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।। ॐ ।। पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्या। यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥ पार्थ! जिस परमात्मा के अन्तर्गत सम्पूर्ण भूत हैं, जिससे सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, सनातन अव्यक्त भाववाला वह परमपुरुष अनन्य भक्ति से प्राप्त होने योग्य है। अनन्य भक्ति का तात्पर्य है कि परमात्मा के सिवाय अन्य किसी का स्मरण न करते हुए उनसे जुड़ जाय। अनन्य भाव से लगनेवाले पुरुष भी कब तक पुनर्जन्म की सीमा में हैं और कब वे पुनर्जन्म का अतिक्रमण कर जाते हैं? इस पर योगेश्वर कहते हैं- #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - अनन्य भक्ति |/ 35 |/ परमात्मा के सिवाय पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्या। अन्य किसी का येन सर्वमिदं ततम् Il यस्यान्तःस्थानि भूतानि स्मरण न करते हुए पार्थ! जिस परमात्मा के अन्तर्गत सम्पूर्ण भूत हैं, उनसे जुड़ जाय। जिससे जगत् व्याप्त है, सनातन अव्यक्त সম্পুত भाववाला वह परमपुरुष अनन्य भक्ति से प्राप्त होने योग्य है। अनन्य भक्ति का तात्पर्य है कि परमात्मा के सिवाय अन्य किसी का स्मरण न करते हुए उनसे जुड़ जाय। अनन्य भाव से लगनेवाले पुरुष भी कब तक की सीमा पुनर्जन्म में हैं और कब वे पुनर्जन्म का अतिक्रमण कर जाते हैं? इस पर योगेश्वर कहते हैं- பவளிரை अनन्य भक्ति |/ 35 |/ परमात्मा के सिवाय पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्या। अन्य किसी का येन सर्वमिदं ततम् Il यस्यान्तःस्थानि भूतानि स्मरण न करते हुए पार्थ! जिस परमात्मा के अन्तर्गत सम्पूर्ण भूत हैं, उनसे जुड़ जाय। जिससे जगत् व्याप्त है, सनातन अव्यक्त সম্পুত भाववाला वह परमपुरुष अनन्य भक्ति से प्राप्त होने योग्य है। अनन्य भक्ति का तात्पर्य है कि परमात्मा के सिवाय अन्य किसी का स्मरण न करते हुए उनसे जुड़ जाय। अनन्य भाव से लगनेवाले पुरुष भी कब तक की सीमा पुनर्जन्म में हैं और कब वे पुनर्जन्म का अतिक्रमण कर जाते हैं? इस पर योगेश्वर कहते हैं- பவளிரை - ShareChat