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#❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #मेरे विचार ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏गीता ज्ञान🛕
❤️जीवन की सीख - सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेपतः 0 मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ।। संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंको निःशेपरूपसे त्यागकर और मनके द्वारा इन्द्रियोंके समुदायको सभी ओरसे भलीभाँति रोककर - II २४ I।  शनैरुपरमेद्बुद्ध्या  হান: धृतिगृहीतया 45 आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्।।  करता हुआ उपरतिको क्रम-्क्रमसे अभ्यास धैर्ययुक्त 7 चुद्धिके द्वारा मनको परमात्मामें प्राप्त हा तथा स्थित परमात्माके   सिवा और कुछ 37 करके নিলন ন কংII ২4 Il মনা यतो   निश्चरति   मनश्चञ्चलमस्थिरम्। নমনূ Il ततस्ततो   नियम्यैतदात्मन्येव a यह स्थिर न रहनेवाला और चञ्चल मन जिस- जिस शव्दादि विपयके निमित्तसे संसारमें विचरता उस-उस विपयसे रोककर यानी हटाकर इसे & वार-्चार परमात्मामें ही निरुद्ध करे।। २६ ।। श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपूर से सामार गीता सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेपतः 0 मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ।। संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंको निःशेपरूपसे त्यागकर और मनके द्वारा इन्द्रियोंके समुदायको सभी ओरसे भलीभाँति रोककर - II २४ I।  शनैरुपरमेद्बुद्ध्या  হান: धृतिगृहीतया 45 आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्।।  करता हुआ उपरतिको क्रम-्क्रमसे अभ्यास धैर्ययुक्त 7 चुद्धिके द्वारा मनको परमात्मामें प्राप्त हा तथा स्थित परमात्माके   सिवा और कुछ 37 करके নিলন ন কংII ২4 Il মনা यतो   निश्चरति   मनश्चञ्चलमस्थिरम्। নমনূ Il ततस्ततो   नियम्यैतदात्मन्येव a यह स्थिर न रहनेवाला और चञ्चल मन जिस- जिस शव्दादि विपयके निमित्तसे संसारमें विचरता उस-उस विपयसे रोककर यानी हटाकर इसे & वार-्चार परमात्मामें ही निरुद्ध करे।। २६ ।। श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपूर से सामार गीता - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏गीता ज्ञान🛕
❤️जीवन की सीख - फखवरी 4 धैर्य एक महत्वपूर्ण गुण है जो हर Runal ಹr समाधान देता है॰ धैर्य रख्ने से हारी हुई बाजी भी जीती सकती हैं। ড M फखवरी 4 धैर्य एक महत्वपूर्ण गुण है जो हर Runal ಹr समाधान देता है॰ धैर्य रख्ने से हारी हुई बाजी भी जीती सकती हैं। ড M - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 ##भगवद गीता🙏🕉️ #❤️जीवन की सीख
🙏गीता ज्ञान🛕 - सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः Il इन्द्रियोंसे अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिद्वाण ग्रहण  करनेयोग्य जो अनन्त आनन्द हैें; उसको जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस अवस्थामें स्थित यह योगी परमात्माके स्वरूपसे विचलित होता ही नहीं II २१ II यं लव्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः | यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ।। परमात्माको प्राप्तिरूप जिस लाभको प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मप्राप्तिरूप जिस अवस्थामें स्थित योगी वड़े भारी दुःखसे भी चलायमान नहीं होता II २२ II तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसज्ज्ञितम् " स निश्चयेन योक्तव्यो योगोउनिर्विण्णचेतसा I। जो दुःखरूप संसारके संयोगसे रहित है तथा जिसका नाम योग है; उसको जानना चाहिये। वह योग न उकताये हुए अर्थात् धैर्य और उत्साहयुक्त चित्तसे निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य हैIl २३ ।। श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपूर से सामार गीता सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः Il इन्द्रियोंसे अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिद्वाण ग्रहण  करनेयोग्य जो अनन्त आनन्द हैें; उसको जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस अवस्थामें स्थित यह योगी परमात्माके स्वरूपसे विचलित होता ही नहीं II २१ II यं लव्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः | यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ।। परमात्माको प्राप्तिरूप जिस लाभको प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मप्राप्तिरूप जिस अवस्थामें स्थित योगी वड़े भारी दुःखसे भी चलायमान नहीं होता II २२ II तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसज्ज्ञितम् " स निश्चयेन योक्तव्यो योगोउनिर्विण्णचेतसा I। जो दुःखरूप संसारके संयोगसे रहित है तथा जिसका नाम योग है; उसको जानना चाहिये। वह योग न उकताये हुए अर्थात् धैर्य और उत्साहयुक्त चित्तसे निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य हैIl २३ ।। श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपूर से सामार गीता - ShareChat
#मेरे विचार ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕
मेरे विचार - [@ फूल चहे कितनी मी पर क्यौँ ना लव छँचीं डहनी खायै॰ लैकिन मिही सै जुड्न रहता है तभी खिलता है। MN [@ फूल चहे कितनी मी पर क्यौँ ना लव छँचीं डहनी खायै॰ लैकिन मिही सै जुड्न रहता है तभी खिलता है। MN - ShareChat
#मेरे विचार ##भगवद गीता🙏🕉️ #❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕
मेरे विचार - फखवरी 0 किसी की जुबान बोलती है॰ किसी की नीयत बोलती है॰ किसी का पैसा बोलता है॰ किसी का समय बोलता है॰ किसी का पद बोलता है॰ परंतु जीवन के अंत में ईश्वर के सामने तो बस व्यक्ति का कर्म बोलता है॰४४  M फखवरी 0 किसी की जुबान बोलती है॰ किसी की नीयत बोलती है॰ किसी का पैसा बोलता है॰ किसी का समय बोलता है॰ किसी का पद बोलता है॰ परंतु जीवन के अंत में ईश्वर के सामने तो बस व्यक्ति का कर्म बोलता है॰४४  M - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार
🙏 प्रेरणादायक विचार - फखवरी ೧' कभी 28 मत सोचो कि संघर्ष खत्म हो जाएँगें ये जीवन जब तक रहेगा संघर्ष हर रोजू रूप बदलकर आयेंगें। M फखवरी ೧' कभी 28 मत सोचो कि संघर्ष खत्म हो जाएँगें ये जीवन जब तक रहेगा संघर्ष हर रोजू रूप बदलकर आयेंगें। M - ShareChat
#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️ #❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - 02 थित्र॰ Scae ecal [gR{] और विचर गलत ह्वौँ तौ जुमरह कर दैतै हैँ और चदि सही हौँ तौ जीवन बना दैतैं हैं। MN 02 थित्र॰ Scae ecal [gR{] और विचर गलत ह्वौँ तौ जुमरह कर दैतै हैँ और चदि सही हौँ तौ जीवन बना दैतैं हैं। MN - ShareChat
#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । विनियतं ಶಷT निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा I। अत्यन्त वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें परमात्मामें ही भलीभाँति स्थित हा जाता है॰ उस कालमें सम्पूर्ण भोगोंसे स्पृहारहित पुरुप योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है Il १८ II यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता | योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः Il जिस प्रकार वायुरहित स्थानमें स्थित दोपक चलाय- मान नहीं होता, वैसी ही उपमा परमात्माके ध्यानमें लगे हुए योगीके जीते हुए चित्तको कही गयी है II १९ II योगसेवया यत्रोपरमते ಗ೯ಷೆ মিল यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति १l योगके अभ्याससे निरुद्ध चित्त जिस अवस्थामें उपराम हाे जाता हैं और जिस अवस्थामें परमात्माके ध्यानसे शुद्ध हुई सूक्ष्म चुद्धिद्वारा परमात्माको साक्षात् करता हुआ  सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही सन्तुष्ट रहता हैं II २० Il श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपूर से सामार गीता चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । विनियतं ಶಷT निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा I। अत्यन्त वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें परमात्मामें ही भलीभाँति स्थित हा जाता है॰ उस कालमें सम्पूर्ण भोगोंसे स्पृहारहित पुरुप योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है Il १८ II यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता | योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः Il जिस प्रकार वायुरहित स्थानमें स्थित दोपक चलाय- मान नहीं होता, वैसी ही उपमा परमात्माके ध्यानमें लगे हुए योगीके जीते हुए चित्तको कही गयी है II १९ II योगसेवया यत्रोपरमते ಗ೯ಷೆ মিল यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति १l योगके अभ्याससे निरुद्ध चित्त जिस अवस्थामें उपराम हाे जाता हैं और जिस अवस्थामें परमात्माके ध्यानसे शुद्ध हुई सूक्ष्म चुद्धिद्वारा परमात्माको साक्षात् करता हुआ  सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही सन्तुष्ट रहता हैं II २० Il श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपूर से सामार गीता - ShareChat
##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार
#भगवद गीता🙏🕉️ - युञ्जन्नेवं   सदात्मानं योगी   नियतमानसः | शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति Il वशमें किये हुए मनवाला योगी इस प्रकार आत्माको निरन्तर मुझ परमेश्वरके स्वरूपमें लगाता रहनेवाली परमानन्दको पराकाष्ठारूप हुआ मुझमें शान्तिको प्राप्त होता हैIl १५ ।l नात्यश्नतस्तु योगोडस्ति न चैकान्तमनश्नतः | न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।। हे अर्जुन! यह योग न तो वहुत खानेवालेका, न विलकुल न खानेवालेका, न वहुत शयन करनेके  स्वभाववालेका और न 6 எ்ளள் = Tis ఃIT గైII ?6 Il कर्मसु " युक्ताहारविहारस्य  युक्तचेप्टस्य  युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा Il दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार - विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका और यथायोग्य सोने तथा जागनेवालेका हा सिद्ध होता है Il १७ ।। श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपूर से सामार गीता युञ्जन्नेवं   सदात्मानं योगी   नियतमानसः | शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति Il वशमें किये हुए मनवाला योगी इस प्रकार आत्माको निरन्तर मुझ परमेश्वरके स्वरूपमें लगाता रहनेवाली परमानन्दको पराकाष्ठारूप हुआ मुझमें शान्तिको प्राप्त होता हैIl १५ ।l नात्यश्नतस्तु योगोडस्ति न चैकान्तमनश्नतः | न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।। हे अर्जुन! यह योग न तो वहुत खानेवालेका, न विलकुल न खानेवालेका, न वहुत शयन करनेके  स्वभाववालेका और न 6 எ்ளள் = Tis ఃIT గైII ?6 Il कर्मसु " युक्ताहारविहारस्य  युक्तचेप्टस्य  युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा Il दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार - विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका और यथायोग्य सोने तथा जागनेवालेका हा सिद्ध होता है Il १७ ।। श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपूर से सामार गीता - ShareChat
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मेरे विचार - 01 चौरी ॰ निँदा और { झूठ॰ यै तीज बातें चरित्र कौ नष् @ करती MN 01 चौरी ॰ निँदा और { झूठ॰ यै तीज बातें चरित्र कौ नष् @ करती MN - ShareChat