#महाभारत
श्रीमहाभारतकथा-2️⃣9️⃣9️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
सप्तनवतितमोऽध्यायः
राजा प्रतीप का गंगा को पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करना और शान्तनु का जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगा से मिलना...(दिन 299)
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वैशम्पायन उवाच
ततः प्रतीपो राजाऽऽसीत् सर्वभूतहितः सदा । निषसाद समा बह्वीर्गङ्गाद्वारगतो जपन् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- तदनन्तर इस पृथ्वीपर राजा प्रतीप राज्य करने लगे। वे सदा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहते थे। एक समय महाराज प्रतीप गंगाद्वार (हरिद्वार) में गये और बहुत वर्षोंतक जप करते हुए एक आसनपर बैठे रहे ।। १ ।।
तस्य रूपगुणोपेता गङ्गा स्त्रीरूपधारिणी। उत्तीर्य सलिलात् तस्माल्लोभनीयतमाकृतिः ।। २ ।।
अधीयानस्य राजर्षेर्दिव्यरूपा मनस्विनी । दक्षिणं शालसंकाशमूरुं भेजे शुभानना ।। ३ ।।
उस समय मनस्विनी गंगा सुन्दर रूप और उत्तम गुणोंसे युक्त युवती स्त्रीका रूप धारण करके जलसे निकलीं और स्वाध्यायमें लगे हुए राजर्षि प्रतीपके शाल-जैसे विशाल दाहिने ऊरु (जाँघ) पर जा बैठीं। उस समय उनकी आकृति बड़ी लुभावनी थी; रूप देवांगनाओंके समान था और मुख अत्यन्त मनोहर था ।। २-३ ।।
प्रतीपस्तु महीपालस्तामुवाच यशस्विनीम् । करोमि किं ते कल्याणि प्रियं यत् तेऽभिकाङ्क्षितम् ।। ४ ।।
अपनी जाँघपर बैठी हुई उस यशस्विनी नारीसे राजा प्रतीपने पूछा- 'कल्याणि! मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? तुम्हारी क्या इच्छा है?' ।। ४ ।।
रूयुवाच
त्वामहं कामये राजन् भजमानां भजस्व माम् । त्यागः कामवतीनां हि स्त्रीणां सद्भिर्विगर्हितः ।। ५ ।।
स्त्री बोली- राजन् ! मैं आपको ही चाहती हूँ। आपके प्रति मेरा अनुराग है, अतः आप मुझे स्वीकार करें; क्योंकि कामके अधीन होकर अपने पास आयी हुई स्त्रियोंका परित्याग साधु पुरुषोंने निन्दित माना है ।। ५ ।।
प्रतीप उवाच
नाहं परस्त्रियं कामाद् गच्छेयं वरवर्णिनि ।
न चासवर्णा कल्याणि धर्म्यमेतद्धि मे व्रतम् ।। ६ ।।
प्रतीपने कहा- सुन्दरी! मैं कामवश परायी स्त्रीके साथ समागम नहीं कर सकता। जो अपने वर्णकी न हो, उससे भी मैं सम्बन्ध नहीं रख सकता। कल्याणि ! यह मेरा धर्मानुकूल व्रत है ।। ६ ।।
रूयुवाच
नाश्रेयस्यस्मि नागम्या न वक्तव्या च कर्हिचित् ।
भजन्तीं भज मां राजन् दिव्यां कन्यां वरस्त्रियम् ।। ७ ।।
स्त्री बोली- राजन् ! मैं अशुभ या अमंगल करनेवाली नहीं हूँ, समागमके अयोग्य भी नहीं हूँ और ऐसी भी नहीं हूँ कि कभी कोई मुझपर कलंक लगावे। मैं आपके प्रति अनुरक्त होकर आयी हुई दिव्य कन्या एवं सुन्दरी स्त्री हूँ। अतः आप मुझे स्वीकार करें ।। ७ ।।
प्रतीप उवाच
त्वया निवृत्तमेतत् तु यन्मां चोदयसि प्रियम् ।
अन्यथा प्रतिपन्नं मां नाशयेद् धर्मविप्लवः ।। ८ ।।
प्रतीपने कहा-सुन्दरी! तुम जिस प्रिय मनोरथकी पूर्तिके लिये मुझे प्रेरित कर रही हो, उसका निराकरण भी तुम्हारे द्वारा ही हो गया। यदि मैं धर्मके विपरीत तुम्हारा यह प्रस्ताव स्वीकार कर लूँ तो धर्मका यह विनाश मेरा भी नाश कर डालेगा ।। ८ ।।
प्राप्य दक्षिणमूरुं मे त्वमाश्लिष्टा वराङ्गने ।
अपत्यानां स्नुषाणां च भीरु विद्धयेतदासनम् ।। ९ ।।
वरांगने ! तुम मेरी दाहिनी जाँघपर आकर बैठी हो। भीरु ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि यह पुत्र, पुत्री तथा पुत्रवधूका आसन है ।। ९ ।।
सव्योरुः कामिनीभोग्यस्त्वया स च विवर्जितः ।
तस्मादहं नाचरिष्ये त्वयि कामं वराङ्गने ।। १० ।।
पुरुषकी बायीं जाँघ ही कामिनीके उपभोगके योग्य है; किंतु तुमने उसका त्याग कर दिया है। अतः वरांगने ! मैं तुम्हारे प्रति कामयुक्त आचरण नहीं करूँगा ।। १० ।।
स्नुषा मे भव सुश्रोणि पुत्रार्थ त्वां वृणोम्यहम् ।
स्नुषापक्षं हि वामोरु त्वमागम्य समाश्रिता ।। ११ ।।
सुश्रोणि! तुम मेरी पुत्रवधू हो जाओ। मैं अपने पुत्रके लिये तुम्हारा वरण करता हूँ, क्योंकि वामोरु ! तुमने यहाँ आकर मेरी उसी जाँघका आश्रय लिया है, जो पुत्रवधूके पक्षकी है ।। ११ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
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