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#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - अर्जुन उवाच कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो। किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ।। সানুন নাল --ব্ন নীনীা  अतीत पुरुप किन- गुणौंसे किन लक्षणोंसे युक्त होता है और किस प्रकारके आचरणोंवाला होता हैं तथा हे प्रभो ! मनुप्य किस उपायसे इन तीनों गुणोंसे अतीत होता हैं ? II २१ Il প্ীপযনানুনান प्रवृत्ति च मोहमेव च पाण्डव१ प्रकाशं च न द्वेप्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति १।  श्रीभगवान् बोले ~ हे अर्जुन ! जो पुरुप सत्त्वगुणके और रजोगुणके कार्यरूप प्रवृत्तिको  कार्यरूप प्रकाशको १ तथा तमोगुणके कार्यरूप मोहको२ भी न तो प्रवृत्त होनेपर उनसे द्वेप करता हैं और न निवृत्त होनेपर उनकी आकांक्षा करता हैंर Il २२ Il अन्तःकरण और इन्द्रि्याादकोंमें आलस्यका अभाव होकर १ जो एक प्रकारको चेतनता होती हॅ॰ प्रकाश ' हं। उसको नाम २० निद्रा और आलस्य आदिको बहुलतासे अत्तःकरण और ' मोह  इद्द्रियांमं चेतनशकिके लय होनेको यहाँ नामसे समझना चारये। जो पुरुप " एक सचिदानन्दवन परमात्मामें हो नित्य, एकोभावसे 3. स्थित हआ इस त्रिगणमयो मायाके प्रपंचरूप संसारसे सर्वंथा अतीत अभिमानर्रहत अत्तःकरणमें तोनों हा गया हें॰ उस गुणातीत परुपके সক্ষম স্াঁর गुरणोंके कार्यरूप प्रकाश, प्रवृत्ति और मर्हाद वृत्तियोंके और न होनेपर किसो कालर्में भो इच्छा- ढ्वेप आद चिकार नहों हॅ॰यही उसके गुणांसे अतीत होनेके प्रधान लक्षण हॅ। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार अर्जुन उवाच कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो। किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ।। সানুন নাল --ব্ন নীনীা  अतीत पुरुप किन- गुणौंसे किन लक्षणोंसे युक्त होता है और किस प्रकारके आचरणोंवाला होता हैं तथा हे प्रभो ! मनुप्य किस उपायसे इन तीनों गुणोंसे अतीत होता हैं ? II २१ Il প্ীপযনানুনান प्रवृत्ति च मोहमेव च पाण्डव१ प्रकाशं च न द्वेप्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति १।  श्रीभगवान् बोले ~ हे अर्जुन ! जो पुरुप सत्त्वगुणके और रजोगुणके कार्यरूप प्रवृत्तिको  कार्यरूप प्रकाशको १ तथा तमोगुणके कार्यरूप मोहको२ भी न तो प्रवृत्त होनेपर उनसे द्वेप करता हैं और न निवृत्त होनेपर उनकी आकांक्षा करता हैंर Il २२ Il अन्तःकरण और इन्द्रि्याादकोंमें आलस्यका अभाव होकर १ जो एक प्रकारको चेतनता होती हॅ॰ प्रकाश ' हं। उसको नाम २० निद्रा और आलस्य आदिको बहुलतासे अत्तःकरण और ' मोह  इद्द्रियांमं चेतनशकिके लय होनेको यहाँ नामसे समझना चारये। जो पुरुप " एक सचिदानन्दवन परमात्मामें हो नित्य, एकोभावसे 3. स्थित हआ इस त्रिगणमयो मायाके प्रपंचरूप संसारसे सर्वंथा अतीत अभिमानर्रहत अत्तःकरणमें तोनों हा गया हें॰ उस गुणातीत परुपके সক্ষম স্াঁর गुरणोंके कार्यरूप प्रकाश, प्रवृत्ति और मर्हाद वृत्तियोंके और न होनेपर किसो कालर्में भो इच्छा- ढ्वेप आद चिकार नहों हॅ॰यही उसके गुणांसे अतीत होनेके प्रधान लक्षण हॅ। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - 09 सईसदाचार से प्राप्त होने वाला सुख स्थायी और मूल्यः ঔ, খনন৫ 66 ५कर्तव्य पालन ೧ रूपी कीमत ತಹಗ पर ही मिलता है॰ MN 09 सईसदाचार से प्राप्त होने वाला सुख स्थायी और मूल्यः ঔ, খনন৫ 66 ५कर्तव्य पालन ೧ रूपी कीमत ತಹಗ पर ही मिलता है॰ MN - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार #मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔
❤️जीवन की सीख - 9 जिंदगी में अगर लक्ष्य बड़ा हो तो संघर्ष भी बड़ा ही करना पड़ता हैं। MNI 9 जिंदगी में अगर लक्ष्य बड़ा हो तो संघर्ष भी बड़ा ही करना पड़ता हैं। MNI - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 #मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख
🙏गीता ज्ञान🛕 - नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति। गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोउधिगच्छति I१ जिस समय द्रष्टा तीनों अतिरिक्त अन्य गुणोंके किसीको कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणौंसे अत्यन्त परे सच्चिदानन्दघनस्वरूप मुझ परमात्माको तत्त्वसे जानता हैं, उस समय वह मैरे स्वरूपको प्राप्त होता हैंIl १९ II गुणानेतानतीत्य   त्रीन्देही   देहसमुद्भवान्। जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोउमृतमश्नुते यह पुरुप शरीरको * उत्पत्तिके कारणरूप इन तीनों गुणौंको उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु वृद्धावस्था और सव प्रकारके दुःखोंसे मुक्त हुआ परमानन्दको प्राप्त होता है Il २० Il पाँच पाँच   ज्ञानेन्द्रियाँ युद्धि, अहंकार और मन   तथा कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत पाँच इन्द्रियोंके विपय- इस प्रकार इन तेईंस   तत्त्वोंका पिण्डरूप यह स्थूल शरौर   प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले हा कार्यं हैं॰ इसलिये इन तौनों इसको गुणोंको गुणोंका उत्पत्तिका कारण कहा हं। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति। गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोउधिगच्छति I१ जिस समय द्रष्टा तीनों अतिरिक्त अन्य गुणोंके किसीको कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणौंसे अत्यन्त परे सच्चिदानन्दघनस्वरूप मुझ परमात्माको तत्त्वसे जानता हैं, उस समय वह मैरे स्वरूपको प्राप्त होता हैंIl १९ II गुणानेतानतीत्य   त्रीन्देही   देहसमुद्भवान्। जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोउमृतमश्नुते यह पुरुप शरीरको * उत्पत्तिके कारणरूप इन तीनों गुणौंको उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु वृद्धावस्था और सव प्रकारके दुःखोंसे मुक्त हुआ परमानन्दको प्राप्त होता है Il २० Il पाँच पाँच   ज्ञानेन्द्रियाँ युद्धि, अहंकार और मन   तथा कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत पाँच इन्द्रियोंके विपय- इस प्रकार इन तेईंस   तत्त्वोंका पिण्डरूप यह स्थूल शरौर   प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले हा कार्यं हैं॰ इसलिये इन तौनों इसको गुणोंको गुणोंका उत्पत्तिका कारण कहा हं। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
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🙏 प्रेरणादायक विचार - 8 चुनौतियों को स्वीकार करो , মক্লা क्योंकि इससे यातों सिफलता शिक्षा मिलेगी या फिर शिक्षाा MN ব্রুলীনিযাঁ 8 चुनौतियों को स्वीकार करो , মক্লা क्योंकि इससे यातों सिफलता शिक्षा मिलेगी या फिर शिक्षाा MN ব্রুলীনিযাঁ - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार
❤️जीवन की सीख - 08 कहावत है Uకే सूरज में भोजन करे॰ चन्द्र में पीवै पानी। पालन इसका जो करै राखे अटल जवानी MN 08 कहावत है Uకే सूरज में भोजन करे॰ चन्द्र में पीवै पानी। पालन इसका जो करै राखे अटल जवानी MN - ShareChat
#📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #मेरे विचार #❤️जीवन की सीख
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - 7 W பரிசசி মীs 31& कभी हिम्मत् मेत हारना , क्योंकि तुम्हारी हिम्मत ही तुम्हें हर कठिनाई से बाहर निकालेगी MN 7 W பரிசசி মীs 31& कभी हिम्मत् मेत हारना , क्योंकि तुम्हारी हिम्मत ही तुम्हें हर कठिनाई से बाहर निकालेगी MN - ShareChat
#📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार #मेरे विचार
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - 07 दुनिया के பS भाग्य को रेक ಹಾ Fಡಹಗೆ নালে নী ৪} ಡಿಂ काएण पहला अभिमान ढूसला घृणा| MN 07 दुनिया के பS भाग्य को रेक ಹಾ Fಡಹಗೆ নালে নী ৪} ಡಿಂ काएण पहला अभिमान ढूसला घृणा| MN - ShareChat
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मेरे विचार - कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्। रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् II श्रेष्ठ कर्मका तो सात्त्विक अर्थांत् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा हैं; राजस कर्मका फल दुःख एवं तामस कर्मका फल अज्ञान कहा हैं II १६ II सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। प्रमादमोहौ   तमसो   भवतोउ्ज्ञानमेव च।। सत्त्वगुणसे ज्ञान उत्पन्न होता हैं और रजोगुणसे  निस्सन्देह लोभ तथा तमोगुणसे प्रमाद * और मोह २ उत्पन्न होते हैॅं और अज्ञान भौ होता है Il १७ ।l ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः | जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः II  सत्त्वगुणमें स्थित पुरुप स्वर्गांदि उच्च लोकोंको  जाते हैं॰ रजोगुणमें स्थित राजस   पुरुप   मध्यमें अर्थांत् मनूष्यलोकमें होे रहते हैं और तमोगूणके प्रमाद और आलस्यादिमें स्थित AAl, कार्यरूप तामस पुरुप अधोगतिको अर्थात् कोट, पशु आदि नीच योनियोंको तथा नरकोंको प्राप्त होते हैं II १८ १I १-२. इसो अध्यायके श्लोक १३ में देखना चाहिये। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्। रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् II श्रेष्ठ कर्मका तो सात्त्विक अर्थांत् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा हैं; राजस कर्मका फल दुःख एवं तामस कर्मका फल अज्ञान कहा हैं II १६ II सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। प्रमादमोहौ   तमसो   भवतोउ्ज्ञानमेव च।। सत्त्वगुणसे ज्ञान उत्पन्न होता हैं और रजोगुणसे  निस्सन्देह लोभ तथा तमोगुणसे प्रमाद * और मोह २ उत्पन्न होते हैॅं और अज्ञान भौ होता है Il १७ ।l ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः | जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः II  सत्त्वगुणमें स्थित पुरुप स्वर्गांदि उच्च लोकोंको  जाते हैं॰ रजोगुणमें स्थित राजस   पुरुप   मध्यमें अर्थांत् मनूष्यलोकमें होे रहते हैं और तमोगूणके प्रमाद और आलस्यादिमें स्थित AAl, कार्यरूप तामस पुरुप अधोगतिको अर्थात् कोट, पशु आदि नीच योनियोंको तथा नरकोंको प्राप्त होते हैं II १८ १I १-२. इसो अध्यायके श्लोक १३ में देखना चाहिये। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
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🙏गीता ज्ञान🛕 - अप्रकाशोउप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे   कुरुनन्दन ।। हे अर्जुन ! तमोगुणके वढ़नेपर अन्तःकरण और इन्द्रियोंमें अप्रकाश, कर्तव्य-कर्मोंमें अप्रवृत्ति और प्रमाद अर्थात् व्यर्थ चेष्टा और निद्रादि अन्तःकरणकी मोहिनी वृत्तियाँ ~ये सव ही उत्पन्न होते हैं II १३ II यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्। तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ।। यह मनुप्य सत्त्वगुणको वृद्धिमें मृत्युको Jq तव तो उत्तम कर्म करनेवालौंके प्राप्त होता हैं, निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकौंको प्राप्त होता हैं Il १४ II रजसि  प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिपु  जायते। प्रलीनस्तमसि   मूढयोनिपु ತTಾಗ Il तथा रजोगुणके वढ़नेपर मृत्युको प्राप्त होकर कर्मोंको आसक्तिवाले   मनुप्योंमें 8; কানা उत्पत्न तथा तमोगुणके चढ़नेपर मरा हुआ मनुप्य कीट, पशु आदि  मूढ़योनियोंमें होता   है Il १५ II उत्पन्न श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार अप्रकाशोउप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे   कुरुनन्दन ।। हे अर्जुन ! तमोगुणके वढ़नेपर अन्तःकरण और इन्द्रियोंमें अप्रकाश, कर्तव्य-कर्मोंमें अप्रवृत्ति और प्रमाद अर्थात् व्यर्थ चेष्टा और निद्रादि अन्तःकरणकी मोहिनी वृत्तियाँ ~ये सव ही उत्पन्न होते हैं II १३ II यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्। तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ।। यह मनुप्य सत्त्वगुणको वृद्धिमें मृत्युको Jq तव तो उत्तम कर्म करनेवालौंके प्राप्त होता हैं, निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकौंको प्राप्त होता हैं Il १४ II रजसि  प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिपु  जायते। प्रलीनस्तमसि   मूढयोनिपु ತTಾಗ Il तथा रजोगुणके वढ़नेपर मृत्युको प्राप्त होकर कर्मोंको आसक्तिवाले   मनुप्योंमें 8; কানা उत्पत्न तथा तमोगुणके चढ़नेपर मरा हुआ मनुप्य कीट, पशु आदि  मूढ़योनियोंमें होता   है Il १५ II उत्पन्न श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat