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ज़िंदगी परबत हवे बाकिर चढ़े के पड़ी, आपन लड़ाई अपने से ही लड़े के पड़ी। केहू नाही आइ तोहके देबे के सहारा, ठोकर खा के खुदे आगे बढ़े के पड़ी। खाली बसंत के फूल नाही हऽ ज़िंदगी, पतझड़ में पतई नियन झड़े के पड़ी। केतनो निमन होई केहू, आइ ना कामे, आपन दुखवा अपने से ही हरे के पाङी आईसे ना मिली मूङी पर तहारा छाह . श्यामनंदन ओकरा खातिर धूप मे जले के पाङी #✍मेरे पसंदीदा लेखक #✍प्रेमचंद की कहानियां #📗प्रेरक पुस्तकें📘 #📚कविता-कहानी संग्रह #💔दर्द भरी कहानियां अइसे नाही मिली मुड़ी पर तहरा छाँह, श्यामनंदन ओकरा खातिर धूप में जरे के पड़ी। - हमारे नानाजी