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#❤️जीवन की सीख ##भगवद गीता🙏🕉️ #मेरे विचार #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕
❤️जीवन की सीख - 07 हर किसी कौै अपनै UMfE பளபி, =deal 8/ %a है॰ आनै वालै वक्त मैँ वौ आपकै खिलाफ ह्वौ | MN 07 हर किसी कौै अपनै UMfE பளபி, =deal 8/ %a है॰ आनै वालै वक्त मैँ वौ आपकै खिलाफ ह्वौ | MN - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏गीता ज्ञान🛕 #मेरे विचार #❤️जीवन की सीख
🙏 प्रेरणादायक विचार - अजुन उवाच योउ्यं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन। বলমসোন্ক ন পহমামি সঙ্বূলনানিথনি সিথবাম Il  अर्जुन बोले - हे मधुसूदन ! जो यह योग आपने समभावसे कहा है, मनके चञ्चल होनेसे मैं इसकी नित्य स्थितिको नहीं देखता हूँ II ३३ II चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दूढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।t क्चोँकि हे श्रीकृष्ण ! यह मन बड़ा चञ्चल प्रमथन स्वभाववाला, बड़ा दृढ़ और बलवान् है इसलिये उसका वशमें करना मैं रोकनेकी वायुको भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ Il ३४ Il जैसे मनुप्च अपने मस्तक, हाशष, पैर और गुदादिके  212] ग्रहण, क्षत्रिय, शूद्न और म्लेच्छादिकोंका-सा ब्ताव करता हुआ होनेस्े सुख और भी उनमें आत्मिभाव अर्थत् अपनापन सनान दुःखको समान हौ देखता है॰ बैसे हौ सव  भूतोंनें अपनी देखना ಋiir]' सन देखना है। श्रोभगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते १। श्रीभगवान् बोले-् हे महाबाहो ! निःसन्देह मन चञ्चल और कठिनतासे वशमें होनेवाला है; परन्तु और वैराग्यसे हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! यह अभ्यास वशमें होता है Il ३५ Il श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपुर से सामार गीता अजुन उवाच योउ्यं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन। বলমসোন্ক ন পহমামি সঙ্বূলনানিথনি সিথবাম Il  अर्जुन बोले - हे मधुसूदन ! जो यह योग आपने समभावसे कहा है, मनके चञ्चल होनेसे मैं इसकी नित्य स्थितिको नहीं देखता हूँ II ३३ II चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दूढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।t क्चोँकि हे श्रीकृष्ण ! यह मन बड़ा चञ्चल प्रमथन स्वभाववाला, बड़ा दृढ़ और बलवान् है इसलिये उसका वशमें करना मैं रोकनेकी वायुको भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ Il ३४ Il जैसे मनुप्च अपने मस्तक, हाशष, पैर और गुदादिके  212] ग्रहण, क्षत्रिय, शूद्न और म्लेच्छादिकोंका-सा ब्ताव करता हुआ होनेस्े सुख और भी उनमें आत्मिभाव अर्थत् अपनापन सनान दुःखको समान हौ देखता है॰ बैसे हौ सव  भूतोंनें अपनी देखना ಋiir]' सन देखना है। श्रोभगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते १। श्रीभगवान् बोले-् हे महाबाहो ! निःसन्देह मन चञ्चल और कठिनतासे वशमें होनेवाला है; परन्तु और वैराग्यसे हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! यह अभ्यास वशमें होता है Il ३५ Il श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपुर से सामार गीता - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏गीता ज्ञान🛕 #मेरे विचार #❤️जीवन की सीख
🙏 प्रेरणादायक विचार - 9 7 सफलता न तो जादुई है॰ न ही रहरयमयी है॰ यह अच्छी आदतों मेहनत और का स्वाभाविक परिणाम है। M 9 7 सफलता न तो जादुई है॰ न ही रहरयमयी है॰ यह अच्छी आदतों मेहनत और का स्वाभाविक परिणाम है। M - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️ #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार #🙏 प्रेरणादायक विचार
🙏गीता ज्ञान🛕 - 03 नाकामी कौ ज्यादा CJ चाहिए अहृत्व नह्वी दैना क्यौकि स्चयं क अजक बनाना हिम्भत का काभ हौता है। MN 03 नाकामी कौ ज्यादा CJ चाहिए अहृत्व नह्वी दैना क्यौकि स्चयं क अजक बनाना हिम्भत का काभ हौता है। MN - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏गीता ज्ञान🛕
🙏 प्रेरणादायक विचार - फखवरी 6 ٩٤٤ जब बदलना हमारे बस में ना हो तब मन की स्थिति बदल के देखिए, सब சள் नर्ही पर बह्नुत कुछ आपके अनुरूप हो जाएगा। M फखवरी 6 ٩٤٤ जब बदलना हमारे बस में ना हो तब मन की स्थिति बदल के देखिए, सब சள் नर्ही पर बह्नुत कुछ आपके अनुरूप हो जाएगा। M - ShareChat
#मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️ #मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख ##भगवद गीता🙏🕉️
मेरे विचार - या मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति | तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति I। जो पुरुप सम्पूर्ण  3 सवके आत्मरूप भूतोंमें वासुदेवको ही व्यापक देखता है और भूतोंको मुझ अन्तर्गत देखता है, वासुदेवके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहों ক্ানা Il 3০ Il सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः | सर्वथा वर्तमानोउपि स योगी मयि वर्तते ।। भूतोंमें जो पुरुप एकोीभावमें स्थित होकर सम्पूर्ण आत्मरूपसे स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेवको " भजता है, वह योगी सव प्रकारसे वरतता हुआ भी हा वरतता है।l ३१ ।। मुझमें गौता अध्याय ९ श्लोक ६में देखना चाहिये। आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योउ्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः I। हे अर्जुन ! जो योगी अपनो भाँति * सम्पूर्ण  भूतोंमें सम देखता है और सुख अथवा दुःखको भी सवमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है Il ३२ II श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 गोरखपूर प्रेस , से सामार गीता या मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति | तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति I। जो पुरुप सम्पूर्ण  3 सवके आत्मरूप भूतोंमें वासुदेवको ही व्यापक देखता है और भूतोंको मुझ अन्तर्गत देखता है, वासुदेवके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहों ক্ানা Il 3০ Il सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः | सर्वथा वर्तमानोउपि स योगी मयि वर्तते ।। भूतोंमें जो पुरुप एकोीभावमें स्थित होकर सम्पूर्ण आत्मरूपसे स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेवको " भजता है, वह योगी सव प्रकारसे वरतता हुआ भी हा वरतता है।l ३१ ।। मुझमें गौता अध्याय ९ श्लोक ६में देखना चाहिये। आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योउ्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः I। हे अर्जुन ! जो योगी अपनो भाँति * सम्पूर्ण  भूतोंमें सम देखता है और सुख अथवा दुःखको भी सवमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है Il ३२ II श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 गोरखपूर प्रेस , से सामार गीता - ShareChat
#मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️
मेरे विचार - या मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति | तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति I। जो पुरुप सम्पूर्ण  3 सवके आत्मरूप भूतोंमें वासुदेवको ही व्यापक देखता है और भूतोंको मुझ अन्तर्गत देखता है, वासुदेवके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहों ক্ানা Il 3০ Il सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः | सर्वथा वर्तमानोउपि स योगी मयि वर्तते ।। भूतोंमें जो पुरुप एकोीभावमें स्थित होकर सम्पूर्ण आत्मरूपसे स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेवको " भजता है, वह योगी सव प्रकारसे वरतता हुआ भी हा वरतता है।l ३१ ।। मुझमें गौता अध्याय ९ श्लोक ६में देखना चाहिये। आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योउ्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः I। हे अर्जुन ! जो योगी अपनो भाँति * सम्पूर्ण  भूतोंमें सम देखता है और सुख अथवा दुःखको भी सवमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है Il ३२ II श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 गोरखपूर प्रेस , से सामार गीता या मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति | तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति I। जो पुरुप सम्पूर्ण  3 सवके आत्मरूप भूतोंमें वासुदेवको ही व्यापक देखता है और भूतोंको मुझ अन्तर्गत देखता है, वासुदेवके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहों ক্ানা Il 3০ Il सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः | सर्वथा वर्तमानोउपि स योगी मयि वर्तते ।। भूतोंमें जो पुरुप एकोीभावमें स्थित होकर सम्पूर्ण आत्मरूपसे स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेवको " भजता है, वह योगी सव प्रकारसे वरतता हुआ भी हा वरतता है।l ३१ ।। मुझमें गौता अध्याय ९ श्लोक ६में देखना चाहिये। आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योउ्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः I। हे अर्जुन ! जो योगी अपनो भाँति * सम्पूर्ण  भूतोंमें सम देखता है और सुख अथवा दुःखको भी सवमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है Il ३२ II श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 गोरखपूर प्रेस , से सामार गीता - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️ #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #मेरे विचार
❤️जीवन की सीख - URgRTT 5 समय बहरा है सुनता किसी की लेकिन नही अंधा नर्ही है ఢGౌ सबको हैं। M URgRTT 5 समय बहरा है सुनता किसी की लेकिन नही अंधा नर्ही है ఢGౌ सबको हैं। M - ShareChat
#📖जीवन का लक्ष्य🤔 ##भगवद गीता🙏🕉️ #मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - 05 ٥ ٤ जीवन डसी दिन UfE बड़ै ह्ौ जातै है॰ जिख दिन er स्वयं कै पौष्ठकर खड़ा हौना सीख् लैतै है। N 05 ٥ ٤ जीवन डसी दिन UfE बड़ै ह्ौ जातै है॰ जिख दिन er स्वयं कै पौष्ठकर खड़ा हौना सीख् लैतै है। N - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️ #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔
🙏गीता ज्ञान🛕 - योगिनं ह्येनं प्रशान्तमनसं सुखमुत्तमम्। বপলি शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मपम् I। क्योंकि जिसका मन भलो प्रकार शान्त है, जो रजोगुण  হাল ৯াঁ पापसे रहित है और जिसका गया हैं॰ ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ग्रह्मके साथ एकीभाव हुए योगीको उत्तम आनन्द प्राप्त होता है Il २७ ।। युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मपः 4 ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते  सुखेन I वह पापरहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्माको परमात्मामें लगाता हुआ सुखपूर्वक परग्रह्म परमात्माको  प्राप्तिरूप अनन्त आनन्दका अनभव करता है II २८ I। सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि a | ईक्षते   योगयुक्तात्मा समदर्शनः I। सर्वत्र सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त आत्मावाला तथा सवमें समभावसे देखनेवाला योगी आत्माको सम्पूर्ण  स्थित और भूतोंमें सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें कल्पित देखता है II २९ ।l श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपूर से सामार गीता योगिनं ह्येनं प्रशान्तमनसं सुखमुत्तमम्। বপলি शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मपम् I। क्योंकि जिसका मन भलो प्रकार शान्त है, जो रजोगुण  হাল ৯াঁ पापसे रहित है और जिसका गया हैं॰ ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ग्रह्मके साथ एकीभाव हुए योगीको उत्तम आनन्द प्राप्त होता है Il २७ ।। युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मपः 4 ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते  सुखेन I वह पापरहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्माको परमात्मामें लगाता हुआ सुखपूर्वक परग्रह्म परमात्माको  प्राप्तिरूप अनन्त आनन्दका अनभव करता है II २८ I। सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि a | ईक्षते   योगयुक्तात्मा समदर्शनः I। सर्वत्र सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त आत्मावाला तथा सवमें समभावसे देखनेवाला योगी आत्माको सम्पूर्ण  स्थित और भूतोंमें सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें कल्पित देखता है II २९ ।l श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 6 प्रेस , गोरखपूर से सामार गीता - ShareChat