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#❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार ##भगवद गीता🙏🕉️ #मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔
❤️जीवन की सीख - ]5 फखवर कई बार उलझनों को झुककर भी सुलझाना पडता है क्योंकि सभी लोग आपके कद के बराबर नही होते। M ]5 फखवर कई बार उलझनों को झुककर भी सुलझाना पडता है क्योंकि सभी लोग आपके कद के बराबर नही होते। M - ShareChat
##भगवद गीता🙏🕉️ #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख
#भगवद गीता🙏🕉️ - ]5 फखवर कई बार उलझनों को झुककर भी सुलझाना पडता है क्योंकि सभी लोग आपके कद के बराबर नही होते। M ]5 फखवर कई बार उलझनों को झुककर भी सुलझाना पडता है क्योंकि सभी लोग आपके कद के बराबर नही होते। M - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️
🙏 प्रेरणादायक विचार - 00 मजुष्य को सफल समय [{gR{] नहवी बनाता बल्कि समय का सह्वी उपयौज अजुष्य को सफल बनाता है। MN 00 मजुष्य को सफल समय [{gR{] नहवी बनाता बल्कि समय का सह्वी उपयौज अजुष्य को सफल बनाता है। MN - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏 प्रेरणादायक विचार
❤️जीवन की सीख - बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोउस्मि भरतर्षभ ।। भरतश्रेष्ठ ! मैँ बलवानोंका आसक्ति और గ్ कामनाओंसे रहित बल अर्थात् सामर्थ्य हूँ और सब 31%7 धर्मके अनुकूल शास्त्रके अनुकूल भूतोंमें काम हूँ Il ११ II ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि।। 7 और भी जो सत्त्वगुणसे उत्पन्न होनेवाले भाव हैँ और जो रजोगुणसे तथा तमोगुणसे होनेवाले भाव हैँ, उन सबको तू ' मुझसे ही होनेवाले हैं ' ऐसा जान, परन्तु वास्तवमें * उनमें मैँ और वे मुझमें नहों हैँ II १२ II  त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः মনসিন जगत्। मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् I। और कार्यरूप सात्त्विक, राजस गुणोंके IHH इन तीनों प्रकारके भावोंसे यह सारा संसार  प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा है, इसीलिये इन तीनों परे मुझ अविनाशीको नहों जानता II १३ II गुणोंसे श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 प्रेस , गोरखपुर से साभार गीता बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोउस्मि भरतर्षभ ।। भरतश्रेष्ठ ! मैँ बलवानोंका आसक्ति और గ్ कामनाओंसे रहित बल अर्थात् सामर्थ्य हूँ और सब 31%7 धर्मके अनुकूल शास्त्रके अनुकूल भूतोंमें काम हूँ Il ११ II ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि।। 7 और भी जो सत्त्वगुणसे उत्पन्न होनेवाले भाव हैँ और जो रजोगुणसे तथा तमोगुणसे होनेवाले भाव हैँ, उन सबको तू ' मुझसे ही होनेवाले हैं ' ऐसा जान, परन्तु वास्तवमें * उनमें मैँ और वे मुझमें नहों हैँ II १२ II  त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः মনসিন जगत्। मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् I। और कार्यरूप सात्त्विक, राजस गुणोंके IHH इन तीनों प्रकारके भावोंसे यह सारा संसार  प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा है, इसीलिये इन तीनों परे मुझ अविनाशीको नहों जानता II १३ II गुणोंसे श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 प्रेस , गोरखपुर से साभार गीता - ShareChat
#मेरे विचार ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख
मेरे विचार - LL किसी व्यक्ति कै व्यक्तित्व WQRU मूल्यांकन एसकै कितावी क ज्ञान सै न्ह्वी उसकै व्यवहर सै हौता है। MN LL किसी व्यक्ति कै व्यक्तित्व WQRU मूल्यांकन एसकै कितावी क ज्ञान सै न्ह्वी उसकै व्यवहर सै हौता है। MN - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️ #❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार #मेरे विचार
🙏गीता ज्ञान🛕 - रसोउहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः | सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ।१  प्रणवः हे अर्जुन ! मैँ जलमें रस हूँ॰ चन्द्रमा और सूर्यमें हूँ, सम्पूर्ण वेदोंमें ओँकार हूँ॰ आकाशमें प्रकाश पुरुषत्व हूँ II ८ II शब्द और पुरुषोंमें गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ | पुण्यो जीवनं   सर्वभूतेषु तपश्चास्मि   तपस्विषु I। मैं पृथ्वीमें पवित्र * गन्ध और अग्नि्में तेज हूँ शब्द स्पर्श, रूप रस॰ गन्धसे इस प्रसङ्गमें इनके कारणरूप तन्मात्राओंका ग्रहण है॰ इस बातको स्पष्ट करनेके लिये उनके जोड़ा गया है। साथ पवित्र शब्द उनका जीवन हूँ और तपस्वियोंमें तथा सम्पूर्ण  %# గౌ క్డII 8 II बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्। बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।। মনানন নীত हे अर्जुन! तू सम्पूर्ण भूतोंका बुद्धिमानोँकी बुद्धि और मुझको   ही जान। मैं तेजस्वियोंका तेज हूँ Il १० Il श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 प्रेस , गोरखपुर से साभार गीता रसोउहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः | सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ।१  प्रणवः हे अर्जुन ! मैँ जलमें रस हूँ॰ चन्द्रमा और सूर्यमें हूँ, सम्पूर्ण वेदोंमें ओँकार हूँ॰ आकाशमें प्रकाश पुरुषत्व हूँ II ८ II शब्द और पुरुषोंमें गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ | पुण्यो जीवनं   सर्वभूतेषु तपश्चास्मि   तपस्विषु I। मैं पृथ्वीमें पवित्र * गन्ध और अग्नि्में तेज हूँ शब्द स्पर्श, रूप रस॰ गन्धसे इस प्रसङ्गमें इनके कारणरूप तन्मात्राओंका ग्रहण है॰ इस बातको स्पष्ट करनेके लिये उनके जोड़ा गया है। साथ पवित्र शब्द उनका जीवन हूँ और तपस्वियोंमें तथा सम्पूर्ण  %# గౌ క్డII 8 II बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्। बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।। মনানন নীত हे अर्जुन! तू सम्पूर्ण भूतोंका बुद्धिमानोँकी बुद्धि और मुझको   ही जान। मैं तेजस्वियोंका तेज हूँ Il १० Il श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 प्रेस , गोरखपुर से साभार गीता - ShareChat
#मेरे विचार #❤️जीवन की सीख ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕
मेरे विचार - ]4 फखवरी सपने देखने से है ज्यादा जरूरी सपनों के एन पीछे लगन और मेहनत से काम करना। M ]4 फखवरी सपने देखने से है ज्यादा जरूरी सपनों के एन पीछे लगन और मेहनत से काम करना। M - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️ #मेरे विचार
🙏 प्रेरणादायक विचार - [9 फखवरी असफलता के डर को अपने सपनों के बीच की बाधा मत बनने दें॰ बल्कि उसे अपने सफल होने की प्रेरणा बनाएं॰ M [9 फखवरी असफलता के डर को अपने सपनों के बीच की बाधा मत बनने दें॰ बल्कि उसे अपने सफल होने की प्रेरणा बनाएं॰ M - ShareChat
#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - 3 जैसै ष्त पर चढ़ जाश्ष तौ [৫R ढेपना भकान न्ह्वी दिख्ता , ऐसी प्रकार अहकांरी मजुष्य कौ मानव मैँ मानव नही दिखता। MN 3 जैसै ष्त पर चढ़ जाश्ष तौ [৫R ढेपना भकान न्ह्वी दिख्ता , ऐसी प्रकार अहकांरी मजुष्य कौ मानव मैँ मानव नही दिखता। MN - ShareChat
#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - भूमिरापोउनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना   प्रकृतिरष्टधा ११ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, चुद्धि और  अहंकार भी = इस प्रकार यह आठ प्रकारसे विभाजित मेरी प्रकृति हैं। यह आठ प्रकारके भेदोंवाली तो अपरा अर्थात  मेरी जड़ प्रकृति है और हे महावाहो ! इससे दूसरीको,  जिससे यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता हैं, मेरी जोवरूपा परा अर्थात् चेतन সক্ৃনি ٦٢٩ ١١ ٧٠٦ ١١ भूतानि   सर्वाणीत्युपधारय एतद्योनीनि अहं कत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।। हे अर्जुन! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियोंसे हो उत्पन्न होनेवाले हैं और मैँ सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात् सम्पूर्ण जगत्का मूलकारण हूँ II ६ Il परतरं   नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय | সন: मयि सर्वमिदं प्रौतं सूत्रे   मणिगणा ஈ" || हे धनञ्जय ! भिन्न दूसरा कोई भी मुझसे कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् 7# मनियोंके सदृश मुझमें गुँथा हुआ है Il ७ ।l श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 ೩೯, गोरखपुर से साभार गीता भूमिरापोउनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना   प्रकृतिरष्टधा ११ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, चुद्धि और  अहंकार भी = इस प्रकार यह आठ प्रकारसे विभाजित मेरी प्रकृति हैं। यह आठ प्रकारके भेदोंवाली तो अपरा अर्थात  मेरी जड़ प्रकृति है और हे महावाहो ! इससे दूसरीको,  जिससे यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता हैं, मेरी जोवरूपा परा अर्थात् चेतन সক্ৃনি ٦٢٩ ١١ ٧٠٦ ١١ भूतानि   सर्वाणीत्युपधारय एतद्योनीनि अहं कत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।। हे अर्जुन! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियोंसे हो उत्पन्न होनेवाले हैं और मैँ सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात् सम्पूर्ण जगत्का मूलकारण हूँ II ६ Il परतरं   नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय | সন: मयि सर्वमिदं प्रौतं सूत्रे   मणिगणा ஈ" || हे धनञ्जय ! भिन्न दूसरा कोई भी मुझसे कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् 7# मनियोंके सदृश मुझमें गुँथा हुआ है Il ७ ।l श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 ೩೯, गोरखपुर से साभार गीता - ShareChat