Jagdish Sharma
ShareChat
click to see wallet page
@6079857
6079857
Jagdish Sharma
@6079857
यथार्थगीता पढ़ें और पढ़ायें।
।। ॐ ।। योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।। 'विजितात्मा' - विशेष रूप से जीता हुआ है शरीर जिसका, 'जितेन्द्रियः' जीती हुई हैं इन्द्रियाँ जिसकी और 'विशुद्धात्मा'- विशेष रूप से शुद्ध है अन्तःकरण जिसका, ऐसा पुरुष 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' - सम्पूर्ण भूतप्राणियों के आत्मा के मूल उद्गम परमात्मा से एकीभाव हुआ योग से युक्त है। वह कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता। तो करता क्यों है? पीछेवालों में परमकल्याणकारी बीज का संग्रह करने के लिये। लिप्त क्यों नहीं होता? क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों का जो मूल उद्गम है, जिसका नाम परमतत्त्व है उस तत्त्व में वह स्थित हो गया। आगे कोई वस्तु नहीं जिसकी शोध करे। पीछेवाली वस्तुएँ छोटी पड़ गयीं तो भला आसक्ति किसमें करे? इसलिये वह कर्मों से आवृत्त नहीं होता। यह योगयुक्त की पराकाष्ठा का चित्रण है। पुनः योगयुक्त पुरुष की रहनी स्पष्ट करते हैं कि वह करते हुए भी उससे लिप्त क्यों नहीं होता? - #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
यथार्थ गीता - ShareChat
।। ॐ ।। चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थाथी ज्ञानी च भरतर्षभ॥ हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! 'सुकृतिनः' उत्तम अर्थात् नियत कर्म (जिसके परिणाम में श्रेय की प्राप्ति हो, उसको) करनेवाले 'अर्थार्थी' अर्थात् सकाम, 'आर्तः' अर्थात् दुःख से छूटने की इच्छावाले, 'जिज्ञासुः' अर्थात् प्रत्यक्ष रूप से जानने की इच्छावाले और 'ज्ञानी' अर्थात् जो प्रवेश की स्थिति में हैं- ये चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते हैं।'अर्थ' वह वस्तु है, जिससे हमारे शरीर अथवा सम्बन्धों की पूर्ति हो। इसलिये अर्थ, कामनाएँ सब कुछ पहले तो भगवान द्वारा पूर्ण होती हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही पूर्ण करता हूँ; किन्तु इतना ही वास्तविक 'अर्थ' नहीं है। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है, यही अर्थ है। सांसारिक 'अर्थ' की पूर्ति करते-करते भगवान वास्तविक अर्थ आत्मिक सम्पत्ति की ओर बढ़ा देते हैं; क्योंकि वे जानते हैं कि इतने ही से मेरा भक्त सुखी नहीं होगा इसलिये वे आत्मिक सम्पत्ति भी उसे देने लगते हैं। 'लोक लाहु परलोक निबाहू।' (रामचरितमानस, १/१९/२) - लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह ये दोनों भगवान की वस्तुएँ हैं। #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - I39 || चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्ड्जुन।  आर्तो जिज्ञासुरर्थाथी ज्ञानी च भरतर्षभ।। हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! ' सुकृतिनः ' उत्तम अर्थात् नियत कर्म (जिसके परिणाम मे श्रेय की प्राप्ति हो॰ उसको ) करनेवाले 'अर्थार्थी' अर्थात् सकाम ' आर्तः' अर्थात् दुःख से छूटने की इच्छावाले, 'जिज्ञासुः अर्थात् प्रत्यक्ष रूप से जानने की इच्छावाले और 'ज्ञानी ' अर्थात् जो प्रवेश की स्थिति में है-ये चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते है। ' अर्थ' वह वस्तु है, जिससे हमारे शरीर अथवा सम्बन्धों की पूर्ति हो। इसलिये अर्थ, कामनाएँ सव कुछ पहले तो भगवान द्वारा पूर्ण होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही पूर्ण करता  किन्तु इतना ही सम्पह्तै ह्ीन्स्थरतसाम्दीत्ति  वास्तविक ' अर्थ' नहीं है। आत्मिक है॰ यही अर्थ है। सांसारिक ' अर्थ' की पूर्ति करते करते भगवान वास्तविक अर्थ आत्मिक सम्पत्ति की ओरबढा देते भक्त सुखी नहीं  हैः वर्योंकि वे जानते हैं कि इतने ही से मेरा होगा इसलिये वे आत्मिक सम्पत्ति भी उसे देने लगते है। ' लोक  लाहु परलोक निबाहू। ' ( रामचरितमानस , १/ १९/२ ) - लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह ये दोनों भगवान की वस्तुएँ हैं। भक्त को खाली नहीं छोड़ते। ' आर्तः' - जो दुःखी हो अपन 'जिज्ञासुः समग्रता से जानने की इच्छावाले जिज्ञासु मुझे हैं। साधना की परिपव्व अवस्था में दिग्दर्शन ( प्रत्यक्ष भ्जर की अवस्थावाले ज्ञानी भी मुझे भजते है। इस प्रकार दर्शन चार प्रकार के भक्त मुझे भजते है, जिनमें ज्ञानी श्रेष्ठ है अर्थात् ज्ञानी भी भक्त ही है। इन सबमें भी॰ I39 || चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्ड्जुन।  आर्तो जिज्ञासुरर्थाथी ज्ञानी च भरतर्षभ।। हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! ' सुकृतिनः ' उत्तम अर्थात् नियत कर्म (जिसके परिणाम मे श्रेय की प्राप्ति हो॰ उसको ) करनेवाले 'अर्थार्थी' अर्थात् सकाम ' आर्तः' अर्थात् दुःख से छूटने की इच्छावाले, 'जिज्ञासुः अर्थात् प्रत्यक्ष रूप से जानने की इच्छावाले और 'ज्ञानी ' अर्थात् जो प्रवेश की स्थिति में है-ये चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते है। ' अर्थ' वह वस्तु है, जिससे हमारे शरीर अथवा सम्बन्धों की पूर्ति हो। इसलिये अर्थ, कामनाएँ सव कुछ पहले तो भगवान द्वारा पूर्ण होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही पूर्ण करता  किन्तु इतना ही सम्पह्तै ह्ीन्स्थरतसाम्दीत्ति  वास्तविक ' अर्थ' नहीं है। आत्मिक है॰ यही अर्थ है। सांसारिक ' अर्थ' की पूर्ति करते करते भगवान वास्तविक अर्थ आत्मिक सम्पत्ति की ओरबढा देते भक्त सुखी नहीं  हैः वर्योंकि वे जानते हैं कि इतने ही से मेरा होगा इसलिये वे आत्मिक सम्पत्ति भी उसे देने लगते है। ' लोक  लाहु परलोक निबाहू। ' ( रामचरितमानस , १/ १९/२ ) - लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह ये दोनों भगवान की वस्तुएँ हैं। भक्त को खाली नहीं छोड़ते। ' आर्तः' - जो दुःखी हो अपन 'जिज्ञासुः समग्रता से जानने की इच्छावाले जिज्ञासु मुझे हैं। साधना की परिपव्व अवस्था में दिग्दर्शन ( प्रत्यक्ष भ्जर की अवस्थावाले ज्ञानी भी मुझे भजते है। इस प्रकार दर्शन चार प्रकार के भक्त मुझे भजते है, जिनमें ज्ञानी श्रेष्ठ है अर्थात् ज्ञानी भी भक्त ही है। इन सबमें भी॰ - ShareChat
।। ॐ ।। न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥ जो मुझे निरन्तर भजते हैं, वे जानते हैं। फिर भी लोग नहीं भजते। माया के द्वारा जिनके ज्ञान का अपहरण कर लिया गया है, जो आसुरी स्वभाव को धारण किये हुए, मनुष्यों में अधम, काम-क्रोधादि दुष्कृतियों को करनेवाले मूढ़लोग मुझे नहीं भजते। तो भजता कौन है? देखें-"यथार्थ गीता" #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - 130 |( मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः|  नमा दुष्कृतिनो  माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः जो मुझे निरन्तर भजते हैं वे जानते हैं। फिर  भी लोग नहीं भजते। माया के द्वारा जिनके  ज्ञान का अपहरण कर लिया गया है॰जो आसुरी स्वभाव को धारण किये हुए मनुष्यों  में अधम, काम क्रोधादि दुष्कृतियों को मुझे नहीं भजते। तो करनेवाले मूढ़लोग  भजता कौन है? देखें " यथार्थ गीता " 130 |( मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः|  नमा दुष्कृतिनो  माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः जो मुझे निरन्तर भजते हैं वे जानते हैं। फिर  भी लोग नहीं भजते। माया के द्वारा जिनके  ज्ञान का अपहरण कर लिया गया है॰जो आसुरी स्वभाव को धारण किये हुए मनुष्यों  में अधम, काम क्रोधादि दुष्कृतियों को मुझे नहीं भजते। तो करनेवाले मूढ़लोग  भजता कौन है? देखें " यथार्थ गीता " - ShareChat
।। ॐ ।। दैवी ह्येषा गुणमयी मम मया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ यह त्रिगुणमयी मेरी अद्भुत माया दुस्तर है; किन्तु जो पुरुष मुझे ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया का पार पा जाते हैं। यह माया है तो दैवी, परन्तु अगरबत्ती जलाकर इसकी पूजा न करने लगें। इससे पार पाना है। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - // 35 || दैवी ह्येषा गुणमयी मम मया दुरत्यया।  मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।। त्रिगुणमयी मेरी अद्भुत माया दुस्तर 46 है; किन्तु जो पुरुष मुझे ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया का पार पा जाते हैं। यह माया है तो दैवी , परन्तु अगरबत्ती जलाकर इसकी पूजा न करने लगें | इससे पार पाना है। Vutharth Sondesh @ पूज्य स्वामी श्री अड़गड़ारनदजी महाराज ७ शीपरमईसाआश्रमशक्तेशगठ्मिर्जापुर७ // 35 || दैवी ह्येषा गुणमयी मम मया दुरत्यया।  मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।। त्रिगुणमयी मेरी अद्भुत माया दुस्तर 46 है; किन्तु जो पुरुष मुझे ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया का पार पा जाते हैं। यह माया है तो दैवी , परन्तु अगरबत्ती जलाकर इसकी पूजा न करने लगें | इससे पार पाना है। Vutharth Sondesh @ पूज्य स्वामी श्री अड़गड़ारनदजी महाराज ७ शीपरमईसाआश्रमशक्तेशगठ्मिर्जापुर७ - ShareChat
।। ॐ ।। त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्। मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥ सात्त्विक, राजस और तामस इन तीन गुणों के कार्यरूप भावों से यह सारा जगत् मोहित हो रहा है इसलिये लोग इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को तत्त्व से भली प्रकार नहीं जानते। मैं इन तीनों गुणों से परे हूँ अर्थात् जब तक अंशमात्र भी गुणों का आवरण विद्यमान है, तब तक कोई मुझे नहीं जानता। उसे अभी चलना है, वह राही है और- #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - ShareChat
।। ॐ ।। ये चैव सात्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ और भी जो सत्त्वगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, जो रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, उन सबको तू मुझसे ही उत्पन्न होनेवाले हैं, ऐसा जान। परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मेरे में नहीं हैं। क्योंकि न मैं उनमें खोया हुआ हूँ और न वे ही मुझमें प्रवेश कर पाते हैं; क्योंकि मुझे कर्म से स्पृहा नहीं है। मैं निर्लेप हूँ, मुझे इनमें कुछ पाना नहीं है। इसलिये मुझमें प्रवेश नहीं कर पाते। ऐसा होने पर भी- जिस प्रकार आत्मा की उपस्थिति से ही शरीर को भूख-प्यास लगती है, आत्मा को अन्न अथवा जल से कोई प्रयोजन नहीं है, उसी प्रकार प्रकृति परमात्मा की उपस्थिति में ही अपना कार्य कर पाती है। परमात्मा उसके गुण और कार्यों से निर्लेप रहता है। #यथार्थ गीता #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - जिस प्रकार आत्मा की उपस्थिति ।।ऊँ ।। से ही शरीर को भूखनप्यास लगती ये चैव सात्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। है, आत्मा को अन्न अथवा जल से एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि Il मत्त कोई प्रयोजन नहीं है॰ उसी प्रकार परमात्मा की उपस्थिति में प्रकृति और भी जो सत्त्वगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, जो ही अपना कार्य कर पाती है। रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, उन परमात्मा उसके गुण और कार्यों से निर्लेप रहता है। तू मुझसे ही उत्पन्न होनेवाले हैं, ऐसा जान। Hdo परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मेरे में नहीं हैं। क्योंकि न मैं उनमें खोया हुआ हूँ और न वे ही प्रवेश कर मुझमें पाते हैं; क्योंकि मुझे कर्म से स्पृहा नहीं है। मैं निर्लेप हूँ, मुझे इनमें कुछ पाना नहीं है। इसलिये प्रवेश मुझमें : नहीं कर पाते। ऐसा होने पर भी- {59495ು4ಚ025 "অাথ১৯) जिस प्रकार आत्मा की उपस्थिति ।।ऊँ ।। से ही शरीर को भूखनप्यास लगती ये चैव सात्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। है, आत्मा को अन्न अथवा जल से एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि Il मत्त कोई प्रयोजन नहीं है॰ उसी प्रकार परमात्मा की उपस्थिति में प्रकृति और भी जो सत्त्वगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, जो ही अपना कार्य कर पाती है। रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, उन परमात्मा उसके गुण और कार्यों से निर्लेप रहता है। तू मुझसे ही उत्पन्न होनेवाले हैं, ऐसा जान। Hdo परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मेरे में नहीं हैं। क्योंकि न मैं उनमें खोया हुआ हूँ और न वे ही प्रवेश कर मुझमें पाते हैं; क्योंकि मुझे कर्म से स्पृहा नहीं है। मैं निर्लेप हूँ, मुझे इनमें कुछ पाना नहीं है। इसलिये प्रवेश मुझमें : नहीं कर पाते। ऐसा होने पर भी- {59495ು4ಚ025 "অাথ১৯) - ShareChat
।। ॐ ।। बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कमोऽस्मि भरतर्षभ॥ हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! मैं बलवानों की कामना और आसक्तिरहित बल हूँ। संसार में सब बलवान् ही तो बनते हैं। कोई दण्ड-बैठक लगाता है, तो कोई परमाणु इकट्ठा करता है; किन्तु नहीं, श्रीकृष्ण कहते हैं- काम और राग से परे जो बल है वह मैं हूँ। वही वास्तविक बल है। सब भूतों में धर्म के अनुकूल कामना मैं हूँ। परब्रह्म परमात्मा ही एकमात्र धर्म है, जो सबको धारण किये हुए है। जो शाश्वत आत्मा है वही धर्म है। जो उससे अविरोध रखनेवाली कामना है, मैं हूँ। आगे भी श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन ! मेरी प्राप्ति के लिये इच्छा कर। सब कामनाएँ तो वर्जित हैं; किन्तु उस परमात्मा को पाने की कामना आवश्यक है अन्यथा आप साधन कर्म में प्रवृत्त नहीं होंगे। ऐसी कामना भी मेरी ही देन है। #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
❤️जीवन की सीख - स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज  Il35 Il बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कमोडस्मि भरतर्षभ।।  अर्जुन ! मैं बलवानों की कामना और हे भरतश्रेष्ठ মমাং ম মন নলনান কী নী ননন ;1 आसक्तिरहित बल हूँ कोई दण्ड-बैठक लगाता है, तो कोई परमाणु इकट्ठा करता हैः किन्तु नहीं , श्रीकृष्ण कहते हैं- काम और राग से परे जो बल है वह मैं हूँ। वही वास्तविक बल है। सब भूतों में धर्म के अनुकूल कामना मैं हूँ। परब्रह्म परमात्मा ही एकमात्र धर्म है जो सबको धारण किये हुए है।जो शाश्वत आत्मा है वही धर्म है।जो उससे अविरोध रखनेवाली कामना है, मैं हूँ । आगे भी அிதன ने कहा- अर्जुन ! मेरी प्राप्ति के लिये इच्छा कर। सब ( कामनाएँतो वर्जित हैं उस परमात्मा को पाने की कामना आवश्यक हे अन्यथा आप साधन कर्म में प्रवृत्त नहीं होंगे। ऐसी कामना भी मेरी ही देन है।  स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज  Il35 Il बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कमोडस्मि भरतर्षभ।।  अर्जुन ! मैं बलवानों की कामना और हे भरतश्रेष्ठ মমাং ম মন নলনান কী নী ননন ;1 आसक्तिरहित बल हूँ कोई दण्ड-बैठक लगाता है, तो कोई परमाणु इकट्ठा करता हैः किन्तु नहीं , श्रीकृष्ण कहते हैं- काम और राग से परे जो बल है वह मैं हूँ। वही वास्तविक बल है। सब भूतों में धर्म के अनुकूल कामना मैं हूँ। परब्रह्म परमात्मा ही एकमात्र धर्म है जो सबको धारण किये हुए है।जो शाश्वत आत्मा है वही धर्म है।जो उससे अविरोध रखनेवाली कामना है, मैं हूँ । आगे भी அிதன ने कहा- अर्जुन ! मेरी प्राप्ति के लिये इच्छा कर। सब ( कामनाएँतो वर्जित हैं उस परमात्मा को पाने की कामना आवश्यक हे अन्यथा आप साधन कर्म में प्रवृत्त नहीं होंगे। ऐसी कामना भी मेरी ही देन है। - ShareChat
।। ॐ ।। बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्। बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥ पार्थ! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन कारण अर्थात् बीज मुझे ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ। इसी क्रम में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-"यथार्थ गीता" #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
❤️जीवन की सीख - || 3 | | बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ HAIAAHI बुद्धि्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।। पार्थ! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन कारण अर्थात् बीज मुझे ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का श्रीकृष्ण  तेज हूँ । इसी क्रम में योगेश्वर  कहते हैं-" यथार्थ गीता"' शरीसदगुरु 8 || 3 | | बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ HAIAAHI बुद्धि्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।। पार्थ! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन कारण अर्थात् बीज मुझे ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का श्रीकृष्ण  तेज हूँ । इसी क्रम में योगेश्वर  कहते हैं-" यथार्थ गीता"' शरीसदगुरु 8 - ShareChat
।। ॐ ।। पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥ पृथ्वी में पवित्र गन्ध और अग्नि में तेज हूँ। सम्पूर्ण जीवों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में उनका तप हूँ। #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख
यथार्थ गीता - 1/ 35 11 पृथिव्यां च तेजश्चास्मि गन्धः पुण्यो विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु।। में पवित्र गन्ध और अग्नि में पृथ्वी तेज हूँ। सम्पूर्ण जीवों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में उनका নপ চুঁl हरि थँ 1/ 35 11 पृथिव्यां च तेजश्चास्मि गन्धः पुण्यो विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु।। में पवित्र गन्ध और अग्नि में पृथ्वी तेज हूँ। सम्पूर्ण जीवों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में उनका নপ চুঁl हरि थँ - ShareChat
।। ॐ ।। मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।। धनंजय! मेरे सिवाय किंचिन्मात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मेरे में गुँथा हुआ है। है तो; परन्तु जानेंगे कब? जब (इसी अध्याय के प्रथम श्लोक के अनुसार) अनन्य आसक्ति (भक्ति) से मेरे परायण होकर योग में उसी रूप से लग जायें। इसके बिना नहीं। योग में लगना आवश्यक है। #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख
यथार्थ गीता - Ishreemadohaaundoea OalhanthOelall W Il 3 |l मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।। धनंजय ! मेरे सिवाय किंचिन्मात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मेरे में गुँथा हुआ है। है तो; परन्तु जानेंगे कब? जब (इसी अध्याय के प्रथम श्लोक के अनुसार ) अनन्य आसक्ति (भक्ति) से मेरे परायण होकर योग में उसी रूप से लग जायें । इसके बिना नहीं | योग में लगना आवश्यक है। Ishreemadohaaundoea OalhanthOelall W Il 3 |l मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।। धनंजय ! मेरे सिवाय किंचिन्मात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मेरे में गुँथा हुआ है। है तो; परन्तु जानेंगे कब? जब (इसी अध्याय के प्रथम श्लोक के अनुसार ) अनन्य आसक्ति (भक्ति) से मेरे परायण होकर योग में उसी रूप से लग जायें । इसके बिना नहीं | योग में लगना आवश्यक है। - ShareChat