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#❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #श्रीमद भगवद्गीता
❤️जीवन की सीख - बहुवक्त्रनेत्रं - महत्ते रूपं महावाहो बहुबाहूरुपादम्| बहुदंष्ट्राकरालं- எ* दृष्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् I१  हे महावाहो ! आपके बहुत मुख और नेत्रोंवाले , वहुत हाथ, जंघा और पैरौंवाले बहुत उदरौंवाले और बहुत-सो दाढ़ोंके कारण अत्यन्त विकराल महान् रूपको देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हेँ तथा मैॅ भौ व्याकुल हाे रहा हूँ II २३ Il  दीप्तमनेकवर्ण - नभःस्पृशं दोप्तविशालनेत्रम् | व्यात्ताननं दृष्ठा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा  धृतिॅ न विन्दामि शमं च विष्णो ११  क्यौंकि हे विष्णो ! आकाशको स्पर्श करनेवाले, देदोप्यमान, अनेक वर्णोंसे युक्त तथा फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नैत्रौंसे युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरणवाला मेँ धौरज और হালি নন্কী দানা হুঁIl ২৮ Il च ते मुखानि दंष्ट्राकरालानि दृष्ैव कालानलसन्रिभानि| दिशो न जाने न लभे च शर्म देवेश जगन्रिवास १। प्रसीद दाढ़ॅंके कारण विकण्ल और प्रलयकालकी अग्निके  देखकर मॅ दिशाओंको समान प्रज्चलित आपके मुरखौंको  नहों जानता हूँ और सुख भौ नहों पाता हूँ । इसलिये हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न हों Il २५ Il श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार बहुवक्त्रनेत्रं - महत्ते रूपं महावाहो बहुबाहूरुपादम्| बहुदंष्ट्राकरालं- எ* दृष्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् I१  हे महावाहो ! आपके बहुत मुख और नेत्रोंवाले , वहुत हाथ, जंघा और पैरौंवाले बहुत उदरौंवाले और बहुत-सो दाढ़ोंके कारण अत्यन्त विकराल महान् रूपको देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हेँ तथा मैॅ भौ व्याकुल हाे रहा हूँ II २३ Il  दीप्तमनेकवर्ण - नभःस्पृशं दोप्तविशालनेत्रम् | व्यात्ताननं दृष्ठा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा  धृतिॅ न विन्दामि शमं च विष्णो ११  क्यौंकि हे विष्णो ! आकाशको स्पर्श करनेवाले, देदोप्यमान, अनेक वर्णोंसे युक्त तथा फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नैत्रौंसे युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरणवाला मेँ धौरज और হালি নন্কী দানা হুঁIl ২৮ Il च ते मुखानि दंष्ट्राकरालानि दृष्ैव कालानलसन्रिभानि| दिशो न जाने न लभे च शर्म देवेश जगन्रिवास १। प्रसीद दाढ़ॅंके कारण विकण्ल और प्रलयकालकी अग्निके  देखकर मॅ दिशाओंको समान प्रज्चलित आपके मुरखौंको  नहों जानता हूँ और सुख भौ नहों पाता हूँ । इसलिये हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न हों Il २५ Il श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat