Jagdish Sharma
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Jagdish Sharma
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यथार्थगीता पढ़ें और पढ़ायें।
।। ॐ ।। अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।। #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो पुरुष अन्तकाल में अर्थात् मन के निरोध और विलयकाल में मेरा ही स्मरण करते हुए शरीर के सम्बन्ध को छोड़ अलग हो जाता है, वह 'मद्भावम्'- साक्षात् मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है। शरीर का निधन शुद्ध अन्तकाल नहीं है। मरने के बाद भी शरीरों का क्रम पीछे लगा रहता है। संचित संस्कारों की सतह के मिट जाने के साथ ही मन का निरोध हो जाता है। और वह मन भी जब विलीन हो जाता है तो वहीं पर अन्तकाल है, जिसके बाद शरीर धारण नहीं करना पड़ता। यह क्रियात्मक है। केवल कहने से, वार्त्ताक्रम से समझ में नहीं आता। जब तक वस्त्रों की तरह शरीर का परिवर्तन हो रहा है, तब तक शरीरों का अन्त कहाँ हुआ? मन के निरोध और निरुद्ध मन के भी विलयकाल में जीते-जी शरीर के सम्बन्धों का विच्छेद हो जाता है। यदि मरने के बाद ही यह स्थिति मिलती तो श्रीकृष्ण भी पूर्ण न होते।
यथार्थ गीता - Il 3ಠ Il अनेक जन्मों के अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।।  अभ्यास से प्राप्तिवाला योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं किजो पुरुष अन्तकाल में ज्ञानी साक्षात् अर्थात् मन के निरोध और विलयकाल में मेरा ही स्मरण करते हुए शरीर के सम्बन्ध को छोड़ अलग हो जाता है मेरा स्वरूप है। वह 'मद्भावम् - साक्षात् मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है इसमें संशय नहीं है। शरीर का निधन शुद्ध अन्तकाल नहीं मैं वह हूँ और वह है। मरने के बाद भी शरीरों का क्रम पीछे लगा रहता है। संचित संस्कारों की सतह के मिट जाने के साथ ही मन का मुझमें है। लेशमात्र भी निरोध हो जाता है। और वह मन भी जब विलीन हो जाता है तो वहीं पर अन्तकाल है, जिसके बाद शरीर धारण नहीं उसमें और करना पडता। यह क्रियात्मक हैे। केवल कहने से, मुझमें वार्त्ताक्रम से समझ में नहीं आता। जब तक वस्त्रों की तरह शरीर का परिवर्तन हो रहा है॰ तब तक शरीरों का अन्तर नहीं कहाँ हुआ ? मन के निरोध और निरुद्ध मन के भी সন विलयकाल में जीते ्जी शरीर के सम्बन्धों का विच्छेद हो जाता है। यदि मरने के बाद ही यह स्थिति मिलती तो श्रीकृष्ण  भी पूर्ण न होते। Il 3ಠ Il अनेक जन्मों के अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।।  अभ्यास से प्राप्तिवाला योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं किजो पुरुष अन्तकाल में ज्ञानी साक्षात् अर्थात् मन के निरोध और विलयकाल में मेरा ही स्मरण करते हुए शरीर के सम्बन्ध को छोड़ अलग हो जाता है मेरा स्वरूप है। वह 'मद्भावम् - साक्षात् मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है इसमें संशय नहीं है। शरीर का निधन शुद्ध अन्तकाल नहीं मैं वह हूँ और वह है। मरने के बाद भी शरीरों का क्रम पीछे लगा रहता है। संचित संस्कारों की सतह के मिट जाने के साथ ही मन का मुझमें है। लेशमात्र भी निरोध हो जाता है। और वह मन भी जब विलीन हो जाता है तो वहीं पर अन्तकाल है, जिसके बाद शरीर धारण नहीं उसमें और करना पडता। यह क्रियात्मक हैे। केवल कहने से, मुझमें वार्त्ताक्रम से समझ में नहीं आता। जब तक वस्त्रों की तरह शरीर का परिवर्तन हो रहा है॰ तब तक शरीरों का अन्तर नहीं कहाँ हुआ ? मन के निरोध और निरुद्ध मन के भी সন विलयकाल में जीते ्जी शरीर के सम्बन्धों का विच्छेद हो जाता है। यदि मरने के बाद ही यह स्थिति मिलती तो श्रीकृष्ण  भी पूर्ण न होते। - ShareChat
।। ॐ ।। अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्। अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ जब तक अक्षय भाव नहीं मिलता, तब तक नष्ट होनेवाले सम्पूर्ण क्षर भाव अधिभूत अर्थात् भूतों के अधिष्ठान हैं। वही भूतों की उत्पत्ति के कारण हैं। #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 'पुरुषः च अधिदैवतम्'- प्रकृति से परे जो परम पुरुष है, वही अधिदैव अर्थात् सम्पूर्ण देवों (दैवी सम्पद्) का अधिष्ठाता है। दैवी सम्पद् उसी परमदेव में विलीन हो जाती है। देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! इस मनुष्य-तन में मैं ही 'अधियज्ञ' हूँ अर्थात् यज्ञों का अधिष्ठाता हूँ। अतः इसी शरीर में, अव्यक्त स्वरूप में स्थित महापुरुष ही अधियज्ञ है। श्रीकृष्ण एक योगी थे। जो सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता है, अन्त में यज्ञ उसमें प्रवेश पा जाते हैं। वही परमस्वरूप मिल जाता है। इस प्रकार अर्जुन के छः प्रश्नों का समाधान हुआ। अब अन्तिम प्रश्न कि अन्तकाल में कैसे आप जानने में आते हैं, जो कभी विस्मृत नहीं होते?
🧘सदगुरु जी🙏 - अधिभूनं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्। अधियज्ञो डहमेबात्र देहे देहभृता वर। जब तक अक्षय भाव नहीं मिलना , तब तक नष्ट होनेवाले क्षर भाव अधिभूत अर्थात् भूतों सम्पूर्ण  के अधिष्ठान हैं। वही  की उत्पत्ति के कारण भूतों प्रकृति से परे जो परम हैं। पुरुषः च अधिवैवतम् - पुरुष है॰ वही अधिदैव अर्थात् सम्पूर्ण देवों (दैवी का अधिष्ठाता है। दैवी सम्पद उसी सदव में किलीन हषठगतातह हैै वैहसमरियो सेश्रेष्ठ परमदच इस मनुष्य ्तन में मैं ही ' अधियज्ञ' हूँ 3{7 अर्थात् यज्ञों का अधिष्ठाता हूँ 6 अधिभूनं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्। अधियज्ञो डहमेबात्र देहे देहभृता वर। जब तक अक्षय भाव नहीं मिलना , तब तक नष्ट होनेवाले क्षर भाव अधिभूत अर्थात् भूतों सम्पूर्ण  के अधिष्ठान हैं। वही  की उत्पत्ति के कारण भूतों प्रकृति से परे जो परम हैं। पुरुषः च अधिवैवतम् - पुरुष है॰ वही अधिदैव अर्थात् सम्पूर्ण देवों (दैवी का अधिष्ठाता है। दैवी सम्पद उसी सदव में किलीन हषठगतातह हैै वैहसमरियो सेश्रेष्ठ परमदच इस मनुष्य ्तन में मैं ही ' अधियज्ञ' हूँ 3{7 अर्थात् यज्ञों का अधिष्ठाता हूँ 6 - ShareChat
।। ॐ ।। श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्जितः ॥ 'अक्षरं ब्रह्म परमम्'- जो अक्षय है, जिसका क्षय नहीं होता, वही परम ब्रह्म है। 'स्वभावः अध्यात्मम् उच्यते' - स्वयं में स्थिर भाव ही अध्यात्म अर्थात् आत्मा का आधिपत्य है। इससे पहले सभी माया के आधिपत्य में रहते हैं; किन्तु जब 'स्व'-भाव अर्थात् स्वरूप में स्थिरभाव (स्वयं में स्थिरभाव) मिल जाता है तो आत्मा का ही आधिपत्य उसमें प्रवाहित हो जाता है। यही अध्यात्म है, अध्यात्म की पराकाष्ठा है। 'भूतभावोद्भवकरः' भूतों के वे भाव जो कुछ-न-कुछ उद्भव करते हैं अर्थात् प्राणियों के वे संकल्प जो भले अथवा बुरे संस्कारों की संरचना करते हैं उनका विसर्ग अर्थात् विसर्जन, उनका मिट जाना ही कर्म की पराकाष्ठा है। यही सम्पूर्ण कर्म है, जिसके लिये योगेश्वर ने कहा- 'वह सम्पूर्ण कर्म को जानता है।' वहाँ कर्म पूर्ण है, आगे आवश्यकता नहीं है (नियत कर्म) इस अवस्था में जबकि भूतों के वे भाव जो कुछ-न-कुछ रचते हैं, भले अथवा बुरे संस्कार-संग्रह करते हैं, बनाते हैं, वे जब सर्वथा शान्त हो जायें, यहीं कर्म की सम्पूर्णता है। इसके आगे कर्म करने की आवश् #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🧘सदगुरु जी🙏 - 5|17 हिताय मौक्षार्थ 4 आत्मने ೬ 474#7=7#` श्री श्री १००८ श्री स्वामी परमानन्दजी महाराज ( परमहंसजी ) ஜி பH अडगडानंद जी महाराज 5|17 हिताय मौक्षार्थ 4 आत्मने ೬ 474#7=7#` श्री श्री १००८ श्री स्वामी परमानन्दजी महाराज ( परमहंसजी ) ஜி பH अडगडानंद जी महाराज - ShareChat
।। ॐ ।। अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन। प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥ हे मधुसूदन ! यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह इस शरीर में कैसे है? सिद्ध है कि अधियज्ञ अर्थात् यज्ञ का अधिष्ठाता कोई ऐसा पुरुष है, जो मनुष्य शरीर के आधारवाला है। समाहित चित्तवाले पुरुषों द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं? इन सातों प्रश्नों का क्रम से निर्णय देने के लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले-"यथार्थ गीता" #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏
❤️जीवन की सीख - 130 | यज्ञ का अधिष्ठाता कोई ऐसा देहेडस्मिन्मधुसूदन।  अधियज्ञः कथ कोडत्र पुरुष है, जो मनुष्य शरीर के प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोडसि नियतात्मभिः।।  आधारवाला है। ট নঙুমুনে  यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह इस  1 शरीर में कैसे है? सिद्ध है कि अधियज्ञ अर्थात् अधिष्ठाता कोई ऐसा पुरुष है, जो मनुष्य  यज्ञ का शरीर के आधारवाला है। समाहित चित्तवाले  द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार  पुरुषों  जानने में आते है? इन सातों प्रश्नों का क्रम से निर्णय देने के लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण  बोले-" यथार्थ गीता " 130 | यज्ञ का अधिष्ठाता कोई ऐसा देहेडस्मिन्मधुसूदन।  अधियज्ञः कथ कोडत्र पुरुष है, जो मनुष्य शरीर के प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोडसि नियतात्मभिः।।  आधारवाला है। ট নঙুমুনে  यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह इस  1 शरीर में कैसे है? सिद्ध है कि अधियज्ञ अर्थात् अधिष्ठाता कोई ऐसा पुरुष है, जो मनुष्य  यज्ञ का शरीर के आधारवाला है। समाहित चित्तवाले  द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार  पुरुषों  जानने में आते है? इन सातों प्रश्नों का क्रम से निर्णय देने के लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण  बोले-" यथार्थ गीता " - ShareChat
।। ॐ ।। अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥ हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत तथा अधिदैव किसे कहा जाता है? #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🙏गीता ज्ञान🛕 - ஈ3|1 अर्जुन उवाच  किं नदबह्म किमध्यात्म किकिर्म पुरुषात्तमा षशिभूतं चःकिं प्रोक्तमधिदैच किमुच्यते। | हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म ब्या है?  है२ कर्म क्या 394444 90 अधिभूत तथा अधिदेव किसे कहा जाता है२ a ஈ3|1 अर्जुन उवाच  किं नदबह्म किमध्यात्म किकिर्म पुरुषात्तमा षशिभूतं चःकिं प्रोक्तमधिदैच किमुच्यते। | हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म ब्या है?  है२ कर्म क्या 394444 90 अधिभूत तथा अधिदेव किसे कहा जाता है२ a - ShareChat
।। ॐ ।। साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः। प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥ जो पुरुष अधिभूत, अधिदैव तथा अधियज्ञ के सहित मुझे जानते हैं, मुझमें समाहित चित्तवाले वे पुरुष अन्तकाल में भी मुझको ही जानते हैं, मुझमें ही स्थित रहते हैं और सदैव मुझे प्राप्त रहते हैं।छब्बीसवें-सत्ताइसवें श्लोक में उन्होंने कहा-मुझे कोई नहीं जानता; क्योंकि वे मोहग्रस्त हैं। किन्तु जो उस मोह से छूटने के लिये प्रयत्नशील हैं, वे (१) सम्पूर्ण ब्रह्म, (२) सम्पूर्ण अध्यात्म, (३) सम्पूर्ण कर्म, (४) सम्पूर्ण अधिभूत, (५) सम्पूर्ण अधिदैव और (६) सम्पूर्ण अधियज्ञसहित मुझको जानते हैं अर्थात् इन सबका परिणाम मैं (सद्गुरु) हूँ। वही मुझे जानता है, ऐसा नहीं कि कोई नहीं जानता। #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🙏गीता ज्ञान🛕 - 11 3 Il च ये विदुः।  साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं " प्रयाणकालेडपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसःll जो पुरुष अधिभूत अधिदैव तथा अधियज्ञ के सहित মুহ্সী আানন ট, समाहित चित्तवाले वे पुरुष मुझमें - ही जानते हैं, अन्तकाल में भी ही स्थित मुझमें  मुझको रहते हैं और सदैव मुझे प्राप्त रहते हैं। छब्बीसवें सत्ताइसवें श्लोक में उन्होंने कहा-मुझे कोई न्ही  नानताः क्योंकि वे मोहग्रस्त हैं। किन्तु जो उस  मोह से छूटने के लिये प्रयत्नशील हैं॰ वे (१ ) सम्पूर्ण ब्रह्म (२)  अध्यात्म (३) सम्पूर्ण  सम्पूर्ण  कर्म   ४) सम्पूर्ण अधिभूत, (५) सम्पूर्ण अधिदैव और अधियज्ञसहित मुझको जानते हैं अर्थात् (६) रम्पूर्ण  इन सबका परिणाम मैं ( सद्गुरु ) हूँ । वही मुझे जानता है, ऐसा नहीं कि कोई नहीं जानता।  11 3 Il च ये विदुः।  साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं " प्रयाणकालेडपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसःll जो पुरुष अधिभूत अधिदैव तथा अधियज्ञ के सहित মুহ্সী আানন ট, समाहित चित्तवाले वे पुरुष मुझमें - ही जानते हैं, अन्तकाल में भी ही स्थित मुझमें  मुझको रहते हैं और सदैव मुझे प्राप्त रहते हैं। छब्बीसवें सत्ताइसवें श्लोक में उन्होंने कहा-मुझे कोई न्ही  नानताः क्योंकि वे मोहग्रस्त हैं। किन्तु जो उस  मोह से छूटने के लिये प्रयत्नशील हैं॰ वे (१ ) सम्पूर्ण ब्रह्म (२)  अध्यात्म (३) सम्पूर्ण  सम्पूर्ण  कर्म   ४) सम्पूर्ण अधिभूत, (५) सम्पूर्ण अधिदैव और अधियज्ञसहित मुझको जानते हैं अर्थात् (६) रम्पूर्ण  इन सबका परिणाम मैं ( सद्गुरु ) हूँ । वही मुझे जानता है, ऐसा नहीं कि कोई नहीं जानता। - ShareChat
।। ॐ ।। जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥ जो मेरी शरण होकर जरा और मरण से मुक्ति पाने के लिये प्रयत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं। #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
🧘सदगुरु जी🙏 - Il3 I जरामरणमोक्षाय  मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म   चाखिलम्।। எ # எ 3R शरण   होकर मरण से पाने के लिये मुक्ति प्रयत्न करते हैं॰  ப 3 ब्रह्मको, अध्यात्म को সম্পুত और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं। और इसी क्रम में- Il3 I जरामरणमोक्षाय  मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म   चाखिलम्।। எ # எ 3R शरण   होकर मरण से पाने के लिये मुक्ति प्रयत्न करते हैं॰  ப 3 ब्रह्मको, अध्यात्म को সম্পুত और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं। और इसी क्रम में- - ShareChat
।। ॐ ।। येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥ परन्तु पुण्यकर्म (जो संसृति का अन्त करनेवाला है, जिसका नाम कार्यम् कर्म, नियत कर्म, यज्ञ की प्रक्रिया कहकर बारम्बार समझाया है, उस कर्म को) करनेवाले जिन भक्तों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषादि द्वन्द्व के मोह से भली प्रकार मुक्त होकर, व्रत में दृढ़ रहकर मुझे भजते हैं। किसलिये भजते हैं?- #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - Tda I CI ~1-1 4I ٥٢  मण्पकर्मणामा ব বন্তমীনিসুকা মতনব সা {orrl: Ii = ரக @1 Tl 4 3fn tmridlFl R fariTchi 7 कार्पम कर्म॰ निपत कर्म 1^1 Tfhn  ப7 तरारकर्मको )  कलेचाले छिन + 'Rl rmml p 1 भक्तीकफा Tlt লা #দাণি চন্ড কর মীষম মলী e Thrz tm Huhe   ar' --0 रहकर मधे भ्णते ह। किगतिवे  भजते १७  Tda I CI ~1-1 4I ٥٢  मण्पकर्मणामा ব বন্তমীনিসুকা মতনব সা {orrl: Ii = ரக @1 Tl 4 3fn tmridlFl R fariTchi 7 कार्पम कर्म॰ निपत कर्म 1^1 Tfhn  ப7 तरारकर्मको )  कलेचाले छिन + 'Rl rmml p 1 भक्तीकफा Tlt লা #দাণি চন্ড কর মীষম মলী e Thrz tm Huhe   ar' --0 रहकर मधे भ्णते ह। किगतिवे  भजते १७ - ShareChat
।। ॐ ।। इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥ भरतवंशी अर्जुन ! इच्छा और द्वेष अर्थात् राग-द्वेषादि द्वन्द्व के मोह से संसार के सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त मोह को प्राप्त हो रहे हैं इसलिये मुझे नहीं जान पाते। तो क्या कोई जानेगा ही नहीं? योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-"यथार्थ गीता" #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - || 3 || इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।। भरतवंशी अर्जुन इच्छा और द्वेष अर्थात् राग-द्वेषादि द्वन्द्व के मोह से संसार के सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त मोह को प्राप्त हो रहे हैं इसलिये मुझे नहीं जान पाते। तो क्या कोई श्रीकृष्ण  जानेगा ही नहीं ? योगेश्वर कहते हैं-"यथार्थ गीता" || 3 || इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।। भरतवंशी अर्जुन इच्छा और द्वेष अर्थात् राग-द्वेषादि द्वन्द्व के मोह से संसार के सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त मोह को प्राप्त हो रहे हैं इसलिये मुझे नहीं जान पाते। तो क्या कोई श्रीकृष्ण  जानेगा ही नहीं ? योगेश्वर कहते हैं-"यथार्थ गीता" - ShareChat
।। ॐ ।। योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।। 'विजितात्मा' - विशेष रूप से जीता हुआ है शरीर जिसका, 'जितेन्द्रियः' जीती हुई हैं इन्द्रियाँ जिसकी और 'विशुद्धात्मा'- विशेष रूप से शुद्ध है अन्तःकरण जिसका, ऐसा पुरुष 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' - सम्पूर्ण भूतप्राणियों के आत्मा के मूल उद्गम परमात्मा से एकीभाव हुआ योग से युक्त है। वह कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता। तो करता क्यों है? पीछेवालों में परमकल्याणकारी बीज का संग्रह करने के लिये। लिप्त क्यों नहीं होता? क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों का जो मूल उद्गम है, जिसका नाम परमतत्त्व है उस तत्त्व में वह स्थित हो गया। आगे कोई वस्तु नहीं जिसकी शोध करे। पीछेवाली वस्तुएँ छोटी पड़ गयीं तो भला आसक्ति किसमें करे? इसलिये वह कर्मों से आवृत्त नहीं होता। यह योगयुक्त की पराकाष्ठा का चित्रण है। पुनः योगयुक्त पुरुष की रहनी स्पष्ट करते हैं कि वह करते हुए भी उससे लिप्त क्यों नहीं होता? - #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
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