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#श्रीमद्भगवद् गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार
श्रीमद्भगवद् गीता - मयाध्यक्षेण   प्रकृतिः মুমন सचराचरम्| जगद्विपरिवर्तते I। हेतुनानेन  कौन्तेय अधिष्ठाताके सकाशसे प्रकृति ৮ সতুন! सुद्न जगव्क्काोता रचसीकहशस र्रकृत चराचरसहित हेतुसे ही यह संसारचक्र घूम रहा है Il १० Il अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भूतमहेश्वरम् II भावमजानन्तो मम मेरे परमभावको २ न जाननेवाले मूढ़लोग मनुष्यका शरीर धारण करनेवाले मुझ सम्पूर्ण भूतोंके সঙ্কান ईश्वरको तुच्छ समझते हैेँ अर्थात् अपनी योगमायासे संसारके उद्धारके लिये मनुष्यरूपमें विचरते हुए मुझ परमेश्वरको साधारण मनुष्य मानते हैँ II ११ II मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः | राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः II वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञानवाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी , आसुरी और मोहिनी हो धारण किये रहते हैं Il १२Il प्रकृतिको१ २४ में देखना चाहिये। २. गोता अध्याय ७ श्लोक श्रीमदभगवदगीता अध्याय 9 प्रेस , गोरखपुर से साभार যীলা मयाध्यक्षेण   प्रकृतिः মুমন सचराचरम्| जगद्विपरिवर्तते I। हेतुनानेन  कौन्तेय अधिष्ठाताके सकाशसे प्रकृति ৮ সতুন! सुद्न जगव्क्काोता रचसीकहशस र्रकृत चराचरसहित हेतुसे ही यह संसारचक्र घूम रहा है Il १० Il अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भूतमहेश्वरम् II भावमजानन्तो मम मेरे परमभावको २ न जाननेवाले मूढ़लोग मनुष्यका शरीर धारण करनेवाले मुझ सम्पूर्ण भूतोंके সঙ্কান ईश्वरको तुच्छ समझते हैेँ अर्थात् अपनी योगमायासे संसारके उद्धारके लिये मनुष्यरूपमें विचरते हुए मुझ परमेश्वरको साधारण मनुष्य मानते हैँ II ११ II मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः | राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः II वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञानवाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी , आसुरी और मोहिनी हो धारण किये रहते हैं Il १२Il प्रकृतिको१ २४ में देखना चाहिये। २. गोता अध्याय ७ श्लोक श्रीमदभगवदगीता अध्याय 9 प्रेस , गोरखपुर से साभार যীলা - ShareChat