शिशुपाल वध के समय सभी ने देखा कि शिशुपाल की चेतना श्रीकृष्ण में लीन हो गई।
यह देख कर युधिष्ठिर ने नारदजी से पूछा शिशुपाल तो भगवान से द्वेष रखता था फिर उसे वो मुक्ति कैसे मिली जो बड़े बड़े योगियों को भी दुर्लभ है। इस पर नारद जी बोले - युधिष्ठिर! मनुष्य वैरभाव से भगवान् में जितना तन्मय हो जाता है, उतना भक्तियोग से नहीं होता।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/७/१/२६
श्रीमद्भागवत-महापुराण/7/1/16
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