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गज़ल #✒ शायरी
✒ शायरी - हमीद अदम अब्दुल  कोई दिन जाएँगे নষ্ী সুতয सरकार I जाएँगे 318 नहीं ज़ख़्म I भर सरकार समझता   है हमें अगर 3114 কা शहर সায नहीं जाएँगे कोई কুব कर सरकार I आप के जौर का जब ज़िक्र छिड़ा महशर में नहीं कोई हम जाएग मुकर सरकार I रो  के जीने में भला कौन सी   शीरीनी   है हंस  के मर  जाएँगे नहीं सरकार   कोई সান निकल आए हैं 'अदम' से तो झिझकना कैसा जाएँगे कोई नहीं दर -ब-दर সকায I हमीद अदम अब्दुल  कोई दिन जाएँगे নষ্ী সুতয सरकार I जाएँगे 318 नहीं ज़ख़्म I भर सरकार समझता   है हमें अगर 3114 কা शहर সায नहीं जाएँगे कोई কুব कर सरकार I आप के जौर का जब ज़िक्र छिड़ा महशर में नहीं कोई हम जाएग मुकर सरकार I रो  के जीने में भला कौन सी   शीरीनी   है हंस  के मर  जाएँगे नहीं सरकार   कोई সান निकल आए हैं 'अदम' से तो झिझकना कैसा जाएँगे कोई नहीं दर -ब-दर সকায I - ShareChat

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