Jagdish Sharma
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Jagdish Sharma
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यथार्थगीता पढ़ें और पढ़ायें।
।।ॐ।। समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥ #🙏गुरु महिमा😇 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता मैं सब भूतों में सम हूँ। सृष्टि में न मेरा कोई प्रिय है और न अप्रिय है; किन्तु जो अनन्य भक्त है, वह मुझमें है और मैं उसमें हूँ। यही मेरा एकमात्र रिश्ता है। मैं उसमें परिपूर्ण हो जाता हूँ। मुझमें और उसमें कोई अन्तर नहीं रह जाता। तब तो बहुत भाग्यशाली लोग ही भजन करते होंगे? भजन करने का अधिकार किसे है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-"यथार्थ गीता"
🙏गुरु महिमा😇 - Il3ol l तो बहुत भाग्यशाली लोग q समोड्हं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योडस्ति न प्रियः| ही भजन करते होंगे? मयि ते तेषु चाप्यहम्।।  ये भजन्ति तु मां भक्त्या भजन करने का मैं सब भूतों में सम हूँ। अधिकार किसे है? सृष्टि में न मेरा कोई प्रिय है इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते और न अप्रिय हैः किन्तु जो अनन्य भक्त है, हैं- "यथार्थ गीता" वह मुझर्में है और मै उसमें हूँ। यही मेरा एकमात्र रिश्ता है। मैं उसमें परिपूर्ण हो जाता हूँ। और उसर्में कोई मुझर्मे - अन्तर नहीं रह जाता। Il3ol l तो बहुत भाग्यशाली लोग q समोड्हं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योडस्ति न प्रियः| ही भजन करते होंगे? मयि ते तेषु चाप्यहम्।।  ये भजन्ति तु मां भक्त्या भजन करने का मैं सब भूतों में सम हूँ। अधिकार किसे है? सृष्टि में न मेरा कोई प्रिय है इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते और न अप्रिय हैः किन्तु जो अनन्य भक्त है, हैं- "यथार्थ गीता" वह मुझर्में है और मै उसमें हूँ। यही मेरा एकमात्र रिश्ता है। मैं उसमें परिपूर्ण हो जाता हूँ। और उसर्में कोई मुझर्मे - अन्तर नहीं रह जाता। - ShareChat
।। ॐ ।। यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥ अर्जुन! तू जो कर्म (यथार्थ कर्म) करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, समर्पण करता है, दान देता है, मनसहित इन्द्रियों को जो मेरे अनुरूप तपाता है, वह सब मुझे अर्पण कर अर्थात् मेरे प्रति समर्पित होकर यह सब कर। समर्पण करने से योग के क्षेम की जिम्मेदारी मैं ले लूँगा। #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गुरु महिमा😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता
❤️जीवन की सीख - [ಲೊ यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। -5 यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्।।  अर्जुन! तूजो कर्म (यथार्थ कर्म) करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, समर्पण करता दान देता है, मनसहित इन्द्रियों को जो मेरे अनुरूप तपाता है, बह सब मुझे अर्पण कर अर्थात् मेरे प्रति समर्पित होकर यहःसब कर। समर्पण करने से योग के क्षेम की जिम्मेदारी मैं ले लूँगा। [ಲೊ यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। -5 यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्।।  अर्जुन! तूजो कर्म (यथार्थ कर्म) करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, समर्पण करता दान देता है, मनसहित इन्द्रियों को जो मेरे अनुरूप तपाता है, बह सब मुझे अर्पण कर अर्थात् मेरे प्रति समर्पित होकर यहःसब कर। समर्पण करने से योग के क्षेम की जिम्मेदारी मैं ले लूँगा। - ShareChat
।। ॐ ।। पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥ भक्ति का आरम्भ यहीं से है कि पत्र, पुष्प, फल, जल इत्यादि जो कोई मुझे भक्तिपूर्वक अर्पित करता है, मन से अर्पण करनेवाले उस भक्त का वह सब मैं खाता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ। #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕
❤️जीवन की सीख - 3 || I पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।  यहीं से है कि पत्र पुष्प, भाक्त का आरम्भ फल, जल इत्यादि जो कोई मुझे भक्तिपूर्वक 3ণিন কনো ৪, সন ম 3পতা কনেনাল ওম भक्त का वह सब मैं खाता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ 3 || I पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।  यहीं से है कि पत्र पुष्प, भाक्त का आरम्भ फल, जल इत्यादि जो कोई मुझे भक्तिपूर्वक 3ণিন কনো ৪, সন ম 3পতা কনেনাল ওম भक्त का वह सब मैं खाता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ - ShareChat
।। ॐ।। यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥ अर्जुन! देवताओं को पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं। देवता हैं तो परिवर्तित सत्ता, वे अपने सद्कर्मानुसार जीवन व्यतीत करते हैं। पितरों को पूजनेवाले पितरों को प्राप्त होते हैं अर्थात् अतीत में उलझे रहते हैं, भूतों को पूजनेवाले भूत होते हैं- शरीर धारण करते हैं और मेरा भक्त मुझे प्राप्त होता है। वह मेरा साक्षात् स्वरूप होता है। उसका पतन नहीं होता। इतना ही नहीं, मेरी पूजा का विधान भी सरल है- #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
🙏गुरु महिमा😇 - Ilsirreweminill मीता ।यथार्थ I 3bIl पितृव्रताः|  यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोडपि माम्। মুনানি  अर्जुन! देवताओं को देवताओं को प्राप्त पूजनेवाले होते हैं। देवता हैं तो परिवर्तित सत्ता, वे अपने सद्कर्मानुसार जीवन व्यतीत करते हैं। पितरों को पूजनेवाले पितरों को प्राप्त होते हैं अर्थात् अतीत में उलझे रहते हैं भूतों को पूजनेवाले भूत होते हैं- शरीर धारण करते हैं और मेरा भक्त मुझे प्राप्त होता  है। वह मेरा साक्षात् स्वरूप होता है। उसका पतन नहीं होता। इतना ही नहीं, मेरी पूजा का विधान भी सरल है- ১৯৪ 495316 ١١١٩٩١٩ Ilsirreweminill मीता ।यथार्थ I 3bIl पितृव्रताः|  यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोडपि माम्। মুনানি  अर्जुन! देवताओं को देवताओं को प्राप्त पूजनेवाले होते हैं। देवता हैं तो परिवर्तित सत्ता, वे अपने सद्कर्मानुसार जीवन व्यतीत करते हैं। पितरों को पूजनेवाले पितरों को प्राप्त होते हैं अर्थात् अतीत में उलझे रहते हैं भूतों को पूजनेवाले भूत होते हैं- शरीर धारण करते हैं और मेरा भक्त मुझे प्राप्त होता  है। वह मेरा साक्षात् स्वरूप होता है। उसका पतन नहीं होता। इतना ही नहीं, मेरी पूजा का विधान भी सरल है- ১৯৪ 495316 ١١١٩٩١٩ - ShareChat
।। ॐ ।। अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।। सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता अर्थात् यज्ञ जिसमें विलय होते हैं, यज्ञ के परिणाम में जो मिलता है वह मैं हूँ और स्वामी भी मैं ही हूँ; परन्तु वे मुझे तत्त्व से भली प्रकार नहीं जानते, इसलिये 'च्यवन्ति' - गिरते हैं। अर्थात् वे कभी अन्य देवताओं में गिरते हैं और तत्त्व से जब तक नहीं जानते तब तक कामनाओं से भी गिरते हैं। उनकी गति क्या है?- #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - Il 32 Il अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।।  सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता अर्थात् यज्ञ जिसमें विलय होते हैं, यज्ञ के परिणाम में जो मिलता है वह मैं हूँ भी मैं ही हूँ; परन्तु वे मुझे तत्त्व से भली और स्वामी प्रकार नहीं जानते, इसलिये ' च्यवन्ति' - गिरते हैं। अर्थात् वे कभी अन्य देवताओं में गिरते हैं और तत्त्व से जब तक नहीं जानते तब तक कामनाओं से भी गिरते हैं। उनकी गति क्या है?- Il 32 Il अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।।  सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता अर्थात् यज्ञ जिसमें विलय होते हैं, यज्ञ के परिणाम में जो मिलता है वह मैं हूँ भी मैं ही हूँ; परन्तु वे मुझे तत्त्व से भली और स्वामी प्रकार नहीं जानते, इसलिये ' च्यवन्ति' - गिरते हैं। अर्थात् वे कभी अन्य देवताओं में गिरते हैं और तत्त्व से जब तक नहीं जानते तब तक कामनाओं से भी गिरते हैं। उनकी गति क्या है?- - ShareChat
।। ॐ ।। येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥ कौन्तेय! श्रद्धा से युक्त हुए जो भक्त दूसरे-दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझे ही पूजते हैं; क्योंकि वहाँ देवता नाम की कोई वस्तु तो होती नहीं, किन्तु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक है, मेरी प्राप्ति की विधि से रहित है। #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता #🙏गुरु महिमा😇
🧘सदगुरु जी🙏 - ।।ऊँ यहां योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दूसरी बार देवताओं के II येडप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः प्रकरण को लिया है। सर्वप्रथम अघ्याय सात के बीसवें से तेईसवें श्लोक तक उन्होंने कहा- अर्जुन! तेडपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्।। कामनाओं द्वारा जिनके ज्ञानका अपहरण कर लिया गया है, ऐसे मूढ़बुद्धि पुरुष अन्य देवताओं की पूजा  कौन्तेय! श्रद्धा से युक्त हुए जो भक्त करते हें ओर जहॉ पूजा करते हें, वहॉ देवता नाम की तो ह ही नहीं। पीपल, पत्थर, भूत दूसरे-दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझे सक्षम सत्ता झुक जाती  भवानी अथवा अन्यत्र जहॉ उनकी  সস-্ভা ही पूजते हैं; क्योंकि वहाँ देवता नाम की है, वहॉँ कोई देवता नहीं है। मैं ही सर्वत्र हूँ॰ उस स्थान कोई वस्तु तो होती नहीं , किन्तु उनका वह पर में ही खड़ा होकर उनकी देवश्रद्धा को उन स्थानों  पर स्थिर करता हू। में ही फल का विधान करता हूँ पूजन अविधिपूर्वक है, मेरी प्राप्ति की विधि फल देता हूँ। फलनिश्चित मिलता हैः किन्तु उनका  से रहित है। नाशवान्ह। आज है तो कल भोगने में आ फल जायेगा , नष्ट हो जायेगा, जबकि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता। अतःवे मूढ़बुद्धि जिनके ज्ञान का अपहरण हो गया है, वही अन्य देवताओं की पूजा करते हैं।  प्रस्तुत अध्याय नौ के तेईस से पचीसवें श्लोक तक योगेश्वर श्रीकृष्ण पुनः दुहराते हैं कि-अर्जुन ! जो श्रद्धा से अन्य-अन्य हैं, वे मुझे ही గ్గే; देवताओं को পুতন পুতন  किन्तु वह पूजन अविधिपूर्वक है। वहाँ देवता नाम की सक्षम वस्तु नहीं है। उनकी प्राप्ति की विधि गलत है। अब प्रश्न उठता है कि जब वे भी प्रकारान्तर से आपको ही 8 পুতন  और फल भी मिलता ही है, तो दोष क्या है? ।।ऊँ यहां योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दूसरी बार देवताओं के II येडप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः प्रकरण को लिया है। सर्वप्रथम अघ्याय सात के बीसवें से तेईसवें श्लोक तक उन्होंने कहा- अर्जुन! तेडपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्।। कामनाओं द्वारा जिनके ज्ञानका अपहरण कर लिया गया है, ऐसे मूढ़बुद्धि पुरुष अन्य देवताओं की पूजा  कौन्तेय! श्रद्धा से युक्त हुए जो भक्त करते हें ओर जहॉ पूजा करते हें, वहॉ देवता नाम की तो ह ही नहीं। पीपल, पत्थर, भूत दूसरे-दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझे सक्षम सत्ता झुक जाती  भवानी अथवा अन्यत्र जहॉ उनकी  সস-্ভা ही पूजते हैं; क्योंकि वहाँ देवता नाम की है, वहॉँ कोई देवता नहीं है। मैं ही सर्वत्र हूँ॰ उस स्थान कोई वस्तु तो होती नहीं , किन्तु उनका वह पर में ही खड़ा होकर उनकी देवश्रद्धा को उन स्थानों  पर स्थिर करता हू। में ही फल का विधान करता हूँ पूजन अविधिपूर्वक है, मेरी प्राप्ति की विधि फल देता हूँ। फलनिश्चित मिलता हैः किन्तु उनका  से रहित है। नाशवान्ह। आज है तो कल भोगने में आ फल जायेगा , नष्ट हो जायेगा, जबकि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता। अतःवे मूढ़बुद्धि जिनके ज्ञान का अपहरण हो गया है, वही अन्य देवताओं की पूजा करते हैं।  प्रस्तुत अध्याय नौ के तेईस से पचीसवें श्लोक तक योगेश्वर श्रीकृष्ण पुनः दुहराते हैं कि-अर्जुन ! जो श्रद्धा से अन्य-अन्य हैं, वे मुझे ही గ్గే; देवताओं को পুতন পুতন  किन्तु वह पूजन अविधिपूर्वक है। वहाँ देवता नाम की सक्षम वस्तु नहीं है। उनकी प्राप्ति की विधि गलत है। अब प्रश्न उठता है कि जब वे भी प्रकारान्तर से आपको ही 8 পুতন  और फल भी मिलता ही है, तो दोष क्या है? - ShareChat
।। ॐ ।। अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता अनन्य भाव से मुझमें स्थित भक्तजन मुझ परमात्मस्वरूप का निरन्तर चिन्तन करते हैं, 'पर्युपासते' - लेशमात्र भी त्रुटि न रखकर मुझे उपासते हैं। उन नित्य एकीभाव से संयुक्त हुए पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ अर्थात् उनके योग की सुरक्षा की सारी जिम्मेदारी मैं अपने हाथ में लेता हूँ। इतना होने पर भी लोग अन्य देवताओं को भजते हैं-
🙏गुरु महिमा😇 - I 3 Il अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।  अनन्य भाव से मुझमें स्थित भक्तजन मुझ परमात्मस्वरूप का निरन्तर चिन्तन करते हैं 'पर्युपासते लेशमात्र भी त्रुटि न रखकर मुझे उपासते हैं। उन नित्य एकीभाव से  हुए पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन संयुक्त करता हूँ अर्थात् उनके योग की सुरक्षा की सारी जिम्मेदारी मैं अपने हाथ में लेता हूँ। इतना होने पर भी लोग अन्य देवताओं को भजते हैं- I 3 Il अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।  अनन्य भाव से मुझमें स्थित भक्तजन मुझ परमात्मस्वरूप का निरन्तर चिन्तन करते हैं 'पर्युपासते लेशमात्र भी त्रुटि न रखकर मुझे उपासते हैं। उन नित्य एकीभाव से  हुए पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन संयुक्त करता हूँ अर्थात् उनके योग की सुरक्षा की सारी जिम्मेदारी मैं अपने हाथ में लेता हूँ। इतना होने पर भी लोग अन्य देवताओं को भजते हैं- - ShareChat
।। ॐ।। त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा-यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥ #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता आराधना-विद्या के तीनों अंग-ऋक्, साम और यजुः अर्थात् प्रार्थना, समत्व की प्रक्रिया और यजन का आचरण करनेवाले, सोम अर्थात् चन्द्रमा के क्षीण प्रकाश को पानेवाले पाप से मुक्त होकर पवित्र हुए पुरुष उसी यज्ञ की निर्धारित प्रक्रिया द्वारा मुझे इष्टरूप में पूजकर स्वर्ग के लिये प्रार्थना करते हैं। यही असत् की कामना है, इससे वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म होता है; जैसा पिछले श्लोक में योगेश्वर ने बताया। वे पूजते मुझे ही हैं, उसी निर्धारित विधि से पूजते हैं; किन्तु बदले में स्वर्ग की याचना करते हैं। वे पुरुष अपने पुण्य के फलस्वरूप इन्द्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं, अर्थात् वह भोग भी मैं ही देता हूँ।
❤️जीवन की सीख - Il 3Il त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा-्यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। Trna  पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मश्नन्ति दिव्यान्दिवि Oalhantk Cvmzu II देवभोगान्।। W आराधना विद्या के तीनों अंग ऋक्॰ साम और यजुः अर्थात् प्रार्थना, समत्व की प्रक्रिया और करनेवाले , सोम अर्थात् यजन का आचरण को पानेवाले पाप से मुक्त चन्द्रमा के क्षीण प्रकाश पवित्र हुए पुरुष उसी यज्ञ की निर्धारित होकर प्रक्रिया द्वारा मुझे इष्टरूप में पूजकर स्वर्ग के लिये प्रार्थना करते हैं। यही असत् की कामना है, इससे वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका होता है; पुनर्जन्म  जैसा पिछले श्लोक में योगेश्वर ने बताया। वे पूजते मुझे ही हैं, उसी निर्धारित विधि से पूजते हैं; किन्तु बदले में स्वर्ग की याचना करते हैं। वे पुरुष अपने पुण्य के फलस्वरूप इन्द्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं, अर्थात् वह भोग भी मैं ही देता हूँ। Il 3Il त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा-्यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। Trna  पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मश्नन्ति दिव्यान्दिवि Oalhantk Cvmzu II देवभोगान्।। W आराधना विद्या के तीनों अंग ऋक्॰ साम और यजुः अर्थात् प्रार्थना, समत्व की प्रक्रिया और करनेवाले , सोम अर्थात् यजन का आचरण को पानेवाले पाप से मुक्त चन्द्रमा के क्षीण प्रकाश पवित्र हुए पुरुष उसी यज्ञ की निर्धारित होकर प्रक्रिया द्वारा मुझे इष्टरूप में पूजकर स्वर्ग के लिये प्रार्थना करते हैं। यही असत् की कामना है, इससे वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका होता है; पुनर्जन्म  जैसा पिछले श्लोक में योगेश्वर ने बताया। वे पूजते मुझे ही हैं, उसी निर्धारित विधि से पूजते हैं; किन्तु बदले में स्वर्ग की याचना करते हैं। वे पुरुष अपने पुण्य के फलस्वरूप इन्द्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं, अर्थात् वह भोग भी मैं ही देता हूँ। - ShareChat
।। ॐ ।। तपाम्यहमहं वर्ष निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥ #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता मैं सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा को आकर्षित करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। मृत्यु से परे अमृत-तत्त्व तथा मृत्यु, सत् और असत् सब कुछ मैं ही हूँ। अर्थात् जो परम प्रकाश प्रदान करता है, वह सूर्य मैं ही हूँ। कभी-कभी भजनेवाले मुझे असत् भी मान बैठते हैं, वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं। आगे कहते हैं-"यथार्थ गीता"
🙏गुरु महिमा😇 - 113 I1 तपाम्यहमहं वर्ष निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन।l मैं सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा को आकर्षित करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। मृत्यु से परे अमृतन्तत्त्व तथा मृत्यु, सत् और असत् सब कुछ मैं ही हूँ। अर्थात् जो परम प्रकाश प्रदान करता है, वह सूर्य मैं ही हूँ। कभी॰कभी भजनेवाले मुझे असत् भी मान बैठते हैं, वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं। आगे कहते हैं गीता" -"यथार्थ 113 I1 तपाम्यहमहं वर्ष निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन।l मैं सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा को आकर्षित करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। मृत्यु से परे अमृतन्तत्त्व तथा मृत्यु, सत् और असत् सब कुछ मैं ही हूँ। अर्थात् जो परम प्रकाश प्रदान करता है, वह सूर्य मैं ही हूँ। कभी॰कभी भजनेवाले मुझे असत् भी मान बैठते हैं, वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं। आगे कहते हैं गीता" -"यथार्थ - ShareChat
।। ॐ ।। योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।। 'विजितात्मा' - विशेष रूप से जीता हुआ है शरीर जिसका, 'जितेन्द्रियः' जीती हुई हैं इन्द्रियाँ जिसकी और 'विशुद्धात्मा'- विशेष रूप से शुद्ध है अन्तःकरण जिसका, ऐसा पुरुष 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' - सम्पूर्ण भूतप्राणियों के आत्मा के मूल उद्गम परमात्मा से एकीभाव हुआ योग से युक्त है। वह कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता। तो करता क्यों है? पीछेवालों में परमकल्याणकारी बीज का संग्रह करने के लिये। लिप्त क्यों नहीं होता? क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों का जो मूल उद्गम है, जिसका नाम परमतत्त्व है उस तत्त्व में वह स्थित हो गया। आगे कोई वस्तु नहीं जिसकी शोध करे। पीछेवाली वस्तुएँ छोटी पड़ गयीं तो भला आसक्ति किसमें करे? इसलिये वह कर्मों से आवृत्त नहीं होता। यह योगयुक्त की पराकाष्ठा का चित्रण है। पुनः योगयुक्त पुरुष की रहनी स्पष्ट करते हैं कि वह करते हुए भी उससे लिप्त क्यों नहीं होता? - #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
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