#श्रीमहाभारतकथा-2️⃣7️⃣6️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
एकोननवतितमोऽध्यायः
ययाति और अष्टक का संवाद...(दिन 276)
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ततः पुरीं पुरुहूतस्य रम्यां सहस्रद्वारां शतयोजनायताम् । अध्यावसं वर्षसहस्रमात्रं
ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः ।। १६ ।।
वहाँ सौ योजन विस्तृत और एक हजार दरवाजोंसे युक्त इन्द्रकी रमणीय पुरी प्राप्त हुई। उसमें मैंने केवल एक हजार वर्षोंतक निवास किया और उसके बाद उससे भी ऊँचे लोकमें गया ।। १६ ।।
ततो दिव्यमर्जर प्राप्य लोकं प्रजापतेर्लोकपतेर्दुरापम् । तत्रावसं वर्षसहस्रमात्रं ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः ।। १७ ।।
तदनन्तर लोकपालोंके लिये भी दुर्लभ प्रजापतिके उस दिव्य लोकमें जा पहुँचा, जहाँ जरावस्थाका प्रवेश नहीं है। वहाँ एक हजार वर्षतक रहा, फिर उससे भी उत्तम लोकमें चला गया ।। १७ ।
स देवदेवस्य निवेशने च विहृत्य लोकानवसं यथेष्टम् । सम्पूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तै-स्तुल्यप्रभावद्युतिरीश्वराणाम् ।। १८ ।।
वह देवाधिदेव ब्रह्माजीका धाम था। वहाँ में अपनी इच्छाके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंमें विहार करता हुआ सम्पूर्ण देवताओंसे सम्मानित होकर रहा। उस समय मेरा प्रभाव और तेज देवेश्वरोंके समान था ।। १८ ।।
तथावसं नन्दने कामरूपी संवत्सराणामयुतं शतानाम् । सहाप्सरोभिर्विहरन् पुण्यगन्धान् पश्यन् नगान् पुष्पितांश्चारुरूपान् ।। १९ ।।
इसी प्रकार में नन्दनवनमें इच्छानुसार रूप धारण करके अप्सराओंके साथ विहार करता हुआ दस लाख वर्षोंतक रहा। वहाँ मुझे पवित्र गन्ध और मनोहर रूपवाले वृक्ष देखनेको मिले, जो फूलोंसे लदे हुए थे ।। १९ ।।
तत्र स्थितं मां देवसुखेषु सक्तं कालेऽतीते महति ततोऽतिमात्रम् । दूतो देवानामब्रवीदुग्ररूपो ध्वंसेत्युच्चैस्त्रिः प्लुतेन स्वरेण ।। २० ।।
वहाँ रहकर मैं देवलोकके सुखोंमें आसक्त हो गया। तदनन्तर बहुत अधिक समय बीत जानेपर एक भयंकर रूपधारी देवदूत आकर मुझसे ऊँची आवाजमें तीन बार बोला- 'गिर जाओ, गिर जाओ, गिर जाओ' ।। २० ।।
एतावन्मे विदितं राजसिंह
ततो भ्रष्टोऽहं नन्दनात् क्षीणपुण्यः ।
वाचोऽश्रौषं चान्तरिक्षे सुराणां
सानुक्रोशाः शोचतां मां नरेन्द्र ।। २१ ।।
राजशिरोमणे ! मुझे इतना ही ज्ञात हो सका है। तदनन्तर पुण्य क्षीण हो जानेके कारण मैं नन्दनवनसे नीचे गिर पडा। नरेन्द्र ! उस समय मेरे लिये शोक करनेवाले देवताओंकी अन्तरिक्षमें यह दयाभरी वाणी सुनायी पड़ी ।। २१ ।।
अहो कष्टं क्षीणपुण्यो ययातिः पतत्यसौ पुण्यकृत् पुण्यकीर्तिः । तानब्रुवं पतमानस्ततोऽहं सतां मध्ये निपतेयं कथं नु ।। २२ ।।
'अहो! बड़े कष्टकी बात है कि पवित्र कीर्तिवाले ये पुण्यकर्मा महाराज ययाति पुण्य क्षीण होनेके कारण नीचे गिर रहे हैं।' तब नीचे गिरते हुए मैंने उनसे पूछा- 'देवताओ ! मैं साधु पुरुषोंके बीच गिरूँ, इसका क्या उपाय है!' ।। २२ ।।
तैराख्याता भवतां यज्ञभूमिः समीक्ष्य चेमां त्वरितमुपागतोऽस्मि । हविर्गन्धं देशिकं यज्ञभूमे-धूमापाङ्गं प्रतिगृह्य प्रतीतः ।। २३ ।।
तब देवताओंने मुझे आपकी यज्ञभूमिका परिचय दिया। मैं इसीको देखता हुआ तुरंत यहाँ आ पहुँचा हूँ। यज्ञभूमिका परिचय देनेवाली हविष्यकी सुगन्धका अनुभव तथा धूमप्रान्तका अवलोकन करके मुझे बड़ी प्रसन्नता और सान्त्वना मिली है ।। २३ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते एकोननवतितमोऽध्यायः।। ८९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८९ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
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