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व्यस्त रहें, मस्त रहें
#🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕
🙏 प्रेरणादायक विचार - समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः Uu जो शत्रु-मित्रमें और मान-्अपमानमें सम है तथा सरदी, गरमी और सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंमें सम है और आसक्तिसे रहित है Il १८ II तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्। अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रिया नरः ।। जो निन्दा-स्तुतिको समान समझनेवाला , मननशील ಕೆಗಗೆ जिस किसी प्रकारसे भौ शरौरका निर्वाह सदा हो सन्तुष्ट है और रहनेके स्थानमें ममता और आसक्तिसे रहित है= वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान् पुरुप ೯ ೯Il  Il मुझको ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं   पर्युपासते । श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेउतीव मे प्रियाः I। परन्तु जो श्रद्धायुक्त  पुरुप मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृतको निप्काम प्रेमभावसे सेवन करते हैँ वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैँ Il २० Il ३४ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्यविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशो5ध्यायः Il १२ Il ~0 वेद महात्मा   और तथा   परमेश्वरके गुरुजनोंके शास्त्र वचनोंमें प्रत्यक्षके सदश विश्वासका नाम ' श्रद्धा ' ऐ। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः Uu जो शत्रु-मित्रमें और मान-्अपमानमें सम है तथा सरदी, गरमी और सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंमें सम है और आसक्तिसे रहित है Il १८ II तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्। अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रिया नरः ।। जो निन्दा-स्तुतिको समान समझनेवाला , मननशील ಕೆಗಗೆ जिस किसी प्रकारसे भौ शरौरका निर्वाह सदा हो सन्तुष्ट है और रहनेके स्थानमें ममता और आसक्तिसे रहित है= वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान् पुरुप ೯ ೯Il  Il मुझको ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं   पर्युपासते । श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेउतीव मे प्रियाः I। परन्तु जो श्रद्धायुक्त  पुरुप मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृतको निप्काम प्रेमभावसे सेवन करते हैँ वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैँ Il २० Il ३४ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्यविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशो5ध्यायः Il १२ Il ~0 वेद महात्मा   और तथा   परमेश्वरके गुरुजनोंके शास्त्र वचनोंमें प्रत्यक्षके सदश विश्वासका नाम ' श्रद्धा ' ऐ। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
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मेरे विचार - 78 ENad घूं तौ अवसर प्रत्यैक सनुष्य कौ जिँदगौ ्ैं थन् है लैकिन प्मान्ुष्य डसपव डपया।गा UNFi ఉ0గా अवस्तर कौ लौढनै झे چ=٨0 MN 78 ENad घूं तौ अवसर प्रत्यैक सनुष्य कौ जिँदगौ ्ैं थन् है लैकिन प्मान्ुष्य डसपव डपया।गा UNFi ఉ0గా अवस्तर कौ लौढनै झे چ=٨0 MN - ShareChat
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🙏 प्रेरणादायक विचार - 10 @CIC] [C@cJ @గాణె अप्रैल ಊತರಿ ೮ರ ಡ9 @ತಲಾ ಸ್ಥ[ರl ಊೊಊಞಹಾವೆಠ @ಪr CJe] খ্রন] খ০জ্] @্ু খ্যঈন০ ৯০ MN 10 @CIC] [C@cJ @గాణె अप्रैल ಊತರಿ ೮ರ ಡ9 @ತಲಾ ಸ್ಥ[ರl ಊೊಊಞಹಾವೆಠ @ಪr CJe] খ্রন] খ০জ্] @্ু খ্যঈন০ ৯০ MN - ShareChat
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मेरे विचार - 17 ea ೯[ ಈಗಿೂ ಹrr ೩ ٥٢٥٢٤٢٤؟٤٤٩٢٤٤ काार्यन करै षिटस्क QIR SG=5 िटसाका यन चचल दहनाा हौ वह दृढ़ना द्ै डद्दैेश्य पूर्ति र्ै न्ही लगाा 7@ FEGRGIT] MN 17 ea ೯[ ಈಗಿೂ ಹrr ೩ ٥٢٥٢٤٢٤؟٤٤٩٢٤٤ काार्यन करै षिटस्क QIR SG=5 िटसाका यन चचल दहनाा हौ वह दृढ़ना द्ै डद्दैेश्य पूर्ति र्ै न्ही लगाा 7@ FEGRGIT] MN - ShareChat
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मेरे विचार - यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः | हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः Il जिससे कोई भी जौव उद्वेगको प्राप्त नहों होता और जो स्वयं भी किसीं जीवसे उद्वेगको प्राप्त नहों होता; तथा जो हर्प, अमर्प१, भय और उद्वेगादिसे रहित है वह भक्त प्रिय है Il १५ Il मुझको अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासींनो   गतव्यथः | सर्वारम्भपरित्यागी या मद्धक्तः स मे प्रियः I। जो   पुरुप आकांक्षासे रहित,   बाहर- भीतरसे शुद्ध२ चतुर, पक्षपातसे रहित और दुःखोंसे छूटा सब आरम्भोंका त्यागी मेरा भक्त हुआ है-वह fq గైII ?6 Il मुझको या न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति | शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः II जो न कभी हर्पिंत होता है॰ न द्वेप करता है॰ न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मोंका त्यागी है =वह भक्तियुक्त ಞ೯Il % Il पुरुप मुझको उत्नतिको देखकर संताप होनेका नाम ' अमर्प ' है। दूसरेको ?. २. गौता अध्याय १३ श्लोक ७ को टिप्पणोमें इसका विस्तार देखना   चाहिये। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः | हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः Il जिससे कोई भी जौव उद्वेगको प्राप्त नहों होता और जो स्वयं भी किसीं जीवसे उद्वेगको प्राप्त नहों होता; तथा जो हर्प, अमर्प१, भय और उद्वेगादिसे रहित है वह भक्त प्रिय है Il १५ Il मुझको अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासींनो   गतव्यथः | सर्वारम्भपरित्यागी या मद्धक्तः स मे प्रियः I। जो   पुरुप आकांक्षासे रहित,   बाहर- भीतरसे शुद्ध२ चतुर, पक्षपातसे रहित और दुःखोंसे छूटा सब आरम्भोंका त्यागी मेरा भक्त हुआ है-वह fq గైII ?6 Il मुझको या न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति | शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः II जो न कभी हर्पिंत होता है॰ न द्वेप करता है॰ न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मोंका त्यागी है =वह भक्तियुक्त ಞ೯Il % Il पुरुप मुझको उत्नतिको देखकर संताप होनेका नाम ' अमर्प ' है। दूसरेको ?. २. गौता अध्याय १३ श्लोक ७ को टिप्पणोमें इसका विस्तार देखना   चाहिये। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #मेरे विचार
❤️जीवन की सीख - औप्रैल   क्रोध , चिन्ता॰ ईर्ष्या, द्वेष॰ निन्दा Twa %k 5 घयुलाने ೧ वाली है। इनल शना औल शलील दौनौं ली अवनति होती है। इनलो  बचना चाहिए। MN औप्रैल   क्रोध , चिन्ता॰ ईर्ष्या, द्वेष॰ निन्दा Twa %k 5 घयुलाने ೧ वाली है। इनल शना औल शलील दौनौं ली अवनति होती है। इनलो  बचना चाहिए। MN - ShareChat
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मेरे विचार - श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् II मर्मको न जानकर किये हुए अभ्याससे 3 श्रेष्ठ है; ज्ञानसे मुझ परमेश्वरके स्वरूपका ध्यान है और ध्यानसे भी सब कर्मोंके फलका त्याग२ श्रेष्ठ है; क्योंकि त्यागसे तत्काल ही परम शान्ति होती है Il १२ II अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च निर्ममो   निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ।I सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यों मद्धक्तः स मे प्रियः Il जो पुरुप सब भूतोंमें द्वेपभावसे रहित, स्वार्थरहित सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममतासे रहित, अहंकारसे रहित, सुख-दुःखोंको प्राप्तिमें सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करनेवालेको भी अभय देनेवाला है; तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है॰ मन- इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें किये हुए है और  मुझमें किये हुए 7 दृढ़ निश्चयवाला है-वह अर्पण ತಳಣೆ' मन= बुद्धिवाला मेरा भक्त प्रिय है Il १३-१४ II मुझको २. कैवल भगवदर्थ कर्म करनेवाले पुरुपका भगवानूमें प्रेम और श्रद्धा तथा भगवानूका चिन्तन भी बना रहता है॰ इसलिये कहा   है। ध्यानसे " कर्मफलका 4a যোা श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् II मर्मको न जानकर किये हुए अभ्याससे 3 श्रेष्ठ है; ज्ञानसे मुझ परमेश्वरके स्वरूपका ध्यान है और ध्यानसे भी सब कर्मोंके फलका त्याग२ श्रेष्ठ है; क्योंकि त्यागसे तत्काल ही परम शान्ति होती है Il १२ II अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च निर्ममो   निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ।I सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यों मद्धक्तः स मे प्रियः Il जो पुरुप सब भूतोंमें द्वेपभावसे रहित, स्वार्थरहित सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममतासे रहित, अहंकारसे रहित, सुख-दुःखोंको प्राप्तिमें सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करनेवालेको भी अभय देनेवाला है; तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है॰ मन- इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें किये हुए है और  मुझमें किये हुए 7 दृढ़ निश्चयवाला है-वह अर्पण ತಳಣೆ' मन= बुद्धिवाला मेरा भक्त प्रिय है Il १३-१४ II मुझको २. कैवल भगवदर्थ कर्म करनेवाले पुरुपका भगवानूमें प्रेम और श्रद्धा तथा भगवानूका चिन्तन भी बना रहता है॰ इसलिये कहा   है। ध्यानसे " कर्मफलका 4a যোা श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
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🙏गीता ज्ञान🛕 - 76 ea आपने लक्ष्य को कथीी सत % அஅச] @9 सिलगाा डसी में संतोप करन्ा पड़ेगा Iul 76 ea आपने लक्ष्य को कथीी सत % அஅச] @9 सिलगाा डसी में संतोप करन्ा पड़ेगा Iul - ShareChat
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मेरे विचार - 10 अप्रैल   हर एक विपत्ति मनुष्य के खाहविला की एलीक्षा लैने ओती ह्रै औल हवल ऐक ढुल् ईफ्हलु कै प्रति ಶಕ೯ [@galm ಹ ಪila ಹಾರ್ ओता है। MN 10 अप्रैल   हर एक विपत्ति मनुष्य के खाहविला की एलीक्षा लैने ओती ह्रै औल हवल ऐक ढुल् ईफ्हलु कै प्रति ಶಕ೯ [@galm ಹ ಪila ಹಾರ್ ओता है। MN - ShareChat
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❤️जीवन की सीख - 75 ENal छपनै ज्जीवन का থুণে লেঃস্র এ্রনঙ্খী और डस्क बाढ छ्पनी शशारीरिक और ZTIनIटसक शशखित ٤«؟R؟؟٢٦R٤ झौँक ढौ 0 MN 75 ENal छपनै ज्जीवन का থুণে লেঃস্র এ্রনঙ্খী और डस्क बाढ छ्पनी शशारीरिक और ZTIनIटसक शशखित ٤«؟R؟؟٢٦R٤ झौँक ढौ 0 MN - ShareChat