Jagdish Sharma
ShareChat
click to see wallet page
@6079857
6079857
Jagdish Sharma
@6079857
यथार्थगीता पढ़ें और पढ़ायें।
।। ॐ।। त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा-यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥ #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता आराधना-विद्या के तीनों अंग-ऋक्, साम और यजुः अर्थात् प्रार्थना, समत्व की प्रक्रिया और यजन का आचरण करनेवाले, सोम अर्थात् चन्द्रमा के क्षीण प्रकाश को पानेवाले पाप से मुक्त होकर पवित्र हुए पुरुष उसी यज्ञ की निर्धारित प्रक्रिया द्वारा मुझे इष्टरूप में पूजकर स्वर्ग के लिये प्रार्थना करते हैं। यही असत् की कामना है, इससे वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म होता है; जैसा पिछले श्लोक में योगेश्वर ने बताया। वे पूजते मुझे ही हैं, उसी निर्धारित विधि से पूजते हैं; किन्तु बदले में स्वर्ग की याचना करते हैं। वे पुरुष अपने पुण्य के फलस्वरूप इन्द्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं, अर्थात् वह भोग भी मैं ही देता हूँ।
❤️जीवन की सीख - Il 3Il त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा-्यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। Trna  पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मश्नन्ति दिव्यान्दिवि Oalhantk Cvmzu II देवभोगान्।। W आराधना विद्या के तीनों अंग ऋक्॰ साम और यजुः अर्थात् प्रार्थना, समत्व की प्रक्रिया और करनेवाले , सोम अर्थात् यजन का आचरण को पानेवाले पाप से मुक्त चन्द्रमा के क्षीण प्रकाश पवित्र हुए पुरुष उसी यज्ञ की निर्धारित होकर प्रक्रिया द्वारा मुझे इष्टरूप में पूजकर स्वर्ग के लिये प्रार्थना करते हैं। यही असत् की कामना है, इससे वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका होता है; पुनर्जन्म  जैसा पिछले श्लोक में योगेश्वर ने बताया। वे पूजते मुझे ही हैं, उसी निर्धारित विधि से पूजते हैं; किन्तु बदले में स्वर्ग की याचना करते हैं। वे पुरुष अपने पुण्य के फलस्वरूप इन्द्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं, अर्थात् वह भोग भी मैं ही देता हूँ। Il 3Il त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा-्यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। Trna  पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मश्नन्ति दिव्यान्दिवि Oalhantk Cvmzu II देवभोगान्।। W आराधना विद्या के तीनों अंग ऋक्॰ साम और यजुः अर्थात् प्रार्थना, समत्व की प्रक्रिया और करनेवाले , सोम अर्थात् यजन का आचरण को पानेवाले पाप से मुक्त चन्द्रमा के क्षीण प्रकाश पवित्र हुए पुरुष उसी यज्ञ की निर्धारित होकर प्रक्रिया द्वारा मुझे इष्टरूप में पूजकर स्वर्ग के लिये प्रार्थना करते हैं। यही असत् की कामना है, इससे वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका होता है; पुनर्जन्म  जैसा पिछले श्लोक में योगेश्वर ने बताया। वे पूजते मुझे ही हैं, उसी निर्धारित विधि से पूजते हैं; किन्तु बदले में स्वर्ग की याचना करते हैं। वे पुरुष अपने पुण्य के फलस्वरूप इन्द्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं, अर्थात् वह भोग भी मैं ही देता हूँ। - ShareChat
।। ॐ ।। तपाम्यहमहं वर्ष निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥ #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता मैं सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा को आकर्षित करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। मृत्यु से परे अमृत-तत्त्व तथा मृत्यु, सत् और असत् सब कुछ मैं ही हूँ। अर्थात् जो परम प्रकाश प्रदान करता है, वह सूर्य मैं ही हूँ। कभी-कभी भजनेवाले मुझे असत् भी मान बैठते हैं, वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं। आगे कहते हैं-"यथार्थ गीता"
🙏गुरु महिमा😇 - 113 I1 तपाम्यहमहं वर्ष निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन।l मैं सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा को आकर्षित करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। मृत्यु से परे अमृतन्तत्त्व तथा मृत्यु, सत् और असत् सब कुछ मैं ही हूँ। अर्थात् जो परम प्रकाश प्रदान करता है, वह सूर्य मैं ही हूँ। कभी॰कभी भजनेवाले मुझे असत् भी मान बैठते हैं, वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं। आगे कहते हैं गीता" -"यथार्थ 113 I1 तपाम्यहमहं वर्ष निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन।l मैं सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा को आकर्षित करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। मृत्यु से परे अमृतन्तत्त्व तथा मृत्यु, सत् और असत् सब कुछ मैं ही हूँ। अर्थात् जो परम प्रकाश प्रदान करता है, वह सूर्य मैं ही हूँ। कभी॰कभी भजनेवाले मुझे असत् भी मान बैठते हैं, वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं। आगे कहते हैं गीता" -"यथार्थ - ShareChat
।। ॐ ।। गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥ हे अर्जुन ! 'गतिः' अर्थात् प्राप्त होने योग्य परमगति, 'भर्ता'- भरण-पोषण करनेवाला, सबका स्वामी, 'साक्षी' अर्थात् द्रष्टा-रूप में स्थित सबको जाननेवाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, अकारण प्रेमी मित्र, उत्पत्ति और प्रलय अर्थात् शुभाशुभ संस्कारों का विलय तथा अविनाशी कारण मैं ही हूँ। अर्थात् अन्त में जिनमें प्रवेश मिलता है, वे सारी विभूतियाँ मैं ही हूँ। #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #यथार्थ गीता
❤️जीवन की सीख - 3 I1 11 गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।। हे अर्जुन ! ' गतिः' अर्थात् प्राप्त होने योग्य परमगति, ' भर्ता - भरण-पोषण करनेवाला, सबका स्वामी , 'साक्षी' अर्थात् द्रष्टा रूप में स्थित सबको जाननेवाला , सबका वासस्थान , लेने योग्य , अकारण प्रेमी Ra, उत्पत्ति शरण और प्रलय अर्थात् शुभाशुभ संस्कारों का ग़ मैं ही हूँ । अर्थात् विलय तथा अविनाशी कारण  अन्त में जिनमें प्रवेश मिलता है॰ वे सारी विभूतियाँ मैं ही हूँ। 3 I1 11 गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।। हे अर्जुन ! ' गतिः' अर्थात् प्राप्त होने योग्य परमगति, ' भर्ता - भरण-पोषण करनेवाला, सबका स्वामी , 'साक्षी' अर्थात् द्रष्टा रूप में स्थित सबको जाननेवाला , सबका वासस्थान , लेने योग्य , अकारण प्रेमी Ra, उत्पत्ति शरण और प्रलय अर्थात् शुभाशुभ संस्कारों का ग़ मैं ही हूँ । अर्थात् विलय तथा अविनाशी कारण  अन्त में जिनमें प्रवेश मिलता है॰ वे सारी विभूतियाँ मैं ही हूँ। - ShareChat
।। ॐ ।। पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥ अर्जुन! मैं ही सम्पूर्ण जगत् का 'धाता' अर्थात् धारण करनेवाला, 'पिता' अर्थात् पालन करनेवाला, 'माता' अर्थात् उत्पन्न करनेवाला, 'पितामहः' अर्थात् मूल उद्गम हूँ, जिसमें सभी प्रवेश पाते हैं और जानने योग्य पवित्र ओंकार अर्थात् 'अहं आकार इति ओंकार:' - वह परमात्मा मेरे स्वरूप में है। 'सोऽहं, तत्त्वमसि' इत्यादि एक दूसरे के पर्याय हैं, ऐसा जानने योग्य स्वरूप मैं ही हूँ। 'ऋक्' अर्थात् सम्पूर्ण प्रार्थना, 'साम' अर्थात् समत्व दिलानेवाली प्रक्रिया, 'यजुः' अर्थात् यजन की विधि-विशेष भी मैं ही हूँ। योग-अनुष्ठान के उक्त तीनों आवश्यक अंग मुझसे होते हैं। #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता #🙏गुरु महिमा😇
🙏गीता ज्ञान🛕 - I39 || पिताहमस्य जगनो माता घाना पितामहः वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च।।  अर्जुन! मैं ही सम्पूर्ण जगत् का ' धाता' अर्थान् धारण * কনেনালা; 'দিনা সমনিপালন করূনেনালা; पाता अर्थात् उत्पन्न करनेवाला ' पितामहः अर्थात्मूल उद्गम हूॅ जिसमें सभी प्रवेश पाते है और जानने योग्य पवित्र ओंकार अर्थात् अह आाकार इति সান্ধায:' वह परमात्मा मेरे स्वरूप में है। सोड्ह तत्त्वमासि इत्यादि एक पर्याय हैं ऐसा दूसरेके जानने योग्य स्वरूप मे ही हू। ऋक्' अर्थात् सम्पूर्ण  সাথনা; 'মাস' সথান মসন রিলাননালী সক্রিতা अर्थात् यजन की विधि॰विशेष भी मै ही हूॅ। 'ಶಸ: अनुष्ठान के उक्त तीनों आवश्यक अंग मुझसे  योग  होने है। I39 || पिताहमस्य जगनो माता घाना पितामहः वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च।।  अर्जुन! मैं ही सम्पूर्ण जगत् का ' धाता' अर्थान् धारण * কনেনালা; 'দিনা সমনিপালন করূনেনালা; पाता अर्थात् उत्पन्न करनेवाला ' पितामहः अर्थात्मूल उद्गम हूॅ जिसमें सभी प्रवेश पाते है और जानने योग्य पवित्र ओंकार अर्थात् अह आाकार इति সান্ধায:' वह परमात्मा मेरे स्वरूप में है। सोड्ह तत्त्वमासि इत्यादि एक पर्याय हैं ऐसा दूसरेके जानने योग्य स्वरूप मे ही हू। ऋक्' अर्थात् सम्पूर्ण  সাথনা; 'মাস' সথান মসন রিলাননালী সক্রিতা अर्थात् यजन की विधि॰विशेष भी मै ही हूॅ। 'ಶಸ: अनुष्ठान के उक्त तीनों आवश्यक अंग मुझसे  योग  होने है। - ShareChat
।।ॐ।। अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहममौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥ कर्त्ता मैं हूँ। वस्तुतः कर्त्ता के पीछे प्रेरक के रूप में सदैव संचालित करनेवाला इष्ट ही है। कर्त्ता द्वारा जो पार लगता है, मेरी देन है। यज्ञ मैं हूँ। यज्ञ आराधना की विधि-विशेष है। पूर्तिकाल में यज्ञ जिसका सृजन करता है, उस अमृत को पान करनेवाला पुरुष सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है। स्वधा मैं हूँ अर्थात् अतीत के अनन्त संस्कारों को विलय करना, उन्हें तृप्त कर देना मेरी देन है। भवरोग को मिटानेवाली औषधि मैं हूँ। मुझे पाकर लोग इस रोग से निवृत्त हो जाते हैं। मन्त्र मैं हूँ। मन को श्वास के अन्तराल में निरोध करना मेरी देन है। इस निरोध-क्रिया में तीव्रता लानेवाली वस्तु 'आज्य' (हवि) भी मैं हूँ। मेरे ही प्रकाश में मन की सभी प्रवृत्तियाँ विलीन होती हैं। हवन अर्थात् समर्पण भी मैं ही हूँ। यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण बार-बार 'मैं हूँ' कह रहे हैं। इसका आशय मात्र इतना ही है कि मैं ही प्रेरक के रूप में आत्मा से अभिन्न होकर खड़ा हो जाता हूँ तथा निरन्तर निर्णय देते हुए योगक्रिया को पूर्ण कराता हूँ। इसी का नाम विज्ञान है। 'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - ~ =0" 77410F কনামনাববদ্াএদাা কমোওমযেক চমদমমে  =11771=17=1717  7=T7  +74=#/ப7+#ப117547571414-[404#1 -7-'=71=751 Bar ಊಣ~Hiಳarr urin' -=+7 লধাসাত4li ননমনদনকার ক্ানিবয বননা বননদ এ্ভনা সযতন [1 সনবয ক্রী  Tu r iaruಝil- ' HiTr೯a TTrಣ Tnಹiar hl#T111371 514 47 3  ar1 ` =ப==711*=7=1=741-7## FTನ4 [ ITru (M#) '14[1#ಗ : FI1 1 2 ، ٠ ٥ ٣٧»٥  ٥٠  ٥  ٠٢ ٧٢١   411 ರ ~ =0" 77410F কনামনাববদ্াএদাা কমোওমযেক চমদমমে  =11771=17=1717  7=T7  +74=#/ப7+#ப117547571414-[404#1 -7-'=71=751 Bar ಊಣ~Hiಳarr urin' -=+7 লধাসাত4li ননমনদনকার ক্ানিবয বননা বননদ এ্ভনা সযতন [1 সনবয ক্রী  Tu r iaruಝil- ' HiTr೯a TTrಣ Tnಹiar hl#T111371 514 47 3  ar1 ` =ப==711*=7=1=741-7## FTನ4 [ ITru (M#) '14[1#ಗ : FI1 1 2 ، ٠ ٥ ٣٧»٥  ٥٠  ٥  ٠٢ ٧٢١   411 ರ - ShareChat
#🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता ॐ ।। ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥ उनमें से कोई तो मुझ सर्वव्याप्त विराट् परमात्मा को ज्ञानयज्ञ द्वारा यजन करते हैं अर्थात् अपनी हानि, लाभ और शक्ति को समझकर इसी नियत कर्म यज्ञ में प्रवृत्त होते हैं, कुछ एकत्व भाव से मेरी उपासना करते हैं कि मुझे इसी में एक होना है और दूसरे सब कुछ मुझे अलग रखकर, मुझे समर्पण करके निष्काम सेवा-भाव से मुझे उपासते हैं तथा बहुत प्रकार से उपासते हैं; क्योंकि एक ही यज्ञ के ये सभी ऊँचे-नीचे स्तर हैं। यज्ञ का आरम्भ सेवा से ही होता है; किन्तु उसका अनुष्ठान होता कैसे है? योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- यज्ञ मैं करता हूँ। यदि महापुरुष रथी न हो तो यज्ञ पार नहीं लगेगा। उन्हीं के निर्देशन में साधक समझ पाता है कि अब वह किस स्तर पर है, कहाँ तक पहुँच सका है। वस्तुतः यज्ञकर्त्ता कौन है?- इस पर योगेश्वर कहते हैं-"यथार्थ गीता "
🧘सदगुरु जी🙏 - a ५२००  ।श्रीमढ्पगवढ्गीता।।  ५२०० y২০০  गीता।। ।।यथार्थ ५२०० ५२०० ப13 11 8 ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्।१  [নিবয उनमें से कोई तो मुझ सर्वव्याप्त  परमात्मा को ज्ञानयज्ञ द्वारा यजन करते हैं अर्थात् अपनी हानि , लाभ और शक्ति को समझकर इसी नियत कर्म यज्ञ में प्रवृत्त होते मै एकहोकह्व शरदूसेसेसीब कुासनाकअलेहें किखमककोे मुक्ने স ৎক্র? समर्पण करके निष्काम सेवा- भाव से मुझे उपासते हैं तथा बहुत प्रकार से उपासते हैं; क्योंकि एक ही यज्ञ के ये सभी ऊँचे नीचे स्तर हैं। यज्ञ का आरम्भ सेवा से ही होता है; उसका अनुष्ठान होता कैसे है? योगेश्वर श्रीकृष्ण " किन्तु  हैं- यज्ञ मैं करता हूँ। यदि महापुरुष रथी न हो तो यज्ञ कहते पार नहीं लगेगा | उन्हीं के निर्देशन में साधक समझ पाता है ५२०० कि अब वह किस स्तर पर है, कहाँ तक पहुँच सका है। वस्तुतः यज्ञकर्त्ता कौन है?- इस पर योगेश्वर कहते हैं-" यथार्थ गीता वर्षों के लम्बे अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवढ्गीता की शाश्वत व्याख्या Nextef-ia .507 धर्मशास्त्र ೯ a ५२००  ।श्रीमढ्पगवढ्गीता।।  ५२०० y২০০  गीता।। ।।यथार्थ ५२०० ५२०० ப13 11 8 ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्।१  [নিবয उनमें से कोई तो मुझ सर्वव्याप्त  परमात्मा को ज्ञानयज्ञ द्वारा यजन करते हैं अर्थात् अपनी हानि , लाभ और शक्ति को समझकर इसी नियत कर्म यज्ञ में प्रवृत्त होते मै एकहोकह्व शरदूसेसेसीब कुासनाकअलेहें किखमककोे मुक्ने স ৎক্র? समर्पण करके निष्काम सेवा- भाव से मुझे उपासते हैं तथा बहुत प्रकार से उपासते हैं; क्योंकि एक ही यज्ञ के ये सभी ऊँचे नीचे स्तर हैं। यज्ञ का आरम्भ सेवा से ही होता है; उसका अनुष्ठान होता कैसे है? योगेश्वर श्रीकृष्ण " किन्तु  हैं- यज्ञ मैं करता हूँ। यदि महापुरुष रथी न हो तो यज्ञ कहते पार नहीं लगेगा | उन्हीं के निर्देशन में साधक समझ पाता है ५२०० कि अब वह किस स्तर पर है, कहाँ तक पहुँच सका है। वस्तुतः यज्ञकर्त्ता कौन है?- इस पर योगेश्वर कहते हैं-" यथार्थ गीता वर्षों के लम्बे अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवढ्गीता की शाश्वत व्याख्या Nextef-ia .507 धर्मशास्त्र ೯ - ShareChat
।।ॐ।। सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥ वे निरन्तर चिन्तन के व्रत में अचल रहते हुए मेरे नाम और गुणों का चिन्तन करते हैं, प्राप्ति के यत्न करते हैं और मुझे बारम्बार नमस्कार करते हुए सदैव मुझसे संयुक्त होकर अनन्य भक्ति से मुझे उपासते हैं। अविरल लगे रहते हैं। कौन-सी उपासना करते हैं? कैसा है यह कीर्तिगान? कोई दूसरी उपासना नहीं वरन् वही 'यज्ञ', जिसे विस्तार से बता आये हैं। उसी आराधना को यहाँ संक्षेप में योगेश्वर श्रीकृष्ण दुहरा रहे हैं-"यथार्थ गीता " #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता
🧘सदगुरु जी🙏 - 3் IlIl सतत कीर्तयन्नो मा यतन्तश्च दृठवताः| नित्ययुक्ता उपासते।l  नमस्यन्तश्च मा भवत्या  रहते हुए 7 चे निसन्तर चिन्तन के व्रत में अचत मेरे नाम ओर गुर्णो का चिन्तन करते ्हे॰ प्राप्ति के यत्न करते ह 7#47` ओर मुदो वारम्बार नमस्कार करते मुझसे संयुक्त होकर अनन्य भक्ति से मुझे उपासते हे। अविरल लगे रहते ्ह। कोन-सी उपासना करते हें? केसा हे यह कीर्तिगान? कोई दूसरी उपासना नर्ही वरन् बही '्यज्ञः जिसे चिस्तार से बता आये हें। उसी  आराधना को यहॉं संक्षेप में योगेश्वर = श्रीकृष्ण " दुहरा रहे ೯-"4uಖಚ TfinT' 3் IlIl सतत कीर्तयन्नो मा यतन्तश्च दृठवताः| नित्ययुक्ता उपासते।l  नमस्यन्तश्च मा भवत्या  रहते हुए 7 चे निसन्तर चिन्तन के व्रत में अचत मेरे नाम ओर गुर्णो का चिन्तन करते ्हे॰ प्राप्ति के यत्न करते ह 7#47` ओर मुदो वारम्बार नमस्कार करते मुझसे संयुक्त होकर अनन्य भक्ति से मुझे उपासते हे। अविरल लगे रहते ्ह। कोन-सी उपासना करते हें? केसा हे यह कीर्तिगान? कोई दूसरी उपासना नर्ही वरन् बही '्यज्ञः जिसे चिस्तार से बता आये हें। उसी  आराधना को यहॉं संक्षेप में योगेश्वर = श्रीकृष्ण " दुहरा रहे ೯-"4uಖಚ TfinT' - ShareChat
।। ॐ ।। महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥ परन्तु हे पार्थ! दैवी प्रकृति अर्थात् दैवी सम्पद् के आश्रित हुए महात्माजन मुझे सब भूतों का आदिकारण, अव्यक्त और अक्षर जानकर अनन्य मन से अर्थात् मन के अन्तराल में किसी अन्य को स्थान न देकर केवल मुझमें श्रद्धा रखकर निरन्तर मुझे भजते हैं। किस प्रकार भजते हैं? इस पर कहते हैं- #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
❤️जीवन की सीख - Il 3 Il महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः]  भजन्त्यनन्यमनसो भूतादिमव्ययम्।।  ज्ञात्वा परन्तु हे पार्थ! दैवी प्रकृति अर्थात् दैवी सम्पद् के आश्रित हुए महात्माजन मुझे सब भूतों का आदिकारण, अव्यक्त और अक्षर जानकर 34~4#4734f4 मन के अन्तराल में किसी अन्य को स्थान न देकर केवल  श्रद्धा रखकर मुझमें निरन्तर मुझे भजते हैं। किस प्रकार भजते हैं? इस पर कहते हैं- "यथार्थ गीता" Il 3 Il महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः]  भजन्त्यनन्यमनसो भूतादिमव्ययम्।।  ज्ञात्वा परन्तु हे पार्थ! दैवी प्रकृति अर्थात् दैवी सम्पद् के आश्रित हुए महात्माजन मुझे सब भूतों का आदिकारण, अव्यक्त और अक्षर जानकर 34~4#4734f4 मन के अन्तराल में किसी अन्य को स्थान न देकर केवल  श्रद्धा रखकर मुझमें निरन्तर मुझे भजते हैं। किस प्रकार भजते हैं? इस पर कहते हैं- "यथार्थ गीता" - ShareChat
।। ॐ।। मोघाशामोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥ वे वृथा आशा (जो कभी पूर्ण न हो ऐसी आशा), वृथा कर्म (बन्धनकारी कर्म), वृथा ज्ञान (जो वस्तुतः अज्ञान है), 'विचेतसः'- विशेष रूप से अचेत हुए, राक्षसों और असुरों के-से मोहित होनेवाले स्वभाव को धारण किये होते हैं अर्थात् आसुरी स्वभाववाले होते हैं इसलिये मनुष्य समझते हैं। असुर और राक्षस मन का एक स्वभाव है, न कि कोई जाति या योनि। आसुरी स्वभाववाले मुझे नहीं जान पाते; किन्तु महात्माजन मुझे जानते और भजते हैं- #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता
🧘सदगुरु जी🙏 - असुर और राक्षस मन का एक  स्वभाव है॰ न कि कोई जाति या ٩١٨١ स्वभाववाले मुझे সামুহী: I 39 | | f नहीं जान पाते; मोघाशामोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः| महात्माजन राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं সুহী আানন farl:Il और भजते हैं- 4447 (जो कभी पूर्ण न हो ऐसी आशा वृथा कर्म (बन्धनकारी कर्म) , T?TT), (जो वस्तुतः अज्ञान है), वृथा ज्ञान विचेतसः - विशेष रूप से अचेत हुए, राक्षसों और असुरों केनसे मोहित होनेवाले स्वभावको धारण किये होते हैं अर्थात् आसुरी स्वभाववाले होते हैं इसलिये मनुष्य समझते हैं। असुर और राक्षस मन का एक  स्वभाव है॰ न कि कोई जाति या ٩١٨١ स्वभाववाले मुझे সামুহী: I 39 | | f नहीं जान पाते; मोघाशामोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः| महात्माजन राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं সুহী আানন farl:Il और भजते हैं- 4447 (जो कभी पूर्ण न हो ऐसी आशा वृथा कर्म (बन्धनकारी कर्म) , T?TT), (जो वस्तुतः अज्ञान है), वृथा ज्ञान विचेतसः - विशेष रूप से अचेत हुए, राक्षसों और असुरों केनसे मोहित होनेवाले स्वभावको धारण किये होते हैं अर्थात् आसुरी स्वभाववाले होते हैं इसलिये मनुष्य समझते हैं। - ShareChat
।। ॐ ।। योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।। 'विजितात्मा' - विशेष रूप से जीता हुआ है शरीर जिसका, 'जितेन्द्रियः' जीती हुई हैं इन्द्रियाँ जिसकी और 'विशुद्धात्मा'- विशेष रूप से शुद्ध है अन्तःकरण जिसका, ऐसा पुरुष 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' - सम्पूर्ण भूतप्राणियों के आत्मा के मूल उद्गम परमात्मा से एकीभाव हुआ योग से युक्त है। वह कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता। तो करता क्यों है? पीछेवालों में परमकल्याणकारी बीज का संग्रह करने के लिये। लिप्त क्यों नहीं होता? क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों का जो मूल उद्गम है, जिसका नाम परमतत्त्व है उस तत्त्व में वह स्थित हो गया। आगे कोई वस्तु नहीं जिसकी शोध करे। पीछेवाली वस्तुएँ छोटी पड़ गयीं तो भला आसक्ति किसमें करे? इसलिये वह कर्मों से आवृत्त नहीं होता। यह योगयुक्त की पराकाष्ठा का चित्रण है। पुनः योगयुक्त पुरुष की रहनी स्पष्ट करते हैं कि वह करते हुए भी उससे लिप्त क्यों नहीं होता? - #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
यथार्थ गीता - ShareChat