#महाभारत
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
अष्टनवतितमोऽध्यायः
शान्तनु और गंगा का कुछ शर्तों के साथ सम्बन्ध, वसुओं का जन्म और शाप से उद्धार तथा भीष्म की उत्पत्ति...(दिन 302)
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वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचो राज्ञः सस्मितं मृदु वल्गु च ।
(यशस्विनी च साऽऽगच्छच्छान्तनोर्भूतये तदा । सा च दृष्ट्वा नृपश्रेष्ठं चरन्तं तीरमाश्रितम् ।।)
वसूनां समयं स्मृत्वाथाभ्यगच्छदनिन्दिता ।। १ ।।
(प्रजार्थिनी राजपुत्रं शान्तनुं पृथिवीपतिम् । प्रतीपवचनं चापि संस्मृत्यैव स्वयं नृप ।। कालोऽयमिति मत्वा सा वसूनां शापचोदिता ।) उवाच चैव राज्ञः सा ह्लादयन्ती मनो गिरा । भविष्यामि महीपाल महिषी ते वशानुगा ।। २ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! राजा शान्तनुका मधुर मुसकानयुक्त मनोहर वचन सुनकर यशस्विनी गंगा उनकी ऐश्वर्य-वृद्धिके लिये उनके पास आयीं। तटपर विचरते हुए उन नृपश्रेष्ठको देखकर सती साध्वी गंगाको वसुओंको दिये हुए वचनका स्मरण हो आया। साथ ही राजा प्रतीपकी बात भी याद आ गयी। तब यही उपयुक्त समय है, ऐसा मानकर वसुओंको मिले हुए शापसे प्रेरित हो वे स्वयं संतानोत्पादनकी इच्छासे पृथ्वीपति महाराज शान्तनुके समीप चली आयीं और अपनी मधुर वाणीसे महाराजके मनको आनन्द प्रदान करती हुई बोलीं- 'भूपाल ! मैं आपकी महारानी बनूँगी एवं आपके अधीन रहूँगी ।। १-२ ।।
यत् तु कुर्यामहं राजञ्छुभं वा यदि वाशुभम् । न तद् द्वारयितव्यास्मि न वक्तव्या तथाप्रियम् ।। ३ ।।
'(परंतु एक शर्त है-) राजन् ! मैं भला या बुरा जो कुछ भी करूँ, उसके लिये आपको मुझे नहीं रोकना चाहिये और मुझसे कभी अप्रिय वचन भी नहीं कहना चाहिये ।। ३ ।।
एवं हि वर्तमानेऽहं त्वयि वत्स्यामि पार्थिव ।
वारिता विप्रियं चोक्ता त्यजेयं त्वामसंशयम् ।। ४ ।।
'पृथ्वीपते! ऐसा बर्ताव करनेपर ही मैं आपके समीप रहूँगी। यदि आपने कभी मुझे किसी कार्यसे रोका या अप्रिय वचन कहा तो मैं निश्चय ही आपका साथ छोड़ दूँगी' ।। ४ ।।
तथेति सा यदा तूक्ता तदा भरतसत्तम ।
प्रहर्षमतुलं लेभे प्राप्य तं पार्थिवोत्तमम् ।। ५ ।।
भरतश्रेष्ठ ! उस समय बहुत अच्छा कहकर राजाने जब उसकी शर्त मान ली, तब उन नृपश्रेष्ठको पतिरूपमें प्राप्त करके उस देवीको अनुपम आनन्द मिला ।। ५ ।।
(रथमारोप्य तां देवीं जगाम स तया सह । सा च शान्तनुमभ्यागात् साक्षाल्लक्ष्मीरिवापरा ।।)
तब राजा शान्तनु देवी गंगाको रथपर बिठाकर उनके साथ अपनी राजधानीको चले गये। साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान सुशोभित होनेवाली गंगादेवी शान्तनुके साथ गयीं।
आसाद्य शान्तनुस्तां च बुभुजे कामतो वशी । न प्रष्टव्येति मन्वानो न स तां किंचिदूचिवान् ।। ६ ।।
इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले राजा शान्तनु उस देवीको पाकर उसका इच्छानुसार उपभोग करने लगे। पिताका यह आदेश था कि उससे कुछ पूछना मत; अतः उनकी आज्ञा मानकर राजाने उससे कोई बात नहीं पूछी ।। ६ ।।
स तस्याः शीलवृत्तेन रूपौदार्यगुणेन च । उपचारेण च रहस्तुतोष जगतीपतिः ।। ७ ।।
उसके उत्तम शील-स्वभाव, सदाचार, रूप, उदारता, सद्गुण तथा एकान्त सेवासे महाराज शान्तनु बहुत संतुष्ट रहते थे ।। ७ ।।
दिव्यरूपा हि सा देवी गङ्गा त्रिपथगामिनी । मानुषं विग्रहं कृत्वा श्रीमन्तं वरवर्णिनी ।। ८ ।।
भाग्योपनतकामस्य भार्या चोपनताभवत्।
शान्तनोनृपसिंहस्य देवराजसमद्युतेः ।। ९ ।।
त्रिपथगामिनी दिव्यरूपिणी देवी गंगा ही अत्यन्त सुन्दर मनुष्य-देह धारण करके देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी नृपशिरोमणि महाराज शान्तनुको, जिन्हें भाग्यसे इच्छानुसार सुख अपने-आप मिल रहा था, सुन्दरी पत्नीके रूपमें प्राप्त हुई थीं ।। ८-९ ।।
सम्भोगस्नेहचातुर्यैर्हावभावसमन्वितैः ।
राजानं रमयामास यथा रेमे तथैव सः ।। १० ।।
गंगादेवी हाव-भावसे युक्त सम्भोग-चातुरी और प्रणय-चातुरीसे राजाको जैसे-जैसे रमातीं, उसी-उसी प्रकार वे उनके साथ रमण करते थे ।। १० ।।
स राजा रतिसक्तत्वादुत्तमस्त्रीगुणैर्हतः । संवत्सरानृतून् मासान् बुबुधे न बहून् गतान् ।। ११ ।।
उस दिव्य नारीके उत्तम गुणोंने उनके चित्तको चुरा लिया था; अतः वे राजा उसके साथ रति-भोगमें आसक्त हो गये। कितने ही वर्ष, ऋतु और मास व्यतीत हो गये, किंतु उसमें आसक्त होनेके कारण राजाको कुछ पता न चला ।। ११ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
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