MUKESH Nagar
ShareChat
click to see wallet page
@mukeshkhujner
mukeshkhujner
MUKESH Nagar
@mukeshkhujner
व्यस्त रहें, मस्त रहें
#मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕
मेरे विचार - प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति १। और जो पुरुप सम्पूर्ण कर्मोंको सब प्रकारसे  সকৃনিন্ধ द्वारा हो किये जाते हुए देखता हैं और आत्माको अकर्ता  देखता हैं, वही यथार्थ देखता है Il २९ II भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति | মনা एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा।। पृथक्- पृथक् भावको जिस क्षण यह पुरुप " भूतोंके एक परमात्मामें हो स्थित तथा उस परमात्मासे हो विस्तार देखता हैं॰ उसी क्षण वह सम्पूर्ण भूतोंका মমিরানবমন সম্মক্ষী সাদ ক্াঁ ভানা ৮ঁ Il ২০ Il अनादित्वान्नि्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः शरीरस्थोउपि   कौन्तेय न करोति न लिप्यते।। हे अर्जुन ! अनादि होनेसे और निर्गुंण होनेसे यह अविनाशी परमात्मा शरीरमॅं स्थित होनेपर भौ वास्तवमें न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है II ३१ I। यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते। सर्वत्रावस्थितो   देहे तथात्मा नोपलिप्यते ।। आकाश सूक्ष्म होनेकेकारण  जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त लिप्त नहीं होता, वैसे हा दैहमें सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होनेके कारण देहके गुणौंसे लिप्त नहीं होता II३२ II श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १३ गीता प्रेस गोरखपुर से साभार प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति १। और जो पुरुप सम्पूर्ण कर्मोंको सब प्रकारसे  সকৃনিন্ধ द्वारा हो किये जाते हुए देखता हैं और आत्माको अकर्ता  देखता हैं, वही यथार्थ देखता है Il २९ II भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति | মনা एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा।। पृथक्- पृथक् भावको जिस क्षण यह पुरुप " भूतोंके एक परमात्मामें हो स्थित तथा उस परमात्मासे हो विस्तार देखता हैं॰ उसी क्षण वह सम्पूर्ण भूतोंका মমিরানবমন সম্মক্ষী সাদ ক্াঁ ভানা ৮ঁ Il ২০ Il अनादित्वान्नि्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः शरीरस्थोउपि   कौन्तेय न करोति न लिप्यते।। हे अर्जुन ! अनादि होनेसे और निर्गुंण होनेसे यह अविनाशी परमात्मा शरीरमॅं स्थित होनेपर भौ वास्तवमें न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है II ३१ I। यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते। सर्वत्रावस्थितो   देहे तथात्मा नोपलिप्यते ।। आकाश सूक्ष्म होनेकेकारण  जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त लिप्त नहीं होता, वैसे हा दैहमें सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होनेके कारण देहके गुणौंसे लिप्त नहीं होता II३२ II श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १३ गीता प्रेस गोरखपुर से साभार - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #मेरे विचार
❤️जीवन की सीख - 30 रह्णइयं साँसजरयम। आविद्ेष कृणो सिब४। अथर्व ३०!३t अप्रैल ತಂತರಹ[ ಊ೬[ @[ಞರ @೬್ e1 # & uJ 231 47 # उत्तृम िचयार किया करें और ओपस झं प्रेस का बर्ताव करें। ढूलाले स कभी द्ेष न करें।  एक MN 30 रह्णइयं साँसजरयम। आविद्ेष कृणो सिब४। अथर्व ३०!३t अप्रैल ತಂತರಹ[ ಊ೬[ @[ಞರ @೬್ e1 # & uJ 231 47 # उत्तृम िचयार किया करें और ओपस झं प्रेस का बर्ताव करें। ढूलाले स कभी द्ेष न करें।  एक MN - ShareChat
#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख
मेरे विचार - 00 cిన विनाख्राता का अर्थ है अत्यथिक ध्रतिकाूल ٩١R»١٠؟9٢؟ ٦٢٤٤٤٦٩١؟٨٤٢ ٢ @E Gl IREGI @లా लैन्ा, इट्सालिए विनस्र व्यवित्त कभषी &, कहीः क्षी दूढता नही है । MN 00 cిన विनाख्राता का अर्थ है अत्यथिक ध्रतिकाूल ٩١R»١٠؟9٢؟ ٦٢٤٤٤٦٩١؟٨٤٢ ٢ @E Gl IREGI @లా लैन्ा, इट्सालिए विनस्र व्यवित्त कभषी &, कहीः क्षी दूढता नही है । MN - ShareChat
#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख
मेरे विचार - ३०खप्नेल विनम्रताका अर्थहै अत्यथिक प्रतिवनूल UINIFAIGESTణcT ؟٢ rreಖ Hಲಕ[ಗ' होने को क्षमत्ाा पैदा कर लेना, इसलिए विनख्र व्यवित्त क्धी &ीr कह्नी भी दूटता नही है। MN ३०खप्नेल विनम्रताका अर्थहै अत्यथिक प्रतिवनूल UINIFAIGESTణcT ؟٢ rreಖ Hಲಕ[ಗ' होने को क्षमत्ाा पैदा कर लेना, इसलिए विनख्र व्यवित्त क्धी &ीr कह्नी भी दूटता नही है। MN - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #मेरे विचार
🙏 प्रेरणादायक विचार - ३० सह्ृढयं सयँयनरयमू। आविद्वेषं कृणो किव४।   अथर्व ३००३१ 3d- Soar ] कौ ओज्ाा ह्वै कि सब लौल e1 # &2 %a reaji %al #| डित्तृमा दिचयाए कि्या कलैं औल ओपला औैँ द्रैखा का बर्दादय कलैँ। लौ कभी द्वैष ना कलेँ। ढूललै एक MN ३० सह्ृढयं सयँयनरयमू। आविद्वेषं कृणो किव४।   अथर्व ३००३१ 3d- Soar ] कौ ओज्ाा ह्वै कि सब लौल e1 # &2 %a reaji %al #| डित्तृमा दिचयाए कि्या कलैं औल ओपला औैँ द्रैखा का बर्दादय कलैँ। लौ कभी द्वैष ना कलेँ। ढूललै एक MN - ShareChat
#मेरे विचार #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते। Iగైన బfEFTTIT: तेउपि चातितरन्त्येव || परन्तु इनसे दूसरे अर्थात्  पुरुप সথানূ নলন हैेँ, वे इस प्रकार न जानते हुए  दूसरोंसे সানননাল सुनकर ही तदनुसार उपासना पुरुपौंसे करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुप भी मृत्युरूप संसार - सागरको निःसन्देह तर जाते हैं Il २५ Il यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्पभ ।। हे अर्जुन! यावन्मात्र जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं॰ उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे ही उत्पन्न जान II २६ ।I # तिष्ठन्तं   परमेश्वरम्। भूतेपु समं विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति I। होते हुए जो पुरुप   नष्ट भूतोंमें ٦٩ चराचर परमेश्वरको नाशरहित और समभावसे स्थित देखता है, वही यथार्थ देखता हैं Il २७ Il समं   पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्। न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्।।  क्योकिजो पुरुप सवमें समभावसे स्थित परमेश्वरको समान देखता हुआ अपने द्वारा अपनेको नष्ट नहों करता , इससे वह परम गतिको प्राप्त होता हैं Il २८ I श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १३ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते। Iగైన బfEFTTIT: तेउपि चातितरन्त्येव || परन्तु इनसे दूसरे अर्थात्  पुरुप সথানূ নলন हैेँ, वे इस प्रकार न जानते हुए  दूसरोंसे সানননাল सुनकर ही तदनुसार उपासना पुरुपौंसे करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुप भी मृत्युरूप संसार - सागरको निःसन्देह तर जाते हैं Il २५ Il यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्पभ ।। हे अर्जुन! यावन्मात्र जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं॰ उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे ही उत्पन्न जान II २६ ।I # तिष्ठन्तं   परमेश्वरम्। भूतेपु समं विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति I। होते हुए जो पुरुप   नष्ट भूतोंमें ٦٩ चराचर परमेश्वरको नाशरहित और समभावसे स्थित देखता है, वही यथार्थ देखता हैं Il २७ Il समं   पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्। न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्।।  क्योकिजो पुरुप सवमें समभावसे स्थित परमेश्वरको समान देखता हुआ अपने द्वारा अपनेको नष्ट नहों करता , इससे वह परम गतिको प्राप्त होता हैं Il २८ I श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १३ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #मेरे विचार
🙏गीता ज्ञान🛕 - 29ఐలే ణబంeిలబదబంలే ఇlldlqeలే velaaral బిలలే ష91516 अप्रैल कौ डिच्वित् है कि वै জ্ম্ভুঙ্খী औिपृनै कना ढजौ बलवान बनाकर किल्ी लै क्ी न डरतै ह्वुए॰ सदा निर्भयता पूर्वेक ओच्छै कर्त्तव्य करतै रह्लें। N 29ఐలే ణబంeిలబదబంలే ఇlldlqeలే velaaral బిలలే ష91516 अप्रैल कौ डिच्वित् है कि वै জ্ম্ভুঙ্খী औिपृनै कना ढजौ बलवान बनाकर किल्ी लै क्ी न डरतै ह्वुए॰ सदा निर्भयता पूर्वेक ओच्छै कर्त्तव्य करतै रह्लें। N - ShareChat
#मेरे विचार #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕
मेरे विचार - २९ अप्रैल दुनिया में प्रसन्न व स्वस्थ रहने का एक हरी डप्ााय है कि अपनी जरूरतों कौकेमस्ै कम क्रदिया जाए। MN २९ अप्रैल दुनिया में प्रसन्न व स्वस्थ रहने का एक हरी डप्ााय है कि अपनी जरूरतों कौकेमस्ै कम क्रदिया जाए। MN - ShareChat
#📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - २८   योजागारतमृचकामयन्ते योजागारतभुसामानि- वन्ति। अप्रैल योजागार तमयं सोम आह तबाह भस्मि रख्येनव्योकाः अर्थात- जो मनुष्य प्रातःकाल में जाग है उसको ऋचायें चाहती हैं॰ उठता जगता है उसको ही स्तुतियाँ होती हैं। जो मनुष्य जाग जाता है I उसको ईश्वर कहते है कि हे मनुष्य. मैं तेरी मित्रता र्थिर करता हूँ। MN २८   योजागारतमृचकामयन्ते योजागारतभुसामानि- वन्ति। अप्रैल योजागार तमयं सोम आह तबाह भस्मि रख्येनव्योकाः अर्थात- जो मनुष्य प्रातःकाल में जाग है उसको ऋचायें चाहती हैं॰ उठता जगता है उसको ही स्तुतियाँ होती हैं। जो मनुष्य जाग जाता है I उसको ईश्वर कहते है कि हे मनुष्य. मैं तेरी मित्रता र्थिर करता हूँ। MN - ShareChat
#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔
मेरे विचार - य एवं वेत्ति पुरुपं प्रकृतिं च ToT: ೧೯ | सर्वथा वर्तमानोउपि न स भूयोउभिजायते ।। सहित प्रकृतिको  इस प्रकार पुरुपको और  गुणोंके जो मनुष्य तत्त्वसे जानता है९ वह सव प्रकारसे कर्तव्यकर्म करता हुआ भी फिर नहों जन्मता II २३ II ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना | अन्ये साइख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।।  परमात्माको कितने हा मनुप्य तो शुद्ध हुई उस ध्यानके द्वारा हृदयमें देखते हॅ ; अन्य चुद्धिसे सूक्ष्म कितने हो ज्ञानयोगके द्वारा और दूसरे कितने हो कर्मयोगकें द्वारा देखते हैॅ अर्थात् प्राप्त करते हैॅ II २४ II १० दृश्यमात्र सम्पूपं जगत् मायाका कार्यं होनेसे श्वपभंगुर ,  नाशवान जड ओर अनित्य ऐ तथा जोवात्मा नित्य चेतन निर्विकार और अविनाशी एवं शुड बोधस्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्पाका हो मायिक पदार्योके सनातन अंश ऐ इस प्रकार समझकर মম্ূর্ণ  संगका सवंथा त्याग करके परमपुरुषप परमात्मामें हो एकोभावसे नित्य स्थित रहनेका नाम उनको ' तत्वसे जानना ' ४। २. जिसका वणन गीोता अध्याय ६ में श्लोक ११ से ३२ तक  विस्तारपूरवंक किया र। ३. जिसका वणन गोता अध्याय २ में श्लोक ११ से ३० तक विस्तारपूर्वंक किया ऐ। ४. जिसका वणन गोता अध्याय २ मेॅ श्लाक ४० से अथ्याय समाप्तिपर्यंन्त विस्तारपूर्वंक किया रै। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १३ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार य एवं वेत्ति पुरुपं प्रकृतिं च ToT: ೧೯ | सर्वथा वर्तमानोउपि न स भूयोउभिजायते ।। सहित प्रकृतिको  इस प्रकार पुरुपको और  गुणोंके जो मनुष्य तत्त्वसे जानता है९ वह सव प्रकारसे कर्तव्यकर्म करता हुआ भी फिर नहों जन्मता II २३ II ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना | अन्ये साइख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।।  परमात्माको कितने हा मनुप्य तो शुद्ध हुई उस ध्यानके द्वारा हृदयमें देखते हॅ ; अन्य चुद्धिसे सूक्ष्म कितने हो ज्ञानयोगके द्वारा और दूसरे कितने हो कर्मयोगकें द्वारा देखते हैॅ अर्थात् प्राप्त करते हैॅ II २४ II १० दृश्यमात्र सम्पूपं जगत् मायाका कार्यं होनेसे श्वपभंगुर ,  नाशवान जड ओर अनित्य ऐ तथा जोवात्मा नित्य चेतन निर्विकार और अविनाशी एवं शुड बोधस्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्पाका हो मायिक पदार्योके सनातन अंश ऐ इस प्रकार समझकर মম্ূর্ণ  संगका सवंथा त्याग करके परमपुरुषप परमात्मामें हो एकोभावसे नित्य स्थित रहनेका नाम उनको ' तत्वसे जानना ' ४। २. जिसका वणन गीोता अध्याय ६ में श्लोक ११ से ३२ तक  विस्तारपूरवंक किया र। ३. जिसका वणन गोता अध्याय २ में श्लोक ११ से ३० तक विस्तारपूर्वंक किया ऐ। ४. जिसका वणन गोता अध्याय २ मेॅ श्लाक ४० से अथ्याय समाप्तिपर्यंन्त विस्तारपूर्वंक किया रै। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १३ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat