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अहंकार का बीज
महाभारत का महायुद्ध समाप्त हो चुका था। पांडवों की विजय पताका लहरा रही थी। इस विजय और श्री कृष्ण के निरंतर सानिध्य ने अर्जुन के मन में एक सूक्ष्म अहंकार का बीज बो दिया था। अर्जुन को लगने लगा था, "मेरे रथ के सारथी स्वयं त्रिभुवन के स्वामी हैं। वे हर पल मेरी रक्षा करते हैं, मेरी हर बात मानते हैं। निश्चय ही मैं ही श्री कृष्ण का सर्वश्रेष्ठ और सबसे प्रिय भक्त हूँ।"
श्री कृष्ण तो अंतर्यामी हैं, वे अर्जुन के मन में पनप रहे इस अहंकार को भांप गए। वे जानते थे कि अहंकार भक्ति के मार्ग का सबसे बड़ा शत्रु है। अपने प्रिय सखा का कल्याण करने और उसका भ्रम तोड़ने के लिए, लीलाधर ने एक विचित्र लीला रची।
एक दिन भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा, "पार्थ! चलो आज भ्रमण के लिए चलते हैं।" लेकिन इस बार रूप अलग था। दोनों ने जोगियों (साधुओं) का वेश धारण किया। श्री कृष्ण ने अपनी माया से वन से एक खूंखार शेर (सिंह) को पकड़ा और उसे अपने साथ ले लिया। अर्जुन हैरान थे कि आखिर माधव करना क्या चाहते हैं?
चलते-चलते वे भगवान विष्णु के परम भक्त, राजा मोरध्वज की नगरी 'रत्नपुरी' पहुंचे। राजा मोरध्वज अपनी दानवीरता, धर्म-पालन और अतिथि सत्कार के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थे। उनके द्वार से कोई भी याचक कभी खाली हाथ नहीं लौटा था।
द्वारपालों ने जब राजा को सूचना दी कि दो तेजस्वी साधु एक सिंह के साथ द्वार पर पधारे हैं, तो राजा मोरध्वज नंगे पाँव दौड़ते हुए आए। साधुओं के तेज को देखकर वे नतमस्तक हो गए और हाथ जोड़कर बोले, "हे महात्माओं! मेरा अहोभाग्य जो आप मेरे द्वार पधारे। कृपया मेरा आतिथ्य स्वीकार करें और मुझे सेवा का अवसर दें।"
साधु वेश में श्री कृष्ण बोले, "राजन! हम तुम्हारा आतिथ्य तब ही स्वीकार करेंगे जब तुम हमारी एक शर्त पूरी करोगे। सोच लो, यह आसान नहीं होगा।"
राजा मोरध्वज ने बिना संकोच कहा, "महाराज! रघुकुल रीति की तरह ही मेरे कुल की भी मर्यादा है। प्राण जा सकते हैं, पर वचन नहीं। आप आज्ञा दें।"
श्री कृष्ण ने गंभीर स्वर में कहा, "राजन, हम तो ब्राह्मण हैं, जो मिलेगा खा लेंगे। लेकिन हमारा यह सिंह नरभक्षी है। यह तब ही भोजन करेगा जब तुम अपने इकलौते पुत्र का मांस इसे खिलाओगे। और शर्त यह है कि तुम्हें और तुम्हारी पत्नी को अपने ही हाथों से आरी (karvat) से अपने पुत्र के दो टुकड़े करने होंगे। यदि इस दौरान तुम्हारी आँखों से एक भी आंसू गिरा, तो यह सिंह भोजन ग्रहण नहीं करेगा और हम चले जायेंगे।"
यह शर्त किसी वज्रपात से कम नहीं थी। एक पिता के लिए इससे बड़ा धर्म-संकट और क्या हो सकता था? अर्जुन का कलेजा कांप उठा, उन्हें लगा राजा अभी मना कर देंगे। लेकिन राजा मोरध्वज तो भक्ति की उस अवस्था में थे जहाँ मोह का कोई स्थान नहीं था।
राजा ने विनम्रता से कहा, "मुनिवर! मुझे शर्त स्वीकार है। बस एक बार अपनी अर्धांगिनी से अनुमति ले लूं।"
राजा भारी मन से रनिवास पहुंचे। रानी ने जब राजा का उतरा हुआ चेहरा देखा तो कारण पूछा। राजा ने सारी बात बताई। एक पल के लिए सन्नाटा छा गया, लेकिन अगले ही पल रानी की आँखों में आंसू और मुख पर तेज था। वे बोलीं, "स्वामी! यह नश्वर शरीर तो एक दिन नष्ट होना ही है। यदि हमारे पुत्र का बलिदान संतों की सेवा में काम आए, तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा? आप उन महात्माओं को आदर सहित भीतर लाइए। मैं अपनी कोख धन्य करूँगी।"
राजा, रानी और उनका छोटा सा पुत्र रतन कंवर—तीनों दरबार में उपस्थित हुए। बालक रतन अभी मात्र कुछ ही वर्षों का था, लेकिन संस्कारों में अपने माता-पिता से कम न था। उसने हंसते-हंसते बलिदान के लिए सहमति दे दी।
भोजन की तैयारी शुरू हुई। एक तरफ छप्पन भोग रखे थे, दूसरी तरफ मृत्यु का सन्नाटा। राजा और रानी ने अपने ही हाथों में वह आरी थामी। अर्जुन यह दृश्य देख नहीं पा रहे थे, उनका गला सूख रहा था, हृदय बैठा जा रहा था। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई भक्ति में इतना कठोर भी हो सकता है।
आरी चली। न राजा का हाथ कांपा, न रानी का। बालक के मुख पर भी हरि का नाम था। उसने उफ़ तक न की।
जैसे ही बालक का शरीर आधा कटा, रानी की बायीं आँख से एक आंसू टपक पड़ा। यह देखते ही श्री कृष्ण (साधु वेश में) क्रोधित होकर खड़े हो गए।
"रुको राजन! हमने पहले ही कहा था कि यदि यह कार्य दुखी मन से किया गया तो हम स्वीकार नहीं करेंगे। देखो, तुम्हारी रानी रो रही है। यह भोजन अशुद्ध हो गया। हम जा रहे हैं।"
राजा और रानी भगवान के चरणों में गिर पड़े। रानी ने रोते हुए कहा, "हे महात्मा! यह आंसू पुत्र मोह में नहीं गिरा। यह तो मेरे शरीर के बाएं हिस्से (वाम अंग) का दुःख है। मेरी बायीं आँख इसलिए रो रही है क्योंकि आपने पुत्र के दाहिने अंग को तो भोजन के लिए स्वीकार कर लिया, लेकिन बायां अंग व्यर्थ जा रहा है। यह आंसू दुःख का नहीं, उस हिस्से के दुर्भाग्य का है जो आपकी सेवा में नहीं आ सका।"
यह सुनते ही वहां खड़े अर्जुन का धैर्य टूट गया। जिस भक्ति पर उन्हें गर्व था, वह राजा मोरध्वज और उनकी रानी के इस त्याग के आगे तिनके के समान थी। अर्जुन को अपनी तुच्छता का अहसास हो गया। वे दौड़कर श्री कृष्ण के चरणों में गिर पड़े और बिलखने लगे।
"माधव! बस करो प्रभु। अब और परीक्षा न लो। मेरे अहंकार को तोड़ने के लिए आपने इन परम भक्तों को इतना कष्ट दिया। मैंने मान लिया केशव, इनसे बड़ा भक्त तीनों लोकों में कोई नहीं है। अब अपनी लीला समाप्त करें।"
अर्जुन का अहंकार चूर-चूर हो चुका था। श्री कृष्ण मंद-मंद मुस्कुराए।
उन्होंने रानी से कहा, "देवी! अपने पुत्र को आवाज दो।"
रानी ने चकित होकर सोचा कि पुत्र तो अब रहा नहीं, पर साधु की आज्ञा मानकर उन्होंने पुकारा, "रतन! बेटा बाहर आओ।"
और तभी चमत्कार हुआ। वही रतन कंवर, जिसका शरीर कुछ क्षण पहले तक कटा हुआ था, वह दौड़ता हुआ, खेलता-हंसता हुआ अपनी माँ के गले लग गया। शेर और साधु का वेश ओझल हो गया और साक्षात् शंख-चक्र-गदा-पद्म धारी भगवान विष्णु के रूप में श्री कृष्ण प्रकट हुए।
राजा मोरध्वज, रानी और रतन भगवान के चरणों में लोट गए। उनकी भक्ति सफल हो गई थी। भगवान ने उन्हें गले लगाया और कहा, "मांगो राजन! आज तुम जो मांगोगे, मैं दूंगा।"
राजा मोरध्वज और रानी ने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु! हमें मोक्ष या धन नहीं चाहिए। बस एक ही वरदान दीजिये कि भविष्य में आप अपने किसी भी भक्त की इतनी कठिन परीक्षा न लें। हर कोई इस कठोरता को सहन नहीं कर पाएगा।"
भगवान ने 'तथास्तु' कहा।


