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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣4️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः पाण्डु का अनुताप, संन्यास लेने का निश्चय तथा पत्नियों के अनुरोध से वानप्रस्थ-आश्रम में प्रवेश...(दिन 349) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच तं व्यतीतमतिक्रम्य राजा स्वमिव बान्धवम् । सभार्यः शोकदुःखार्तः पर्यदेवयदातुरः ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! उन मृगरूपधारी मुनिको मरा हुआ छोड़कर राजा पाण्डु जब आगे बढ़े, तब पत्नीसहित शोक और दुःखसे आतुर हो अपने सगे भाई-बन्धुकी भाँति उनके लिये विलाप करने लगे तथा अपनी भूलपर पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे ।। १ ।। पाण्डुरुवाच सतामपि कुले जाताः कर्मणा बत दुर्गतिम् । प्राप्नुवन्त्यकृतात्मानः कामजालविमोहिताः ।। २ ।। पाण्डु बोले-खेदकी बात है कि श्रेष्ठ पुरुषोंके उत्तम कुलमें उत्पन्न मनुष्य भी अपने अन्तःकरणपर वश न होनेके कारण कामके फंदेमें फँसकर विवेक खो बैठते हैं और अनुचित कर्म करके उसके द्वारा भारी दुर्गतिमें पड़ जाते हैं ।। २ ।। शश्वद्धर्मात्मना जातो बाल एव पिता मम । जीवितान्तमनुप्राप्तः कामात्मैवेति नः श्रुतम् ।। ३ ।। हमने सुना है, सदा धर्ममें मन लगाये रहनेवाले महाराज शन्तनुसे जिनका जन्म हुआ था, वे मेरे पिता विचित्रवीर्य भी कामभोगमें आसक्तचित्त होनेके कारण ही छोटी अवस्थामें ही मृत्युको प्राप्त हुए थे ।। ३ ।। तस्य कामात्मनः क्षेत्रे राज्ञः संयतवागृषिः । कृष्णद्वैपायनः साक्षाद् भगवान् मामजीजनत् ।। ४ ।। उन्हीं कामासक्त नरेश की पत्नी से वाणी पर संयम रखने वाले ऋषिप्रवर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन ने मुझे उत्पन्न किया ।। ४ ।। तस्याद्य व्यसने बुद्धिः संजातेयं ममाधमा । त्यक्तस्य देवैरनयान्मृगयां परिधावतः ।। ५ ।। मैं शिकारके पीछे दौड़ता रहता हूँ; मेरी इसी अनीतिके कारण जान पड़ता है देवताओंने मुझे त्याग दिया है। इसीलिये तो ऐसे विशुद्ध वंशमें उत्पन्न होनेपर भी आज व्यसनमें फँसकर मेरी यह बुद्धि इतनी नीच हो गयी ।। ५ ।। मोक्षमेव व्यवस्यामि बन्धो हि व्यसनं महत् । सुवृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम् ।। ६ ।। अतः अब मैं इस निश्चयपर पहुँच रहा हूँ कि मोक्षके मार्गपर चलनेसे ही अपना कल्याण है। स्त्री-पुत्र आदिका बन्धन ही सबसे महान् दुःख है। आजसे मैं अपने पिता वेदव्यासजीकी उस उत्तम वृत्तिका आश्रय लूँगा, जिससे पुण्यका कभी नाश नहीं होता ।। ६ ।। अतीव तपसाऽऽत्मानं योजयिष्याम्यसंशयम् । तस्मादेकोऽहमेकाकी एकैकस्मिन् वनस्पतौ ।। ७ ।। चरन् भैक्ष्यं मुनिर्मुण्डश्चरिष्याम्याश्रमानिमान् । पांसुना समवच्छन्नः शून्यागारकृतालयः ।। ८ ।। मैं अपने शरीर और मनको निःसंदेह अत्यन्त कठोर तपस्यामें लगाऊँगा। इसलिये अब अकेला (स्त्रीरहित) और एकाकी (सेवक आदिसे भी अलग) रहकर एक-एक वृक्षके नीचे फलकी भिक्षा माँगूँगा। सिर मुँड़ाकर मौनी संन्यासी हो इन वानप्रस्थियोंके आश्रमोंमें विचरूँगा। उस समय मेरा शरीर धूलसे भरा होगा और निर्जन एकान्त स्थानमें मेरा निवास होगा ।। ७-८ ।। वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रियाप्रियः । न शोचन् न प्रहृष्यंश्च तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ।। ९ ।। अथवा वृक्षोंका तल ही मेरा निवासगृह होगा। मैं प्रिय एवं अप्रिय सब प्रकारकी वस्तुओंको त्याग दूँगा। न मुझे किसीके वियोगका शोक होगा और न किसीकी प्राप्ति या संयोगसे हर्ष ही होगा। निन्दा और स्तुति दोनों मेरे लिये समान होंगी ।। ९ ।। निराशीर्निर्नमस्कारो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः। न चाप्यवहसन् कच्चिन्न कुर्वन् भुकुटीं क्वचित् ।। १० ।। न मुझे आशीर्वादकी इच्छा होगी न नमस्कारकी। मैं सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित और संग्रह-परिग्रहसे दूर रहूँगा। न तो किसीकी हँसी उड़ाऊँगा और न क्रोधसे किसीपर भौंहें टेढ़ी करूँगा ।। १० ।। प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वभूतहिते रतः । जङ्गमाजङ्गमं सर्वमविहिंसंश्चतुर्विधम् ।। ११ ।। मेरे मुखपर प्रसन्नता छायी रहेगी तथा सदा सब भूतोंके हितसाधनमें संलग्न रहूँगा। (स्वेदज, उद्भिज्ज, अण्डज, जरायुज) चार प्रकारके जो चराचर प्राणी हैं, उनमेंसे किसीकी भी मैं हिंसा नहीं करूँगा ।। ११ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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