#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣4️⃣4️⃣
श्रीमहाभारतम्
〰️〰️🌼〰️〰️
।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः
दुःशला के जन्म की कथा...(दिन 344)
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
जनमेजय उवाच
धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामादितः कथितं त्वया । ऋषेः प्रसादात् तु शतं न च कन्या प्रकीर्तिता ।। १ ।।
जनमेजय ने पूछा- ब्रह्मन् ! महर्षि व्यास के प्रसाद से धृतराष्ट्र के सौ पुत्र हुए, यह बात आपने मुझे पहले ही बता दी थी। परंतु उस समय यह नहीं कहा था कि उन्हें एक कन्या भी हुई ।। १ ।।
वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च कन्या चैका शताधिका । गान्धारराजदुहिता शतपुत्रेति चानघ ।। २ ।।
उक्ता महर्षिणा तेन व्यासेनामिततेजसा । कथं त्विदानीं भगवन् कन्यां त्वं तु ब्रवीषि मे ।। ३ ।।
अनघ ! इस समय आपने वैश्यापुत्र युयुत्सु तथा सौ पुत्रोंके अतिरिक्त एक कन्याकी भी चर्चा की है। अमिततेजस्वी महर्षि व्यासने गान्धारराजकुमारीको सौ पुत्र होनेका ही वरदान दिया था। भगवन्! फिर आप मुझसे यह कैसे कहते हैं कि एक कन्या भी हुई ।। २-३ ।।
यदि भागशतं पेशी कृता तेन महर्षिणा । न प्रजास्यति चेद् भूयः सौबलेयी कथंचन ।। ४ ।।
कथं तु सम्भवस्तस्या दुःशलाया वदस्व मे । यथावदिह विप्रर्षे परं मेऽत्र कुतूहलम् ।। ५ ।।
यदि महर्षिने उक्त मांसपिण्डके सौ भाग किये और यदि सुबलपुत्री गान्धारीने किसी प्रकार फिर गर्भ धारण या प्रसव नहीं किया, तो उस दुःशला नामवाली कन्याका जन्म किस प्रकार हुआ? ब्रह्मर्षे! यह सब यथार्थरूपसे मुझे बताइये। मुझे इस विषयमें कौतूहल हो रहा है ।। ४-५ ।।
वैशम्पायन उवाच
साध्वयं प्रश्न उद्दिष्टः पाण्डवेय ब्रवीमि ते । तां मांसपेशीं भगवान् स्वयमेव महातपाः ।। ६ ।।
शीताभिरद्भिरासिच्य भागं भागमकल्पयत् । यो यथा कल्पितो भागस्तं तं धात्र्या तथा नृप ।। ७ ।।
घृतपूर्णेषु कुण्डेषु एकैकं प्राक्षिपत् तदा । एतस्मिन्नन्तरे साध्वी गान्धारी सुदृढव्रता ।। ८ ।।
दुहितुः स्नेहसंयोगमनुध्याय वराङ्गना । मनसाचिन्तयद् देवी एतत् पुत्रशतं मम ।। ९ ।।
भविष्यति न संदेहो न ब्रवीत्यन्यथा मुनिः । ममेयं परमा तुष्टिर्दुहिता मे भवेद् यदि ।। १० ।।
वैशम्पायनजीने कहा- पाण्डवनन्दन ! तुमने यह बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है। मैं तुम्हें इसका उत्तर देता हूँ। महातपस्वी भगवान् व्यासने स्वयं ही उस मांसपिण्डको शीतल जलसे सींचकर उसके सौ भाग किये। राजन् ! उस समय जो भाग जैसा बना, उसे धायद्वारा वे एक-एक करके घीसे भरे हुए कुण्डोंमें डलवाते गये। इसी बीचमें पूर्ण दृढ़तासे सतीव्रतका पालन करनेवाली साध्वी एवं सुन्दरी गान्धारी कन्याके स्नेह-सम्बन्धका विचार करके मन-ही-मन सोचने लगी- इसमें संदेह नहीं कि इस मांसपिण्डसे मेरे सौ पुत्र उत्पन्न होंगे; क्योंकि व्यासमुनि कभी झूठ नहीं बोलते; परंतु मुझे अधिक संतोष तो तब होता, यदि एक पुत्री भी हो जाती ।। ६-१० ।।
एका शताधिका बाला भविष्यति कनीयसी । ततो दौहित्रजाल्लोकादबाह्योऽसौ पतिर्मम ।। ११ ।।
यदि सौ पुत्रों के अतिरिक्त एक छोटी कन्या हो जायगी तो मेरे ये पति दौहित्रके पुण्यसे प्राप्त होनेवाले उत्तम लोकोंसे भी वंचित नहीं रहेंगे ।। ११ ।।
अधिका किल नारीणां प्रीतिर्जामातृजा भवेत् । यदि नाम ममापि स्याद् दुहितैका शताधिका ।। १२ ।।
कृतकृत्या भवेयं वै पुत्रदौहित्रसंवृता । यदि सत्यं तपस्तप्तं दत्तं वाप्यथवा हुतम् ।। १३ ।।
गुरवस्तोषिता वापि तथास्तु दुहिता मम । एतस्मिन्नेव काले तु कृष्णद्वैपायनः स्वयम् ।। १४ ।।
व्यभजत् स तदा पेशीं भगवानृषिसत्तमः । गणयित्वा शतं पूर्णमंशानामाह सौबलीम् ।। १५ ।।
कहते हैं, स्त्रियोंका दामादमें पुत्रसे भी अधिक स्नेह होता है। यदि मुझे भी सौ पुत्रोंके अतिरिक्त एक पुत्री प्राप्त हो जाय तो मैं पुत्र और दौहित्र दोनोंसे घिरी रहकर कृतकृत्य हो जाऊँ। यदि मैंने सचमुच तप, दान अथवा होम किया हो तथा गुरुजनोंको सेवाद्वारा प्रसन्न कर लिया हो, तो मुझे पुत्री अवश्य प्राप्त हो। इसी बीचमें मुनिश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासने स्वयं ही उस मांसपिण्डके विभाग कर दिये और पूरे सौ अंशों की गणना करके गान्धारी से कहा ।। १२-१५ ।।
व्यास उवाच
पूर्ण पुत्रशतं त्वेतन्न मिथ्या वागुदाहृता ।
दौहित्रयोगाय भाग एकः शिष्टः शतात् परः । एषा ते सुभगा कन्या भविष्यति यथेप्सिता ।। १६ ।।
व्यासजी बोले-गान्धारी! मैंने झूठी बात नहीं कही थी; ये पूरे सौ पुत्र हैं। सौके अतिरिक्त एक भाग और बचा है, जिससे दौहित्रका योग होगा। इस अंशसे तुम्हें अपने मनके अनुरूप एक सौभाग्यशालिनी कन्या प्राप्त होगी ।। १६ ।।
ततोऽन्यं घृतकुम्भं च समानाय्य महातपाः । तं चापि प्राक्षिपत् तत्र कन्याभागं तपोधनः ।। १७ ।।
एतत् ते कथितं राजन् दुःशलाजन्म भारत । ब्रूहि राजेन्द्र किं भूयो वर्तयिष्यामि तेऽनघ ।। १८ ।।
यों कहकर महातपस्वी व्यासजीने घीसे भरा हुआ एक और घड़ा मँगाया और उन तपोधन मुनिने उस कन्याभागको उसीमें डाल दिया। भरतवंशी नरेश! इस प्रकार मैंने तुम्हें दुःशलाके जन्मका प्रसंग सुना दिया। अनघ ! बोलो, अब पुनः और क्या कहूँ ।। १७-१८ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि दुःशलोत्पत्तौ पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें दुःशलाकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११५ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️


