#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣4️⃣2️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः
धृतराष्ट्र के गान्धारी से एक सौ पुत्र तथा एक कन्या की तथा सेवा करने वाली वैश्यजातीय युवती से युयुत्सु नामक एक पुत्र की उत्पत्ति...(दिन 342)
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गान्धार्युवाच
ज्येष्ठं कुन्तीसुतं जातं श्रुत्वा रविसमप्रभम् ।। १५ ।।
दुःखेन परमेणेदमुदरं घातितं मया । शतं च किल पुत्राणां वितीर्ण मे त्वया पुरा ।। १६ ।।
इयं च मे मांसपेशी जाता पुत्रशताय वै ।
गान्धारीने कहा- मुने ! मैंने सुना है, कुन्तीके एक ज्येष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ है, जो सूर्यके समान तेजस्वी है। यह समाचार सुनकर अत्यन्त दुःखके कारण मैंने अपने उदरपर आघात करके गर्भ गिराया है। आपने पहले मुझे ही सौ पुत्र होनेका वरदान दिया था; परंतु आज इतने दिनों बाद मेरे गर्भसे सौ पुत्रोंकी जगह यह मांसपिण्ड पैदा हुआ है।। १५-१६३ ।।
व्यास उवाच
एवमेतत् सौबलेयि नैतज्जात्वन्यथा भवेत् ।। १७ ।।
व्यासजीने कहा-सुबलकुमारी! यह सब मेरे वरदानके अनुसार ही हो रहा है; वह कभी अन्यथा नहीं हो सकता ।। १७ ।।
वितथं नोक्तपूर्वं मे स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा । घृतपूर्ण कुण्डशतं क्षिप्रमेव विधीयताम् ।। १८ ।।
मैंने कभी हास-परिहासके समय भी झूठी बात मुँहसे नहीं निकाली है। फिर वरदान आदि अन्य अवसरोंपर कही हुई मेरी बात झूठी कैसे हो सकती है। तुम शीघ्र ही सौ मटके (कुण्ड) तैयार कराओ और उन्हें घीसे भरवा दो ।। १८ ।।
सुगुप्तेषु च देशेषु रक्षा चैव विधीयताम् । शीताभिरद्भिरष्ठीलामिमां च परिषेचय ।। १९ ।।
फिर अत्यन्त गुप्त स्थानोंमें रखकर उनकी रक्षा की भी पूरी व्यवस्था करो। इस मांसपिण्डको ठंडे जलसे सींचो ।। १९ ।।
वैशम्पायन उवाच
सा सिच्यमाना त्वष्ठीला बभूव शतधा तदा ।
अङ्गुष्ठपर्वमात्राणां गर्भाणां पृथगेव तु ।। २० ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! उस समय सींचे जानेपर उस मांसपिण्डके सौ टुकड़े हो गये। वे अलग-अलग अँगूठेके पोरुवे बराबर सौ गर्भोके रूपमें परिणत हो गये ।। २० ।।
एकाधिकशतं पूर्ण यथायोगं विशाम्पते ।
मांसपेश्यास्तदा राजन् क्रमशः कालपर्ययात् ।। २१ ।।
राजन् ! कालके परिवर्तनसे क्रमशः उस मांसपिण्डके यथायोग्य पूरे एक सौ एक भाग हुए ।। २१ ।।
ततस्तांस्तेषु कुण्डेषु गर्भानवदधे तदा ।
स्वनुगुप्तेषु देशेषु रक्षां वै व्यदधात् ततः ।। २२ ।।
तत्पश्चात् गान्धारीने उन सभी गभौंको उन पूर्वोक्त कुण्डोंमें रखा। वे सभी कुण्ड अत्यन्त गुप्त स्थानोंमें रखे हुए थे। उनकी रक्षाकी ठीक-ठीक व्यवस्था कर दी गयी ।। २२ ।।
शशंस चैव भगवान् कालेनैतावता पुनः ।
उद्घाटनीयान्येतानि कुण्डानीति च सौबलीम् ।। २३ ।।
तब भगवान् व्यासने गान्धारीसे कहा- 'इतने ही दिन अर्थात् पूरे दो वर्षोंतक प्रतीक्षा करनेके बाद इन कुण्डोंका ढक्कन खोल देना चाहिये' ।। २३ ।।
इत्युक्त्वा भगवान् व्यासस्तथा प्रतिनिधाय च ।
जगाम तपसे धीमान् हिमवन्तं शिलोच्चयम् ।। २४ ।।
यों कहकर और पूर्वोक्त प्रकारसे रक्षाकी व्यवस्था कराकर परम बुद्धिमान् भगवान् व्यास हिमालय पर्वतपर तपस्याके लिये चले गये ।। २४ ।।
जज्ञे क्रमेण चैतेन तेषां दुर्योधनो नृपः ।
जन्मतस्तु प्रमाणेन ज्येष्ठो राजा युधिष्ठिरः ।। २५ ।।
तदनन्तर दो वर्ष बीतनेपर जिस क्रमसे वे गर्भ उन कुण्डोंमें स्थापित किये गये थे, उसी क्रमसे उनमें सबसे पहले राजा दुर्योधन उत्पन्न हुआ। जन्मकालके प्रमाणसे राजा युधिष्ठिर उससे भी ज्येष्ठ थे ।। २५ ।।
तदाख्यातं तु भीष्माय विदुराय च धीमते।
यस्मिन्नहनि दुर्धर्षो जज्ञे दुर्योधनस्तदा ।। २६ ।।
तस्मिन्नेव महाबाहुर्जज्ञे भीमोऽपि वीर्यवान् ।
स जातमात्र एवाथ धृतराष्ट्रसुतो नृप ।। २७ ।।
रासभारावसदृशं रुराव च ननाद च ।
तं खराः प्रत्यभाषन्त गृध्रगोमायुवायसाः ।। २८ ।।
दुर्योधनके जन्मका समाचार परम बुद्धिमान् भीष्म तथा विदुरजीको बताया गया। जिस दिन दुर्धर्ष वीर दुर्योधनका जन्म हुआ, उसी दिन परम पराक्रमी महाबाहु भीमसेन भी उत्पन्न हुए। राजन् ! धृतराष्ट्रका वह पुत्र जन्म लेते ही गदहेके रेंकनेकी-सी आवाजमें रोने-चिल्लाने लगा। उसकी आवाज सुनकर बदलेमें दूसरे गदहे भी रेंकने लगे। गीथ, गीदड़ और कौए भी कोलाहल करने लगे ।। २६-२८ ।।
वाताश्च प्रववुश्चापि दिग्दाहश्चाभवत् तदा।
ततस्तु भीतवद् राजा धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ।। २९ ।।
समानीय बहून् विप्रान् भीष्मं विदुरमेव च।
अन्यांश्च सुहृदो राजन् कुरून् सर्वास्तथैव च ।। ३० ।।
बड़े जोरकी आँधी चलने लगी। सम्पूर्ण दिशाओंमें दाह-सा होने लगा। राजन्! तब राजा धृतराष्ट्र भयभीत-से हो उठे और बहुत-से ब्राह्मणोंको, भीष्मजी और विदुरजीको, दूसरे-दूसरे सुहृदों तथा समस्त कुरुवंशियोंको अपने समीप बुलवाकर उनसे इस प्रकार बोले ।। २९-३० ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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