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#मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕
मेरे विचार - औैलशिक्षा ही सबसे बड़ा धान है। शिक्षा যমানন চ हम ओर लेे जाती है। डॉ॰ भामराव अम्बेडकर MN औैलशिक्षा ही सबसे बड़ा धान है। शिक्षा যমানন চ हम ओर लेे जाती है। डॉ॰ भामराव अम्बेडकर MN - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #मेरे विचार
❤️जीवन की सीख - पर्युपासते। त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं ये सर्वत्रगमचिन्त्य कूटस्थमचलं e gaH सत्रियम्येन्दरियग्राम सर्वत्र समबुदद्वयः " ते সাদুননি सर्वभूतहिते ামল 0 परन्तु जो पुरुप इन्द्रियोंके समुदायको भलो प्रकार सर्वव्यापी , मन- बुद्धिसे  वशमे परे करक अकथनोयस्वरूप और सदा एकरस रहनेवाले नित्य अचल॰ निराकार, अविनाशी सच्चिदानन्दघ्न ब्रह्मको निरन्तर एकोभावसे ध्यान करते दए भजते हैं॰ वे सम्पूर्ण भूतांके हितमें रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको हो प्राप्त होते हैं"३-४" क्लेशोउ्धिकतरस्तेपामव्यक्तासक्तचेतसाम " हि गतिर्दःखं देहवद्िरवप्यते १। 38న =fச1<1=4 ஈ =அ आसक्त 37 चित्तवाले  पुरुपोंके faar 8; साधनमे परिश्रम क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्तविपयक गति दःखपूर्वक प्राप्त को जाती है।।५ " ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस्य मत्पराः 9 अनन्येनेच योगेन उपासते ।। मा அ परन्तु जो मेरे परायण रहनेवाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मोको मुझ्में अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वरको हो अनन्य भक्तियोगसे निरन्तर चिन्तन करते डुए ಖತಗ ೪ Il ೯ Il समुद्धर्ता  मत्युसंसारसागरात्। तेपामर भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम।। हे॰ अजुंन! उन নিন লাননাল সমী सझमें भक्तोंका मे शोघ्र हो मृत्यरूप संसार - समुद्रसे उड्धार  কনেনালা চাঁনা ৪ুঁI1৩ Il मय्येव मन आधत्स्व मयि चुद्रि निवेशय। নিনমিষ্মি সমন অন কধ ন মহাম: I1 मुझमें हो युडिको लगाः  मनको लगा और সুপ্রদ तू मझमें हो निवास करेगा॰ इसपें হমক্ধ বপযান ಕತ 4 774 ೩1 ೯Il ೭ Il * इस श्लोकका विशेप भाव जाननेके लिये गीोता अध्याय ११ श्लोक ५५ देखना चाहिये। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार पर्युपासते। त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं ये सर्वत्रगमचिन्त्य कूटस्थमचलं e gaH सत्रियम्येन्दरियग्राम सर्वत्र समबुदद्वयः " ते সাদুননি सर्वभूतहिते ামল 0 परन्तु जो पुरुप इन्द्रियोंके समुदायको भलो प्रकार सर्वव्यापी , मन- बुद्धिसे  वशमे परे करक अकथनोयस्वरूप और सदा एकरस रहनेवाले नित्य अचल॰ निराकार, अविनाशी सच्चिदानन्दघ्न ब्रह्मको निरन्तर एकोभावसे ध्यान करते दए भजते हैं॰ वे सम्पूर्ण भूतांके हितमें रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको हो प्राप्त होते हैं"३-४" क्लेशोउ्धिकतरस्तेपामव्यक्तासक्तचेतसाम " हि गतिर्दःखं देहवद्िरवप्यते १। 38న =fச1<1=4 ஈ =அ आसक्त 37 चित्तवाले  पुरुपोंके faar 8; साधनमे परिश्रम क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्तविपयक गति दःखपूर्वक प्राप्त को जाती है।।५ " ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस्य मत्पराः 9 अनन्येनेच योगेन उपासते ।। मा அ परन्तु जो मेरे परायण रहनेवाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मोको मुझ्में अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वरको हो अनन्य भक्तियोगसे निरन्तर चिन्तन करते डुए ಖತಗ ೪ Il ೯ Il समुद्धर्ता  मत्युसंसारसागरात्। तेपामर भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम।। हे॰ अजुंन! उन নিন লাননাল সমী सझमें भक्तोंका मे शोघ्र हो मृत्यरूप संसार - समुद्रसे उड्धार  কনেনালা চাঁনা ৪ুঁI1৩ Il मय्येव मन आधत्स्व मयि चुद्रि निवेशय। নিনমিষ্মি সমন অন কধ ন মহাম: I1 मुझमें हो युडिको लगाः  मनको लगा और সুপ্রদ तू मझमें हो निवास करेगा॰ इसपें হমক্ধ বপযান ಕತ 4 774 ೩1 ೯Il ೭ Il * इस श्लोकका विशेप भाव जाननेके लिये गीोता अध्याय ११ श्लोक ५५ देखना चाहिये। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख
🙏 प्रेरणादायक विचार - 74 ead 8eRFRI rt v | दैखनै वालै स्ाथिारणा व्यक्तित हौतै है ಖx[ajur @ಗಿೊ तौ अवसरों कौ जन्म दैतै हैँ अम्बेडकर M٨ 74 ead 8eRFRI rt v | दैखनै वालै स्ाथिारणा व्यक्तित हौतै है ಖx[ajur @ಗಿೊ तौ अवसरों कौ जन्म दैतै हैँ अम्बेडकर M٨ - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार #🙏 प्रेरणादायक विचार
🙏गीता ज्ञान🛕 - अथ द्वादशोडध्यायः अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः II अर्जुन बोले-जो अनन्यप्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकारसे निरन्तर आपके भजन- ध्यानमें लगे रहकर आप सगुणरूप परमेश्वरको और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्मको हीं अतिश्रेष्ठ भावसे भजते हैँ= उन दोनों   प्रकारके उपासकोंमें अति उत्तम योगवेत्ता कौन हैँ ? Il१ Il श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते | श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः II श्रोभगवान् बोले- मुझमें मनको एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन- ध्यानमें लगे हुए * जो भक्तजन अतिशय  श्रेष्ठ युक्त होकर मुझ सगुणरूप श्रद्धासे परमेश्वरको भजते हैं॰ वे मुझको योगियोंमें अति उत्तम योगी मान्य हैँ II २ II अर्थात् गोता अध्याय ११ श्लोक ५५ में लिखे हुए प्रकारसे निरन्तर मैरेमें लगे हुए। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार अथ द्वादशोडध्यायः अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः II अर्जुन बोले-जो अनन्यप्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकारसे निरन्तर आपके भजन- ध्यानमें लगे रहकर आप सगुणरूप परमेश्वरको और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्मको हीं अतिश्रेष्ठ भावसे भजते हैँ= उन दोनों   प्रकारके उपासकोंमें अति उत्तम योगवेत्ता कौन हैँ ? Il१ Il श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते | श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः II श्रोभगवान् बोले- मुझमें मनको एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन- ध्यानमें लगे हुए * जो भक्तजन अतिशय  श्रेष्ठ युक्त होकर मुझ सगुणरूप श्रद्धासे परमेश्वरको भजते हैं॰ वे मुझको योगियोंमें अति उत्तम योगी मान्य हैँ II २ II अर्थात् गोता अध्याय ११ श्लोक ५५ में लिखे हुए प्रकारसे निरन्तर मैरेमें लगे हुए। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
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मेरे विचार - अहमेवंविधोर्जुन। भक्त्या त्वनन्यया शक्य च तत्त्वेन प्रवेष्टु সান্তু   সম্ভূ ٦٠٩ ١١ 7 परन्तु हे परंतप अर्जुन ! अनन्यभक्तिके  द्वारा इस प्रकार चतुर्भुजरूपवाला मैँ प्रत्यक्ष देखनेके लिये, तत्त्वसे जाननेके लिये तथा प्रवेश करनेके लिये अर्थांत् एकोभावसे प्राप्त होनेके लिये भौ शक्य हूँ Il ५४ II मत्कर्मकृन्मत्परमो   मद्भक्तः  सङ्गवर्जितः निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव११ ಗಣಗಣ್ಕೆ हे अर्जुन ! जो पुरुष केवल मेरे ही लिये कर्त्तव्यकर्मोंको करनेवाला है, मैरे परायण है, भक्त है॰ आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण वैरभावसे रहित है* वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष  ही प्राप्त होता है Il ५५ II मुझको ३४ँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृण्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोउध्यायः Il ११ II ~~0~~ अनन्यभक्तिका भाव अगले श्लोकर्म विस्तारपूर्वक कहा है। सर्वत्र भगवद्युद्धि है जानेसे उस पुरुपका अति अपराध करनैवालेमं भी वैरभाव नहॉं होता हैं॰ फिर ऑरीमें ता कहना हो क्या हैं। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार अहमेवंविधोर्जुन। भक्त्या त्वनन्यया शक्य च तत्त्वेन प्रवेष्टु সান্তু   সম্ভূ ٦٠٩ ١١ 7 परन्तु हे परंतप अर्जुन ! अनन्यभक्तिके  द्वारा इस प्रकार चतुर्भुजरूपवाला मैँ प्रत्यक्ष देखनेके लिये, तत्त्वसे जाननेके लिये तथा प्रवेश करनेके लिये अर्थांत् एकोभावसे प्राप्त होनेके लिये भौ शक्य हूँ Il ५४ II मत्कर्मकृन्मत्परमो   मद्भक्तः  सङ्गवर्जितः निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव११ ಗಣಗಣ್ಕೆ हे अर्जुन ! जो पुरुष केवल मेरे ही लिये कर्त्तव्यकर्मोंको करनेवाला है, मैरे परायण है, भक्त है॰ आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण वैरभावसे रहित है* वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष  ही प्राप्त होता है Il ५५ II मुझको ३४ँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृण्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोउध्यायः Il ११ II ~~0~~ अनन्यभक्तिका भाव अगले श्लोकर्म विस्तारपूर्वक कहा है। सर्वत्र भगवद्युद्धि है जानेसे उस पुरुपका अति अपराध करनैवालेमं भी वैरभाव नहॉं होता हैं॰ फिर ऑरीमें ता कहना हो क्या हैं। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - 72 ead छैढै बच्चे वै चमकते त्वारै है ष्जौो भगवान कै हाथ सै छूटकर ಊciur[r गए है । MN 72 ead छैढै बच्चे वै चमकते त्वारै है ष्जौो भगवान कै हाथ सै छूटकर ಊciur[r गए है । MN - ShareChat
#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔
मेरे विचार - 12 जिँदजी बॉक्सिंज कै खैल की औ्ैल तरह है जहाँ हर का ऐलान ढपकै जिरनै पर नर्ह्वी हौता, वह तौ धपकै डिढनै सै इन्कार करनै पर हौता है उठिए जीवन चलनै का नाम चलतै रहौ सुबह शाम MN 12 जिँदजी बॉक्सिंज कै खैल की औ्ैल तरह है जहाँ हर का ऐलान ढपकै जिरनै पर नर्ह्वी हौता, वह तौ धपकै डिढनै सै इन्कार करनै पर हौता है उठिए जीवन चलनै का नाम चलतै रहौ सुबह शाम MN - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार
🙏 प्रेरणादायक विचार - T Cిన కర్న @@II` भी बदतर और भयंकर चौज है क्यौकि बहानाा सुरक्षित झूढ है। MN T Cిన కర్న @@II` भी बदतर और भयंकर चौज है क्यौकि बहानाा सुरक्षित झूढ है। MN - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔
🙏 प्रेरणादायक विचार - औैल मित्रता हवी ऐसी उत्तम औषधि है॰ जौ संसार 3 & tell, &€ &a कौ भर सकती है। MN औैल मित्रता हवी ऐसी उत्तम औषधि है॰ जौ संसार 3 & tell, &€ &a कौ भर सकती है। MN - ShareChat
#मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - सङ्मय उवाच वासुदेवस्तथोक्त्वा  इत्यर्जुनं स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः भीतमेनं- 7 3াথ্ামমামাম पुनः   सौम्यवपुर्मंहात्मा II भूत्वा संजय बौले  वासुदेवभगवानूने अर्जुनके प्रति इस ग्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुंज रूपको दिखलाया और फिर महात्मा श्रीकृष्णने सौम्यमू्तिं होकर इस भयभीत अर्जुनको धीरज दियाIl ५० Il अजुन उवाच सौम्यं   जनार्दन। दृष्ेदं मानुपं   रूपं নন इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः अर्जुन बोले - हे जनार्दन ! आपके इस अति शान्त मनुष्यरूपको देखकर अब मैॅ स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हौे गया हूँ II ५१ Il श्रीभगवानुवाच ತತ್ತಗಕೆ दृष्टवानसि எ் যন্সম | देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाइक्षिणः II श्रौभगवान् बौले- मेरा जौ चतुरभुंज रूप तुमने देखा हैं, यह सुदुर्दर्श हैं अर्थात् इसके दर्शन बड़े ही दुर्लंभ हें। देवता भी सदा इस रूपके दर्शनकी  आकांक्षा करते रहते हैॅं Il ५२ ।I  नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया| एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा I।  হানম मुझको देखा है॰ इस् प्रकार f ஈ तुमने चतुर्भुजरूपवाला मैँ न वेदौंसे, न तपसे, न दानसे और न यज्ञसे हीं देखा जा सकता हूँ II ५३ Il  श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार सङ्मय उवाच वासुदेवस्तथोक्त्वा  इत्यर्जुनं स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः भीतमेनं- 7 3াথ্ামমামাম पुनः   सौम्यवपुर्मंहात्मा II भूत्वा संजय बौले  वासुदेवभगवानूने अर्जुनके प्रति इस ग्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुंज रूपको दिखलाया और फिर महात्मा श्रीकृष्णने सौम्यमू्तिं होकर इस भयभीत अर्जुनको धीरज दियाIl ५० Il अजुन उवाच सौम्यं   जनार्दन। दृष्ेदं मानुपं   रूपं নন इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः अर्जुन बोले - हे जनार्दन ! आपके इस अति शान्त मनुष्यरूपको देखकर अब मैॅ स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हौे गया हूँ II ५१ Il श्रीभगवानुवाच ತತ್ತಗಕೆ दृष्टवानसि எ் যন্সম | देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाइक्षिणः II श्रौभगवान् बौले- मेरा जौ चतुरभुंज रूप तुमने देखा हैं, यह सुदुर्दर्श हैं अर्थात् इसके दर्शन बड़े ही दुर्लंभ हें। देवता भी सदा इस रूपके दर्शनकी  आकांक्षा करते रहते हैॅं Il ५२ ।I  नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया| एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा I।  হানম मुझको देखा है॰ इस् प्रकार f ஈ तुमने चतुर्भुजरूपवाला मैँ न वेदौंसे, न तपसे, न दानसे और न यज्ञसे हीं देखा जा सकता हूँ II ५३ Il  श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat