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व्यस्त रहें, मस्त रहें
#🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - 151 मई अपने व्यक्तित्व का गौरव अक्षुण बनाये रहो। चुलबुलापन और बकवाद तुम्हारे व्यक्तिव के नाश ক কাৎতা মী सकते हैं। MN 151 मई अपने व्यक्तित्व का गौरव अक्षुण बनाये रहो। चुलबुलापन और बकवाद तुम्हारे व्यक्तिव के नाश ক কাৎতা মী सकते हैं। MN - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #गीता #मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕
🙏 प्रेरणादायक विचार - 151 मई अपने व्यक्तित्व का गौरव अक्षुण बनाये रहो। चुलबुलापन और बकवाद तुम्हारे व्यक्तिव के नाश ক কাৎতা মী सकते हैं। MN 151 मई अपने व्यक्तित्व का गौरव अक्षुण बनाये रहो। चुलबुलापन और बकवाद तुम्हारे व्यक्तिव के नाश ক কাৎতা মী सकते हैं। MN - ShareChat
#गीता #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #मेरे विचार #🙏 प्रेरणादायक विचार
गीता - 15 ೊ5 ये क्या सोचेंगे? वो क्या सोचेंगे ? क्या सोचेगी ? ত্রুনিয়া इससे ऊपर उठकर कुछ सोचिए. उसी दिन जिन्दगी सुकून का दूसरा नाम हो जाएगी ! MN 15 ೊ5 ये क्या सोचेंगे? वो क्या सोचेंगे ? क्या सोचेगी ? ত্রুনিয়া इससे ऊपर उठकर कुछ सोचिए. उसी दिन जिन्दगी सुकून का दूसरा नाम हो जाएगी ! MN - ShareChat
#मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - इसको अच्छी प्रकारसे स्थिति हीो है१। इसलिये 7 ममता और   वासनारूप সনি   ভূত इस   अहंता, मूलोंवाले संसाररूप पीपलके वृक्षको दृढ़ वैराग्यरूपो న शस्त्रद्वारा काटकर  II३।। तत्परिमार्गितव्यं q নন: यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः| तमेव प्रपद्ये पुरुपं  মাহ্ प्रसृता   पुराणीं Il সনৃনি: যন: परमेश्वरको उसके   पश्चात्   उस परम  पदरूप भलीभाँति खोजना चाहिये, जिसमें गये हुए पुरुप फिर लौटकर संसारमें नहों आते और जिस परमेश्वरसे इस पुरातन संसारवृक्षको प्रवृत्ति विस्तारको प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुप नारायणके मैँ शरण हूँ- इसको अच्छौ प्रकार स्थिति भौ नहों हैं॰ यह कहनेका ೩ प्रयोजन यह हैं कि वास्तवमें यह क्षणभङ्गुर और नाशवान् हैं। प्रेस्त त्रह्मलोकतकके  भोग क्षणिक और नाशवान् हॅ॰ २ समझकर, इस संसारके समस्त विपयभोगोंमें सत्ता, सुख और रमणीयताका न भासना हो दृढ़ " वैराग्यरूप शस्त्र हॅ। यावन्मात्र  संसारके चित्तनका   तथा स्थावर, जङ्गमरूप 3 और अनादिकालसे अज्ञानके   द्वारा दृढ़   हुईं अहंता ममता करना   हो   संसारवृक्षका मूलौंका अवान्तर त्याग वासनारूप 'मूलोंके सहित काटना ' है। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १५ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार इसको अच्छी प्रकारसे स्थिति हीो है१। इसलिये 7 ममता और   वासनारूप সনি   ভূত इस   अहंता, मूलोंवाले संसाररूप पीपलके वृक्षको दृढ़ वैराग्यरूपो న शस्त्रद्वारा काटकर  II३।। तत्परिमार्गितव्यं q নন: यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः| तमेव प्रपद्ये पुरुपं  মাহ্ प्रसृता   पुराणीं Il সনৃনি: যন: परमेश्वरको उसके   पश्चात्   उस परम  पदरूप भलीभाँति खोजना चाहिये, जिसमें गये हुए पुरुप फिर लौटकर संसारमें नहों आते और जिस परमेश्वरसे इस पुरातन संसारवृक्षको प्रवृत्ति विस्तारको प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुप नारायणके मैँ शरण हूँ- इसको अच्छौ प्रकार स्थिति भौ नहों हैं॰ यह कहनेका ೩ प्रयोजन यह हैं कि वास्तवमें यह क्षणभङ्गुर और नाशवान् हैं। प्रेस्त त्रह्मलोकतकके  भोग क्षणिक और नाशवान् हॅ॰ २ समझकर, इस संसारके समस्त विपयभोगोंमें सत्ता, सुख और रमणीयताका न भासना हो दृढ़ " वैराग्यरूप शस्त्र हॅ। यावन्मात्र  संसारके चित्तनका   तथा स्थावर, जङ्गमरूप 3 और अनादिकालसे अज्ञानके   द्वारा दृढ़   हुईं अहंता ममता करना   हो   संसारवृक्षका मूलौंका अवान्तर त्याग वासनारूप 'मूलोंके सहित काटना ' है। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १५ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕
🙏 प्रेरणादायक विचार - लोकमें १ कर्मोंके अनुसार चाँधनेवाली अहंता- ममता औंर वासनारूप जड़ें भौ नीचे और ऊपर सभी लोकोंमें व्याप्त हा रही हैं Il २ Il रूपमस्येह तथोपलभ्यते 7 नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा 4 अश्वत्थमेनं মুনিমনমুল- मसङ्गशस्त्रेण  दृढेन fాII इस संसारवृक्षका स्वरूप जैंसा कहा हैं वैंसा यहाँ विचारकालमें नहों   पाया क्योंकि जाता न तो इसका आदि है३ और न अन्त हैं४ तथा केवल मनुप्ययोनिमें १. अहंता, ममता और वासनारूप मूलांको कर्मोके अनुसार बाँधनेवाली कहनेका कारण यह हॅ कि अन्य ही सव योनियोंमें तो केवल पूरवंकृत कर्मोके फलको भोगनेका अधिकार   हैं और मनुप्ययोनिमें नवीन   कर्मोके करनका 31fTFR € 1 २. इस संसारका जैसा स्वरूप शास्त्रांमें वर्णन किया गया हॅ और जैसा देखा-सुना जाता हैं॰ वैंसा तत्त्वज्ञान होनेके पश्चात् नहीं पाया जाता, जिस प्रकार आँख खुलनेके पश्चात् स्वप्नका संसार नहों   पाया जाता | इसका आदि नहों हं॰ यह कहनेका प्रयजन यह ह 3. ஈ इसको परम्परा कवसे चलो आती है॰ इसका कोई पता हं। 317 7 & कहनेका प्रयोजन यह ह ४ यह इसका कि डसको परम्परा कवतक चलती रहेगो॰ डसका कोडं पता नहों है। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १५ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार लोकमें १ कर्मोंके अनुसार चाँधनेवाली अहंता- ममता औंर वासनारूप जड़ें भौ नीचे और ऊपर सभी लोकोंमें व्याप्त हा रही हैं Il २ Il रूपमस्येह तथोपलभ्यते 7 नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा 4 अश्वत्थमेनं মুনিমনমুল- मसङ्गशस्त्रेण  दृढेन fాII इस संसारवृक्षका स्वरूप जैंसा कहा हैं वैंसा यहाँ विचारकालमें नहों   पाया क्योंकि जाता न तो इसका आदि है३ और न अन्त हैं४ तथा केवल मनुप्ययोनिमें १. अहंता, ममता और वासनारूप मूलांको कर्मोके अनुसार बाँधनेवाली कहनेका कारण यह हॅ कि अन्य ही सव योनियोंमें तो केवल पूरवंकृत कर्मोके फलको भोगनेका अधिकार   हैं और मनुप्ययोनिमें नवीन   कर्मोके करनका 31fTFR € 1 २. इस संसारका जैसा स्वरूप शास्त्रांमें वर्णन किया गया हॅ और जैसा देखा-सुना जाता हैं॰ वैंसा तत्त्वज्ञान होनेके पश्चात् नहीं पाया जाता, जिस प्रकार आँख खुलनेके पश्चात् स्वप्नका संसार नहों   पाया जाता | इसका आदि नहों हं॰ यह कहनेका प्रयजन यह ह 3. ஈ इसको परम्परा कवसे चलो आती है॰ इसका कोई पता हं। 317 7 & कहनेका प्रयोजन यह ह ४ यह इसका कि डसको परम्परा कवतक चलती रहेगो॰ डसका कोडं पता नहों है। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १५ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 #मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार
🙏गीता ज्ञान🛕 - 14 मई अभ्यास हमें बलवान बनाता है, ব্রুঃস্ত্র ৪রম বঁসান बनाता है, हार हमें विनम्रता सिखाती है, जीत हमारे व्यक्तित्व को निखारती है, I 14 मई अभ्यास हमें बलवान बनाता है, ব্রুঃস্ত্র ৪রম বঁসান बनाता है, हार हमें विनम्रता सिखाती है, जीत हमारे व्यक्तित्व को निखारती है, I - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕
❤️जीवन की सीख - 4 Hsi ससार ्ँ शान्ति எஷி அரபஎ எ जबो बलवान लौथी हौना छौडू ्ढैँ और जो निर्बल हैँ॰ वै बलवान बनना सीर्खें । MN 4 Hsi ससार ्ँ शान्ति எஷி அரபஎ எ जबो बलवान लौथी हौना छौडू ्ढैँ और जो निर्बल हैँ॰ वै बलवान बनना सीर्खें । MN - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 #मेरे विचार #🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख
🙏गीता ज्ञान🛕 - 13 15 उम्र में , ओहदे में, कौन कितना बड़ा है कोई फ़र्क नहीं पड़ता , सजदे में , लहज़े में , कौन कितना झुकता है, बहुत फर्क पड़ता है. MN 13 15 उम्र में , ओहदे में, कौन कितना बड़ा है कोई फ़र्क नहीं पड़ता , सजदे में , लहज़े में , कौन कितना झुकता है, बहुत फर्क पड़ता है. MN - ShareChat
#📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - 13 मईमनुष्यता  सीखने की सबसे बड़ी पाठशाला अपना घर है। स्नेह और त्याग क्षमा और उदारता की भावनाओं के विकास के जितने सुन्दर अवसर अपने घर में मिल सकते हैं , उतने और कहीं नहीं मिल सकते। MN 13 मईमनुष्यता  सीखने की सबसे बड़ी पाठशाला अपना घर है। स्नेह और त्याग क्षमा और उदारता की भावनाओं के विकास के जितने सुन्दर अवसर अपने घर में मिल सकते हैं , उतने और कहीं नहीं मिल सकते। MN - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #गीता सार🙏 #गीता #📖जीवन का लक्ष्य🤔
🙏गीता ज्ञान🛕 - जिसके पत्ते१ कहे गये हैँ॰ उस संसाररूप वृक्षको  जो पुरुप मूलसहित तत्त्वसे जानता है, वह वेदके तात्पर्यको जाननेवाला है२II १Il अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा विपयप्रवालाः गुणप्रवृद्धा [1 मूलान्यनुसन्ततानि अधश्च मनुप्यलोके कर्मानुबन्धीनि  I उस संसारवृक्षको तीनों गुणोंरूप जलके శ్లౌ वढ़ी हुई एवं विपय रै - भोगरूप कोंपलोंवाली  तिर्यक् आदि योनिरूप शाखाएँ४ॅ मनुप्य और और ऊपर सर्वत्र फैंलीं हुई हैँ तथा   मनुप्य- शाखारूप त्रह्मासे प्रकट होनेवाले और  य्ज्ञादिक वृक्षको  m कर्मोके द्वारा इस संसारवृक्षको रक्षा और वृद्धि करनेवाले एवं शोभाको चढ़ानेवाले होनेसे वेद ' पत्ते ' कहे गये हैं। भगवान्को   योगमायासे उत्पत्र हुआ संसार   क्षणभंगुर २ नाशवान् और दुःखरूप हॅ॰ इसके चिन्तनको त्यागकर কণল परमेश्वरका हो नित्य-निरन्तर, अनन्यग्रेमसे चिन्तन करना ' वेदके तात्पयंको जानना ' हैं। स्पर्श   रूप॰ रस और गन्धरये पोँचों स्थूलदेह 7 3. और इन्द्रियोंको अपेक्षा सूक्ष्म होनैके कारण उन शाखाओंको के रूपमें कहे गये हं। कौंपलों ४. मुख्य शाखारूप ग्रह्मयासे सम्पूर्ण लोकोंके सहित देव, मनुप्य आदि योनियोंको उत्पत्ति और विस्तार हुआ ह॰ और  ति्यंकू इसलिये उनका यहाँ ' शाखाओं " के रूपमें वर्णन किया हं। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १५ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार जिसके पत्ते१ कहे गये हैँ॰ उस संसाररूप वृक्षको  जो पुरुप मूलसहित तत्त्वसे जानता है, वह वेदके तात्पर्यको जाननेवाला है२II १Il अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा विपयप्रवालाः गुणप्रवृद्धा [1 मूलान्यनुसन्ततानि अधश्च मनुप्यलोके कर्मानुबन्धीनि  I उस संसारवृक्षको तीनों गुणोंरूप जलके శ్లౌ वढ़ी हुई एवं विपय रै - भोगरूप कोंपलोंवाली  तिर्यक् आदि योनिरूप शाखाएँ४ॅ मनुप्य और और ऊपर सर्वत्र फैंलीं हुई हैँ तथा   मनुप्य- शाखारूप त्रह्मासे प्रकट होनेवाले और  य्ज्ञादिक वृक्षको  m कर्मोके द्वारा इस संसारवृक्षको रक्षा और वृद्धि करनेवाले एवं शोभाको चढ़ानेवाले होनेसे वेद ' पत्ते ' कहे गये हैं। भगवान्को   योगमायासे उत्पत्र हुआ संसार   क्षणभंगुर २ नाशवान् और दुःखरूप हॅ॰ इसके चिन्तनको त्यागकर কণল परमेश्वरका हो नित्य-निरन्तर, अनन्यग्रेमसे चिन्तन करना ' वेदके तात्पयंको जानना ' हैं। स्पर्श   रूप॰ रस और गन्धरये पोँचों स्थूलदेह 7 3. और इन्द्रियोंको अपेक्षा सूक्ष्म होनैके कारण उन शाखाओंको के रूपमें कहे गये हं। कौंपलों ४. मुख्य शाखारूप ग्रह्मयासे सम्पूर्ण लोकोंके सहित देव, मनुप्य आदि योनियोंको उत्पत्ति और विस्तार हुआ ह॰ और  ति्यंकू इसलिये उनका यहाँ ' शाखाओं " के रूपमें वर्णन किया हं। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १५ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat