प्रभु श्री राम के चरण बड़े जोर से सागर ने पकड़ लिए और भयभीत स्वर में कहा कि हे परमपिता मेरे से जन्म जन्म में जो भी जाने अनजाने में अपराध हुए हों उन्हें आप दया पूर्वक क्षमा करें ,मैं आपकी शरणागति में हूँ, हे प्रभु आपकी ही रचना है कि आकाश, वायु, अग्नि, जल व भूमी का स्वभाव व बुद्धि स्थिर व जड़ होती है, ये अपना पराया नही देखते, आपने ही अपनी मर्जी से हम पांचों को यह आज्ञा, ऐसा जड़ स्वभाव प्रदान कर रखा है।
।। राम राम ।।
##सुंदरकांड पाठ चौपाई📙🚩
![#सुंदरकांड पाठ चौपाई📙🚩 - सिंधु गहि पद प्रभु केरे। सभय छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।। ] गगन समीर अनल जल धरनी | इन्ह कइ नाथ सहज जड.करनी | I१ | ] भयभीत होकर प्रभु के चरण पकडक़र कहा- समुद्र हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिए। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी - इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है। ।५९ -१।। सदरकाण्द सिंधु गहि पद प्रभु केरे। सभय छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।। ] गगन समीर अनल जल धरनी | इन्ह कइ नाथ सहज जड.करनी | I१ | ] भयभीत होकर प्रभु के चरण पकडक़र कहा- समुद्र हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिए। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी - इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है। ।५९ -१।। सदरकाण्द - ShareChat #सुंदरकांड पाठ चौपाई📙🚩 - सिंधु गहि पद प्रभु केरे। सभय छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।। ] गगन समीर अनल जल धरनी | इन्ह कइ नाथ सहज जड.करनी | I१ | ] भयभीत होकर प्रभु के चरण पकडक़र कहा- समुद्र हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिए। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी - इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है। ।५९ -१।। सदरकाण्द सिंधु गहि पद प्रभु केरे। सभय छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।। ] गगन समीर अनल जल धरनी | इन्ह कइ नाथ सहज जड.करनी | I१ | ] भयभीत होकर प्रभु के चरण पकडक़र कहा- समुद्र हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिए। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी - इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है। ।५९ -१।। सदरकाण्द - ShareChat](https://cdn4.sharechat.com/bd5223f_s1w/compressed_gm_40_img_746592_3798cefd_1766551745147_sc.jpg?tenant=sc&referrer=pwa-sharechat-service&f=147_sc.jpg)

