#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣2️⃣1️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
त्र्यधिकशततमोऽध्यायः
सत्यवती का भीष्म से राज्य ग्रहण और संतानोत्पादन के लिये आग्रह तथा भीष्म के द्वारा अपनी प्रतिज्ञा बतलाते हुए उसकी अस्वीकृति...(दिन 321)
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वैशम्पायन उवाच
ततः सत्यवती दीना कृपणा पुत्रगृद्धिनी । पुत्रस्य कृत्वा कार्याणि स्नुषाभ्यां सह भारत ।। १ ।।
समाश्वास्य स्नुषे ते च भीष्मं शस्त्रभृतां वरम् । धर्म च पितृवंशं च मातृवंशं च भाविनी । प्रसमीक्ष्य महाभागा गाङ्गेयं वाक्यमब्रवीत् ।। २ ।।
शान्तनोर्धर्मनित्यस्य कौरव्यस्य यशस्विनः । त्वयि पिण्डश्च कीर्तिश्च संतानं च प्रतिष्ठितम् ।। ३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर पुत्रकी इच्छा रखनेवाली सत्यवती अपने पुत्रके वियोगसे अत्यन्त दीन और कृपण हो गयी। उसने पुत्रवधुओंके साथ पुत्रके प्रेतकार्य करके अपनी दोनों बहुओं तथा शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्मजीको धीरज बँधाया। फिर उस महाभागा मंगलमयी देवीने धर्म, पितृकुल तथा मातृकुलकी ओर देखकर गंगानन्दन भीष्मसे कहा- 'बेटा! सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले परम यशस्वी कुरुनन्दन महाराज शान्तनुके पिण्ड, कीर्ति और वंश ये सब अब तुम्हींपर अवलम्बित हैं ।। १-३ ।।
यथा कर्म शुभं कृत्वा स्वर्गोपगमनं ध्रुवम् । यथा चायुध्रुवं सत्ये त्वयि धर्मस्तथा ध्रुवः ।। ४ ।।
'जैसे शुभ कर्म करके स्वर्गलोकमें जाना निश्चित है, जैसे सत्य बोलनेसे आयुका बढ़ना अवश्यम्भावी है, वैसे ही तुममें धर्मका होना भी निश्चित है ।। ४ ।।
वेत्थ धर्मांश्च धर्मज्ञ समासेनेतरेण च । विविधास्त्वं श्रुतीर्वेत्थ वेदाङ्गानि च सर्वशः ।। ५ ।।
'धर्मज्ञ ! तुम सब धर्मोको संक्षेप और विस्तारसे जानते हो। नाना प्रकारकी श्रुतियों और समस्त वेदांगोंका भी तुम्हें पूर्ण ज्ञान है ।। ५ ।।
व्यवस्थानं च ते धर्मे कुलाचारं च लक्षये ।
प्रतिपत्तिं च कृच्छ्रेषु शुक्राङ्गिरसयोरिव ।। ६ ।।
'मैं तुम्हारी धर्मनिष्ठा और कुलोचित सदाचारको भी देखती हूँ। संकटके समय शुक्राचार्य और बृहस्पतिकी भाँति तुम्हारी बुद्धि उपयुक्त कर्तव्यका निर्णय करनेमें समर्थ है ।। ६ ।।
तस्मात् सुभृशमाश्वस्य त्वयि धर्मभृतां वर । कार्ये त्वां विनियोक्ष्यामि तच्छ्रुत्वा कर्तुमर्हसि ।। ७ ।।
'अतः धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भीष्म ! तुमपर अत्यन्त विश्वास रखकर ही मैं तुम्हें एक आवश्यक कार्यमें लगाना चाहती हूँ। तुम पहले उसे सुन लो; फिर उसका पालन करनेकी चेष्टा करो ।। ७ ।।
मम पुत्रस्तव भ्राता वीर्यवान् सुप्रियश्च ते । बाल एव गतः स्वर्गमपुत्रः पुरुषर्षभ ।। ८ ।।
इमे महिष्यौ भ्रातुस्ते काशिराजसुते शुभे । रूपयौवनसम्पन्ने पुत्रकामे च भारत ।। ९ ।।
तयोरुत्पादयापत्यं संतानाय कुलस्य नः । मन्नियोगान्महाबाहो धर्म कर्तुमिहार्हसि ।। १० ।।
'मेरा पुत्र और तुम्हारा भाई विचित्रवीर्य जो पराक्रमी होनेके साथ ही तुम्हें अत्यन्त प्रिय था, छोटी अवस्थामें ही स्वर्गवासी हो गया। नरश्रेष्ठ ! उसके कोई पुत्र नहीं हुआ था। तुम्हारे भाईकी ये दोनों सुन्दरी रानियाँ, जो काशिराजकी कन्याएँ हैं, मनोहर रूप और युवावस्थासे सम्पन्न हैं। इनके हृदयमें पुत्र पानेकी अभिलाषा है। भारत ! तुम हमारे कुलकी संतानपरम्पराको सुरक्षित रखनेके लिये स्वयं ही इन दोनोंके गर्भसे पुत्र उत्पन्न करो। महाबाहो ! मेरी आज्ञासे यह धर्मकार्य तुम अवश्य करो ।। ८-१० ।।
राज्ये चैवाभिषिच्यस्व भारताननुशाधि च ।
दारांश्च कुरु धर्मेण मा निमज्जीः पितामहान् ।। ११ ।।
'राज्यपर अपना अभिषेक करो और भारतीय प्रजाका पालन करते रहो। धर्मके अनुसार विवाह कर लो; पितरोंको नरकमें न गिरने दो' ।। ११ ।।
वैशम्पायन उवाच
तथोच्यमानो मात्रा स सुहृद्भिश्च परंतपः । इत्युवाचाथ धर्मात्मा धर्म्यमेवोत्तरं वचः ।। १२ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! माता और सुहृदोंके ऐसा कहनेपर शत्रुदमन धर्मात्मा भीष्मने यह धर्मानुकूल उत्तर दिया ।। १२ ।।
असंशयं परो धर्मस्त्वया मातरुदाहृतः । राज्यार्थे नाभिषिञ्चेयं नोपेयां जातु मैथुनम् । त्वमपत्यं प्रति च मे प्रतिज्ञां वेत्थ वै पराम् ।। १३ ।।
जानासि च यथावृत्तं शुल्कहेतोस्त्वदन्तरे । स सत्यवति सत्यं ते प्रतिजानाम्यहं पुनः ।। १४ ।।
'माता! तुमने जो कुछ कहा है, वह धर्मयुक्त है, इसमें संशय नहीं; परंतु मैं राज्यके लोभसे न तो अपना अभिषेक कराऊँगा और न स्त्रीसहवास ही करूँगा। संतानोत्पादन और राज्य ग्रहण न करनेके विषयमें जो मेरी कठोर प्रतिज्ञा है, उसे तो तुम जानती ही हो। सत्यवती ! तुम्हारे लिये शुल्क देनेके हेतु जो-जो बातें हुई थीं, वे सब तुम्हें ज्ञात हैं। उन प्रतिज्ञाओंको पुनः सच्ची करनेके लिये मैं अपना दृढ़ निश्चय बताता हूँ ।। १३-१४ ।।
परित्यजेयं त्रैलोक्यं राज्यं देवेषु वा पुनः । यद् वाप्यधिकमेताभ्यां न तु सत्यं कथंचन ।। १५ ।।
'मैं तीनों लोकोंका राज्य, देवताओंका साम्राज्य अथवा इन दोनोंसे भी अधिक महत्त्वकी वस्तुको भी एकदम त्याग सकता हूँ, परंतु सत्यको किसी प्रकार नहीं छोड़ सकता ।। १५ ।।
त्यजेच्च पृथ्वी गन्धमापश्च रसमात्मनः ।
ज्योतिस्तथा त्यजेद् रूपं वायुः स्पर्शगुणं त्यजेत् ।। १६ ।।
'पृथ्वी अपनी गंध छोड़ दे, जल अपने रसका परित्याग कर दे, तेज रूपका और वायु स्पर्श नामक स्वाभाविक गुणका त्याग कर दे ।। १६ ।।
प्रभां समुत्सृजेदों धूमकेतुस्तथोष्मताम् । त्यजेच्छब्दं तथाऽऽकाशं सोमः शीतांशुतां त्यजेत् ।। १७ ।।
'सूर्य प्रभा और अग्नि अपनी उष्णताको छोड़ दे, आकाश शब्दका और चन्द्रमा अपनी शीतलताका परित्याग कर दे ।। १७ ।।
विक्रमं वृत्रहा जह्याद् धर्म जह्याच्च धर्मराट् ।
न त्वहं सत्यमुत्स्रष्टुं व्यवसेयं कथंचन ।। १८ ।।
'इन्द्र पराक्रमको छोड़ दें और धर्मराज धर्मकी उपेक्षा कर दें; परंतु मैं किसी प्रकार सत्यको छोडनेका विचार भी नहीं कर सकता ।। १८ ।।
(तन्न जात्वन्यथा कुर्या लोकानामपि संक्षये । अमरत्वस्य वा हेतोस्त्रैलोक्यसदनस्य वा ।। एवमुक्ता तु पुत्रेण भूरिद्रविणतेजसा ।) माता सत्यवती भीष्ममुवाच तदनन्तरम् ।। १९ ।।
जानामि ते स्थितिं सत्ये परां सत्यपराक्रम । इच्छन् सृजेथास्त्रींल्लोकानन्यांस्त्वं स्वेन तेजसा ।। २० ।।
जानामि चैवं सत्यं तन्मदर्थे यच्च भाषितम् । आपद्धर्म त्वमावेक्ष्य वह पैतामहीं धुरम् ।। २१ ।।
'सारे संसारका नाश हो जाय, मुझे अमरत्व मिलता हो या त्रिलोकीका राज्य प्राप्त हो, तो भी मैं अपने किये हुए प्रणको नहीं तोड़ सकता।' महान् तेजोरूप धनसे सम्पन्न अपने पुत्र भीष्मके ऐसा कहनेपर माता सत्यवती इस प्रकार बोली- 'बेटा! तुम सत्यपराक्रमी हो। मैं जानती हूँ, सत्यमें तुम्हारी दृढ़ निष्ठा है। तुम चाहो तो अपने ही तेजसे नयी त्रिलोकीकी रचना कर सकते हो। मैं उस सत्यको भी नहीं भूल सकी हूँ, जिसकी तुमने मेरे लिये घोषणा की थी। फिर भी मेरा आग्रह है कि तुम आपद्धर्मका विचार करके बाप-दादोंके दिये हुए इस राज्यभारको वहन करो ।। १९-२१ ।।
यथा ते कुलतन्तुश्च धर्मश्च न पराभवेत् । सुहृदश्च प्रहृष्येरंस्तथा कुरु परंतप ।। २२ ।।
'परंतप ! जिस उपायसे तुम्हारे वंशकी परम्परा नष्ट न हो, धर्मकी भी अवहेलना न होने पावे और प्रेमी सुहृद् भी संतुष्ट हो जायें, वही करो' ।। २२ ।।
लालप्यमानां तामेवं कृपणां पुत्रगृद्धिनीम् । धर्मादपेतं ब्रुवतीं भीष्मो भूयोऽब्रवीदिदम् ।। २३ ।।
पुत्रकी कामनासे दीन वचन बोलनेवाली और मुखसे धर्मरहित बात कहनेवाली सत्यवतीसे भीष्मने फिर यह बात कही- ।। २३ ।।
राज्ञि धर्मानवेक्षस्व मा नः सर्वान् व्यनीनशः । सत्याच्च्युतिः क्षत्रियस्य न धर्मेषु प्रशस्यते ।। २४ ।।
'राजमाता! धर्मकी ओर दृष्टि डालो, हम सबका नाश न करो। क्षत्रियका सत्यसे विचलित होना किसी भी धर्ममें अच्छा नहीं माना गया है ।। २४ ।।
शान्तनोरपि संतानं यथा स्यादक्षयं भुवि ।
तत् ते धर्मं प्रवक्ष्यामि क्षात्रं राज्ञि सनातनम् ।। २५ ।।
'राजमाता! महाराज शान्तनुकी संतानपरम्परा भी जिस उपायसे इस भूतलपर अक्षय बनी रहे, वह धर्मयुक्त उपाय मैं तुम्हें बतलाऊँगा। वह सनातन क्षत्रियधर्म है ।। २५ ।।
श्रुत्वा तं प्रतिपद्यस्व प्राज्ञैः सह पुरोहितैः ।
आपद्धर्मार्थकुशलैर्लोकतन्त्रमवेक्ष्य च ।। २६ ।।
उसे आपद्धर्मके निर्णयमें कुशल विद्वान् पुरोहितोंसे सुनकर और लोकतन्त्रकी ओर भी देखकर निश्चय करो ।। २६ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीष्मसत्यवतीसंवादे त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १०३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीष्म-सत्यवती-संवादविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०३ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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