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।। ॐ ।। प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः। शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।। मन चलायमान होने से योगभ्रष्ट हुआ वह पुरुष पुण्यवानों के लोकों में वासनाओं को भोगकर (जिन वासनाओं को लेकर वह योगभ्रष्ट हुआ था, भगवान उसे थोड़े में सब दिखा-सुना देते हैं, उन्हें भोगकर) वह 'शुचीनां श्रीमताम्'- शुद्ध आचरणवाले श्रीमान् पुरुषों के घर में जन्म लेता है। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - जो शुद्ध आचरणवाले हैं, वही श्रीमान् हैं। स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज  Il 3 Il पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः प्राप्य समाः | शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोडभिजायते।। से योगभ्रष्ट हुआ वह मन चलायमान होने के लोकों में वासनाओं पुण्यवानों  9q को भोगकर (जिन वासनाओं को लेकर वह योगभ्रष्ट हुआ था, भगवान उसे थोड़े में सब दिखा सुना देते हैं, उन्हें भोगकर) श्रीमताम् - शुद्ध शुचीनां वह आचरणवाले श्रीमान् पुरुषों के घर में जन्म लेता है। जो शुद्ध आचरणवाले हैं, वही श्रीमान् हैं। स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज  Il 3 Il पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः प्राप्य समाः | शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोडभिजायते।। से योगभ्रष्ट हुआ वह मन चलायमान होने के लोकों में वासनाओं पुण्यवानों  9q को भोगकर (जिन वासनाओं को लेकर वह योगभ्रष्ट हुआ था, भगवान उसे थोड़े में सब दिखा सुना देते हैं, उन्हें भोगकर) श्रीमताम् - शुद्ध शुचीनां वह आचरणवाले श्रीमान् पुरुषों के घर में जन्म लेता है। - ShareChat