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###शुभ संध्या
##शुभ संध्या - यूँ ही नहीं मिलती मंज़िल॰ हर राह पर चलना पड़़ता है, आंसू  को पोंछकर. . हर खुद को ही सम्भलना पड़ता है, आसान नहीं होती उड़ान कभी॰ हौसलों को बुलंद करना पड़ता है, सपनों की खातिर अक्सर. सब कुछ दाँव पर रखना पड़ता है।। शुभ संध्या यूँ ही नहीं मिलती मंज़िल॰ हर राह पर चलना पड़़ता है, आंसू  को पोंछकर. . हर खुद को ही सम्भलना पड़ता है, आसान नहीं होती उड़ान कभी॰ हौसलों को बुलंद करना पड़ता है, सपनों की खातिर अक्सर. सब कुछ दाँव पर रखना पड़ता है।। शुभ संध्या - ShareChat