हर साल फरवरी के तीसरे गुरुवार को विश्व मानव विज्ञान दिवस( world Anthropology day) मनाया जाता है। यह दिन अप्रयुक्त क्षेत्र का सम्मान करने और आम जनता को मानव विज्ञान के बारे में शिक्षित करने के लिए मनाया जाता है। मानवता के वैज्ञानिक अध्ययन को मानवविज्ञान के रूप में जाना जाता है। यह मानव समाजों और संस्कृतियों की शुरुआत और प्रगति की जांच करता है। ऐतिहासिक और समकालीन समुदायों में लक्षणों की जांच के लिए विभिन्न वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग किया जाता है। यह अध्ययन हमें यह समझने में भी मदद करता है कि दुनिया कैसे काम करती है, हमारे व्यवहार के पीछे क्या कारण हैं और हमारा वातावरण हमसे कैसे प्रभावित होता है। प्रारंभ में राष्ट्रीय मानवविज्ञान दिवस के रूप में मनाया गया, बाद में 2016 में इस दिन का नाम बदल दिया गया। चूंकि मानवविज्ञान केवल एक देश के लिए नहीं, बल्कि दुनिया में सभी के लिए महत्वपूर्ण है, इसलिए विश्व मानवविज्ञान दिवस मनाना अधिक उपयुक्त लगा। फिर, मानवविज्ञानी क्षेत्रीय प्रथाओं और सामाजिक संबंधों को समझाने के लिए नृवंशविज्ञान पद्धति का उपयोग करते हैं। मानवविज्ञानी अपने विषयों के दैनिक जीवन में संलग्न होकर लोगों की संस्कृतियों, संस्थानों और प्रथाओं के वास्तविक महत्व को देख और उजागर कर सकते हैं। और मानवविज्ञानियों द्वारा किए गए योगदान को स्वीकार करने और उन्हें महत्व देने के लिए, विश्व मानवविज्ञान दिवस की स्थापना 2015 में अमेरिकन एंथ्रोपोलॉजिकल एसोसिएशन (एएए) द्वारा की गई थी। #जागरूकता दिवस
छत्रपति शिवाजी जयंती
छत्रपति शिवाजी भोसले (1630-1680 ई.) छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 को मराठा परिवार में हुआ था। उनके जन्मदिवस के अवसर पर ही हर साल 19 फरवरी को भारत में छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती मनाई जाती है। महाराष्ट सरकार ने तो इस दिन को राज्य में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। भारत के एक महान राजा एवं रणनीतिकार थे जिन्होंने 1674 ई. में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी। इसके लिए उन्होंने मुगल साम्राज्य के शासक औरंगज़ेब से संघर्ष किया। सन् 1674 में रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक हुआ और वह "छत्रपति" बने। छत्रपती शिवाजी महाराज ने अपनी अनुशासित सेना एवं सुसंगठित प्रशासनिक इकाइयों कि सहायता से एक योग्य एवं प्रगतिशील प्रशासन प्रदान किया। उन्होंने समर-विद्या में अनेक नवाचार किए तथा छापामार युद्ध (guerilla warfare) की नयी शैली (शिवसूत्र) विकसित की। उन्होंने प्राचीन हिन्दू राजनीतिक प्रथाओं तथा दरबारी शिष्टाचारों को पुनर्जीवित किया।
गुरिल्ला युद्ध के अविष्कारक : कहते हैं कि छत्रपति शिवाजी ने ही भारत में पहली बार गुरिल्ला युद्ध का आरम्भ किया था। उनकी इस युद्ध नीती से प्रेरित होकर ही वियतनामियों ने अमेरिका से जंगल जीत ली थी। इस युद्ध का उल्लेख उस काल में रचित 'शिव सूत्र' में मिलता है। गोरिल्ला युद्ध एक प्रकार का छापामार युद्ध। मोटे तौर पर छापामार युद्ध अर्धसैनिकों की टुकड़ियों अथवा अनियमित सैनिकों द्वारा शत्रुसेना के पीछे या पार्श्व में आक्रमण करके लड़े जाते हैं। #शत शत नमन
रामकृष्ण परमहंस जयंती
फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भारत के महान संत एवं विचारक रामकृष्ण परमहंस का जन्म हुआ था। इस वर्ष यह तिथि 15 मार्च को है। आज रामकृष्ण परमहंस की जयंती है। उनका बचपन का नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था। तारीख के अनुसार उनका जन्म 18 फरवरी 1836 को बंगाल के एक प्रांत कामारपुकुर गांव में हुआ था। पिता का नाम खुदीराम तथा माता का नाम चंद्रमणि देवी था। वे भारत के एक महान संत और विचारक थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में सभी धर्मों की एकता पर जोर दिया। वे मानवता के पुजारी थे। हिन्दू, इस्लाम और ईसाई आदि सभी धर्मों पर उसकी श्रद्धा एक समान थी, ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने बारी-बारी सबकी साधना करके एक ही परम-सत्य का साक्षात्कार किया था।
अपने बचपन से ही उन्हें विश्वास था कि भगवान के दर्शन हो सकते हैं, अतः भगवान प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर साधना और भक्ति की तथा सादगीपूर्ण जीवन बिताया। अपने जीवन में उन्होंने स्कूल के कभी दर्शन नहीं किए थे। उन्हें न तो अंग्रेजी आती थी, न वे संस्कृत के जानकार थे। वे तो सिर्फ मां काली के भक्त थे। उनकी सारी पूंजी महाकाली का नाम-स्मरण मात्र था।
माना जाता है कि उनके माता-पिता को उनके जन्म से पहले ही अलौकिक घटनाओं का अनुभव हुआ था। उनके पिता को एक रात दृष्टांत हुआ, जिसमें उन्होंने देखा कि भगवान गदाधर ने स्वप्न में उनसे कहा था कि वे विष्णु अवतार के रूप में उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे तथा माता चंद्रमणि को भी ऐसे ही एक दृष्टांत का अनुभव हुआ था, जिसमें उन्होंने शिव मंदिर में अपने गर्भ में एक रोशनी को प्रवेश करते हुए देखा था।
#शत शत नमन
फूलेरा दूज
हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह में शुक्ल पक्ष के दौरान दूसरे दिन (द्वितीया तिथि) पर फुलेरा दूज पर मनाई जाती है । ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, यह दिन मार्च या फरवरी के महीने में मनाया जाता है। हर साल फुलेरा दूज का त्यौहार दो प्रमुख त्योहारों के बीच आता है, यानी वसंत पंचमी और होली।
फुलेरा दूज को एक शुभ और सर्वोच्च त्यौहार माना जाता है, जिसे उत्तर भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में बड़े उत्साह और जोश के साथ मनाया जाता है।
यह त्योहार भगवान कृष्ण को समर्पित है। शाब्दिक अर्थ में फुलेरा का अर्थ है 'फूल' जो फूलों को दर्शाता है। यह माना जाता है कि भगवान कृष्ण फूलों के साथ खेलते हैं और फुलेरा दूज की शुभ पूर्व संध्या पर होली के त्योहार में भाग लेते हैं। यह त्योहार लोगों के जीवन में खुशियां और उल्लास लाता है।
वृंदावन और मथुरा के कुछ मंदिरों में, भक्तों को भगवान कृष्ण के विशेष दर्शन का भी मौका मिल सकता है, जहां वह हर साल फुलेरा दूज के उचित समय पर होली उत्सव में भाग लेने वाले होते हैं। इस दिन विभिन्न अनुष्ठानों और समारोहों का आयोजन किया जाता है और साथ ही देवता भगवान कृष्ण की मूर्तियों को होली के आगामी उत्सव पर दर्शाने के लिए रंगों से सराबोर किया जाता है। #शुभ कामनाएँ 🙏







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