Jagdish Sharma
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Jagdish Sharma
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यथार्थगीता पढ़ें और पढ़ायें।
।। ॐ ।। योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।। 'विजितात्मा' - विशेष रूप से जीता हुआ है शरीर जिसका, 'जितेन्द्रियः' जीती हुई हैं इन्द्रियाँ जिसकी और 'विशुद्धात्मा'- विशेष रूप से शुद्ध है अन्तःकरण जिसका, ऐसा पुरुष 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' - सम्पूर्ण भूतप्राणियों के आत्मा के मूल उद्गम परमात्मा से एकीभाव हुआ योग से युक्त है। वह कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता। तो करता क्यों है? पीछेवालों में परमकल्याणकारी बीज का संग्रह करने के लिये। लिप्त क्यों नहीं होता? क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों का जो मूल उद्गम है, जिसका नाम परमतत्त्व है उस तत्त्व में वह स्थित हो गया। आगे कोई वस्तु नहीं जिसकी शोध करे। पीछेवाली वस्तुएँ छोटी पड़ गयीं तो भला आसक्ति किसमें करे? इसलिये वह कर्मों से आवृत्त नहीं होता। यह योगयुक्त की पराकाष्ठा का चित्रण है। पुनः योगयुक्त पुरुष की रहनी स्पष्ट करते हैं कि वह करते हुए भी उससे लिप्त क्यों नहीं होता? - #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
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।। ॐ ।। यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धायार्चितुमिच्छति। तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥ जो-जो सकामी भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, मैं उसी देवता के प्रति उसकी श्रद्धा को स्थिर करता हूँ। मैं स्थिर करता हूँ; क्योंकि देवता नाम की कोई वस्तु होती तब तो वह देवता ही श्रद्धा को स्थिर करता। #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - 3Il यो। योर्यां यां तनुं भक्तः श्रद्मायार्चितमिच्छति। तस्यतस्याचला श्रद्धां तामेव विदथाम्यहम्।। जोजो सकामी भक्त जिस ्जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है में उसी देवता केप्रति उसकी श्रद्धा को নস্থিকেনাচুঁ स्थिरकरता क्योंकि देवता नाम की कोई वस्त होती तब तो बहदेवता ही श्रद्धा को स्थिर करता| 3Il यो। योर्यां यां तनुं भक्तः श्रद्मायार्चितमिच्छति। तस्यतस्याचला श्रद्धां तामेव विदथाम्यहम्।। जोजो सकामी भक्त जिस ्जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है में उसी देवता केप्रति उसकी श्रद्धा को নস্থিকেনাচুঁ स्थिरकरता क्योंकि देवता नाम की कोई वस्त होती तब तो बहदेवता ही श्रद्धा को स्थिर करता| - ShareChat
।। ॐ ।। कामैस्तैस्तैर्हतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥ "वह तत्त्वदर्शी महात्मा अथवा परमात्मा ही सब कुछ है।"- लोग ऐसा समझ नहीं पाते; क्योंकि भोगों की कामनाओं द्वारा लोगों के विवेक अथवा ज्ञान अपहरण कर लिया गया है, इसलिये वे अपनी प्रकृति अर्थात् जन्म-जन्मान्तरों से अर्जित संस्कारों के स्वभाव से प्रेरित होकर मुझ परमात्मा से भिन्न अन्य देवताओं और उनके लिये प्रचलित नियमों की शरण लेते हैं। यहाँ 'अन्य देवता' का प्रसंग पहली बार आया है। #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - ரL ।यथार्थ 00 "Fraeaff' ೪೨o೦' विश्वमानव महात्मा 3 अथवा = परमात्मा धर्मशास्त्र #্ী Soo सभी पढ़़ें कुछ 4 ५२००  0 81" ीललम्य S೦೦la থমননণননাদয 71717 HNDI   ரL ।यथार्थ 00 "Fraeaff' ೪೨o೦' विश्वमानव महात्मा 3 अथवा = परमात्मा धर्मशास्त्र #্ী Soo सभी पढ़़ें कुछ 4 ५२००  0 81" ीललम्य S೦೦la থমননণননাদয 71717 HNDI - ShareChat
।। ॐ ।। बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ अभ्यास करते-करते बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में, प्राप्तिवाले जन्म में साक्षात्कार को प्राप्त हुआ ज्ञानी 'सब कुछ वासुदेव ही है'- इस प्रकार मेरे को भजता है। वह महात्मा अतिदुर्लभ है। वह किसी वासुदेव की प्रतिमा नहीं गढ़वाता बल्कि अपने भीतर ही उस परमदेव का वास पाता है। उसी ज्ञानी महात्मा को श्रीकृष्ण तत्त्वदर्शी भी कहते हैं। इन्हीं महापुरुषों से बाहर समाज में कल्याण सम्भव है। इस प्रकार के प्रत्यक्ष तत्त्वदर्शी महापुरुष श्रीकृष्ण के शब्दों में अतिदुर्लभ हैं। जब श्रेय और प्रेय (मुक्ति और भोग) दोनों ही भगवान से मिलते हैं, तब तो सभी को एकमात्र भगवान का भजन करना चाहिये, फिर भी लोग उन्हें नहीं भजते। क्यों? श्रीकृष्ण के ही शब्दों में-"यथार्थ गीता" #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - --= சாச"" थी परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी महाराज --= சாச"" थी परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी महाराज - ShareChat
।। ॐ ।। उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवनुत्तमां गतिम्॥ यद्यपि ये चारों प्रकार के भक्त उदार ही हैं (कौन-सी उदारता कर दी? क्या आपके भक्ति करने से भगवान को कुछ मिल जाता है? क्या भगवान में कोई कमी है जिसे आपने पूरा कर दिया? नहीं, वस्तुतः वही उदार है जो अपनी आत्मा को अधोगति में न पहुँचाये, जो उसके उद्धार के लिये अग्रसर है। इस प्रकार यह सब उदार हैं।) परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है, ऐसी मेरी मान्यता है; क्योंकि वह स्थिरबुद्धि ज्ञानी भक्त सर्वोत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही स्थित है। अर्थात् वह मैं हूँ, वह मुझमें है। मुझमें और उसमें कोई अन्तर नहीं है। इसी पर पुनः बल देते हैं-"यथार्थ गीता" #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज  ப13 11 उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवनुत्तमां गतिम्।।  यद्यपि ये चारों प्रकार के भक्त उदार ही हैं (कौननसी उदारता कर दी? क्या आपके भक्ति करने से भगवान को कुछ मिल जाता है? क्या भगवान में कोई कमी है जिसे आपने पूरा कर दिया? नहीं, वस्तुतः वही उदार है जो अपनी आत्मा को अधोगति में न पहुँचाये , जो उसके उद्धार के लिये अग्रसर है। इस प्रकार यह सब उदार हैंl ) परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है, ऐसी मेरी मान्यता है; क्योंकि वह स्थिरबुद्धि ज्ञानी भक्त सर्वोत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही स्थित है। अर्थात् वह मैं हूँ, वह मुझमें है। मुझमें और उसमें कोई अन्तर नहीं है। इसी पर पुनः बल देते हैं -"यथार्थ गीता" स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज  ப13 11 उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवनुत्तमां गतिम्।।  यद्यपि ये चारों प्रकार के भक्त उदार ही हैं (कौननसी उदारता कर दी? क्या आपके भक्ति करने से भगवान को कुछ मिल जाता है? क्या भगवान में कोई कमी है जिसे आपने पूरा कर दिया? नहीं, वस्तुतः वही उदार है जो अपनी आत्मा को अधोगति में न पहुँचाये , जो उसके उद्धार के लिये अग्रसर है। इस प्रकार यह सब उदार हैंl ) परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है, ऐसी मेरी मान्यता है; क्योंकि वह स्थिरबुद्धि ज्ञानी भक्त सर्वोत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही स्थित है। अर्थात् वह मैं हूँ, वह मुझमें है। मुझमें और उसमें कोई अन्तर नहीं है। इसी पर पुनः बल देते हैं -"यथार्थ गीता" - ShareChat
।। ॐ ।। तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥ अर्जुन! उनमें भी नित्य मुझमें एकीभाव में स्थित अनन्य भक्तिवाला ज्ञानी विशिष्ट है; क्योंकि साक्षात्कार के सहित जाननेवाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी भी मुझे अत्यन्त प्रिय है। वह ज्ञानी मेरा ही स्वरूप है। #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - 132 I नित्ययुक्त " तेषा ज्ञानी एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रियः।l अर्जुन! उनमें भी नित्य  एकीभाव मे मुझमें  स्थित अनन्य भक्तिवाला ज्ञानी विशिष्ट है क्योंकि साक्षात्कार के सहित जाननेवाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी  शी मुडो अत्यन्त प्रिय है। वह ज्ञानी मेरा ही 74<45/ 132 I नित्ययुक्त " तेषा ज्ञानी एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रियः।l अर्जुन! उनमें भी नित्य  एकीभाव मे मुझमें  स्थित अनन्य भक्तिवाला ज्ञानी विशिष्ट है क्योंकि साक्षात्कार के सहित जाननेवाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी  शी मुडो अत्यन्त प्रिय है। वह ज्ञानी मेरा ही 74<45/ - ShareChat
।। ॐ ।। चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थाथी ज्ञानी च भरतर्षभ॥ हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! 'सुकृतिनः' उत्तम अर्थात् नियत कर्म (जिसके परिणाम में श्रेय की प्राप्ति हो, उसको) करनेवाले 'अर्थार्थी' अर्थात् सकाम, 'आर्तः' अर्थात् दुःख से छूटने की इच्छावाले, 'जिज्ञासुः' अर्थात् प्रत्यक्ष रूप से जानने की इच्छावाले और 'ज्ञानी' अर्थात् जो प्रवेश की स्थिति में हैं- ये चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते हैं।'अर्थ' वह वस्तु है, जिससे हमारे शरीर अथवा सम्बन्धों की पूर्ति हो। इसलिये अर्थ, कामनाएँ सब कुछ पहले तो भगवान द्वारा पूर्ण होती हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही पूर्ण करता हूँ; किन्तु इतना ही वास्तविक 'अर्थ' नहीं है। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है, यही अर्थ है। सांसारिक 'अर्थ' की पूर्ति करते-करते भगवान वास्तविक अर्थ आत्मिक सम्पत्ति की ओर बढ़ा देते हैं; क्योंकि वे जानते हैं कि इतने ही से मेरा भक्त सुखी नहीं होगा इसलिये वे आत्मिक सम्पत्ति भी उसे देने लगते हैं। 'लोक लाहु परलोक निबाहू।' (रामचरितमानस, १/१९/२) - लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह ये दोनों भगवान की वस्तुएँ हैं। #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - I39 || चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्ड्जुन।  आर्तो जिज्ञासुरर्थाथी ज्ञानी च भरतर्षभ।। हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! ' सुकृतिनः ' उत्तम अर्थात् नियत कर्म (जिसके परिणाम मे श्रेय की प्राप्ति हो॰ उसको ) करनेवाले 'अर्थार्थी' अर्थात् सकाम ' आर्तः' अर्थात् दुःख से छूटने की इच्छावाले, 'जिज्ञासुः अर्थात् प्रत्यक्ष रूप से जानने की इच्छावाले और 'ज्ञानी ' अर्थात् जो प्रवेश की स्थिति में है-ये चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते है। ' अर्थ' वह वस्तु है, जिससे हमारे शरीर अथवा सम्बन्धों की पूर्ति हो। इसलिये अर्थ, कामनाएँ सव कुछ पहले तो भगवान द्वारा पूर्ण होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही पूर्ण करता  किन्तु इतना ही सम्पह्तै ह्ीन्स्थरतसाम्दीत्ति  वास्तविक ' अर्थ' नहीं है। आत्मिक है॰ यही अर्थ है। सांसारिक ' अर्थ' की पूर्ति करते करते भगवान वास्तविक अर्थ आत्मिक सम्पत्ति की ओरबढा देते भक्त सुखी नहीं  हैः वर्योंकि वे जानते हैं कि इतने ही से मेरा होगा इसलिये वे आत्मिक सम्पत्ति भी उसे देने लगते है। ' लोक  लाहु परलोक निबाहू। ' ( रामचरितमानस , १/ १९/२ ) - लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह ये दोनों भगवान की वस्तुएँ हैं। भक्त को खाली नहीं छोड़ते। ' आर्तः' - जो दुःखी हो अपन 'जिज्ञासुः समग्रता से जानने की इच्छावाले जिज्ञासु मुझे हैं। साधना की परिपव्व अवस्था में दिग्दर्शन ( प्रत्यक्ष भ्जर की अवस्थावाले ज्ञानी भी मुझे भजते है। इस प्रकार दर्शन चार प्रकार के भक्त मुझे भजते है, जिनमें ज्ञानी श्रेष्ठ है अर्थात् ज्ञानी भी भक्त ही है। इन सबमें भी॰ I39 || चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्ड्जुन।  आर्तो जिज्ञासुरर्थाथी ज्ञानी च भरतर्षभ।। हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! ' सुकृतिनः ' उत्तम अर्थात् नियत कर्म (जिसके परिणाम मे श्रेय की प्राप्ति हो॰ उसको ) करनेवाले 'अर्थार्थी' अर्थात् सकाम ' आर्तः' अर्थात् दुःख से छूटने की इच्छावाले, 'जिज्ञासुः अर्थात् प्रत्यक्ष रूप से जानने की इच्छावाले और 'ज्ञानी ' अर्थात् जो प्रवेश की स्थिति में है-ये चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते है। ' अर्थ' वह वस्तु है, जिससे हमारे शरीर अथवा सम्बन्धों की पूर्ति हो। इसलिये अर्थ, कामनाएँ सव कुछ पहले तो भगवान द्वारा पूर्ण होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही पूर्ण करता  किन्तु इतना ही सम्पह्तै ह्ीन्स्थरतसाम्दीत्ति  वास्तविक ' अर्थ' नहीं है। आत्मिक है॰ यही अर्थ है। सांसारिक ' अर्थ' की पूर्ति करते करते भगवान वास्तविक अर्थ आत्मिक सम्पत्ति की ओरबढा देते भक्त सुखी नहीं  हैः वर्योंकि वे जानते हैं कि इतने ही से मेरा होगा इसलिये वे आत्मिक सम्पत्ति भी उसे देने लगते है। ' लोक  लाहु परलोक निबाहू। ' ( रामचरितमानस , १/ १९/२ ) - लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह ये दोनों भगवान की वस्तुएँ हैं। भक्त को खाली नहीं छोड़ते। ' आर्तः' - जो दुःखी हो अपन 'जिज्ञासुः समग्रता से जानने की इच्छावाले जिज्ञासु मुझे हैं। साधना की परिपव्व अवस्था में दिग्दर्शन ( प्रत्यक्ष भ्जर की अवस्थावाले ज्ञानी भी मुझे भजते है। इस प्रकार दर्शन चार प्रकार के भक्त मुझे भजते है, जिनमें ज्ञानी श्रेष्ठ है अर्थात् ज्ञानी भी भक्त ही है। इन सबमें भी॰ - ShareChat
।। ॐ ।। न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥ जो मुझे निरन्तर भजते हैं, वे जानते हैं। फिर भी लोग नहीं भजते। माया के द्वारा जिनके ज्ञान का अपहरण कर लिया गया है, जो आसुरी स्वभाव को धारण किये हुए, मनुष्यों में अधम, काम-क्रोधादि दुष्कृतियों को करनेवाले मूढ़लोग मुझे नहीं भजते। तो भजता कौन है? देखें-"यथार्थ गीता" #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - 130 |( मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः|  नमा दुष्कृतिनो  माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः जो मुझे निरन्तर भजते हैं वे जानते हैं। फिर  भी लोग नहीं भजते। माया के द्वारा जिनके  ज्ञान का अपहरण कर लिया गया है॰जो आसुरी स्वभाव को धारण किये हुए मनुष्यों  में अधम, काम क्रोधादि दुष्कृतियों को मुझे नहीं भजते। तो करनेवाले मूढ़लोग  भजता कौन है? देखें " यथार्थ गीता " 130 |( मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः|  नमा दुष्कृतिनो  माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः जो मुझे निरन्तर भजते हैं वे जानते हैं। फिर  भी लोग नहीं भजते। माया के द्वारा जिनके  ज्ञान का अपहरण कर लिया गया है॰जो आसुरी स्वभाव को धारण किये हुए मनुष्यों  में अधम, काम क्रोधादि दुष्कृतियों को मुझे नहीं भजते। तो करनेवाले मूढ़लोग  भजता कौन है? देखें " यथार्थ गीता " - ShareChat
।। ॐ ।। दैवी ह्येषा गुणमयी मम मया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ यह त्रिगुणमयी मेरी अद्भुत माया दुस्तर है; किन्तु जो पुरुष मुझे ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया का पार पा जाते हैं। यह माया है तो दैवी, परन्तु अगरबत्ती जलाकर इसकी पूजा न करने लगें। इससे पार पाना है। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - // 35 || दैवी ह्येषा गुणमयी मम मया दुरत्यया।  मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।। त्रिगुणमयी मेरी अद्भुत माया दुस्तर 46 है; किन्तु जो पुरुष मुझे ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया का पार पा जाते हैं। यह माया है तो दैवी , परन्तु अगरबत्ती जलाकर इसकी पूजा न करने लगें | इससे पार पाना है। Vutharth Sondesh @ पूज्य स्वामी श्री अड़गड़ारनदजी महाराज ७ शीपरमईसाआश्रमशक्तेशगठ्मिर्जापुर७ // 35 || दैवी ह्येषा गुणमयी मम मया दुरत्यया।  मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।। त्रिगुणमयी मेरी अद्भुत माया दुस्तर 46 है; किन्तु जो पुरुष मुझे ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया का पार पा जाते हैं। यह माया है तो दैवी , परन्तु अगरबत्ती जलाकर इसकी पूजा न करने लगें | इससे पार पाना है। Vutharth Sondesh @ पूज्य स्वामी श्री अड़गड़ारनदजी महाराज ७ शीपरमईसाआश्रमशक्तेशगठ्मिर्जापुर७ - ShareChat
।। ॐ ।। त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्। मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥ सात्त्विक, राजस और तामस इन तीन गुणों के कार्यरूप भावों से यह सारा जगत् मोहित हो रहा है इसलिये लोग इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को तत्त्व से भली प्रकार नहीं जानते। मैं इन तीनों गुणों से परे हूँ अर्थात् जब तक अंशमात्र भी गुणों का आवरण विद्यमान है, तब तक कोई मुझे नहीं जानता। उसे अभी चलना है, वह राही है और- #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
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