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शेर गालिब #✒ शायरी
✒ शायरी - शेर तुम से बेजा है मुझे अपनी तबाही का गिला उसमें कुछ शाएबा ए ख़ूबिए ्तक़दीर কী থা मैं जो अपनी तबाही का तुमसे . शिकवा कर रहा हूँ, वो ठीक नहीं है। मेरी तबाही में मेरी तक़दीर का भी तो हाथ हा सकता है। ये ग़ालिब साहब का अन्दाज़ है के तक़दीर की बुराई को भी तक़दीर की ख़ूबी कह रहे हैं। बतौर तंज़ ऐसा कहा गया है। गालिब Motivational Videos App Want . शेर तुम से बेजा है मुझे अपनी तबाही का गिला उसमें कुछ शाएबा ए ख़ूबिए ्तक़दीर কী থা मैं जो अपनी तबाही का तुमसे . शिकवा कर रहा हूँ, वो ठीक नहीं है। मेरी तबाही में मेरी तक़दीर का भी तो हाथ हा सकता है। ये ग़ालिब साहब का अन्दाज़ है के तक़दीर की बुराई को भी तक़दीर की ख़ूबी कह रहे हैं। बतौर तंज़ ऐसा कहा गया है। गालिब Motivational Videos App Want . - ShareChat