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#🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️ #मेरे विचार
🙏 प्रेरणादायक विचार - [9 फखवरी असफलता के डर को अपने सपनों के बीच की बाधा मत बनने दें॰ बल्कि उसे अपने सफल होने की प्रेरणा बनाएं॰ M [9 फखवरी असफलता के डर को अपने सपनों के बीच की बाधा मत बनने दें॰ बल्कि उसे अपने सफल होने की प्रेरणा बनाएं॰ M - ShareChat
#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - 3 जैसै ष्त पर चढ़ जाश्ष तौ [৫R ढेपना भकान न्ह्वी दिख्ता , ऐसी प्रकार अहकांरी मजुष्य कौ मानव मैँ मानव नही दिखता। MN 3 जैसै ष्त पर चढ़ जाश्ष तौ [৫R ढेपना भकान न्ह्वी दिख्ता , ऐसी प्रकार अहकांरी मजुष्य कौ मानव मैँ मानव नही दिखता। MN - ShareChat
#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - भूमिरापोउनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना   प्रकृतिरष्टधा ११ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, चुद्धि और  अहंकार भी = इस प्रकार यह आठ प्रकारसे विभाजित मेरी प्रकृति हैं। यह आठ प्रकारके भेदोंवाली तो अपरा अर्थात  मेरी जड़ प्रकृति है और हे महावाहो ! इससे दूसरीको,  जिससे यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता हैं, मेरी जोवरूपा परा अर्थात् चेतन সক্ৃনি ٦٢٩ ١١ ٧٠٦ ١١ भूतानि   सर्वाणीत्युपधारय एतद्योनीनि अहं कत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।। हे अर्जुन! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियोंसे हो उत्पन्न होनेवाले हैं और मैँ सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात् सम्पूर्ण जगत्का मूलकारण हूँ II ६ Il परतरं   नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय | সন: मयि सर्वमिदं प्रौतं सूत्रे   मणिगणा ஈ" || हे धनञ्जय ! भिन्न दूसरा कोई भी मुझसे कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् 7# मनियोंके सदृश मुझमें गुँथा हुआ है Il ७ ।l श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 ೩೯, गोरखपुर से साभार गीता भूमिरापोउनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना   प्रकृतिरष्टधा ११ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, चुद्धि और  अहंकार भी = इस प्रकार यह आठ प्रकारसे विभाजित मेरी प्रकृति हैं। यह आठ प्रकारके भेदोंवाली तो अपरा अर्थात  मेरी जड़ प्रकृति है और हे महावाहो ! इससे दूसरीको,  जिससे यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता हैं, मेरी जोवरूपा परा अर्थात् चेतन সক্ৃনি ٦٢٩ ١١ ٧٠٦ ١١ भूतानि   सर्वाणीत्युपधारय एतद्योनीनि अहं कत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।। हे अर्जुन! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियोंसे हो उत्पन्न होनेवाले हैं और मैँ सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात् सम्पूर्ण जगत्का मूलकारण हूँ II ६ Il परतरं   नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय | সন: मयि सर्वमिदं प्रौतं सूत्रे   मणिगणा ஈ" || हे धनञ्जय ! भिन्न दूसरा कोई भी मुझसे कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् 7# मनियोंके सदृश मुझमें गुँथा हुआ है Il ७ ।l श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 ೩೯, गोरखपुर से साभार गीता - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार ##भगवद गीता🙏🕉️ #मेरे विचार
❤️जीवन की सीख - 00 बढ़तै चलै॰ अंधैरों में { ज्यादा दभ नह्वी ह्ौता , निवाहौं का उज्ाला भी दीर्यौं सै क्म न्ही हौता MN 00 बढ़तै चलै॰ अंधैरों में { ज्यादा दभ नह्वी ह्ौता , निवाहौं का उज्ाला भी दीर्यौं सै क्म न्ही हौता MN - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #मेरे विचार ##भगवद गीता🙏🕉️ #❤️जीवन की सीख
🙏 प्रेरणादायक विचार - अथ सप्तमोडध्यायः श्रोभगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः | असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ।। श्रीभगवान् बोले-्हे पार्थ ! अनन्यप्रेमसे मुझमें आसक्तचित्त तथा अनन्यभावसे मैरे पण्यण होकर योगमें लगा हुआ तू जिस प्रकारसे सम्पूर्ण विभूति बल,   ऐश्वर्यादि युक्त,  सबके गुणोंसे आत्मरूप संशयरहित जानेगा, उसको सुन II १ Il मुझको ज्ञानं तेउ्हं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेपतः | यज्ज्ञात्वा नेह भूयोउन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते II मैं तेरे लिये इस   विज्ञानसहित  तत्त्वज्ञानको सम्पूर्णतया कहूँगा, जिसको जानकर संसारमें फिर और कुछ भी जाननेयोग्य शेप नहीं रह जाता II २ II मनुष्याणां सहस्रेपु कश्चिद्यतति सिद्धये  '1 यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ।। कोई एक मेरी प्राप्तिके लिये हजारों मनुप्योंमें यत्न करता है और उन यत् करनेवाले योगियोंमें भी कोई एक मेरे परायण होकर तत्त्वसे मुझको अर्थात्  ೫೫೫೯ಂ `lq ೯ Il ? Il श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 प्रेस , गोरखपुर से साभार যীলা अथ सप्तमोडध्यायः श्रोभगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः | असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ।। श्रीभगवान् बोले-्हे पार्थ ! अनन्यप्रेमसे मुझमें आसक्तचित्त तथा अनन्यभावसे मैरे पण्यण होकर योगमें लगा हुआ तू जिस प्रकारसे सम्पूर्ण विभूति बल,   ऐश्वर्यादि युक्त,  सबके गुणोंसे आत्मरूप संशयरहित जानेगा, उसको सुन II १ Il मुझको ज्ञानं तेउ्हं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेपतः | यज्ज्ञात्वा नेह भूयोउन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते II मैं तेरे लिये इस   विज्ञानसहित  तत्त्वज्ञानको सम्पूर्णतया कहूँगा, जिसको जानकर संसारमें फिर और कुछ भी जाननेयोग्य शेप नहीं रह जाता II २ II मनुष्याणां सहस्रेपु कश्चिद्यतति सिद्धये  '1 यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ।। कोई एक मेरी प्राप्तिके लिये हजारों मनुप्योंमें यत्न करता है और उन यत् करनेवाले योगियोंमें भी कोई एक मेरे परायण होकर तत्त्वसे मुझको अर्थात्  ೫೫೫೯ಂ `lq ೯ Il ? Il श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 प्रेस , गोरखपुर से साभार যীলা - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏 प्रेरणादायक विचार
❤️जीवन की सीख - ]2 फखवरी जीवन में सबरोे ज्यादा सफल वो लोग हुए है जिनमें सबसो ज्यादा धैर्य और लगन थी, इसलिए धैर्य और लगन को जीवन में आत्मसात करें। M ]2 फखवरी जीवन में सबरोे ज्यादा सफल वो लोग हुए है जिनमें सबसो ज्यादा धैर्य और लगन थी, इसलिए धैर्य और लगन को जीवन में आत्मसात करें। M - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏गीता ज्ञान🛕 #मेरे विचार #❤️जीवन की सीख
🙏 प्रेरणादायक विचार - प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः 1 अनेकजन्मसंसिद्द्धस्ततो याति परां गतिम्।l परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी तो पिछले अनेक जन्मोंके संस्कारबलसे इसी जन्ममें पापोंसे रहित हा फिर तत्काल संसिद्ध होकर सम्पूर्ण  ही परमगतिको प्राप्त हो जाता है Il ४५ Il तपस्विभ्योउधिको योगी ज्ञानिभ्योउपि मतोउधिकः | कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन १। योगी तपस्वियोंसे श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियोंसे भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करनेवालोंसे भी योगी बह ' शब्दसे श्रनानौोंके बरनें जन्न लेनेवाला योगश्रप्ट परुप समड़ना चाहिने। श्रेष्ठ है; इससे हे अर्जुन ! हा ।l ४६ Il লু সীর্যী योगिनामपि मद्गतेनान्तरात्मना । सर्वेषां श्रदद्धावान्भजते या मां स मे युक्ततमो मतः ११  योगियोंमें भी जो श्रद्धावान् योगी मुझमें সম্পুত लगे हुए अन्तरात्मासे निरन्तर भजता है, मुझको वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है Il ४७ Il ३> तत्सदिति श्रीमद्भगवदीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो  नाम षष्ठाडध्यायः II ६।l -==0-=-= श्रीमदभगवदगीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपुर से साभार যীলা प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः 1 अनेकजन्मसंसिद्द्धस्ततो याति परां गतिम्।l परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी तो पिछले अनेक जन्मोंके संस्कारबलसे इसी जन्ममें पापोंसे रहित हा फिर तत्काल संसिद्ध होकर सम्पूर्ण  ही परमगतिको प्राप्त हो जाता है Il ४५ Il तपस्विभ्योउधिको योगी ज्ञानिभ्योउपि मतोउधिकः | कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन १। योगी तपस्वियोंसे श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियोंसे भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करनेवालोंसे भी योगी बह ' शब्दसे श्रनानौोंके बरनें जन्न लेनेवाला योगश्रप्ट परुप समड़ना चाहिने। श्रेष्ठ है; इससे हे अर्जुन ! हा ।l ४६ Il লু সীর্যী योगिनामपि मद्गतेनान्तरात्मना । सर्वेषां श्रदद्धावान्भजते या मां स मे युक्ततमो मतः ११  योगियोंमें भी जो श्रद्धावान् योगी मुझमें সম্পুত लगे हुए अन्तरात्मासे निरन्तर भजता है, मुझको वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है Il ४७ Il ३> तत्सदिति श्रीमद्भगवदीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो  नाम षष्ठाडध्यायः II ६।l -==0-=-= श्रीमदभगवदगीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपुर से साभार যীলা - ShareChat
#मेरे विचार ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏कर्म क्या है❓ #🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔
मेरे विचार - ٦٦ [R] जीतनै रै जीत पहले और ह्वार सै पहले हर॰ चाहिए। कभी नर्ह्ी भाननी MN ٦٦ [R] जीतनै रै जीत पहले और ह्वार सै पहले हर॰ चाहिए। कभी नर्ह्ी भाननी MN - ShareChat
##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏कर्म क्या है❓ #🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #मेरे विचार
#भगवद गीता🙏🕉️ - फखवर 0 धनी बनने के प्रयास में हो सकता है॰ असफलता प्राप्त परतु @1 गुणवान बनने के प्रयास 61 Fuad नर्ही होते। M फखवर 0 धनी बनने के प्रयास में हो सकता है॰ असफलता प्राप्त परतु @1 गुणवान बनने के प्रयास 61 Fuad नर्ही होते। M - ShareChat
##भगवद गीता🙏🕉️ #मेरे विचार
#भगवद गीता🙏🕉️ - फखवर 0 धनी बनने के प्रयास में हो सकता है॰ असफलता प्राप्त परतु @1 गुणवान बनने के प्रयास 61 Fuad नर्ही होते। M फखवर 0 धनी बनने के प्रयास में हो सकता है॰ असफलता प्राप्त परतु @1 गुणवान बनने के प्रयास 61 Fuad नर्ही होते। M - ShareChat