभी महामुनि उत्तंक ने देखा.. चमड़े के पात्र में जल लिये एक चाँडाल सामने खड़ा है और पानी पीने के लिए कह रहा है।
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उत्तंक उत्तेजित हो उठे और बिगड़ कर बोले, शूद्र! मेरे सामने से हट जा, नहीं तो अभी शाप देकर भस्म कर दूँगा। चाँडाल होकर तू मुझे पानी पिलाने आया है।
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उनके साथ-साथ कृष्ण पर भी क्रोध आ गया। मुझे उस दिन मूर्ख बनाकर चले गये। पर आज उत्तंक के क्रोध से बचना कठिन है।
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जैसे ही शाप देने के लिए उन्होंने मुख खोला कि सामने भगवान श्रीकृष्ण दिखाई दिये।
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कृष्ण ने पूछा- नाराज न हों महामुनि! आप तो कहा करते हैं कि आत्मा ही आत्मा है, आत्मा ही इन्द्र और आत्मा ही साक्षात परमात्मा है।
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फिर आप ही बताइये कि इस चाँडाल की आत्मा में क्या इन्द्र नहीं थे? यह इन्द्र ही थे, जो आपको अमृत पिलाने आये थे, पर आपने उसे ठुकरा दिया।
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बताइये, अब मैं आपकी कैसे सहायता कर सकता हूँ। यह कहकर भगवान कृष्ण भी वहाँ से अदृश्य हो गये और वह चाण्डाल भी।
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मुनि को बड़ा पश्चाताप हुआ। उन्होंने अनुभव किया कि जाति, कुल और योग्यता के अभिमान में डूबे हुए मेरे जैसे व्यक्ति ने शास्त्र-ज्ञान को व्यावहारिक नहीं बनाया..
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तो फिर यदि कौरवों-पाँडवों ने श्रीकृष्ण की बात को नहीं माना तो इसमें उनका क्या दोष?
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महापुरुष केवल मार्ग दर्शन कर सकते हैं। यदि कोई उस प्राप्त ज्ञान को आचरण में न लाये और यथार्थ लाभ से वंचित रहे, तो इसमें उनका क्या दोष?
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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#🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🕉️ क्या आप जानते हैं? आपकी हर सांस एक महामंत्र गा रही है! 🕉️
हम अक्सर ईश्वर को बाहर मंदिरों में खोजते हैं, लेकिन हमारे भीतर चौबीस घंटे एक 'अजपा-जप' चल रहा है— "सोऽहम्"।
✨ "सोऽहम्" का दिव्य अर्थ:
🔹 'सो' (So): वह (परमात्मा/ब्रह्म)
🔹 'हम्' (Hum): मैं (आत्मा)
जब हम सांस अंदर लेते हैं तो ध्वनि होती है 'सो', और जब सांस बाहर छोड़ते हैं तो ध्वनि होती है 'हम्'।
अर्थात्— "मैं वही हूँ" (I am That)।
यह मंत्र हमें हर पल याद दिलाता है कि हम और परमात्मा अलग नहीं हैं। हमारी आत्मा उसी परम ज्योति का एक अंश है। 🌟
🧘♂️ साधना का रहस्य:
जब आप ध्यान में 'सोऽहम्' की लय पर टिकते हैं, तो मन शांत हो जाता है और अहंकार मिटने लगता है। बस शेष रह जाता है—शुद्ध अस्तित्व।
अगली बार जब आप सांस लें, तो याद रखें—आप केवल हवा नहीं ले रहे, आप परमात्मा के साथ एक हो रहे हैं।
हर हर महादेव! 🙏
#☝आज का ज्ञान #महाभारत
व्यास-रचित मूल महाभारत के अनुसार कुरुक्षेत्र युद्ध केवल एक राजनीतिक या वंशगत युद्ध नहीं था, बल्कि धर्म, कर्म और मोक्ष की दिव्य योजना का भाग था। इसी कारण युद्ध में भाग लेने वाले सभी योद्धाओं की गति को सामान्य मृत्यु से ऊपर माना गया है।
1️⃣ कुरुक्षेत्र युद्ध और मोक्ष
महाभारत में स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि कुरुक्षेत्र धर्मक्षेत्र था।
यहाँ युद्ध करते हुए प्राण त्यागने वाले योद्धा—
व्यक्तिगत द्वेष से नहीं
बल्कि अपने स्वधर्म के पालन में
श्रीकृष्ण की उपस्थिति में
युद्धरत थे।
इसलिए उन्हें पापबंधन से मुक्ति और उच्च लोकों की प्राप्ति हुई। कई आचार्य इसे सद्यः मोक्ष या उत्तम लोकगति मानते हैं।
2️⃣ अर्जुन को “उत्तम गति” क्यों मिली?
अर्जुन की स्थिति अन्य योद्धाओं से अलग थी, क्योंकि—
वे स्वयं श्रीकृष्ण के सखा और शरणागत थे
उन्हें गीता का उपदेश प्रत्यक्ष मिला
उन्होंने युद्ध अहंकार से नहीं, बल्कि ईश्वर की आज्ञा से किया
इस कारण अर्जुन को केवल स्वर्ग ही नहीं, बल्कि ईश्वर-सान्निध्य प्राप्त हुआ — जिसे ग्रंथों में उत्तम गति कहा गया है।
3️⃣ युधिष्ठिर का स्वर्ग दर्शन
महाभारत के स्वर्गारोहण पर्व में वर्णन आता है कि जब
युधिष्ठिर स्वर्ग पहुँचे, तो उन्होंने देखा—
अर्जुन दिव्य रूप में
श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न हैं
वहाँ अर्जुन न तो योद्धा हैं, न राजा
बल्कि भक्त और सेवक हैं
#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान
यह देश सभी देशों में उत्तम है। बहुत पुण्य से प्राणी का जन्म भारतवर्ष में होता है। इस देश में जन्म पाकर जो अपने कल्याणvके लिये सत्कर्म करता है वही बुद्धिमान है। जिसने ऐसा नहीं किया, उसने अपने आत्मा के साथ वञ्चना की। जबतक यह शरीर स्वस्थ है, तबतक जो कुछ पुण्य बन सके, कर लेना चाहिये, बाद में कुछ भी नहीं हो सकता।
दिन-रात के बहाने नित्य आयु के ही अंश खण्डित हो रहे हैं। फिर भी मनुष्यों को बोध नहीं होता कि एक दिन मृत्यु आ पहुँचेगी और इन सभी सामग्रीयों को छोड़कर अकेले चला जाना पड़ेगा। फिर अपने हाथ से ही अपनी सम्पत्ति सत्पात्रों को क्यों नहीं बाँट देते? मनुष्य के लिये दान ही पाथेय अर्थात रास्ते के लिये भोजन है। जो दान करते हैं वे सुखपूर्वक जाते हैं। दान-हीन मार्ग में अनेक दुःख पाते हैं। भूखे मरते जाते हैं, इन सब यत्नों को विचार कर पुण्य कर्म ही करना चाहिये।
पुण्य कमाने से देवत्व प्राप्त होता है और पाप करने से नरक में वास होता है। जो सत्पुरुष सर्वात्मभाव से श्रीपरमात्म-प्रभु की शरण में जाते हैं, वे पद्मपत्र पर स्थित जल की तरह पापों से लिप्त नहीं होते, इसलिये द्वन्द से छूट कर भक्तिपूर्वक ईश्वर की आराधना करनी चाहिये तथा सभी प्रकार के पापों से निरन्तर बचना चाहिये।
- भविष्य पुराण
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
मृत्यु का रहस्य: जब सूक्ष्म शरीर देह से मुक्त होता है .........
साँसें थमती हैं… नाड़ियों में प्राण स्पंदन खोने लगते हैं… और धीरे-धीरे एक अजीब-सा सन्नाटा समूचे शरीर में व्याप्त हो जाता है। यह क्षण सामान्य नहीं है—यह देह के लिए अंत है और आत्मा के लिए एक नई यात्रा का आरंभ। मृत्यु के इस अलौकिक क्षण में, सूक्ष्म शरीर स्थूल देह का परित्याग कर आगे बढ़ता है। विज्ञान इसे न्यूरोलॉजिकल घटना कहता है, और वेदांत इसे आत्मा का उच्च लोकों की ओर प्रयाण। दोनों दृष्टिकोणों में अद्भुत समानता है, मानो दो किनारे एक ही नदी के।
मस्तिष्क की न्यूरोनल गतिविधियाँ धीमी पड़ने लगती हैं। हृदय अपनी धड़कनों को विराम देने लगता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, मृत्यु के कुछ क्षणों के बाद भी मस्तिष्क चेतना की झलक बनाए रखता है। कई लोगों ने मृत्यु के करीब पहुँचकर "Out of Body Experience (OBE)" का अनुभव किया है—उन्होंने खुद को ऊपर से देखा, प्रकाशमय सुरंग से गुजरने की अनुभूति की, और कभी-कभी दिव्य उपस्थिति का एहसास भी किया।
चिकित्सकीय रूप से इसे "Near Death Experience (NDE)" कहा जाता है, जहाँ मस्तिष्क अंतिम क्षणों में अत्यधिक न्यूरोट्रांसमिटर और एंडोर्फिन छोड़ता है, जिससे व्यक्ति को शांति और प्रकाश का अनुभव होता है। लेकिन क्या यह केवल एक न्यूरो-रासायनिक प्रतिक्रिया है, या सच में आत्मा का प्रस्थान? विज्ञान इस पर मौन है, परंतु वेदांत इसकी व्याख्या हजारों वर्षों से करता आ रहा है।
वेदों में कहा गया है कि मृत्यु केवल शरीर का त्याग है, आत्मा की समाप्ति नहीं। कठोपनिषद में यमराज नचिकेता से कहते हैं—
"न जायते म्रियते वा कदाचिन्,
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो,
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥"
(आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। यह अजन्मा, शाश्वत और सनातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी यह समाप्त नहीं होती।)
जब मृत्यु का क्षण आता है, तो सूक्ष्म शरीर स्थूल देह से मुक्त होने लगता है। वेदों के अनुसार, यह प्राणमय कोश (Vital Energy) के माध्यम से निकलता है और उसके कर्मों के अनुसार मार्ग निर्धारित होता है।
1. सुषुम्ना नाड़ी का मार्ग: यदि आत्मा सुषुम्ना नाड़ी से निकलती है, तो वह उच्च लोकों (मोक्ष या ब्रह्मलोक) में प्रवेश करती है।
2. इड़ा या पिंगला नाड़ी का मार्ग: यदि आत्मा कर्मों के अनुसार इड़ा या पिंगला से निकलती है, तो पुनर्जन्म चक्र में प्रवेश करती है।
3. यमदूत या देवदूत: वेदांत कहता है कि अच्छे कर्मों वाले को देवदूत मार्ग दिखाते हैं, और पाप कर्मों वाले को यमदूत कर्मफल भोगने हेतु अन्य लोकों में ले जाते हैं।
अगर हम ध्यान दें, तो विज्ञान और वेदांत दोनों मृत्यु के समय प्रकाश, ऊर्जा और चेतना के अनुभव को स्वीकार करते हैं। विज्ञान इसे न्यूरोलॉजिकल प्रक्रिया कहता है, जबकि वेदांत इसे आत्मा की यात्रा। Near Death Experience के दौरान लोग जिस प्रकाश को देखते हैं, उसे वेदांत "ब्रह्म ज्योति" कहता है। विज्ञान आत्मा की पुष्टि नहीं करता, लेकिन Out of Body Experience और Near Death Experience के सैकड़ों प्रमाण इसे झुठला भी नहीं सकते।
मृत्यु का रहस्य केवल शरीर तक सीमित नहीं, बल्कि चेतना की एक गहन यात्रा है। विज्ञान इसे न्यूरोनल निष्क्रियता और रासायनिक प्रतिक्रियाओं के रूप में देखता है, जबकि वेदांत इसे आत्मा का परम सत्य मानता है। दोनों दृष्टिकोण मिलकर हमें बताते हैं कि मृत्यु केवल देह का अंत है, आत्मा की यात्रा तो अभी जारी है…!
#महाभारत
🚩 विजय का विष और एक माँ का रहस्य! 🚩
दृश्य १: शमशान जैसी शांति
कुरुक्षेत्र का अठारह दिवसीय महासमर समाप्त हो चुका था। पांडवों के मस्तक पर विजय का मुकुट तो था, परंतु उनके हृदय शमशान की भाँति वीरान थे। जहाँ तक दृष्टि जाती थी, केवल जलती हुई चिताओं का धुआँ और विधवाओं का करुण क्रंदन ही सुनाई देता था।
हस्तिनापुर का वह राजसिंहासन, जिसे पाने के लिए इतना रक्त बहाया गया था, अब पांडवों का था। लेकिन इसकी कीमत क्या थी? पितामह भीष्म, गुरु द्रोण, भाई-बंधु और अपने ही नन्हे पुत्रों (उपपांडवों) के शवों पर चलकर मिली यह जीत, किसी पराजय से कम नहीं लग रही थी।
दृश्य २: गंगा तट पर तर्पण
विजयी होने के बावजूद, धर्मराज युधिष्ठिर का मन असीम ग्लानि और विषाद से भरा था। वे अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ गंगा के पवित्र तट पर खड़े थे। युद्ध में मारे गए अपने परिजनों को वे अश्रुपूरित नेत्रों से 'जलांजलि' (तर्पण) दे रहे थे।
तभी, वहाँ एक ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ जिसने वातावरण को और अधिक भारी कर दिया।
राजमाता कुंती धीरे-धीरे, लड़खड़ाते कदमों से युधिष्ठिर की ओर आ रही थीं। उनका मुख मण्डल आंसुओं से तर था और आँखों में युगों का दर्द छिपा था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई भारी पत्थर उनके सीने पर रखा हो जिसे वे अब और नहीं ढो सकतीं।
दृश्य ३: रहस्य का विस्फोट
कुंती ने कांपते स्वर में युधिष्ठिर के कंधे पर हाथ रखा और कहा,
"पुत्र! तुमने अपने पितामह, गुरु और बंधु-बांधवों को जलांजलि दे दी? अब... अब एक अंजलि उस योद्धा के नाम भी दो, जिसे तुम सब जीवन भर 'सूतपुत्र' कहकर अपमानित करते रहे। उस 'राधेय' कर्ण के लिए भी तर्पण करो।"
युधिष्ठिर ठिठक गए। उनके माथे पर लकीरें उभर आईं। उन्होंने आश्चर्य से पूछा,
"माता! आप क्या कह रही हैं? वह तो हमारा परम शत्रु था। वह दुर्योधन का मित्र और अधर्म का साथी था। मैं उस कुटिल सूतपुत्र के लिए तर्पण क्यों करूँ?"
कुंती का धैर्य अब जवाब दे गया। वर्षों से रोका गया आंसुओं का बाँध टूट पड़ा। वे चीत्कार कर उठीं—
"नहीं युधिष्ठिर! वह सूतपुत्र नहीं था। वह सूर्यपुत्र था! वह तुम्हारा शत्रु नहीं, तुम्हारा ज्येष्ठ भ्राता था। वह मेरी कोख से जन्मा मेरा 'प्रथम पुत्र' था, जिसे मैंने लोक-लाज के भय से त्याग दिया था।"
दृश्य ४: सत्य का आघात
कुंती के ये शब्द युधिष्ठिर के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरे। समय जैसे वहीं थम गया। भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव पत्थर की मूर्ति बन गए।
युधिष्ठिर के हाथ से जल का कलश छूटकर गिर पड़ा।
छपाक!
उनके मस्तिष्क में अतीत के चित्र बिजली की तरह कौंधने लगे।
* उन्हें याद आया कि कैसे भरी सभा में उन्होंने कर्ण को 'नीच जाति'
का कहकर दुत्कारा था।
* उन्हें याद आया अर्जुन का वह बाण, जिसने निहत्थे कर्ण का शीश काट दिया था।
* उन्हें याद आया कि कर्ण सब कुछ जानते हुए भी चुप रहा। उसने कभी नहीं कहा कि "मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ।"
युधिष्ठिर का शरीर कांपने लगा। यह केवल एक भाई की मृत्यु का समाचार नहीं था, यह 'धर्मराज' के हाथों अनजाने में हुए 'भ्रातृहत्या' के पाप का बोध था।
वे घुटनों के बल रेत पर गिर पड़े और विलाप करने लगे:
> "हाय! हमने यह क्या अनर्थ कर दिया! हे विधाता, मैंने अपने ही अग्रज (बड़े भाई) का वध करवा दिया? हमारे धर्म में बड़ा भाई पिता तुल्य होता है, और मैंने राज्य के लोभ में अपने पिता समान भाई का रक्त बहा दिया?"
>
युधिष्ठिर का विलाप गंगा की लहरों से भी ऊँचा था। वे बोले:
> "माता! यदि मुझे यह सत्य पहले पता होता, तो कुरुक्षेत्र की यह भूमि कभी रक्त से लाल न होती। मैं कर्ण के चरणों में हस्तिनापुर का मुकुट रख देता और स्वयं वन चला जाता। न दुर्योधन मरता, न अभिमन्यु, न मेरे पुत्र... केवल आपके एक 'गोपनीयता' ने मेरे पूरे कुल का नाश कर दिया।"
>
दृश्य ५: युगों तक गूंजने वाला श्राप
युधिष्ठिर का शोक अब भीषण क्रोध में बदल चुका था। यह क्रोध अपनी माता पर था, उस निष्ठुर समाज पर था जिसने एक कुंवारी माँ को डरपोक बना दिया, और उस 'रहस्य' पर था जिसने महाभारत रच दिया।
उनकी आँखों में अंगारे धधक रहे थे। वे गंगा के जल में खड़े हुए और अपनी अंजलि में जल लिया।
उन्होंने समस्त दिशाओं और नारी जाति को साक्षी मानकर एक भीषण घोषणा की:
> "जिस प्रकार मेरी माता ने इस सत्य को अपने हृदय में छिपाकर रखा, जिसके कारण आज लाखों निर्दोष मारे गए और भाइयों ने भाइयों का रक्त बहाया... मैं धर्मराज युधिष्ठिर, आज यह श्राप देता हूँ कि आज से सृष्टि की कोई भी स्त्री अपने पेट में कोई 'रहस्य' नहीं छिपा पाएगी। ताकि भविष्य में फिर किसी 'छिपे हुए सत्य' के कारण ऐसा महाविनाश न हो।"
>
कथा का मर्म: तीन दृष्टिकोण
युधिष्ठिर का वह श्राप किसी द्वेष से नहीं, बल्कि सत्य के आग्रह और गहरी पीड़ा से निकला था। यह घटना हमें तीन अलग-अलग नजरिये देती है:
* कुंती की विवशता (The Mother's Dilemma):
कुंती एक विवश माँ का प्रतीक थीं। किशोरावस्था की एक भूल और समाज के क्रूर नियमों के डर ने उन्हें अपना बेटा त्यागने पर मजबूर किया। उनका मौन उनकी 'ममता' और 'सामाजिक प्रतिष्ठा' के बीच का खूनी संघर्ष था। वह जीवन भर अपने बेटे को अपनी आंखों के सामने अपमानित होते देखती रहीं, पर कुछ बोल न सकीं।
* युधिष्ठिर का सत्य (The Burden of Truth):
युधिष्ठिर के लिए सत्य ही ईश्वर था। उनके लिए, झूठ या छिपाया गया सत्य सबसे बड़ा अधर्म था। उनका श्राप, उस धोखे के खिलाफ एक विद्रोह था जिसने उन्हें, जो धर्म के प्रतीक थे, अनजाने में सबसे बड़ा पापी बना दिया था।
* कर्ण का महा-त्याग (The Ultimate Sacrifice):
यह प्रसंग कर्ण के चरित्र को हिमालय से भी ऊँचा कर देता है। युद्ध से पहले कुंती और कृष्ण दोनों ने उसे सत्य बता दिया था। कर्ण जानता था कि पांडव उसके छोटे भाई हैं। वह चाहता तो एक क्षण में युद्ध रोक सकता था, राज्य पा सकता था। लेकिन उसने 'मौन' रहना चुना—ताकि युधिष्ठिर का धर्म न डगमगाए और माँ कुंती का सम्मान बना रहे।
आज भी हमारे समाज में जब मुहावरे के तौर पर कहा जाता है कि "औरतों के पेट में बात नहीं पचती", तो यह हँसी का पात्र नहीं, बल्कि उस महान त्रासदी का स्मरण है। यह उस माँ की पीड़ा की याद दिलाता है जिसके चुप रहने की कीमत, उसके बेटों ने एक-दूसरे का खून बहाकर चुकाई थी।
#पौराणिक कथा
💥 तपोवन का तेज: ऋषि जमदग्नि और रेणुका! 💥
प्राचीन भारतवर्ष के घने वनों में, जहाँ शांति और पवित्रता का वास था, वहीं महर्षि जमदग्नि का आश्रम स्थित था। महर्षि जमदग्नि, जो सप्तऋषियों में से एक थे, अपनी कठोर तपस्या और क्रोध पर नियंत्रण (प्रायः) रखने के लिए जाने जाते थे। उनकी अर्धांगिनी थीं—माता रेणुका। रेणुका एक क्षत्रिय राजकुमारी थीं, लेकिन विवाह के पश्चात उन्होंने राजमहल के सुख-त्याग कर आश्रम के कठोर जीवन को पूर्ण समर्पण के साथ अपना लिया था।
उनके पाँच पुत्र थे, जिनमें सबसे छोटे थे राम (जो बाद में परशुराम कहलाए)। परशुराम बचपन से ही शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुण थे और अपने माता-पिता के प्रति उनकी भक्ति अतुलनीय थी।
नदी तट पर: मन का एक क्षणिक भटकाव
प्रतिदिन की भाँति, माता रेणुका प्रातःकाल नदी से जल भरने गईं। यह कोई साधारण जल-पात्र नहीं था; कहा जाता है कि माता रेणुका अपने सतीत्व और पवित्रता के बल पर गीली रेत से ही घड़ा बना लेती थीं और उसी में जल भरकर लाती थीं।
उस दिन, जब वे नदी तट पर पहुँचीं, तो उन्होंने देखा कि गंधर्वराज चित्ररथ अपनी पत्नियों (अप्सराओं) के साथ जल-क्रीड़ा कर रहे थे। उनका सौंदर्य और विलास देख, क्षणभर के लिए रेणुका का मन विचलित हो गया। वह आश्रम जीवन की कठोरता भूलकर उस दृश्य में खो गईं।
यह विचलन मात्र कुछ पलों का था, उन्हें तुरंत अपनी भूल का अहसास हुआ और वे संभल गईं। लेकिन, मन की एकाग्रता भंग होने के कारण उस दिन रेत का घड़ा नहीं बन पाया। भयभीत और लज्जित रेणुका किसी तरह जल लेकर आश्रम लौटीं, लेकिन उन्हें विलंब हो चुका था।
ऋषि का कोप: अग्नि परीक्षा
आश्रम में ऋषि जमदग्नि हवन के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे। जब रेणुका विलंब से और घबराई हुई लौटीं, तो ऋषि ने अपनी योग-दृष्टि से सब कुछ जान लिया। उन्होंने देख लिया कि उनकी पत्नी का मन क्षणभर के लिए धर्म से विमुख हुआ था।
ऋषि का क्रोध प्रलय की अग्नि के समान धधक उठा। उन्होंने अपनी भावनाओं पर नियंत्रण खो दिया और जोर से गर्जना की। उन्होंने अपने चार बड़े पुत्रों को बुलाया— रुक्मवान, सुषेण, वसु और विश्वावसु।
क्रोध से कांपते हुए ऋषि ने आदेश दिया:
> "पुत्रों! अपनी माता का वध कर दो! इनका मन कलुषित हो गया है।"
>
चारों पुत्र यह सुनकर सन्न रह गए। अपनी ही जन्मदात्री माँ का वध? यह तो महापाप है! स्नेह और धर्म के द्वंद्व में फंसकर वे जड़वत हो गए और उन्होंने पिता का आदेश मानने से इनकार कर दिया। अपनी आज्ञा की अवहेलना देख ऋषि ने उन्हें श्राप दिया, जिससे वे अपनी चेतना खो बैठे और जड़वत हो गए।
परशुराम की प्रतिज्ञा: कर्तव्य की पराकाष्ठा
अंत में, ऋषि ने अपने सबसे छोटे और प्रिय पुत्र, परशुराम की ओर देखा।
ऋषि ने कहा, "राम! मेरी आज्ञा का पालन करो। अपनी माता और इन अवज्ञाकारी भाइयों का वध कर दो।"
परशुराम स्थिति की गंभीरता को समझ गए। वे जानते थे कि उनके पिता एक महान तपस्वी हैं। यदि उन्होंने आज्ञा नहीं मानी, तो पिता के श्राप से पूरा कुल नष्ट हो जाएगा। और यदि वे आज्ञा मान लेते हैं, तो पिता का क्रोध शांत हो जाएगा और प्रसन्न होकर वे वरदान देंगे।
परशुराम ने एक क्षण भी नहीं गंवाया। उन्होंने अपना तेजस्वी परशु (कुल्हाड़ी) उठाया और एक ही वार में अपनी माता और चारों भाइयों का सिर धड़ से अलग कर दिया।
वरदान और पुनर्जीवन: बुद्धि की विजय
जैसे ही यह कार्य पूर्ण हुआ, ऋषि जमदग्नि का क्रोध कपूर की तरह उड़ गया। उन्होंने देखा कि उनके पुत्र ने अपनी भावनाओं को मारकर 'पितृ-आज्ञा' (पिता के आदेश) को सर्वोपरि रखा।
प्रसन्न होकर ऋषि बोले:
> "वत्स! मैं तुम्हारी पितृ-भक्ति और साहस से अत्यंत प्रसन्न हूँ। आज तक किसी पुत्र ने ऐसी निष्ठा नहीं दिखाई। मांगो, क्या वरदान मांगते हो?"
>
परशुराम इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने हाथ जोड़कर, विनम्रतापूर्वक कहा:
"पिताश्री, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे ये वरदान दीजिए—
* मेरी माता और मेरे चारों भाई पुनः जीवित हो उठें।
* उन्हें इस बात की तनिक भी स्मृति न रहे कि मैंने उनका वध किया था।
* मेरा कोई भी पाप मुझे स्पर्श न कर सके और मैं युद्ध में सदैव अजेय रहूँ।"
ऋषि जमदग्नि मुस्कुराए। वे समझ गए कि उनके पुत्र ने न केवल आज्ञा का पालन किया, बल्कि अपनी बुद्धिमत्ता से सब कुछ पहले जैसा कर दिया। उन्होंने कहा, "तथास्तु!"
क्षणभर में, माता रेणुका और चारों भाई गहरी नींद से जागने की भांति उठ खड़े हुए। उन्हें लगा कि वे बस सो रहे थे। आश्रम का वातावरण पुनः पवित्र और शांत हो गया।
यह कथा हमें सिखाती है कि 'धर्म' की परिभाषा अत्यंत सूक्ष्म होती है। परशुराम जी ने दिखाया कि माता-पिता के प्रति विश्वास और आज्ञापालन से असंभव को भी संभव किया जा सकता है। उन्होंने 'हत्या' का पाप नहीं किया, बल्कि पिता की तपस्या पर भरोसा रखकर अपने परिवार को श्राप से मुक्त कराया।













