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।। ॐ ।। पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः। जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते।। श्रीमानों के घर विषयों के वश में रहने पर भी वह पूर्वजन्म के अभ्यास से भगवत्पथ की ओर आकर्षित हो जाता है और योग में शिथिल प्रयत्नवाला वह जिज्ञासु भी वाणी के विषय को पार करके निर्वाण पद को पा जाता है। उसकी प्राप्ति का यही तरीका है। कोई एक जन्म में पाता भी नहीं। #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
यथार्थ गीता - 1| 3 | | पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोङपि सः।  जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते। । श्रीमानों के घर विषयों के वश में रहने पर भी पूर्वजन्म के अभ्यास से भगवत्पथ की वह ओर आकर्षित हो जाता है और योग में जिज्ञासु  शिथिल प्रयत्नवाला वह भी वाणी के विषय को पार करके निर्वाण पद को पा जाता है। उसकी प्राप्ति का यही तरीका है। कोई में पाता भी नहीं। Tch GFT 1| 3 | | पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोङपि सः।  जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते। । श्रीमानों के घर विषयों के वश में रहने पर भी पूर्वजन्म के अभ्यास से भगवत्पथ की वह ओर आकर्षित हो जाता है और योग में जिज्ञासु  शिथिल प्रयत्नवाला वह भी वाणी के विषय को पार करके निर्वाण पद को पा जाता है। उसकी प्राप्ति का यही तरीका है। कोई में पाता भी नहीं। Tch GFT - ShareChat