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व्यस्त रहें, मस्त रहें
#☪ सूफी संगीत 🕌 #🤲अल्लाह हु अक़बर #🤲 दुआएं
☪ सूफी संगीत 🕌 - 0 जो दश मैं नह्वी डसके ५र्च fg चिन्ताा करनाा ब्यर्थ है॰ पहले अपना बनाओं  MకN 0 जो दश मैं नह्वी डसके ५र्च fg चिन्ताा करनाा ब्यर्थ है॰ पहले अपना बनाओं  MకN - ShareChat
#श्रीमद्भगवद् गीता #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गुरु महिमा😇
श्रीमद्भगवद् गीता - 01] জ্খ৫] कठिनाइयों की सृष्टि करना बुद्धिमानी जही है॰ इन पर विजय प्राप्त करना पुरूषार्था मनुष्यों का काम हैं। -प्रेमचन्द MN 01] জ্খ৫] कठिनाइयों की सृष्टि करना बुद्धिमानी जही है॰ इन पर विजय प्राप्त करना पुरूषार्था मनुष्यों का काम हैं। -प्रेमचन्द MN - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 #मेरे विचार #🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #श्रीमद्भगवद् गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - 02 ulರf सहयोगी चयन में सावधानी बरतें और -सही समझदार व्यक्ति का साथ जीवन के हर बोझ को हल्का कर देता है॰ MN 02 ulರf सहयोगी चयन में सावधानी बरतें और -सही समझदार व्यक्ति का साथ जीवन के हर बोझ को हल्का कर देता है॰ MN - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #मेरे विचार #श्रीमद्भगवद् गीता #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕
🙏 प्रेरणादायक विचार - 0 जो दश मैं नह्वी डसके ५र्च fg चिन्ताा करनाा ब्यर्थ है॰ पहले अपना बनाओं  MకN 0 जो दश मैं नह्वी डसके ५र्च fg चिन्ताा करनाा ब्यर्थ है॰ पहले अपना बनाओं  MకN - ShareChat
#📖जीवन का लक्ष्य🤔 #श्रीमद्भगवद् गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #मेरे विचार
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः | प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ।। हे अर्जुन! जिस कालमेँ३ शरीर त्याग कर गये न लौटनेवालो गतिको हुए योगीजन तो वापस वापस  लौटनेवाली और जिस कालमें गये हुए गतिको ही प्राप्त होते हैेँ, उस कालको अर्थात् दोनों मार्गोंको कहूँगा II २३ II अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः I। जिस मार्गमें ज्योतिर्मय अग्नि-्अभिमानी देवता है, दिनका अभिमानी देवता है, शूक्लपक्षका अभिमानी देवता है और उत्तरायणके छः महीनोंका अभिमानो  *, उस मार्गमें मरकर गये हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपर्युक्त देवताओंद्वारा क्रमसे ले जाये जाकर ब्रह्मको प्राप्त होते हैँ Il २४ Il श्रीमदभगवदगीता अध्याय 8 W; गोरखपुर से साभार যীলা यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः | प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ।। हे अर्जुन! जिस कालमेँ३ शरीर त्याग कर गये न लौटनेवालो गतिको हुए योगीजन तो वापस वापस  लौटनेवाली और जिस कालमें गये हुए गतिको ही प्राप्त होते हैेँ, उस कालको अर्थात् दोनों मार्गोंको कहूँगा II २३ II अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः I। जिस मार्गमें ज्योतिर्मय अग्नि-्अभिमानी देवता है, दिनका अभिमानी देवता है, शूक्लपक्षका अभिमानी देवता है और उत्तरायणके छः महीनोंका अभिमानो  *, उस मार्गमें मरकर गये हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपर्युक्त देवताओंद्वारा क्रमसे ले जाये जाकर ब्रह्मको प्राप्त होते हैँ Il २४ Il श्रीमदभगवदगीता अध्याय 8 W; गोरखपुर से साभार যীলা - ShareChat
#📖जीवन का लक्ष्य🤔 #मेरे विचार #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - 01] জ্খ৫] कठिनाइयों की सृष्टि करना बुद्धिमानी जही है॰ इन पर विजय प्राप्त करना पुरूषार्था मनुष्यों का काम हैं। -प्रेमचन्द MN 01] জ্খ৫] कठिनाइयों की सृष्टि करना बुद्धिमानी जही है॰ इन पर विजय प्राप्त करना पुरूषार्था मनुष्यों का काम हैं। -प्रेमचन्द MN - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 #मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख
🙏गीता ज्ञान🛕 - ( Zच का कोई खुशियों எ6 8391 &aall &ra 9 ह्वी एक रालता हरै MకN ( Zच का कोई खुशियों எ6 8391 &aall &ra 9 ह्वी एक रालता हरै MకN - ShareChat
#📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार #श्रीमद्भगवद् गीता
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - परस्तस्मात्तु भावोउन्योउव्यक्तोडव्यक्तात्सनातनः | सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति Il यः स परे दूसरा अर्थात् विलक्षण  उस अव्यक्तसे भी अति दिव्य पुरुप जो सनातन अव्यक्तभाव है वह परम नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता II २० II q মুনাকধ गतिमू| अव्यक्तोडक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम Il 4 प्राप्य इस नामसे कहा गया है, जो अव्यक्त 37&/{ उसी अक्षर नामक अव्यक्तभावको परमगति कहते हैँ तथा जिस सनातन अव्यक्तभावको प्राप्त होकर मनुप्य वापस नहीं आते. वह मेरा परम धाम है II २१ II पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् II  हे पार्थ! जिस परमात्माके अन्तर्गत सर्वभूत हैँ और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मासे यह समस्त जगत् परिपूर्ण है१ वह सनातन अव्यक्त परम पुरुप तो अनन्य२ भक्तिसे ही प्राप्त होने योग्य है Il 33 Il ஈ अ॰ ९ श्लोक ४ में देखना चाहिये । १ अ॰ ११ श्लौक ५५ में इसका विस्तार देखना चाहिये। 3 काल शव्दसे मार्ग समझना चाहिये; क्योंकि आगेके ३ श्लोकोंमें भगवानने इसका नाम * सति ' ' गति ऐसा कहा हैं। श्रीमदभगवदगीता अध्याय 8 प्रेस , गोरखपुर से साभार गीता परस्तस्मात्तु भावोउन्योउव्यक्तोडव्यक्तात्सनातनः | सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति Il यः स परे दूसरा अर्थात् विलक्षण  उस अव्यक्तसे भी अति दिव्य पुरुप जो सनातन अव्यक्तभाव है वह परम नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता II २० II q মুনাকধ गतिमू| अव्यक्तोडक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम Il 4 प्राप्य इस नामसे कहा गया है, जो अव्यक्त 37&/{ उसी अक्षर नामक अव्यक्तभावको परमगति कहते हैँ तथा जिस सनातन अव्यक्तभावको प्राप्त होकर मनुप्य वापस नहीं आते. वह मेरा परम धाम है II २१ II पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् II  हे पार्थ! जिस परमात्माके अन्तर्गत सर्वभूत हैँ और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मासे यह समस्त जगत् परिपूर्ण है१ वह सनातन अव्यक्त परम पुरुप तो अनन्य२ भक्तिसे ही प्राप्त होने योग्य है Il 33 Il ஈ अ॰ ९ श्लोक ४ में देखना चाहिये । १ अ॰ ११ श्लौक ५५ में इसका विस्तार देखना चाहिये। 3 काल शव्दसे मार्ग समझना चाहिये; क्योंकि आगेके ३ श्लोकोंमें भगवानने इसका नाम * सति ' ' गति ऐसा कहा हैं। श्रीमदभगवदगीता अध्याय 8 प्रेस , गोरखपुर से साभार गीता - ShareChat
#मेरे विचार #❤️जीवन की सीख #श्रीमद्भगवद् गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔
मेरे विचार - विदुः सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो रात्रिं युगसहस्रान्तां तेउहोरात्रविदो जनाः II ब्रह्माका जो एक दिन है, उसको एक हजार चतुर्युगीतकको अवधिवाला और रात्रिको भी एक हजार चतुर्युगीतककी अवधिवाली जो पुरुष तत्त्वसे जानते हैँ, वे योगीजन कालके तत्त्वको जाननेवाले हैँ Il १७ Il अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे   प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्के ।। सम्पूर्ण चराचर भूतगण ब्रह्माके दिनके प्रवेशकालमें अव्यक्तसे अर्थात् ब्रह्माके सूक्ष्म शरीरसे उत्पन्न होते हैँ और ब्रह्माकी रात्रिके प्रवेशकालमें उस अव्यक्त सूक्ष्मशरीरमें ही लीन हो जाते हैँ II १८ II नामक ब्रह्माके एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। भूतग्रामः स रात्र्यागमेउवशः प्रभवत्यहरागमे II पार्थ ক   সাথ !  নঙ্কী ತನ೯ ೯- 46 भूतसमुदाय प्रकृतिके वशमें हुआ रात्रिके प्रवेशकालमें কান্য लीन होता है और दिनके प्रवेशकालमें  फिर ಹTTT ೯Il  Il 3(47 श्रीमदभगवदगीता अध्याय 8 W; गोरखपुर से साभार যীলা विदुः सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो रात्रिं युगसहस्रान्तां तेउहोरात्रविदो जनाः II ब्रह्माका जो एक दिन है, उसको एक हजार चतुर्युगीतकको अवधिवाला और रात्रिको भी एक हजार चतुर्युगीतककी अवधिवाली जो पुरुष तत्त्वसे जानते हैँ, वे योगीजन कालके तत्त्वको जाननेवाले हैँ Il १७ Il अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे   प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्के ।। सम्पूर्ण चराचर भूतगण ब्रह्माके दिनके प्रवेशकालमें अव्यक्तसे अर्थात् ब्रह्माके सूक्ष्म शरीरसे उत्पन्न होते हैँ और ब्रह्माकी रात्रिके प्रवेशकालमें उस अव्यक्त सूक्ष्मशरीरमें ही लीन हो जाते हैँ II १८ II नामक ब्रह्माके एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। भूतग्रामः स रात्र्यागमेउवशः प्रभवत्यहरागमे II पार्थ ক   সাথ !  নঙ্কী ತನ೯ ೯- 46 भूतसमुदाय प्रकृतिके वशमें हुआ रात्रिके प्रवेशकालमें কান্য लीन होता है और दिनके प्रवेशकालमें  फिर ಹTTT ೯Il  Il 3(47 श्रीमदभगवदगीता अध्याय 8 W; गोरखपुर से साभार যীলা - ShareChat
#श्रीमद्भगवद् गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार
श्रीमद्भगवद् गीता - अनन्यचेताः सततं या मां स्मरति नित्यशः | तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः I। अनन्य चित्त होकर हे अर्जून! जो परुष S# ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्तमको स्मरण करता है, सदा उस नित्य- निरन्तर मुझमें युक्त हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ, अर्थात् उसे सहज हो प्राप्त हो जाता हूँ Il १४ II मामुपेत्य   पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्| नाज्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धि परमां गताः I१ परम सिद्धिको प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखोंके घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होते II १५ Il आब्रह्मभुवनाल्लोकाः   पुनरावर्तिनो्उर्जुन ( मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म ল নিম্ন Il हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकपर्यन्त सब लोक पुनरावर्तो हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र ! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता ; क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादिके लोक कालके द्वारा सीमित होनेसे अनित्य हैं Il १६ Il श्रीमदभगवदगीता अध्याय 8 प्रेस , गोरखपुर से साभार যীলা अनन्यचेताः सततं या मां स्मरति नित्यशः | तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः I। अनन्य चित्त होकर हे अर्जून! जो परुष S# ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्तमको स्मरण करता है, सदा उस नित्य- निरन्तर मुझमें युक्त हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ, अर्थात् उसे सहज हो प्राप्त हो जाता हूँ Il १४ II मामुपेत्य   पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्| नाज्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धि परमां गताः I१ परम सिद्धिको प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखोंके घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होते II १५ Il आब्रह्मभुवनाल्लोकाः   पुनरावर्तिनो्उर्जुन ( मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म ল নিম্ন Il हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकपर्यन्त सब लोक पुनरावर्तो हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र ! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता ; क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादिके लोक कालके द्वारा सीमित होनेसे अनित्य हैं Il १६ Il श्रीमदभगवदगीता अध्याय 8 प्रेस , गोरखपुर से साभार যীলা - ShareChat