Jagdish Sharma
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Jagdish Sharma
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यथार्थगीता पढ़ें और पढ़ायें।
।। ॐ ।। योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।। 'विजितात्मा' - विशेष रूप से जीता हुआ है शरीर जिसका, 'जितेन्द्रियः' जीती हुई हैं इन्द्रियाँ जिसकी और 'विशुद्धात्मा'- विशेष रूप से शुद्ध है अन्तःकरण जिसका, ऐसा पुरुष 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' - सम्पूर्ण भूतप्राणियों के आत्मा के मूल उद्गम परमात्मा से एकीभाव हुआ योग से युक्त है। वह कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता। तो करता क्यों है? पीछेवालों में परमकल्याणकारी बीज का संग्रह करने के लिये। लिप्त क्यों नहीं होता? क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों का जो मूल उद्गम है, जिसका नाम परमतत्त्व है उस तत्त्व में वह स्थित हो गया। आगे कोई वस्तु नहीं जिसकी शोध करे। पीछेवाली वस्तुएँ छोटी पड़ गयीं तो भला आसक्ति किसमें करे? इसलिये वह कर्मों से आवृत्त नहीं होता। यह योगयुक्त की पराकाष्ठा का चित्रण है। पुनः योगयुक्त पुरुष की रहनी स्पष्ट करते हैं कि वह करते हुए भी उससे लिप्त क्यों नहीं होता? - #यथार्थ गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
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।। ॐ ।। अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः। परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥ यद्यपि जब देवताओं के नाम पर देवता नाम की कोई वस्तु है ही नहीं, जो फल मिलता है वह भी नाशवान् है, फिर भी सब लोग मेरा भजन नहीं करते; क्योंकि बुद्धिहीन पुरुष (जैसा पिछले श्लोक में आया कि कामनाओं द्वारा जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है वे) मेरे सर्वोत्तम, अविनाशी और परमप्रभाव को भली प्रकार नहीं जानते, इसलिये वे मुझ अव्यक्त पुरुष को व्यक्तिभाव को प्राप्त हुआ मानते हैं, मनुष्य मानते हैं। अर्थात् श्रीकृष्ण भी मनुष्य शरीरधारी योगी थे, योगेश्वर थे। जो स्वयं योगी हों और दूसरों को भी योग प्रदान करने की जिनमें क्षमता हो, उन्हें योगेश्वर कहते हैं। साधना के सही दौर में पड़कर क्रमशः उत्थान होते-होते महापुरुष भी उसी परमभाव में स्थित हो जाते हैं। शरीरधारी होते हुए भी वे उसी अव्यक्त स्वरूप में स्थित हो जाते हैं; फिर भी कामनाओं से विवश मन्दबुद्धि के लोग उन्हें साधारण व्यक्ति ही मानते हैं। वे सोचते हैं कि हमारी ही तरह तो यह भी पैदा हुए हैं, भगवान कैसे हो सकते हैं? उन बेचारों का दोष भी क्या है? दृष्टिपात करते हैं तो शरीर ही दिखायी पड़ता है। #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख
यथार्थ गीता - llsiinawem inill गीता ।यथार्थ 11 3 I1 अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः| परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।। यद्यपि जब देवताओं के नाम पर देवता नाम की कोई वस्तु है ही नहीं , जो फल मिलता है वह भी नाशवान् है, फिर भी सब लोग मेरा भजन नहीं करते; क्योंकि बुद्धिहीन पुरुष (जैसा पिछले श्लोक में आया कि कामनाओं द्वारा जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है वे) मेरे सर्वोत्तम, अविनाशी और परमप्रभाव को भली प्रकार वे मुझ - नहीं जानते , इसलिये पुरुष को अव्यक्त प्राप्त हुआ मानते हैं, मनुष्य मानते हैं। व्यक्तिभाव को शरीरधारी योगी थे, योगेश्वर श्रीकृष्ण " ক্ী সনুস্প  সথনি थे।जो स्वयं योगी हों और दूसरों को भी योग प्रदान करने की जिनमें क्षमता हो, उन्हें योगेश्वर कहते हैं। साधना के होते होते महापुरुष सही दौर में पड़कर क्रमशः उत्थान भी उसी परमभाव में स्थित हो जाते हैं। शरीरधारी होते हुए भी वे उसी अव्यक्त स्वरूप में स्थित हो जाते हैं; फिर भी कामनाओं से विवश मन्दबुद्धि के लोग उन्हें साधारण व्यक्ति ही मानते हैं। वे सोचते हैं कि हमारी ही तरह तो यह भी पैदा हुए हैं, भगवान कैसे हो सकते हैं? उन बेचारों का दोष भी क्या है? दृष्टिपात करते हैं तो शरीर ही दिखायी पड़ता है। वे महापुरुष के वास्तविक स्वरूप को देख क्यों नहीं पाते? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण से ही सुनें "यथार्थ far" ನಷ ।यथथ llsiinawem inill गीता ।यथार्थ 11 3 I1 अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः| परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।। यद्यपि जब देवताओं के नाम पर देवता नाम की कोई वस्तु है ही नहीं , जो फल मिलता है वह भी नाशवान् है, फिर भी सब लोग मेरा भजन नहीं करते; क्योंकि बुद्धिहीन पुरुष (जैसा पिछले श्लोक में आया कि कामनाओं द्वारा जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है वे) मेरे सर्वोत्तम, अविनाशी और परमप्रभाव को भली प्रकार वे मुझ - नहीं जानते , इसलिये पुरुष को अव्यक्त प्राप्त हुआ मानते हैं, मनुष्य मानते हैं। व्यक्तिभाव को शरीरधारी योगी थे, योगेश्वर श्रीकृष्ण " ক্ী সনুস্প  সথনি थे।जो स्वयं योगी हों और दूसरों को भी योग प्रदान करने की जिनमें क्षमता हो, उन्हें योगेश्वर कहते हैं। साधना के होते होते महापुरुष सही दौर में पड़कर क्रमशः उत्थान भी उसी परमभाव में स्थित हो जाते हैं। शरीरधारी होते हुए भी वे उसी अव्यक्त स्वरूप में स्थित हो जाते हैं; फिर भी कामनाओं से विवश मन्दबुद्धि के लोग उन्हें साधारण व्यक्ति ही मानते हैं। वे सोचते हैं कि हमारी ही तरह तो यह भी पैदा हुए हैं, भगवान कैसे हो सकते हैं? उन बेचारों का दोष भी क्या है? दृष्टिपात करते हैं तो शरीर ही दिखायी पड़ता है। वे महापुरुष के वास्तविक स्वरूप को देख क्यों नहीं पाते? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण से ही सुनें "यथार्थ far" ನಷ ।यथथ - ShareChat
।। ॐ ।। देवता' हृदय के अन्तराल में परमदेव परमात्मा के देवत्व को अर्जित करानेवाले सद्गुणों का नाम है। थी तो यह अन्दर की वस्तु; किन्तु कालान्तर में लोगों ने भीतर की वस्तु को बाहर देखना प्रारम्भ कर दिया। मूर्तियाँ गढ़ लीं, कर्मकाण्ड रच डाले और वास्तविकता से दूर खड़े हो गये। श्रीकृष्ण ने इस भ्रान्ति का निराकरण उपर्युक्त चार श्लोकों में किया। गीता में पहली बार 'अन्य देवताओं' का नाम लेते हुए उन्होंने कहा कि देवता होते ही नहीं। लोगों की श्रद्धा जहाँ झुकती है, वहाँ मैं ही खड़ा होकर उनकी श्रद्धा को पुष्ट करता हूँ और मैं ही वहाँ फल भी देता हूँ। वह फल भी नश्वर है। फल नष्ट हो जाते हैं, देवता नष्ट हो जाते हैं और देवताओं को पूजनेवाला भी नष्ट हो जाता है। जिनका विवेक नष्ट हो गया है, वे मूढ़बुद्धि ही अन्य देवताओं को पूजते हैं। श्रीकृष्ण तो यहाँ तक कहते हैं कि अन्य देवताओं को पूजने का विधान ही अयुक्तिसंगत है (आगे देखेंगे, अध्याय ९/२३)। #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख
यथार्थ गीता - 11 33 I1 अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि II अल्पबुद्धिवालों " का वह फल नाशवान् है। आज परन्तु उन है तो भोगते- भोगते नष्ट हो जायेगा इसलिये नाशवान् फल 1 पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं है। देवताओं को " अर्थात् देवता भी नाशवान् हैं। देवताओं से लेकर यावन्मात्र जगत् परिवर्तनशील और मरणधर्मा है। मेरा भक्त मुझे ही प्राप्त होता है॰ जो अव्यक्त है नैष्ठिकीं परमशान्ति' पाता है। तीन में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि इस यज्ञ द्वारा  अध्याय देवताओं अर्थात देवी सम्पद की उन्नति करो। বুসলীয: ज्यों -ज्यों दैवी सम्पद् की उन्नति होगी, बही तुम्हारी उन्नति है। क्रमशः उन्नति करते करते परमश्रेय को प्राप्त कर लो। यहाँ देवता उस दैवी सम्पद् का समूह है, जिससे परमदेव परमात्मा का देवत्व अर्जित किया जाता है। दैवी सम्पद् मोक्ष के लिये है, जिसके छब्बीस लक्षणों का निरूपण  गीता के सोलहवें अध्याय में किया गया है। 11 33 I1 अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि II अल्पबुद्धिवालों " का वह फल नाशवान् है। आज परन्तु उन है तो भोगते- भोगते नष्ट हो जायेगा इसलिये नाशवान् फल 1 पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं है। देवताओं को " अर्थात् देवता भी नाशवान् हैं। देवताओं से लेकर यावन्मात्र जगत् परिवर्तनशील और मरणधर्मा है। मेरा भक्त मुझे ही प्राप्त होता है॰ जो अव्यक्त है नैष्ठिकीं परमशान्ति' पाता है। तीन में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि इस यज्ञ द्वारा  अध्याय देवताओं अर्थात देवी सम्पद की उन्नति करो। বুসলীয: ज्यों -ज्यों दैवी सम्पद् की उन्नति होगी, बही तुम्हारी उन्नति है। क्रमशः उन्नति करते करते परमश्रेय को प्राप्त कर लो। यहाँ देवता उस दैवी सम्पद् का समूह है, जिससे परमदेव परमात्मा का देवत्व अर्जित किया जाता है। दैवी सम्पद् मोक्ष के लिये है, जिसके छब्बीस लक्षणों का निरूपण  गीता के सोलहवें अध्याय में किया गया है। - ShareChat
।। ॐ ।। स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते। लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हितान्॥ वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देव-विग्रह के पूजन में तत्पर होता है और देवता के माध्यम से मेरे ही द्वारा निर्मित उन इच्छित भोगों को निःसन्देह प्राप्त होता है। भोग कौन देता है? मैं ही देता हूँ। उसकी श्रद्धा का परिणाम है भोग, न कि किसी देवता की देन। किन्तु वह फल तो पा ही लेता है फिर इसमें बुराई क्या है? इस पर कहते हैं- #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख
यथार्थ गीता - ಣilaf inibili ಖtiumlmmiitl श्री फलहस स्वामी परमानन्वना लहारजा 132 युक्तस्तस्याराधनमीहते। nಖTe  विहितान्हितान्।। चततकामान्मयैच बह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देव विग्रह के पूजन में तत्पर होता है और देवता के माष्रनम से मेरे ही द्वारा निर्मित उन ईच्छित भोयको निःसन्देह प्राप्त होता है। है? मैं ही देता हूँ। उसकी भोग कौन श्रद्धा का " रिणाम है भोग न किकिसी किन्तु वह फल तो पा ही देवता लेता हैफिइसमें बुराईक्या है? इस पर कहते हैं ಣilaf inibili ಖtiumlmmiitl श्री फलहस स्वामी परमानन्वना लहारजा 132 युक्तस्तस्याराधनमीहते। nಖTe  विहितान्हितान्।। चततकामान्मयैच बह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देव विग्रह के पूजन में तत्पर होता है और देवता के माष्रनम से मेरे ही द्वारा निर्मित उन ईच्छित भोयको निःसन्देह प्राप्त होता है। है? मैं ही देता हूँ। उसकी भोग कौन श्रद्धा का " रिणाम है भोग न किकिसी किन्तु वह फल तो पा ही देवता लेता हैफिइसमें बुराईक्या है? इस पर कहते हैं - ShareChat
।। ॐ ।। यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धायार्चितुमिच्छति। तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥ जो-जो सकामी भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, मैं उसी देवता के प्रति उसकी श्रद्धा को स्थिर करता हूँ। मैं स्थिर करता हूँ; क्योंकि देवता नाम की कोई वस्तु होती तब तो वह देवता ही श्रद्धा को स्थिर करता। #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - 3Il यो। योर्यां यां तनुं भक्तः श्रद्मायार्चितमिच्छति। तस्यतस्याचला श्रद्धां तामेव विदथाम्यहम्।। जोजो सकामी भक्त जिस ्जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है में उसी देवता केप्रति उसकी श्रद्धा को নস্থিকেনাচুঁ स्थिरकरता क्योंकि देवता नाम की कोई वस्त होती तब तो बहदेवता ही श्रद्धा को स्थिर करता| 3Il यो। योर्यां यां तनुं भक्तः श्रद्मायार्चितमिच्छति। तस्यतस्याचला श्रद्धां तामेव विदथाम्यहम्।। जोजो सकामी भक्त जिस ्जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है में उसी देवता केप्रति उसकी श्रद्धा को নস্থিকেনাচুঁ स्थिरकरता क्योंकि देवता नाम की कोई वस्त होती तब तो बहदेवता ही श्रद्धा को स्थिर करता| - ShareChat
।। ॐ ।। कामैस्तैस्तैर्हतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥ "वह तत्त्वदर्शी महात्मा अथवा परमात्मा ही सब कुछ है।"- लोग ऐसा समझ नहीं पाते; क्योंकि भोगों की कामनाओं द्वारा लोगों के विवेक अथवा ज्ञान अपहरण कर लिया गया है, इसलिये वे अपनी प्रकृति अर्थात् जन्म-जन्मान्तरों से अर्जित संस्कारों के स्वभाव से प्रेरित होकर मुझ परमात्मा से भिन्न अन्य देवताओं और उनके लिये प्रचलित नियमों की शरण लेते हैं। यहाँ 'अन्य देवता' का प्रसंग पहली बार आया है। #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - ரL ।यथार्थ 00 "Fraeaff' ೪೨o೦' विश्वमानव महात्मा 3 अथवा = परमात्मा धर्मशास्त्र #্ী Soo सभी पढ़़ें कुछ 4 ५२००  0 81" ीललम्य S೦೦la থমননণননাদয 71717 HNDI   ரL ।यथार्थ 00 "Fraeaff' ೪೨o೦' विश्वमानव महात्मा 3 अथवा = परमात्मा धर्मशास्त्र #্ী Soo सभी पढ़़ें कुछ 4 ५२००  0 81" ीललम्य S೦೦la থমননণননাদয 71717 HNDI - ShareChat
।। ॐ ।। बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ अभ्यास करते-करते बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में, प्राप्तिवाले जन्म में साक्षात्कार को प्राप्त हुआ ज्ञानी 'सब कुछ वासुदेव ही है'- इस प्रकार मेरे को भजता है। वह महात्मा अतिदुर्लभ है। वह किसी वासुदेव की प्रतिमा नहीं गढ़वाता बल्कि अपने भीतर ही उस परमदेव का वास पाता है। उसी ज्ञानी महात्मा को श्रीकृष्ण तत्त्वदर्शी भी कहते हैं। इन्हीं महापुरुषों से बाहर समाज में कल्याण सम्भव है। इस प्रकार के प्रत्यक्ष तत्त्वदर्शी महापुरुष श्रीकृष्ण के शब्दों में अतिदुर्लभ हैं। जब श्रेय और प्रेय (मुक्ति और भोग) दोनों ही भगवान से मिलते हैं, तब तो सभी को एकमात्र भगवान का भजन करना चाहिये, फिर भी लोग उन्हें नहीं भजते। क्यों? श्रीकृष्ण के ही शब्दों में-"यथार्थ गीता" #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - --= சாச"" थी परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी महाराज --= சாச"" थी परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी महाराज - ShareChat
।। ॐ ।। उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवनुत्तमां गतिम्॥ यद्यपि ये चारों प्रकार के भक्त उदार ही हैं (कौन-सी उदारता कर दी? क्या आपके भक्ति करने से भगवान को कुछ मिल जाता है? क्या भगवान में कोई कमी है जिसे आपने पूरा कर दिया? नहीं, वस्तुतः वही उदार है जो अपनी आत्मा को अधोगति में न पहुँचाये, जो उसके उद्धार के लिये अग्रसर है। इस प्रकार यह सब उदार हैं।) परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है, ऐसी मेरी मान्यता है; क्योंकि वह स्थिरबुद्धि ज्ञानी भक्त सर्वोत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही स्थित है। अर्थात् वह मैं हूँ, वह मुझमें है। मुझमें और उसमें कोई अन्तर नहीं है। इसी पर पुनः बल देते हैं-"यथार्थ गीता" #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज  ப13 11 उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवनुत्तमां गतिम्।।  यद्यपि ये चारों प्रकार के भक्त उदार ही हैं (कौननसी उदारता कर दी? क्या आपके भक्ति करने से भगवान को कुछ मिल जाता है? क्या भगवान में कोई कमी है जिसे आपने पूरा कर दिया? नहीं, वस्तुतः वही उदार है जो अपनी आत्मा को अधोगति में न पहुँचाये , जो उसके उद्धार के लिये अग्रसर है। इस प्रकार यह सब उदार हैंl ) परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है, ऐसी मेरी मान्यता है; क्योंकि वह स्थिरबुद्धि ज्ञानी भक्त सर्वोत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही स्थित है। अर्थात् वह मैं हूँ, वह मुझमें है। मुझमें और उसमें कोई अन्तर नहीं है। इसी पर पुनः बल देते हैं -"यथार्थ गीता" स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज  ப13 11 उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवनुत्तमां गतिम्।।  यद्यपि ये चारों प्रकार के भक्त उदार ही हैं (कौननसी उदारता कर दी? क्या आपके भक्ति करने से भगवान को कुछ मिल जाता है? क्या भगवान में कोई कमी है जिसे आपने पूरा कर दिया? नहीं, वस्तुतः वही उदार है जो अपनी आत्मा को अधोगति में न पहुँचाये , जो उसके उद्धार के लिये अग्रसर है। इस प्रकार यह सब उदार हैंl ) परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है, ऐसी मेरी मान्यता है; क्योंकि वह स्थिरबुद्धि ज्ञानी भक्त सर्वोत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही स्थित है। अर्थात् वह मैं हूँ, वह मुझमें है। मुझमें और उसमें कोई अन्तर नहीं है। इसी पर पुनः बल देते हैं -"यथार्थ गीता" - ShareChat
।। ॐ ।। तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥ अर्जुन! उनमें भी नित्य मुझमें एकीभाव में स्थित अनन्य भक्तिवाला ज्ञानी विशिष्ट है; क्योंकि साक्षात्कार के सहित जाननेवाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी भी मुझे अत्यन्त प्रिय है। वह ज्ञानी मेरा ही स्वरूप है। #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - 132 I नित्ययुक्त " तेषा ज्ञानी एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रियः।l अर्जुन! उनमें भी नित्य  एकीभाव मे मुझमें  स्थित अनन्य भक्तिवाला ज्ञानी विशिष्ट है क्योंकि साक्षात्कार के सहित जाननेवाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी  शी मुडो अत्यन्त प्रिय है। वह ज्ञानी मेरा ही 74<45/ 132 I नित्ययुक्त " तेषा ज्ञानी एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रियः।l अर्जुन! उनमें भी नित्य  एकीभाव मे मुझमें  स्थित अनन्य भक्तिवाला ज्ञानी विशिष्ट है क्योंकि साक्षात्कार के सहित जाननेवाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी  शी मुडो अत्यन्त प्रिय है। वह ज्ञानी मेरा ही 74<45/ - ShareChat
।। ॐ ।। चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थाथी ज्ञानी च भरतर्षभ॥ हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! 'सुकृतिनः' उत्तम अर्थात् नियत कर्म (जिसके परिणाम में श्रेय की प्राप्ति हो, उसको) करनेवाले 'अर्थार्थी' अर्थात् सकाम, 'आर्तः' अर्थात् दुःख से छूटने की इच्छावाले, 'जिज्ञासुः' अर्थात् प्रत्यक्ष रूप से जानने की इच्छावाले और 'ज्ञानी' अर्थात् जो प्रवेश की स्थिति में हैं- ये चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते हैं।'अर्थ' वह वस्तु है, जिससे हमारे शरीर अथवा सम्बन्धों की पूर्ति हो। इसलिये अर्थ, कामनाएँ सब कुछ पहले तो भगवान द्वारा पूर्ण होती हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही पूर्ण करता हूँ; किन्तु इतना ही वास्तविक 'अर्थ' नहीं है। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है, यही अर्थ है। सांसारिक 'अर्थ' की पूर्ति करते-करते भगवान वास्तविक अर्थ आत्मिक सम्पत्ति की ओर बढ़ा देते हैं; क्योंकि वे जानते हैं कि इतने ही से मेरा भक्त सुखी नहीं होगा इसलिये वे आत्मिक सम्पत्ति भी उसे देने लगते हैं। 'लोक लाहु परलोक निबाहू।' (रामचरितमानस, १/१९/२) - लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह ये दोनों भगवान की वस्तुएँ हैं। #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
🙏गीता ज्ञान🛕 - I39 || चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्ड्जुन।  आर्तो जिज्ञासुरर्थाथी ज्ञानी च भरतर्षभ।। हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! ' सुकृतिनः ' उत्तम अर्थात् नियत कर्म (जिसके परिणाम मे श्रेय की प्राप्ति हो॰ उसको ) करनेवाले 'अर्थार्थी' अर्थात् सकाम ' आर्तः' अर्थात् दुःख से छूटने की इच्छावाले, 'जिज्ञासुः अर्थात् प्रत्यक्ष रूप से जानने की इच्छावाले और 'ज्ञानी ' अर्थात् जो प्रवेश की स्थिति में है-ये चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते है। ' अर्थ' वह वस्तु है, जिससे हमारे शरीर अथवा सम्बन्धों की पूर्ति हो। इसलिये अर्थ, कामनाएँ सव कुछ पहले तो भगवान द्वारा पूर्ण होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही पूर्ण करता  किन्तु इतना ही सम्पह्तै ह्ीन्स्थरतसाम्दीत्ति  वास्तविक ' अर्थ' नहीं है। आत्मिक है॰ यही अर्थ है। सांसारिक ' अर्थ' की पूर्ति करते करते भगवान वास्तविक अर्थ आत्मिक सम्पत्ति की ओरबढा देते भक्त सुखी नहीं  हैः वर्योंकि वे जानते हैं कि इतने ही से मेरा होगा इसलिये वे आत्मिक सम्पत्ति भी उसे देने लगते है। ' लोक  लाहु परलोक निबाहू। ' ( रामचरितमानस , १/ १९/२ ) - लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह ये दोनों भगवान की वस्तुएँ हैं। भक्त को खाली नहीं छोड़ते। ' आर्तः' - जो दुःखी हो अपन 'जिज्ञासुः समग्रता से जानने की इच्छावाले जिज्ञासु मुझे हैं। साधना की परिपव्व अवस्था में दिग्दर्शन ( प्रत्यक्ष भ्जर की अवस्थावाले ज्ञानी भी मुझे भजते है। इस प्रकार दर्शन चार प्रकार के भक्त मुझे भजते है, जिनमें ज्ञानी श्रेष्ठ है अर्थात् ज्ञानी भी भक्त ही है। इन सबमें भी॰ I39 || चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्ड्जुन।  आर्तो जिज्ञासुरर्थाथी ज्ञानी च भरतर्षभ।। हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! ' सुकृतिनः ' उत्तम अर्थात् नियत कर्म (जिसके परिणाम मे श्रेय की प्राप्ति हो॰ उसको ) करनेवाले 'अर्थार्थी' अर्थात् सकाम ' आर्तः' अर्थात् दुःख से छूटने की इच्छावाले, 'जिज्ञासुः अर्थात् प्रत्यक्ष रूप से जानने की इच्छावाले और 'ज्ञानी ' अर्थात् जो प्रवेश की स्थिति में है-ये चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते है। ' अर्थ' वह वस्तु है, जिससे हमारे शरीर अथवा सम्बन्धों की पूर्ति हो। इसलिये अर्थ, कामनाएँ सव कुछ पहले तो भगवान द्वारा पूर्ण होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही पूर्ण करता  किन्तु इतना ही सम्पह्तै ह्ीन्स्थरतसाम्दीत्ति  वास्तविक ' अर्थ' नहीं है। आत्मिक है॰ यही अर्थ है। सांसारिक ' अर्थ' की पूर्ति करते करते भगवान वास्तविक अर्थ आत्मिक सम्पत्ति की ओरबढा देते भक्त सुखी नहीं  हैः वर्योंकि वे जानते हैं कि इतने ही से मेरा होगा इसलिये वे आत्मिक सम्पत्ति भी उसे देने लगते है। ' लोक  लाहु परलोक निबाहू। ' ( रामचरितमानस , १/ १९/२ ) - लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह ये दोनों भगवान की वस्तुएँ हैं। भक्त को खाली नहीं छोड़ते। ' आर्तः' - जो दुःखी हो अपन 'जिज्ञासुः समग्रता से जानने की इच्छावाले जिज्ञासु मुझे हैं। साधना की परिपव्व अवस्था में दिग्दर्शन ( प्रत्यक्ष भ्जर की अवस्थावाले ज्ञानी भी मुझे भजते है। इस प्रकार दर्शन चार प्रकार के भक्त मुझे भजते है, जिनमें ज्ञानी श्रेष्ठ है अर्थात् ज्ञानी भी भक्त ही है। इन सबमें भी॰ - ShareChat