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#मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕
मेरे विचार - 0 cిన गुणवान व्यक्ति द्वारा की गई टूसरों गलतियों से सीखकर भी अपना सुधार कर सकते है। MN 0 cిన गुणवान व्यक्ति द्वारा की गई टूसरों गलतियों से सीखकर भी अपना सुधार कर सकते है। MN - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #मेरे विचार
❤️जीवन की सीख - 01 हम सब एक है 3G कैवल अहॅकार॰ विश्वस और भय %4 ही हमैँ अलग करतै 01 हम सब एक है 3G कैवल अहॅकार॰ विश्वस और भय %4 ही हमैँ अलग करतै - ShareChat
#श्रीमद भगवद्गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔
श्रीमद भगवद्गीता - ज्चलनं   पतङ्गा- यथा   प्रदीप्तं विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः | तथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः II जैंसे पतंग मोहवश नष्ट होनेके लिये प्रज्चलित अग्निमें अतिवेगसे दौड़ते हुए प्रवेश करते हैं वैंसे हौ ये सव लोग भौ अपने नाशके लिये आपके अतिवेगसे दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैँ Il २९ II T ললিম্ম যম্সানঃ समन्ता- ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्धिः 49 तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं- भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विप्णो ।l आप उन सम्पूर्ण लौकौंको प्रज्वलित मुखौंद्वारा  ग्रास करते हुए सब औरसे बार-्चार चाट रहे हैेँ सम्पूर्ण जगतूको हे विण्गो ! आपका उग्र प्रकाश तेजके द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है Il ३० Il आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो - नमोडस्तु देववर সমীন| ন विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं - न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्।। मुझे बतलाइये कि आप उग्ररूपवाले कौन हैं ? हे देवौंमें श्रेष्ठ ! आपको नमस्कार हो।आप प्रसत्र होइये | आदिपुरुप आपको मैँ विशेपरूपसे जानना क्यौंकि मेँ आपको प्रवृत्तिको नहीँ & चाहता সাননা Il 3? Il श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार ज्चलनं   पतङ्गा- यथा   प्रदीप्तं विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः | तथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः II जैंसे पतंग मोहवश नष्ट होनेके लिये प्रज्चलित अग्निमें अतिवेगसे दौड़ते हुए प्रवेश करते हैं वैंसे हौ ये सव लोग भौ अपने नाशके लिये आपके अतिवेगसे दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैँ Il २९ II T ললিম্ম যম্সানঃ समन्ता- ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्धिः 49 तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं- भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विप्णो ।l आप उन सम्पूर्ण लौकौंको प्रज्वलित मुखौंद्वारा  ग्रास करते हुए सब औरसे बार-्चार चाट रहे हैेँ सम्पूर्ण जगतूको हे विण्गो ! आपका उग्र प्रकाश तेजके द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है Il ३० Il आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो - नमोडस्तु देववर সমীন| ন विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं - न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्।। मुझे बतलाइये कि आप उग्ररूपवाले कौन हैं ? हे देवौंमें श्रेष्ठ ! आपको नमस्कार हो।आप प्रसत्र होइये | आदिपुरुप आपको मैँ विशेपरूपसे जानना क्यौंकि मेँ आपको प्रवृत्तिको नहीँ & चाहता সাননা Il 3? Il श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #मेरे विचार #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - ०३ धप्रैल भूल करना मनुष्य का स्वभाव है किंतु हुई भूल को मान लेना और इस तरह आचरण रखना कि वह भूल फिर न होने पाए तो हीं पूर्ण भूल सुधार है। MN ०३ धप्रैल भूल करना मनुष्य का स्वभाव है किंतु हुई भूल को मान लेना और इस तरह आचरण रखना कि वह भूल फिर न होने पाए तो हीं पूर्ण भूल सुधार है। MN - ShareChat
#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख
मेरे विचार - अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सहैवावनिपालसङ्घैः ম্লন '1 भोष्मो   द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ  सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः I१ वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि | केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु  चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः II सन्दृश्यन्ते  धृतराष्ट्रके पुत्र राजाओंके समुदायसहित  ন মলপী आपमें प्रवेश कर रहे हैं और भोष्मपितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण और हमारे पक्षके भी प्रधान यौद्धाओंके सहित सव-्के-्सब आपके दाढ़ोंके कारण विकराल बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रवेश कर मुरखोंमें भयानक रहे हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरौंसहित आपके दाँतोंके बीचमें लगे हुए दीख रहे हैँ II २६- २७ |I यथा   नदीनां   बहवोउम्बुवेगाः বনলি | समुद्रमेवाभिमुखा ননামী नरलोकवीरा- T विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति १l जैसे नदियोंके बहुत-से जलके प्रवाह स्वाभाविक ही सम्मुख दौड़ते हैं अर्थात् 8 समुद्रके समुद्रमें प्रवैश करते हैँ॰ वैसे हौ वै नरलौकके वौर भौ प्रवेश कर रहे हैं Il २८ Il आपके प्रज्वलित मुखोंमें श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सहैवावनिपालसङ्घैः ম্লন '1 भोष्मो   द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ  सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः I१ वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि | केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु  चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः II सन्दृश्यन्ते  धृतराष्ट्रके पुत्र राजाओंके समुदायसहित  ন মলপী आपमें प्रवेश कर रहे हैं और भोष्मपितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण और हमारे पक्षके भी प्रधान यौद्धाओंके सहित सव-्के-्सब आपके दाढ़ोंके कारण विकराल बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रवेश कर मुरखोंमें भयानक रहे हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरौंसहित आपके दाँतोंके बीचमें लगे हुए दीख रहे हैँ II २६- २७ |I यथा   नदीनां   बहवोउम्बुवेगाः বনলি | समुद्रमेवाभिमुखा ননামী नरलोकवीरा- T विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति १l जैसे नदियोंके बहुत-से जलके प्रवाह स्वाभाविक ही सम्मुख दौड़ते हैं अर्थात् 8 समुद्रके समुद्रमें प्रवैश करते हैँ॰ वैसे हौ वै नरलौकके वौर भौ प्रवेश कर रहे हैं Il २८ Il आपके प्रज्वलित मुखोंमें श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #मेरे विचार
❤️जीवन की सीख - 03 अप्रैल किताबें इसलिए पढो ताकि तुम लोगो से बहस नरही तर्क ೪ಹil @ MN 03 अप्रैल किताबें इसलिए पढो ताकि तुम लोगो से बहस नरही तर्क ೪ಹil @ MN - ShareChat
#गीता सार🙏 #🔱🕉श्रीमद भागवत पुराण 🙏🕉 #श्रीमद भगवदगीता श्लोक #श्रीमद भगवद्गीता #🙏गीता ज्ञान🛕
गीता सार🙏 - बहुवक्त्रनेत्रं - महत्ते रूपं महावाहो बहुबाहूरुपादम्| बहुदंष्ट्राकरालं- எ* दृष्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् I१  हे महावाहो ! आपके बहुत मुख और नेत्रोंवाले , वहुत हाथ, जंघा और पैरौंवाले बहुत उदरौंवाले और बहुत-सो दाढ़ोंके कारण अत्यन्त विकराल महान् रूपको देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हेँ तथा मैॅ भौ व्याकुल हाे रहा हूँ II २३ Il  दीप्तमनेकवर्ण - नभःस्पृशं दोप्तविशालनेत्रम् | व्यात्ताननं दृष्ठा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा  धृतिॅ न विन्दामि शमं च विष्णो ११  क्यौंकि हे विष्णो ! आकाशको स्पर्श करनेवाले, देदोप्यमान, अनेक वर्णोंसे युक्त तथा फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नैत्रौंसे युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरणवाला मेँ धौरज और হালি নন্কী দানা হুঁIl ২৮ Il च ते मुखानि दंष्ट्राकरालानि दृष्ैव कालानलसन्रिभानि| दिशो न जाने न लभे च शर्म देवेश जगन्रिवास १। प्रसीद दाढ़ॅंके कारण विकण्ल और प्रलयकालकी अग्निके  देखकर मॅ दिशाओंको समान प्रज्चलित आपके मुरखौंको  नहों जानता हूँ और सुख भौ नहों पाता हूँ । इसलिये हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न हों Il २५ Il श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार बहुवक्त्रनेत्रं - महत्ते रूपं महावाहो बहुबाहूरुपादम्| बहुदंष्ट्राकरालं- எ* दृष्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् I१  हे महावाहो ! आपके बहुत मुख और नेत्रोंवाले , वहुत हाथ, जंघा और पैरौंवाले बहुत उदरौंवाले और बहुत-सो दाढ़ोंके कारण अत्यन्त विकराल महान् रूपको देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हेँ तथा मैॅ भौ व्याकुल हाे रहा हूँ II २३ Il  दीप्तमनेकवर्ण - नभःस्पृशं दोप्तविशालनेत्रम् | व्यात्ताननं दृष्ठा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा  धृतिॅ न विन्दामि शमं च विष्णो ११  क्यौंकि हे विष्णो ! आकाशको स्पर्श करनेवाले, देदोप्यमान, अनेक वर्णोंसे युक्त तथा फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नैत्रौंसे युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरणवाला मेँ धौरज और হালি নন্কী দানা হুঁIl ২৮ Il च ते मुखानि दंष्ट्राकरालानि दृष्ैव कालानलसन्रिभानि| दिशो न जाने न लभे च शर्म देवेश जगन्रिवास १। प्रसीद दाढ़ॅंके कारण विकण्ल और प्रलयकालकी अग्निके  देखकर मॅ दिशाओंको समान प्रज्चलित आपके मुरखौंको  नहों जानता हूँ और सुख भौ नहों पाता हूँ । इसलिये हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न हों Il २५ Il श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#श्रीमद भगवद गीता उपदेश 🙏🙏 #श्रीमद भगवद्गीता #🔱🕉श्रीमद भागवत पुराण 🙏🕉 #श्रीमद भगवदगीता श्लोक #गीता सार🙏
श्रीमद भगवद गीता उपदेश 🙏🙏 - द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः 1 तवेदं- డ్లర్Tా డైగే  रूपमुग्रं प्रव्यथितं लोकत्रयं সম্ভাননূ l1 हैे महात्मन्! यह स्वर्ग और पृथ्वीके बीचका सम्पूर्ण आकाश तथा सव दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हँ तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूपको देखकर तोनों लोक अति व्यथाको সাদ ক্কাঁ ফ৯ ;ঁII ২০ 11  अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्घीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ! स्वस्तीत्युक्त्वा महर्पिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः I वे ही देवताओंके समूह आपमें प्रवेश करते हैँ और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपके a और उच्चारण करते हॅ तथा महर्पि गुणोंका सिद्धोंके समुदाय ' कल्याण हो ' ऐसा कहकर उत्तम - स्तोत्रौद्वारा आपको स्तुति करते हैँ Il २१ II उत्तम रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या~ विश्वेउश्विनौ मरुतश्चोष्पपाश्च | गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा- वीक्षन्ते त्वां विस्पिताश्चैव सर्वे ।१ जो ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य तथा आठ अश्विनीकुमार तथा मरुद्गण  साध्यगण, विश्वेदेव औसुर स्पितराग़्का सिमुदाय तथ्ष नगक्मव यक्ष 71817 और सिद्धोंके समुदाय हैं॰वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते हैं Il २२ Il श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः 1 तवेदं- డ్లర్Tా డైగే  रूपमुग्रं प्रव्यथितं लोकत्रयं সম্ভাননূ l1 हैे महात्मन्! यह स्वर्ग और पृथ्वीके बीचका सम्पूर्ण आकाश तथा सव दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हँ तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूपको देखकर तोनों लोक अति व्यथाको সাদ ক্কাঁ ফ৯ ;ঁII ২০ 11  अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्घीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ! स्वस्तीत्युक्त्वा महर्पिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः I वे ही देवताओंके समूह आपमें प्रवेश करते हैँ और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपके a और उच्चारण करते हॅ तथा महर्पि गुणोंका सिद्धोंके समुदाय ' कल्याण हो ' ऐसा कहकर उत्तम - स्तोत्रौद्वारा आपको स्तुति करते हैँ Il २१ II उत्तम रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या~ विश्वेउश्विनौ मरुतश्चोष्पपाश्च | गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा- वीक्षन्ते त्वां विस्पिताश्चैव सर्वे ।१ जो ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य तथा आठ अश्विनीकुमार तथा मरुद्गण  साध्यगण, विश्वेदेव औसुर स्पितराग़्का सिमुदाय तथ्ष नगक्मव यक्ष 71817 और सिद्धोंके समुदाय हैं॰वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते हैं Il २२ Il श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #👍 डर के आगे जीत👌 #मेरे विचार
🙏 प्रेरणादायक विचार - 02 अप्रैल जिस व्यक्ति का प्रमात अच्छा हौता है॰ डिसका पूरा दिन अच्छा रहता है। सुवह सवैरै का व्यवहार व्यक्ति कै पूरै दिन की कार्यप्रणाली कौ प्रभावित करता है। MN 02 अप्रैल जिस व्यक्ति का प्रमात अच्छा हौता है॰ डिसका पूरा दिन अच्छा रहता है। सुवह सवैरै का व्यवहार व्यक्ति कै पूरै दिन की कार्यप्रणाली कौ प्रभावित करता है। MN - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #मेरे विचार #👍 डर के आगे जीत👌 #🙏 प्रेरणादायक विचार
❤️जीवन की सीख - 02 cనన अच्छाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अपनी एक ऐसी श्रृंखला কা নিবাতি কঙ্নী ৪ তী को संपूर्ण रूप से gus नष्ट कर देती है। MN 02 cనన अच्छाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अपनी एक ऐसी श्रृंखला কা নিবাতি কঙ্নী ৪ তী को संपूर्ण रूप से gus नष्ट कर देती है। MN - ShareChat