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गज़ल #✒ शायरी
✒ शायरी - उबैदुल्लाह अलीम गज़ल मैं ये किस के नाम लिक्खूँ जो अलम गुज़र रहे हैं जल   रहे  हैं   मिरे लोग   मर  रहे   हैं शहर कोई ग़ुंचा हो कि गुल हो कोई शाख़ हो शजर हो वो हवा-ए-गुलसिताँ है कि॰ सभी   बिखर रहे हैं थीं नाज़िल इसी ख़ित्ता -ए-ज़मीं   पर रहमतें कभो ওনয  ফ্ ঔ ख़ित्ता - ए-ज़मीं   है कि   'अज़ाब वहा के   झुरमुट जो हवा में   झूलते 4 ताएरों 461 फ़ज़ा को देखते हैं तो अब आह भर रहे हैं নী आरज़ू   थी हम को नए ख़्वाब देखने   की ast अपनी जिंदगी में नए সয ফ্ ঔ अब ख़्वाब कोई   और तो नहीं है   पस -ए-ख़ंजर - आज़माई क़त्ल   हो  रहे हैं   हमीं कर   रहे   हैं हमीं क़त्ल Wani Moiivational Vicleos Appl उबैदुल्लाह अलीम गज़ल मैं ये किस के नाम लिक्खूँ जो अलम गुज़र रहे हैं जल   रहे  हैं   मिरे लोग   मर  रहे   हैं शहर कोई ग़ुंचा हो कि गुल हो कोई शाख़ हो शजर हो वो हवा-ए-गुलसिताँ है कि॰ सभी   बिखर रहे हैं थीं नाज़िल इसी ख़ित्ता -ए-ज़मीं   पर रहमतें कभो ওনয  ফ্ ঔ ख़ित्ता - ए-ज़मीं   है कि   'अज़ाब वहा के   झुरमुट जो हवा में   झूलते 4 ताएरों 461 फ़ज़ा को देखते हैं तो अब आह भर रहे हैं নী आरज़ू   थी हम को नए ख़्वाब देखने   की ast अपनी जिंदगी में नए সয ফ্ ঔ अब ख़्वाब कोई   और तो नहीं है   पस -ए-ख़ंजर - आज़माई क़त्ल   हो  रहे हैं   हमीं कर   रहे   हैं हमीं क़त्ल Wani Moiivational Vicleos Appl - ShareChat