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रुबाई उमर खय्याम #सूफी काव्य
सूफी काव्य - "रुबाई" ता-बूद दिलम ज़े इश्क़ महरूम ननशुद कम बूद ज़े असरार कि मफ़्हूम ननशुद अकनूँ कि हमी ब-निगरम अज़ रू-ए ख़िरद मा'लूमम् शुद कि हेच मा'लूम ন-থুণ भावार्थः जिन दिनो मैं इ'श्क में पागल था, लगभग सभी राज़ मुझ पर ज़ाहिर थे। लेकिन जब अपने अ'क़्ल ओ ख़िरद के ज़रिया देखता हूँ, तो पता चलता है कि तो मुझे कुछ भी नहीं ঔন নক মা'লুম থাI (उमर खय्याम) App Motivational Videos Want "रुबाई" ता-बूद दिलम ज़े इश्क़ महरूम ननशुद कम बूद ज़े असरार कि मफ़्हूम ननशुद अकनूँ कि हमी ब-निगरम अज़ रू-ए ख़िरद मा'लूमम् शुद कि हेच मा'लूम ন-থুণ भावार्थः जिन दिनो मैं इ'श्क में पागल था, लगभग सभी राज़ मुझ पर ज़ाहिर थे। लेकिन जब अपने अ'क़्ल ओ ख़िरद के ज़रिया देखता हूँ, तो पता चलता है कि तो मुझे कुछ भी नहीं ঔন নক মা'লুম থাI (उमर खय्याम) App Motivational Videos Want - ShareChat