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#📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #मेरे विचार #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - pece ]7 समय आपका साथ तभी देगा जब ओप समय का सम्मान करेगें| M pece ]7 समय आपका साथ तभी देगा जब ओप समय का सम्मान करेगें| M - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔
🙏 प्रेरणादायक विचार - ] नया=्नया तौ सिव कुष्ठ f_i च्छा ह्वी लजता है॰ सच्चाई तौ ह्वौनै कै वाढ ह्वी पत्ा चलती ge है॰ फिर चहें वौ कौई चीज् ह्वौ य ~SCIC MN ] नया=्नया तौ सिव कुष्ठ f_i च्छा ह्वी लजता है॰ सच्चाई तौ ह्वौनै कै वाढ ह्वी पत्ा चलती ge है॰ फिर चहें वौ कौई चीज् ह्वौ य ~SCIC MN - ShareChat
#📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏 प्रेरणादायक विचार
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोउत्यर्थमहं स च मम प्रियः I। एकोभावसे स्थित अनन्य उनमें नित्य मुझमें प्रेमभक्तिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है, क्योंकि तत्त्वसे जाननेवाले ज्ञानीको मैं अत्यन्त प्रिय मुझको हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है Il १७ ।l उदाराः सर्व एवैते ज्ञानीं त्वात्मैव मे मतम्। যানিবূ II आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां  ये सभी उदार हैँ, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप हो है ऐसा मेरा मत है; क्योंकि वह मद्गत मन-बुद्धिवाला  ज्ञानी  3f 3 পন गतिस्वरूप  ही अच्छी प्रकार स्थित है Il १८ II मुझमें बहूनां   जन्मनामन्ते সাননান্সা সণমন | নাম্তুণন: মনসিনি ম সঙ্কান্সা सुदुर्लभः || बहुत जन्मोंके अन्तके जन्ममें तत्त्वज्ञानको प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही है = इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यन्त है II १९ II दुर्लभ श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 प्रेस , गोरखपुर से साभार गीता तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोउत्यर्थमहं स च मम प्रियः I। एकोभावसे स्थित अनन्य उनमें नित्य मुझमें प्रेमभक्तिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है, क्योंकि तत्त्वसे जाननेवाले ज्ञानीको मैं अत्यन्त प्रिय मुझको हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है Il १७ ।l उदाराः सर्व एवैते ज्ञानीं त्वात्मैव मे मतम्। যানিবূ II आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां  ये सभी उदार हैँ, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप हो है ऐसा मेरा मत है; क्योंकि वह मद्गत मन-बुद्धिवाला  ज्ञानी  3f 3 পন गतिस्वरूप  ही अच्छी प्रकार स्थित है Il १८ II मुझमें बहूनां   जन्मनामन्ते সাননান্সা সণমন | নাম্তুণন: মনসিনি ম সঙ্কান্সা सुदुर्लभः || बहुत जन्मोंके अन्तके जन्ममें तत्त्वज्ञानको प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही है = इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यन्त है II १९ II दुर्लभ श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 प्रेस , गोरखपुर से साभार गीता - ShareChat
#मेरे विचार #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕
मेरे विचार - ८ &1؟&<}&,78743 { जितनी भी समझदारी सै वौलिए लैकिन॰ दाला ढेपनी शौज्यता গুলনী और ढपनै भन कै विचारोँं कै अनुसार हरी डसका भतलव निकालता है। MN ८ &1؟&<}&,78743 { जितनी भी समझदारी सै वौलिए लैकिन॰ दाला ढेपनी शौज्यता গুলনী और ढपनै भन कै विचारोँं कै अनुसार हरी डसका भतलव निकालता है। MN - ShareChat
#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️ #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख
मेरे विचार - दैवीं ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया| मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।। यह अलौकिक अर्थात्ू अति क्योंकि ಇತ್ತಾ त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है; 6 पुरुष केवल ही निरन्तर भजते हैँ, मुझको मायाको उल्लंघन कर जाते हैँ अर्थात् संसारसे तर जाते हैं Il १४Il दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः न मां ^ সানসাপ্সিনা: Il आसुरं माययापहृतज्ञाना چ٨ मायाके द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है आसुर-स्वभावको धारण किये हुए मनुष्योंमें नीच  कर्म करनेवाले 767 ఖెగే II 84 Il मूढ़लोग मुझको चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्जुन। आर्तो जिज्ञासुर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।  हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम कर्म करनेवाले अर्थार्थी१, आर्त२, जिज्ञासुरै और ज्ञानी - ऐसे चार प्रकारके भक्तजन मूझको भजते हैँ II १६ Il १० सांसारिक पदार्थोंके लिये भजनेवाला| २. संकट-निवारणके लिये भजनेवाला | ३. मेरेको यथार्थरूपसे जाननेको इच्छासे भजनेवाला श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 प्रेस , गोरखपुर से साभार যীলা दैवीं ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया| मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।। यह अलौकिक अर्थात्ू अति क्योंकि ಇತ್ತಾ त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है; 6 पुरुष केवल ही निरन्तर भजते हैँ, मुझको मायाको उल्लंघन कर जाते हैँ अर्थात् संसारसे तर जाते हैं Il १४Il दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः न मां ^ সানসাপ্সিনা: Il आसुरं माययापहृतज्ञाना چ٨ मायाके द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है आसुर-स्वभावको धारण किये हुए मनुष्योंमें नीच  कर्म करनेवाले 767 ఖెగే II 84 Il मूढ़लोग मुझको चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्जुन। आर्तो जिज्ञासुर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।  हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम कर्म करनेवाले अर्थार्थी१, आर्त२, जिज्ञासुरै और ज्ञानी - ऐसे चार प्रकारके भक्तजन मूझको भजते हैँ II १६ Il १० सांसारिक पदार्थोंके लिये भजनेवाला| २. संकट-निवारणके लिये भजनेवाला | ३. मेरेको यथार्थरूपसे जाननेको इच्छासे भजनेवाला श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 प्रेस , गोरखपुर से साभार যীলা - ShareChat
#📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - ६ pee बुरा वक्त ही सिखाता है॰ की अच्छा वक्त किसके साथ बिताना है। M ६ pee बुरा वक्त ही सिखाता है॰ की अच्छा वक्त किसके साथ बिताना है। M - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार ##भगवद गीता🙏🕉️ #मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔
❤️जीवन की सीख - ]5 फखवर कई बार उलझनों को झुककर भी सुलझाना पडता है क्योंकि सभी लोग आपके कद के बराबर नही होते। M ]5 फखवर कई बार उलझनों को झुककर भी सुलझाना पडता है क्योंकि सभी लोग आपके कद के बराबर नही होते। M - ShareChat
##भगवद गीता🙏🕉️ #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख
#भगवद गीता🙏🕉️ - ]5 फखवर कई बार उलझनों को झुककर भी सुलझाना पडता है क्योंकि सभी लोग आपके कद के बराबर नही होते। M ]5 फखवर कई बार उलझनों को झुककर भी सुलझाना पडता है क्योंकि सभी लोग आपके कद के बराबर नही होते। M - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 ##भगवद गीता🙏🕉️
🙏 प्रेरणादायक विचार - 00 मजुष्य को सफल समय [{gR{] नहवी बनाता बल्कि समय का सह्वी उपयौज अजुष्य को सफल बनाता है। MN 00 मजुष्य को सफल समय [{gR{] नहवी बनाता बल्कि समय का सह्वी उपयौज अजुष्य को सफल बनाता है। MN - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 ##भगवद गीता🙏🕉️ #🙏 प्रेरणादायक विचार
❤️जीवन की सीख - बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोउस्मि भरतर्षभ ।। भरतश्रेष्ठ ! मैँ बलवानोंका आसक्ति और గ్ कामनाओंसे रहित बल अर्थात् सामर्थ्य हूँ और सब 31%7 धर्मके अनुकूल शास्त्रके अनुकूल भूतोंमें काम हूँ Il ११ II ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि।। 7 और भी जो सत्त्वगुणसे उत्पन्न होनेवाले भाव हैँ और जो रजोगुणसे तथा तमोगुणसे होनेवाले भाव हैँ, उन सबको तू ' मुझसे ही होनेवाले हैं ' ऐसा जान, परन्तु वास्तवमें * उनमें मैँ और वे मुझमें नहों हैँ II १२ II  त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः মনসিন जगत्। मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् I। और कार्यरूप सात्त्विक, राजस गुणोंके IHH इन तीनों प्रकारके भावोंसे यह सारा संसार  प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा है, इसीलिये इन तीनों परे मुझ अविनाशीको नहों जानता II १३ II गुणोंसे श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 प्रेस , गोरखपुर से साभार गीता बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोउस्मि भरतर्षभ ।। भरतश्रेष्ठ ! मैँ बलवानोंका आसक्ति और గ్ कामनाओंसे रहित बल अर्थात् सामर्थ्य हूँ और सब 31%7 धर्मके अनुकूल शास्त्रके अनुकूल भूतोंमें काम हूँ Il ११ II ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि।। 7 और भी जो सत्त्वगुणसे उत्पन्न होनेवाले भाव हैँ और जो रजोगुणसे तथा तमोगुणसे होनेवाले भाव हैँ, उन सबको तू ' मुझसे ही होनेवाले हैं ' ऐसा जान, परन्तु वास्तवमें * उनमें मैँ और वे मुझमें नहों हैँ II १२ II  त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः মনসিন जगत्। मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् I। और कार्यरूप सात्त्विक, राजस गुणोंके IHH इन तीनों प्रकारके भावोंसे यह सारा संसार  प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा है, इसीलिये इन तीनों परे मुझ अविनाशीको नहों जानता II १३ II गुणोंसे श्रीमदभगवदगीता अध्याय 7 प्रेस , गोरखपुर से साभार गीता - ShareChat