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।। ॐ ।। देवता' हृदय के अन्तराल में परमदेव परमात्मा के देवत्व को अर्जित करानेवाले सद्गुणों का नाम है। थी तो यह अन्दर की वस्तु; किन्तु कालान्तर में लोगों ने भीतर की वस्तु को बाहर देखना प्रारम्भ कर दिया। मूर्तियाँ गढ़ लीं, कर्मकाण्ड रच डाले और वास्तविकता से दूर खड़े हो गये। श्रीकृष्ण ने इस भ्रान्ति का निराकरण उपर्युक्त चार श्लोकों में किया। गीता में पहली बार 'अन्य देवताओं' का नाम लेते हुए उन्होंने कहा कि देवता होते ही नहीं। लोगों की श्रद्धा जहाँ झुकती है, वहाँ मैं ही खड़ा होकर उनकी श्रद्धा को पुष्ट करता हूँ और मैं ही वहाँ फल भी देता हूँ। वह फल भी नश्वर है। फल नष्ट हो जाते हैं, देवता नष्ट हो जाते हैं और देवताओं को पूजनेवाला भी नष्ट हो जाता है। जिनका विवेक नष्ट हो गया है, वे मूढ़बुद्धि ही अन्य देवताओं को पूजते हैं। श्रीकृष्ण तो यहाँ तक कहते हैं कि अन्य देवताओं को पूजने का विधान ही अयुक्तिसंगत है (आगे देखेंगे, अध्याय ९/२३)। #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख
यथार्थ गीता - 11 33 I1 अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि II अल्पबुद्धिवालों " का वह फल नाशवान् है। आज परन्तु उन है तो भोगते- भोगते नष्ट हो जायेगा इसलिये नाशवान् फल 1 पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं है। देवताओं को " अर्थात् देवता भी नाशवान् हैं। देवताओं से लेकर यावन्मात्र जगत् परिवर्तनशील और मरणधर्मा है। मेरा भक्त मुझे ही प्राप्त होता है॰ जो अव्यक्त है नैष्ठिकीं परमशान्ति' पाता है। तीन में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि इस यज्ञ द्वारा  अध्याय देवताओं अर्थात देवी सम्पद की उन्नति करो। বুসলীয: ज्यों -ज्यों दैवी सम्पद् की उन्नति होगी, बही तुम्हारी उन्नति है। क्रमशः उन्नति करते करते परमश्रेय को प्राप्त कर लो। यहाँ देवता उस दैवी सम्पद् का समूह है, जिससे परमदेव परमात्मा का देवत्व अर्जित किया जाता है। दैवी सम्पद् मोक्ष के लिये है, जिसके छब्बीस लक्षणों का निरूपण  गीता के सोलहवें अध्याय में किया गया है। 11 33 I1 अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि II अल्पबुद्धिवालों " का वह फल नाशवान् है। आज परन्तु उन है तो भोगते- भोगते नष्ट हो जायेगा इसलिये नाशवान् फल 1 पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं है। देवताओं को " अर्थात् देवता भी नाशवान् हैं। देवताओं से लेकर यावन्मात्र जगत् परिवर्तनशील और मरणधर्मा है। मेरा भक्त मुझे ही प्राप्त होता है॰ जो अव्यक्त है नैष्ठिकीं परमशान्ति' पाता है। तीन में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि इस यज्ञ द्वारा  अध्याय देवताओं अर्थात देवी सम्पद की उन्नति करो। বুসলীয: ज्यों -ज्यों दैवी सम्पद् की उन्नति होगी, बही तुम्हारी उन्नति है। क्रमशः उन्नति करते करते परमश्रेय को प्राप्त कर लो। यहाँ देवता उस दैवी सम्पद् का समूह है, जिससे परमदेव परमात्मा का देवत्व अर्जित किया जाता है। दैवी सम्पद् मोक्ष के लिये है, जिसके छब्बीस लक्षणों का निरूपण  गीता के सोलहवें अध्याय में किया गया है। - ShareChat