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#जय श्री कृष्ण शीर्षक: 🚩 मनुष्य के बार-बार जन्म-मरण का असली कारण क्या है? 🚩 एक बार द्वारकाधीश श्री कृष्ण महल में दातुन कर रहे थे और देवी रुक्मिणी सेवा में खड़ी थीं। अचानक प्रभु जोर से हंसने लगे। रुक्मिणी जी ने संकोच में पूछा- "प्रभु, क्या मुझसे कोई भूल हुई? आप अचानक क्यों हंसे?" भगवान ने मुस्कुराते हुए सामने दीवार पर दौड़ रहे एक चींटे की ओर इशारा किया और कहा— "प्रिये, मैं इस चींटे को अब तक 14 बार 'इंद्र' बना चुका हूँ, लेकिन इसकी भोग की इच्छा (वासना) अब भी शांत नहीं हुई है। आज यह एक चींटी के पीछे पागल होकर दौड़ रहा है। अपनी माया की इसी प्रबलता को देखकर मुझे हंसी आ गई।" इस कहानी का सार: वासना ही पुनर्जन्म का कारण है: हम चाहे कितनी भी ऊंची पदवी पा लें, यदि मन इंद्रियों का गुलाम है, तो जन्म-मरण का चक्र चलता रहेगा। तृष्णा का कोई अंत नहीं: जैसे अग्नि में घी डालने से वह और भड़कती है, वैसे ही भोगों से कामनाएं और बढ़ती हैं। सुख का मार्ग: "नास्ति त्यागसमं सुखम्" अर्थात त्याग के समान कोई सुख नहीं है। जब तक वासना क्षीण नहीं होती, मुक्ति संभव नहीं। मन को विषयों से हटाकर केवल प्रभु के चरणों में लगाना ही शांति का एकमात्र मार्ग है। 🙏
जय श्री कृष्ण - वासना ही पुनर्जन्म কা কাতো द्वारकानाथ श्रीकृष्ण और चीँटें का रहस्य त्याग ही परम सुख है। वासना ही पुनर्जन्म কা কাতো द्वारकानाथ श्रीकृष्ण और चीँटें का रहस्य त्याग ही परम सुख है। - ShareChat