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🌺 शांति की अंतिम पुकार: हस्तिनापुर का वैभव बनाम प्रेम! 🌺 #महाभारत महाभारत के भीषण युद्ध की छाया कुरुक्षेत्र पर मंडरा रही थी। विनाश को टालने के लिए स्वयं भगवान श्रीकृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर की सभा में पधारे। दुर्योधन, जो अपनी शक्ति के मद में चूर था, उसने सोचा कि वह अपनी भव्यता से माधव को मोहित कर लेगा। दुर्योधन ने कृष्ण के स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ी। महल को हीरों और रत्नों से सजाया गया, सोने की थालियों में 'छप्पन भोग' सजाए गए। लेकिन जैसे ही दुर्योधन ने बड़े गर्व से उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया, कृष्ण ने अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ उसे रोक दिया। "दुर्योधन! व्यक्ति भोजन दो ही स्थितियों में करता है—या तो खिलाने वाले के हृदय में अगाध प्रेम हो, या खाने वाले को तीव्र क्षुधा (भूख) लगी हो। न तो तुम्हें मुझसे प्रेम है और न ही इस समय मुझे भूख है। तुम्हारा यह ऐश्वर्य, अहंकार की सुगंध दे रहा है, और मुझे प्रेम की महक पसंद है।" राजसी ठाठ-बाट को ठुकरा कर, सांवरा सीधे महात्मा विदुर की साधारण सी कुटिया की ओर चल पड़ा। विदुर घर पर नहीं थे, पर उनकी पत्नी सुलभा (विदुरानी) वहां थीं। जैसे ही उन्होंने द्वार खोला और सामने जगत के स्वामी को खड़ा पाया, उनके प्राण मानो उनकी आंखों में आकर ठहर गए। वे इतनी भावविभोर हो गईं कि उन्हें याद ही नहीं रहा कि अतिथि का सत्कार कैसे किया जाता है। न बैठने को मखमली आसन था, न खिलाने को कोई पकवान। पर कृष्ण तो प्रेम के भूखे थे। उन्होंने बड़े लाड़ से कहा, "काकी, बड़ी भूख लगी है! कुछ खाने को दो।" काकी हड़बड़ाहट में रसोई से कुछ केले उठा लाईं। कृष्ण को अपने सामने पाकर वे इतनी तल्लीन (मग्न) हो गईं कि उनकी दृष्टि कृष्ण के मनमोहक मुखमंडल पर टिक गई। * वे केला छीलतीं, फल फेंक देतीं और केले का छिलका कृष्ण के हाथों में थमा देतीं। * मधुसूदन भी बड़े चाव से, आँखें मूँदकर उन कड़वे छिलकों को ऐसे खा रहे थे जैसे वे अमृत का रस पी रहे हों। तभी महात्मा विदुर वहाँ पहुँचे और यह दृश्य देखकर हतप्रभ रह गए। उन्होंने चीख कर कहा, "अरी पगली! यह क्या अनर्थ कर रही है? साक्षात नारायण को छिलके खिला रही है?" विदुरानी होश में आईं और अपनी भूल पर फूट-फूट कर रोने लगीं। विदुर जी ने तुरंत एक केला छीलकर उसका गूदा कृष्ण की ओर बढ़ाया। कृष्ण ने एक ग्रास खाया, फिर धीरे से मुस्कुराकर बोले: "विदुर जी, इस फल में वो मिठास कहाँ, जो काकी के उन छिलकों में थी! उन छिलकों में 'मैं' और 'मेरा' मिट चुका था, वहाँ केवल शुद्ध भाव था। मुझे तृप्ति छिलकों से नहीं, काकी की ममता से मिली है।" इस कथा का सार: प्रेम-लक्षणा भक्ति यह प्रसंग हमें सिखाता है कि ईश्वर को वश में करने का कोई मंत्र नहीं है, सिवाय प्रेम के। * भाव ही सार है: भगवान को आपके छप्पन भोग की आवश्यकता नहीं, वे आपके आंसुओं और मुस्कान के पीछे छिपे भाव को देखते हैं। * समर्पण: विदुरानी के पास ऐश्वर्य नहीं था, पर उनके पास 'स्वयं' का पूर्ण समर्पण था। * अहंकार का पतन: जहाँ 'मैं' (Ego) होता है, वहाँ ईश्वर नहीं होते। दुर्योधन के पास 'मैं' था, विदुरानी के पास 'तुम'। इसीलिए सदियों से भक्त गाते आए हैं: "सबसे ऊँची प्रेम सगाई। दुर्योधन की मेवा त्यागी, साग विदुर घर खाई॥"
महाभारत - 2 2 - ShareChat