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#🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #मेरे विचार
🙏 प्रेरणादायक विचार - 11 भरोसा सब 5 कीजिए पर लेकिन सावधानी से क्योंकि कभी-कभी खुद के दांत भी जीभ को काट लेते हैं। MN 11 भरोसा सब 5 कीजिए पर लेकिन सावधानी से क्योंकि कभी-कभी खुद के दांत भी जीभ को काट लेते हैं। MN - ShareChat
#मेरे विचार #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - 11 मई   बुरे प्रभावों से बचना , उनका प्रतिकार करना , नाम संयम ಹ इसी ঔ, জী मनुष्य में योग्यता पैदा कर उसे प्रभावशाली बनाता है। MN 11 मई   बुरे प्रभावों से बचना , उनका प्रतिकार करना , नाम संयम ಹ इसी ঔ, জী मनुष्य में योग्यता पैदा कर उसे प्रभावशाली बनाता है। MN - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #मेरे विचार
🙏गीता ज्ञान🛕 - मां च योउव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। गुणान्समतीत्यैतान्व्रह्मभूयाय कल्पते ।। स और जो पुरुप अव्यभिचारी भक्तियोगके  द्वानों নঙ্ক   9ী   বূন  भजता   है॰ निरन्तर मुझको भलीभाँति लाँघकर सच्चिदानन्दघन ग्रह्मको गुणोंको प्राप्त होनेके लिये योग्य चन जाता है Il २६ Il ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। सुखस्यैकान्तिकस्य च।। शाश्वतस्य च धर्मस्य और क्योंकि उस अविनाशी परव्रह्मका अमृतका  तथा नित्यधर्मका और अखण्ड एकरस आनन्दका आश्रय मैं हूँ Il २७ Il श्रीमद्भगवद्नीतासूपनिपत्सु ग्रह्मविद्यायां ் எfsf योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो  चतुर्दशोषध्यायः नाम II ?& Il ~0~ केवल एक सर्वंशक्तिमान् परमेश्वर वासुदेवभगवानूको हो अपना स्वामो मानता हुआ, स्वार्थ और अभिमानको त्यागकर, श्रद्धा और भावके सहित परम प्रेमसे निरन्तर चिन्तन करनेको अव्यभिचारो   भक्तियोग ' कहते हॅ। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार मां च योउव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। गुणान्समतीत्यैतान्व्रह्मभूयाय कल्पते ।। स और जो पुरुप अव्यभिचारी भक्तियोगके  द्वानों নঙ্ক   9ী   বূন  भजता   है॰ निरन्तर मुझको भलीभाँति लाँघकर सच्चिदानन्दघन ग्रह्मको गुणोंको प्राप्त होनेके लिये योग्य चन जाता है Il २६ Il ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। सुखस्यैकान्तिकस्य च।। शाश्वतस्य च धर्मस्य और क्योंकि उस अविनाशी परव्रह्मका अमृतका  तथा नित्यधर्मका और अखण्ड एकरस आनन्दका आश्रय मैं हूँ Il २७ Il श्रीमद्भगवद्नीतासूपनिपत्सु ग्रह्मविद्यायां ் எfsf योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो  चतुर्दशोषध्यायः नाम II ?& Il ~0~ केवल एक सर्वंशक्तिमान् परमेश्वर वासुदेवभगवानूको हो अपना स्वामो मानता हुआ, स्वार्थ और अभिमानको त्यागकर, श्रद्धा और भावके सहित परम प्रेमसे निरन्तर चिन्तन करनेको अव्यभिचारो   भक्तियोग ' कहते हॅ। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #मेरे विचार #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕
🙏 प्रेरणादायक विचार - न विचाल्यते। उदासीनवदासीनो गुणैर्यों गुणा वर्तन्त इत्येव योउ्वतिष्ठति नेङ्गते ।। जो साक्षौके सदृश स्थित हुआ ಫ್ಞಾ gis নিনলিন নন্কী' ক্িমা सकता और गुण जा गुणोंमें   वरतते * 8~9# हुआ समझता सच्चिदानन्दघन परमात्मामें एकोभावसे स्थित रहता हैं एवं उस स्थितिसे कभी विचलित नहीं होता II २३ II समदुःखसुखः स्वस्थः समलोप्टाश्मकाञ्चनः | तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः I।  जो निरन्तर आत्मभावमें स्थित, दुःख-सुखको  पत्थर और स्वर्णमें समान समझनेवाला, मिट्टी, समान भाववाला, ज्ञानौ, प्रिय तथा अप्रियको एक- सा  माननेवाला और अपनी   निन्दा-स्तुतिमें भौ समान भाववाला हैII २४Il मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः {( सर्वारम्भपरित्यागी गूणातीतः स उच्यते ।। जो मान और अपमानमें सम है, मित्र और वैरीके पक्षमें भी सम हैं एवं सम्पूर्ण आरम्भोंमें कर्तापनके अभिमानसे रहित हैं, वह पुरुप गुणातीत कहा जाता है II २५ II  त्रिगुणमयो मायासे उत्पन्न हुए अन्तःकरणके सहित इन्द्रियोंका अपने- अपने विपयोंमें विचरना हा ' गृणोंका गुणोंमें वरतना ' हॅं। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार न विचाल्यते। उदासीनवदासीनो गुणैर्यों गुणा वर्तन्त इत्येव योउ्वतिष्ठति नेङ्गते ।। जो साक्षौके सदृश स्थित हुआ ಫ್ಞಾ gis নিনলিন নন্কী' ক্িমা सकता और गुण जा गुणोंमें   वरतते * 8~9# हुआ समझता सच्चिदानन्दघन परमात्मामें एकोभावसे स्थित रहता हैं एवं उस स्थितिसे कभी विचलित नहीं होता II २३ II समदुःखसुखः स्वस्थः समलोप्टाश्मकाञ्चनः | तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः I।  जो निरन्तर आत्मभावमें स्थित, दुःख-सुखको  पत्थर और स्वर्णमें समान समझनेवाला, मिट्टी, समान भाववाला, ज्ञानौ, प्रिय तथा अप्रियको एक- सा  माननेवाला और अपनी   निन्दा-स्तुतिमें भौ समान भाववाला हैII २४Il मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः {( सर्वारम्भपरित्यागी गूणातीतः स उच्यते ।। जो मान और अपमानमें सम है, मित्र और वैरीके पक्षमें भी सम हैं एवं सम्पूर्ण आरम्भोंमें कर्तापनके अभिमानसे रहित हैं, वह पुरुप गुणातीत कहा जाता है II २५ II  त्रिगुणमयो मायासे उत्पन्न हुए अन्तःकरणके सहित इन्द्रियोंका अपने- अपने विपयोंमें विचरना हा ' गृणोंका गुणोंमें वरतना ' हॅं। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - 0 थई दानी होने से विचारवान पहले होना आवश्यक 8 frfaR दान देना धन दुरूपयोग @ करना है। Mn 0 थई दानी होने से विचारवान पहले होना आवश्यक 8 frfaR दान देना धन दुरूपयोग @ करना है। Mn - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार
🙏 प्रेरणादायक विचार - 10 पूरे ब्रम्हाण्ड में 5 जुबान हीं एक चीज ऐसी 8, Gfal ঔঞ্ 9 जहा पर जहर और अमृत एक साथ रहतें है ।l MN 10 पूरे ब्रम्हाण्ड में 5 जुबान हीं एक चीज ऐसी 8, Gfal ঔঞ্ 9 जहा पर जहर और अमृत एक साथ रहतें है ।l MN - ShareChat
#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - अर्जुन उवाच कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो। किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ।। সানুন নাল --ব্ন নীনীা  अतीत पुरुप किन- गुणौंसे किन लक्षणोंसे युक्त होता है और किस प्रकारके आचरणोंवाला होता हैं तथा हे प्रभो ! मनुप्य किस उपायसे इन तीनों गुणोंसे अतीत होता हैं ? II २१ Il প্ীপযনানুনান प्रवृत्ति च मोहमेव च पाण्डव१ प्रकाशं च न द्वेप्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति १।  श्रीभगवान् बोले ~ हे अर्जुन ! जो पुरुप सत्त्वगुणके और रजोगुणके कार्यरूप प्रवृत्तिको  कार्यरूप प्रकाशको १ तथा तमोगुणके कार्यरूप मोहको२ भी न तो प्रवृत्त होनेपर उनसे द्वेप करता हैं और न निवृत्त होनेपर उनकी आकांक्षा करता हैंर Il २२ Il अन्तःकरण और इन्द्रि्याादकोंमें आलस्यका अभाव होकर १ जो एक प्रकारको चेतनता होती हॅ॰ प्रकाश ' हं। उसको नाम २० निद्रा और आलस्य आदिको बहुलतासे अत्तःकरण और ' मोह  इद्द्रियांमं चेतनशकिके लय होनेको यहाँ नामसे समझना चारये। जो पुरुप " एक सचिदानन्दवन परमात्मामें हो नित्य, एकोभावसे 3. स्थित हआ इस त्रिगणमयो मायाके प्रपंचरूप संसारसे सर्वंथा अतीत अभिमानर्रहत अत्तःकरणमें तोनों हा गया हें॰ उस गुणातीत परुपके সক্ষম স্াঁর गुरणोंके कार्यरूप प्रकाश, प्रवृत्ति और मर्हाद वृत्तियोंके और न होनेपर किसो कालर्में भो इच्छा- ढ्वेप आद चिकार नहों हॅ॰यही उसके गुणांसे अतीत होनेके प्रधान लक्षण हॅ। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार अर्जुन उवाच कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो। किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ।। সানুন নাল --ব্ন নীনীা  अतीत पुरुप किन- गुणौंसे किन लक्षणोंसे युक्त होता है और किस प्रकारके आचरणोंवाला होता हैं तथा हे प्रभो ! मनुप्य किस उपायसे इन तीनों गुणोंसे अतीत होता हैं ? II २१ Il প্ীপযনানুনান प्रवृत्ति च मोहमेव च पाण्डव१ प्रकाशं च न द्वेप्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति १।  श्रीभगवान् बोले ~ हे अर्जुन ! जो पुरुप सत्त्वगुणके और रजोगुणके कार्यरूप प्रवृत्तिको  कार्यरूप प्रकाशको १ तथा तमोगुणके कार्यरूप मोहको२ भी न तो प्रवृत्त होनेपर उनसे द्वेप करता हैं और न निवृत्त होनेपर उनकी आकांक्षा करता हैंर Il २२ Il अन्तःकरण और इन्द्रि्याादकोंमें आलस्यका अभाव होकर १ जो एक प्रकारको चेतनता होती हॅ॰ प्रकाश ' हं। उसको नाम २० निद्रा और आलस्य आदिको बहुलतासे अत्तःकरण और ' मोह  इद्द्रियांमं चेतनशकिके लय होनेको यहाँ नामसे समझना चारये। जो पुरुप " एक सचिदानन्दवन परमात्मामें हो नित्य, एकोभावसे 3. स्थित हआ इस त्रिगणमयो मायाके प्रपंचरूप संसारसे सर्वंथा अतीत अभिमानर्रहत अत्तःकरणमें तोनों हा गया हें॰ उस गुणातीत परुपके সক্ষম স্াঁর गुरणोंके कार्यरूप प्रकाश, प्रवृत्ति और मर्हाद वृत्तियोंके और न होनेपर किसो कालर्में भो इच्छा- ढ्वेप आद चिकार नहों हॅ॰यही उसके गुणांसे अतीत होनेके प्रधान लक्षण हॅ। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - 09 सईसदाचार से प्राप्त होने वाला सुख स्थायी और मूल्यः ঔ, খনন৫ 66 ५कर्तव्य पालन ೧ रूपी कीमत ತಹಗ पर ही मिलता है॰ MN 09 सईसदाचार से प्राप्त होने वाला सुख स्थायी और मूल्यः ঔ, খনন৫ 66 ५कर्तव्य पालन ೧ रूपी कीमत ತಹಗ पर ही मिलता है॰ MN - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार #मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔
❤️जीवन की सीख - 9 जिंदगी में अगर लक्ष्य बड़ा हो तो संघर्ष भी बड़ा ही करना पड़ता हैं। MNI 9 जिंदगी में अगर लक्ष्य बड़ा हो तो संघर्ष भी बड़ा ही करना पड़ता हैं। MNI - ShareChat
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🙏गीता ज्ञान🛕 - नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति। गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोउधिगच्छति I१ जिस समय द्रष्टा तीनों अतिरिक्त अन्य गुणोंके किसीको कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणौंसे अत्यन्त परे सच्चिदानन्दघनस्वरूप मुझ परमात्माको तत्त्वसे जानता हैं, उस समय वह मैरे स्वरूपको प्राप्त होता हैंIl १९ II गुणानेतानतीत्य   त्रीन्देही   देहसमुद्भवान्। जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोउमृतमश्नुते यह पुरुप शरीरको * उत्पत्तिके कारणरूप इन तीनों गुणौंको उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु वृद्धावस्था और सव प्रकारके दुःखोंसे मुक्त हुआ परमानन्दको प्राप्त होता है Il २० Il पाँच पाँच   ज्ञानेन्द्रियाँ युद्धि, अहंकार और मन   तथा कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत पाँच इन्द्रियोंके विपय- इस प्रकार इन तेईंस   तत्त्वोंका पिण्डरूप यह स्थूल शरौर   प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले हा कार्यं हैं॰ इसलिये इन तौनों इसको गुणोंको गुणोंका उत्पत्तिका कारण कहा हं। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति। गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोउधिगच्छति I१ जिस समय द्रष्टा तीनों अतिरिक्त अन्य गुणोंके किसीको कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणौंसे अत्यन्त परे सच्चिदानन्दघनस्वरूप मुझ परमात्माको तत्त्वसे जानता हैं, उस समय वह मैरे स्वरूपको प्राप्त होता हैंIl १९ II गुणानेतानतीत्य   त्रीन्देही   देहसमुद्भवान्। जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोउमृतमश्नुते यह पुरुप शरीरको * उत्पत्तिके कारणरूप इन तीनों गुणौंको उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु वृद्धावस्था और सव प्रकारके दुःखोंसे मुक्त हुआ परमानन्दको प्राप्त होता है Il २० Il पाँच पाँच   ज्ञानेन्द्रियाँ युद्धि, अहंकार और मन   तथा कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत पाँच इन्द्रियोंके विपय- इस प्रकार इन तेईंस   तत्त्वोंका पिण्डरूप यह स्थूल शरौर   प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले हा कार्यं हैं॰ इसलिये इन तौनों इसको गुणोंको गुणोंका उत्पत्तिका कारण कहा हं। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat