Jagdish Sharma
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यथार्थगीता पढ़ें और पढ़ायें।
।। ॐ ।। अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन। प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥ हे मधुसूदन ! यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह इस शरीर में कैसे है? सिद्ध है कि अधियज्ञ अर्थात् यज्ञ का अधिष्ठाता कोई ऐसा पुरुष है, जो मनुष्य शरीर के आधारवाला है। समाहित चित्तवाले पुरुषों द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं? इन सातों प्रश्नों का क्रम से निर्णय देने के लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले-"यथार्थ गीता" #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏
❤️जीवन की सीख - 130 | यज्ञ का अधिष्ठाता कोई ऐसा देहेडस्मिन्मधुसूदन।  अधियज्ञः कथ कोडत्र पुरुष है, जो मनुष्य शरीर के प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोडसि नियतात्मभिः।।  आधारवाला है। ট নঙুমুনে  यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह इस  1 शरीर में कैसे है? सिद्ध है कि अधियज्ञ अर्थात् अधिष्ठाता कोई ऐसा पुरुष है, जो मनुष्य  यज्ञ का शरीर के आधारवाला है। समाहित चित्तवाले  द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार  पुरुषों  जानने में आते है? इन सातों प्रश्नों का क्रम से निर्णय देने के लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण  बोले-" यथार्थ गीता " 130 | यज्ञ का अधिष्ठाता कोई ऐसा देहेडस्मिन्मधुसूदन।  अधियज्ञः कथ कोडत्र पुरुष है, जो मनुष्य शरीर के प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोडसि नियतात्मभिः।।  आधारवाला है। ট নঙুমুনে  यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह इस  1 शरीर में कैसे है? सिद्ध है कि अधियज्ञ अर्थात् अधिष्ठाता कोई ऐसा पुरुष है, जो मनुष्य  यज्ञ का शरीर के आधारवाला है। समाहित चित्तवाले  द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार  पुरुषों  जानने में आते है? इन सातों प्रश्नों का क्रम से निर्णय देने के लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण  बोले-" यथार्थ गीता " - ShareChat
।। ॐ ।। अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥ हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत तथा अधिदैव किसे कहा जाता है? #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🙏गीता ज्ञान🛕 - ஈ3|1 अर्जुन उवाच  किं नदबह्म किमध्यात्म किकिर्म पुरुषात्तमा षशिभूतं चःकिं प्रोक्तमधिदैच किमुच्यते। | हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म ब्या है?  है२ कर्म क्या 394444 90 अधिभूत तथा अधिदेव किसे कहा जाता है२ a ஈ3|1 अर्जुन उवाच  किं नदबह्म किमध्यात्म किकिर्म पुरुषात्तमा षशिभूतं चःकिं प्रोक्तमधिदैच किमुच्यते। | हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म ब्या है?  है२ कर्म क्या 394444 90 अधिभूत तथा अधिदेव किसे कहा जाता है२ a - ShareChat
।। ॐ ।। साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः। प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥ जो पुरुष अधिभूत, अधिदैव तथा अधियज्ञ के सहित मुझे जानते हैं, मुझमें समाहित चित्तवाले वे पुरुष अन्तकाल में भी मुझको ही जानते हैं, मुझमें ही स्थित रहते हैं और सदैव मुझे प्राप्त रहते हैं।छब्बीसवें-सत्ताइसवें श्लोक में उन्होंने कहा-मुझे कोई नहीं जानता; क्योंकि वे मोहग्रस्त हैं। किन्तु जो उस मोह से छूटने के लिये प्रयत्नशील हैं, वे (१) सम्पूर्ण ब्रह्म, (२) सम्पूर्ण अध्यात्म, (३) सम्पूर्ण कर्म, (४) सम्पूर्ण अधिभूत, (५) सम्पूर्ण अधिदैव और (६) सम्पूर्ण अधियज्ञसहित मुझको जानते हैं अर्थात् इन सबका परिणाम मैं (सद्गुरु) हूँ। वही मुझे जानता है, ऐसा नहीं कि कोई नहीं जानता। #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🙏गीता ज्ञान🛕 - 11 3 Il च ये विदुः।  साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं " प्रयाणकालेडपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसःll जो पुरुष अधिभूत अधिदैव तथा अधियज्ञ के सहित মুহ্সী আানন ট, समाहित चित्तवाले वे पुरुष मुझमें - ही जानते हैं, अन्तकाल में भी ही स्थित मुझमें  मुझको रहते हैं और सदैव मुझे प्राप्त रहते हैं। छब्बीसवें सत्ताइसवें श्लोक में उन्होंने कहा-मुझे कोई न्ही  नानताः क्योंकि वे मोहग्रस्त हैं। किन्तु जो उस  मोह से छूटने के लिये प्रयत्नशील हैं॰ वे (१ ) सम्पूर्ण ब्रह्म (२)  अध्यात्म (३) सम्पूर्ण  सम्पूर्ण  कर्म   ४) सम्पूर्ण अधिभूत, (५) सम्पूर्ण अधिदैव और अधियज्ञसहित मुझको जानते हैं अर्थात् (६) रम्पूर्ण  इन सबका परिणाम मैं ( सद्गुरु ) हूँ । वही मुझे जानता है, ऐसा नहीं कि कोई नहीं जानता।  11 3 Il च ये विदुः।  साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं " प्रयाणकालेडपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसःll जो पुरुष अधिभूत अधिदैव तथा अधियज्ञ के सहित মুহ্সী আানন ট, समाहित चित्तवाले वे पुरुष मुझमें - ही जानते हैं, अन्तकाल में भी ही स्थित मुझमें  मुझको रहते हैं और सदैव मुझे प्राप्त रहते हैं। छब्बीसवें सत्ताइसवें श्लोक में उन्होंने कहा-मुझे कोई न्ही  नानताः क्योंकि वे मोहग्रस्त हैं। किन्तु जो उस  मोह से छूटने के लिये प्रयत्नशील हैं॰ वे (१ ) सम्पूर्ण ब्रह्म (२)  अध्यात्म (३) सम्पूर्ण  सम्पूर्ण  कर्म   ४) सम्पूर्ण अधिभूत, (५) सम्पूर्ण अधिदैव और अधियज्ञसहित मुझको जानते हैं अर्थात् (६) रम्पूर्ण  इन सबका परिणाम मैं ( सद्गुरु ) हूँ । वही मुझे जानता है, ऐसा नहीं कि कोई नहीं जानता। - ShareChat
।। ॐ ।। जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥ जो मेरी शरण होकर जरा और मरण से मुक्ति पाने के लिये प्रयत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं। #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
🧘सदगुरु जी🙏 - Il3 I जरामरणमोक्षाय  मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म   चाखिलम्।। எ # எ 3R शरण   होकर मरण से पाने के लिये मुक्ति प्रयत्न करते हैं॰  ப 3 ब्रह्मको, अध्यात्म को সম্পুত और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं। और इसी क्रम में- Il3 I जरामरणमोक्षाय  मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म   चाखिलम्।। எ # எ 3R शरण   होकर मरण से पाने के लिये मुक्ति प्रयत्न करते हैं॰  ப 3 ब्रह्मको, अध्यात्म को সম্পুত और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं। और इसी क्रम में- - ShareChat
।। ॐ ।। येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥ परन्तु पुण्यकर्म (जो संसृति का अन्त करनेवाला है, जिसका नाम कार्यम् कर्म, नियत कर्म, यज्ञ की प्रक्रिया कहकर बारम्बार समझाया है, उस कर्म को) करनेवाले जिन भक्तों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषादि द्वन्द्व के मोह से भली प्रकार मुक्त होकर, व्रत में दृढ़ रहकर मुझे भजते हैं। किसलिये भजते हैं?- #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - Tda I CI ~1-1 4I ٥٢  मण्पकर्मणामा ব বন্তমীনিসুকা মতনব সা {orrl: Ii = ரக @1 Tl 4 3fn tmridlFl R fariTchi 7 कार्पम कर्म॰ निपत कर्म 1^1 Tfhn  ப7 तरारकर्मको )  कलेचाले छिन + 'Rl rmml p 1 भक्तीकफा Tlt লা #দাণি চন্ড কর মীষম মলী e Thrz tm Huhe   ar' --0 रहकर मधे भ्णते ह। किगतिवे  भजते १७  Tda I CI ~1-1 4I ٥٢  मण्पकर्मणामा ব বন্তমীনিসুকা মতনব সা {orrl: Ii = ரக @1 Tl 4 3fn tmridlFl R fariTchi 7 कार्पम कर्म॰ निपत कर्म 1^1 Tfhn  ப7 तरारकर्मको )  कलेचाले छिन + 'Rl rmml p 1 भक्तीकफा Tlt লা #দাণি চন্ড কর মীষম মলী e Thrz tm Huhe   ar' --0 रहकर मधे भ्णते ह। किगतिवे  भजते १७ - ShareChat
।। ॐ ।। इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥ भरतवंशी अर्जुन ! इच्छा और द्वेष अर्थात् राग-द्वेषादि द्वन्द्व के मोह से संसार के सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त मोह को प्राप्त हो रहे हैं इसलिये मुझे नहीं जान पाते। तो क्या कोई जानेगा ही नहीं? योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-"यथार्थ गीता" #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - || 3 || इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।। भरतवंशी अर्जुन इच्छा और द्वेष अर्थात् राग-द्वेषादि द्वन्द्व के मोह से संसार के सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त मोह को प्राप्त हो रहे हैं इसलिये मुझे नहीं जान पाते। तो क्या कोई श्रीकृष्ण  जानेगा ही नहीं ? योगेश्वर कहते हैं-"यथार्थ गीता" || 3 || इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।। भरतवंशी अर्जुन इच्छा और द्वेष अर्थात् राग-द्वेषादि द्वन्द्व के मोह से संसार के सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त मोह को प्राप्त हो रहे हैं इसलिये मुझे नहीं जान पाते। तो क्या कोई श्रीकृष्ण  जानेगा ही नहीं ? योगेश्वर कहते हैं-"यथार्थ गीता" - ShareChat
।। ॐ ।। नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥ सामान्य मनुष्य के लिये माया एक परदा है, जिसके द्वारा परमात्मा सर्वथा छिपा है। योग-साधना समझकर वह इसमें प्रवृत्त होता है। इसके पश्चात् योगमाया अर्थात् योगक्रिया भी एक आवरण ही है। योग का अनुष्ठान करते-करते उसकी पराकाष्ठा योगारूढ़ता आ जाने पर वह छिपा हुआ परमात्मा विदित होता है। योगेश्वर कहते हैं- मैं अपनी योगमाया से ढँका हुआ हूँ। केवल योग की परिपक्व अवस्थावाले ही मुझे यथार्थ देख सकते हैं। मैं सबके लिये प्रत्यक्ष नहीं हूँ इसलिये यह अज्ञानी मनुष्य मुझ जन्मरहित (जिसे अब जन्म नहीं लेना है), अविनाशी (जिसका नाश नहीं होना है), अव्यक्त स्वरूप (जिसे पुनः व्यक्त नहीं होना है) को नहीं जानता। अर्जुन भी श्रीकृष्ण को अपनी ही तरह मनुष्य मानता था। आगे उन्होंने दृष्टि दी तो अर्जुन गिड़गिड़ाने लगा, प्रार्थना करने लगा। वस्तुतः अव्यक्तस्थित महापुरुष को पहचानने में हमलोग प्रायः अन्धे ही हैं। आगे कहते हैं-"यथार्थ गीता" #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
🧘सदगुरु जी🙏 - 36 नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः| नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम।। मूढोड्यं  सामान्य मनुष्य के लिये माया एक परदा है, जिसके द्वारा परमात्मा सर्वथा छिपा है। योग-साधना समझकर वह इसमें प्रवृत्त होता है। इसके पश्चात् योगमाया अर्थात् योगक्रिया भी एक आवरण ही है। योग का अनुष्ठान करते करते उसकी पराकाष्ठा योगारूढ़ता आ जाने पर वह छिपा हुआ परमात्मा विदित होता है। योगेश्वर कहते हैं- मैं अपनी योगमाया से ढँका हुआ हू। केवल योग की परिपक्व अवस्थावाले ही मुझे यथार्थ देख सकते हैं। मैं सवके लिये प्रत्यक्ष नहीं हूँ इसलिये यह अज्ञानी मनुष्य मुझ जन्मरहित (जिसे अब जन्म नहीं लेना हे) अविनाशी (जिसका नाश नही होना है), अव्यक्त स्वरूप (जिसे पुनः व्यक्त नहीं होना है) को அிதன को अपनी ही तरह नहीं जानता। अर्जुन भी मनुष्य मानता था। आगे उन्होंने दृष्टि दी तो अर्जुन गिड़गिड़ाने लगा, प्रार्थना करने लगा। वस्तुतः अव्यक्तस्थित महापुरुष को पहचानने में हमलोग प्रायः अन्धे ही हैं। आगे कहते हैं- यथार्थ गीता' 36 नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः| नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम।। मूढोड्यं  सामान्य मनुष्य के लिये माया एक परदा है, जिसके द्वारा परमात्मा सर्वथा छिपा है। योग-साधना समझकर वह इसमें प्रवृत्त होता है। इसके पश्चात् योगमाया अर्थात् योगक्रिया भी एक आवरण ही है। योग का अनुष्ठान करते करते उसकी पराकाष्ठा योगारूढ़ता आ जाने पर वह छिपा हुआ परमात्मा विदित होता है। योगेश्वर कहते हैं- मैं अपनी योगमाया से ढँका हुआ हू। केवल योग की परिपक्व अवस्थावाले ही मुझे यथार्थ देख सकते हैं। मैं सवके लिये प्रत्यक्ष नहीं हूँ इसलिये यह अज्ञानी मनुष्य मुझ जन्मरहित (जिसे अब जन्म नहीं लेना हे) अविनाशी (जिसका नाश नही होना है), अव्यक्त स्वरूप (जिसे पुनः व्यक्त नहीं होना है) को அிதன को अपनी ही तरह नहीं जानता। अर्जुन भी मनुष्य मानता था। आगे उन्होंने दृष्टि दी तो अर्जुन गिड़गिड़ाने लगा, प्रार्थना करने लगा। वस्तुतः अव्यक्तस्थित महापुरुष को पहचानने में हमलोग प्रायः अन्धे ही हैं। आगे कहते हैं- यथार्थ गीता' - ShareChat
।। ॐ ।। अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः। परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥ यद्यपि जब देवताओं के नाम पर देवता नाम की कोई वस्तु है ही नहीं, जो फल मिलता है वह भी नाशवान् है, फिर भी सब लोग मेरा भजन नहीं करते; क्योंकि बुद्धिहीन पुरुष (जैसा पिछले श्लोक में आया कि कामनाओं द्वारा जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है वे) मेरे सर्वोत्तम, अविनाशी और परमप्रभाव को भली प्रकार नहीं जानते, इसलिये वे मुझ अव्यक्त पुरुष को व्यक्तिभाव को प्राप्त हुआ मानते हैं, मनुष्य मानते हैं। अर्थात् श्रीकृष्ण भी मनुष्य शरीरधारी योगी थे, योगेश्वर थे। जो स्वयं योगी हों और दूसरों को भी योग प्रदान करने की जिनमें क्षमता हो, उन्हें योगेश्वर कहते हैं। साधना के सही दौर में पड़कर क्रमशः उत्थान होते-होते महापुरुष भी उसी परमभाव में स्थित हो जाते हैं। शरीरधारी होते हुए भी वे उसी अव्यक्त स्वरूप में स्थित हो जाते हैं; फिर भी कामनाओं से विवश मन्दबुद्धि के लोग उन्हें साधारण व्यक्ति ही मानते हैं। वे सोचते हैं कि हमारी ही तरह तो यह भी पैदा हुए हैं, भगवान कैसे हो सकते हैं? उन बेचारों का दोष भी क्या है? दृष्टिपात करते हैं तो शरीर ही दिखायी पड़ता है। #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख
यथार्थ गीता - llsiinawem inill गीता ।यथार्थ 11 3 I1 अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः| परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।। यद्यपि जब देवताओं के नाम पर देवता नाम की कोई वस्तु है ही नहीं , जो फल मिलता है वह भी नाशवान् है, फिर भी सब लोग मेरा भजन नहीं करते; क्योंकि बुद्धिहीन पुरुष (जैसा पिछले श्लोक में आया कि कामनाओं द्वारा जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है वे) मेरे सर्वोत्तम, अविनाशी और परमप्रभाव को भली प्रकार वे मुझ - नहीं जानते , इसलिये पुरुष को अव्यक्त प्राप्त हुआ मानते हैं, मनुष्य मानते हैं। व्यक्तिभाव को शरीरधारी योगी थे, योगेश्वर श्रीकृष्ण " ক্ী সনুস্প  সথনি थे।जो स्वयं योगी हों और दूसरों को भी योग प्रदान करने की जिनमें क्षमता हो, उन्हें योगेश्वर कहते हैं। साधना के होते होते महापुरुष सही दौर में पड़कर क्रमशः उत्थान भी उसी परमभाव में स्थित हो जाते हैं। शरीरधारी होते हुए भी वे उसी अव्यक्त स्वरूप में स्थित हो जाते हैं; फिर भी कामनाओं से विवश मन्दबुद्धि के लोग उन्हें साधारण व्यक्ति ही मानते हैं। वे सोचते हैं कि हमारी ही तरह तो यह भी पैदा हुए हैं, भगवान कैसे हो सकते हैं? उन बेचारों का दोष भी क्या है? दृष्टिपात करते हैं तो शरीर ही दिखायी पड़ता है। वे महापुरुष के वास्तविक स्वरूप को देख क्यों नहीं पाते? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण से ही सुनें "यथार्थ far" ನಷ ।यथथ llsiinawem inill गीता ।यथार्थ 11 3 I1 अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः| परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।। यद्यपि जब देवताओं के नाम पर देवता नाम की कोई वस्तु है ही नहीं , जो फल मिलता है वह भी नाशवान् है, फिर भी सब लोग मेरा भजन नहीं करते; क्योंकि बुद्धिहीन पुरुष (जैसा पिछले श्लोक में आया कि कामनाओं द्वारा जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है वे) मेरे सर्वोत्तम, अविनाशी और परमप्रभाव को भली प्रकार वे मुझ - नहीं जानते , इसलिये पुरुष को अव्यक्त प्राप्त हुआ मानते हैं, मनुष्य मानते हैं। व्यक्तिभाव को शरीरधारी योगी थे, योगेश्वर श्रीकृष्ण " ক্ী সনুস্প  সথনি थे।जो स्वयं योगी हों और दूसरों को भी योग प्रदान करने की जिनमें क्षमता हो, उन्हें योगेश्वर कहते हैं। साधना के होते होते महापुरुष सही दौर में पड़कर क्रमशः उत्थान भी उसी परमभाव में स्थित हो जाते हैं। शरीरधारी होते हुए भी वे उसी अव्यक्त स्वरूप में स्थित हो जाते हैं; फिर भी कामनाओं से विवश मन्दबुद्धि के लोग उन्हें साधारण व्यक्ति ही मानते हैं। वे सोचते हैं कि हमारी ही तरह तो यह भी पैदा हुए हैं, भगवान कैसे हो सकते हैं? उन बेचारों का दोष भी क्या है? दृष्टिपात करते हैं तो शरीर ही दिखायी पड़ता है। वे महापुरुष के वास्तविक स्वरूप को देख क्यों नहीं पाते? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण से ही सुनें "यथार्थ far" ನಷ ।यथथ - ShareChat
।। ॐ ।। देवता' हृदय के अन्तराल में परमदेव परमात्मा के देवत्व को अर्जित करानेवाले सद्गुणों का नाम है। थी तो यह अन्दर की वस्तु; किन्तु कालान्तर में लोगों ने भीतर की वस्तु को बाहर देखना प्रारम्भ कर दिया। मूर्तियाँ गढ़ लीं, कर्मकाण्ड रच डाले और वास्तविकता से दूर खड़े हो गये। श्रीकृष्ण ने इस भ्रान्ति का निराकरण उपर्युक्त चार श्लोकों में किया। गीता में पहली बार 'अन्य देवताओं' का नाम लेते हुए उन्होंने कहा कि देवता होते ही नहीं। लोगों की श्रद्धा जहाँ झुकती है, वहाँ मैं ही खड़ा होकर उनकी श्रद्धा को पुष्ट करता हूँ और मैं ही वहाँ फल भी देता हूँ। वह फल भी नश्वर है। फल नष्ट हो जाते हैं, देवता नष्ट हो जाते हैं और देवताओं को पूजनेवाला भी नष्ट हो जाता है। जिनका विवेक नष्ट हो गया है, वे मूढ़बुद्धि ही अन्य देवताओं को पूजते हैं। श्रीकृष्ण तो यहाँ तक कहते हैं कि अन्य देवताओं को पूजने का विधान ही अयुक्तिसंगत है (आगे देखेंगे, अध्याय ९/२३)। #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख
यथार्थ गीता - 11 33 I1 अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि II अल्पबुद्धिवालों " का वह फल नाशवान् है। आज परन्तु उन है तो भोगते- भोगते नष्ट हो जायेगा इसलिये नाशवान् फल 1 पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं है। देवताओं को " अर्थात् देवता भी नाशवान् हैं। देवताओं से लेकर यावन्मात्र जगत् परिवर्तनशील और मरणधर्मा है। मेरा भक्त मुझे ही प्राप्त होता है॰ जो अव्यक्त है नैष्ठिकीं परमशान्ति' पाता है। तीन में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि इस यज्ञ द्वारा  अध्याय देवताओं अर्थात देवी सम्पद की उन्नति करो। বুসলীয: ज्यों -ज्यों दैवी सम्पद् की उन्नति होगी, बही तुम्हारी उन्नति है। क्रमशः उन्नति करते करते परमश्रेय को प्राप्त कर लो। यहाँ देवता उस दैवी सम्पद् का समूह है, जिससे परमदेव परमात्मा का देवत्व अर्जित किया जाता है। दैवी सम्पद् मोक्ष के लिये है, जिसके छब्बीस लक्षणों का निरूपण  गीता के सोलहवें अध्याय में किया गया है। 11 33 I1 अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि II अल्पबुद्धिवालों " का वह फल नाशवान् है। आज परन्तु उन है तो भोगते- भोगते नष्ट हो जायेगा इसलिये नाशवान् फल 1 पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं है। देवताओं को " अर्थात् देवता भी नाशवान् हैं। देवताओं से लेकर यावन्मात्र जगत् परिवर्तनशील और मरणधर्मा है। मेरा भक्त मुझे ही प्राप्त होता है॰ जो अव्यक्त है नैष्ठिकीं परमशान्ति' पाता है। तीन में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि इस यज्ञ द्वारा  अध्याय देवताओं अर्थात देवी सम्पद की उन्नति करो। বুসলীয: ज्यों -ज्यों दैवी सम्पद् की उन्नति होगी, बही तुम्हारी उन्नति है। क्रमशः उन्नति करते करते परमश्रेय को प्राप्त कर लो। यहाँ देवता उस दैवी सम्पद् का समूह है, जिससे परमदेव परमात्मा का देवत्व अर्जित किया जाता है। दैवी सम्पद् मोक्ष के लिये है, जिसके छब्बीस लक्षणों का निरूपण  गीता के सोलहवें अध्याय में किया गया है। - ShareChat
।। ॐ ।। योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।। 'विजितात्मा' - विशेष रूप से जीता हुआ है शरीर जिसका, 'जितेन्द्रियः' जीती हुई हैं इन्द्रियाँ जिसकी और 'विशुद्धात्मा'- विशेष रूप से शुद्ध है अन्तःकरण जिसका, ऐसा पुरुष 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' - सम्पूर्ण भूतप्राणियों के आत्मा के मूल उद्गम परमात्मा से एकीभाव हुआ योग से युक्त है। वह कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता। तो करता क्यों है? पीछेवालों में परमकल्याणकारी बीज का संग्रह करने के लिये। लिप्त क्यों नहीं होता? क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों का जो मूल उद्गम है, जिसका नाम परमतत्त्व है उस तत्त्व में वह स्थित हो गया। आगे कोई वस्तु नहीं जिसकी शोध करे। पीछेवाली वस्तुएँ छोटी पड़ गयीं तो भला आसक्ति किसमें करे? इसलिये वह कर्मों से आवृत्त नहीं होता। यह योगयुक्त की पराकाष्ठा का चित्रण है। पुनः योगयुक्त पुरुष की रहनी स्पष्ट करते हैं कि वह करते हुए भी उससे लिप्त क्यों नहीं होता? - #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
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