#कर्मफल तो #भोगना पड़ेगा
⚖️ जब प्रभु श्रीराम के दरबार में कुत्ते ने माँगा अनोखा न्याय! 🐕
...और ब्राह्मण के लिए 'सजा' के रूप में माँगी 'मठाधीश' की गद्दी! 😲
बाल्मीकि रामायण में कर्मफल के सिद्धांत को दर्शाती एक अत्यंत आश्चर्यजनक कथा का वर्णन है।
एक बार भगवान श्रीराम के दरबार में न्याय की गुहार लेकर एक कुत्ता पहुँचा। लक्ष्मण जी के पूछने पर उसने कहा, "मुझे प्रभु श्रीराम से न्याय चाहिए।"
क्या था मामला?
भगवान श्रीराम के समक्ष कुत्ते ने अपनी व्यथा सुनाई: "प्रभु! मैं खेत की मेड़ के किनारे चुपचाप लेटा था। तभी वहाँ से गुजर रहे एक ब्राह्मण ने मुझ पर अनावश्यक डंडे से प्रहार किया और मुझे चोटिल कर दिया। मेरा कोई अपराध नहीं था, फिर भी मुझे पीटा गया। मुझे न्याय चाहिए।"
ब्राह्मण का तर्क:
श्रीराम ने उस ब्राह्मण को दरबार में बुलवाया। ब्राह्मण ने सफाई दी, "प्रभु, मैं स्नान के लिए नदी जा रहा था। मुझे लगा कि यह कुत्ता कहीं मेरे वस्त्र छूकर मुझे अपवित्र न कर दे, इसलिए इसे दूर भगाने के लिए मैंने डंडा मारा।"
दण्ड का निर्णय:
भगवान ने कुत्ते से ही पूछा, "तुम ही बताओ, इन्हें क्या दण्ड दिया जाए?"
कुत्ते ने पहले तो प्रभु पर ही निर्णय छोड़ा, किन्तु जब श्रीराम ने आग्रह किया, तो कुत्ते ने जो कहा उसे सुनकर पूरा राजदरबार सन्न रह गया।
कुत्ते ने कहा: "प्रभु, इन ब्राह्मण देव को कालिंजर मठ का मठाधीश बना दिया जाए।" 🏰💰
दरबारियों का आश्चर्य:
सभी अवाक् थे! कालिंजर का मठ असीम वैभव, ऐश्वर्य और अकूत धन-सम्पदा के लिए प्रसिद्ध था। उसका मठाधीश बनना तो बहुत बड़े गर्व और सम्मान की बात थी। यह सजा थी या पुरस्कार?
भगवान राम ने भी पूछा, "यह तुम दण्ड दे रहे हो या इनका उपहास कर रहे हो?"
कुत्ते का रहस्योद्घाटन (चौंकाने वाला सत्य): 😥
तब कुत्ते ने अपनी दर्दभरी कहानी सुनाई:
"नहीं प्रभु, मैं दण्ड ही दे रहा हूँ। पिछले जन्म में, मैं ही उस कालिंजर मठ का मठाधीश था।"
"उस मठ के अपार ऐश्वर्य, समृद्धि और धन ने मेरी बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी। सत्य और तप के मार्ग से हटकर मैं भोग-विलास और गलत कर्मों में लिप्त हो गया। मुझे लगा वही जीवन का असली आनंद है। मेरा सारा तप-तेज नष्ट हो गया। मेरे कर्म इतने दूषित हो गए कि मृत्यु के पश्चात मुझे दोबारा मनुष्य जन्म भी नहीं मिला और मुझे यह कुत्ते की योनि प्राप्त हुई।"
कुत्ते ने अंतिम बात कही: "प्रभु, मैं जानता हूँ कि ये ब्राह्मण भी मठाधीश बनते ही उस ऐश्वर्य में खो जायेंगे। इनका तप भी क्षीण हो जाएगा और निश्चित रूप से इनकी अगली गति भी मेरी तरह ही होगी।"
🔥 जीवन की सीख 🔥
यह प्रसंग सिखाता है कि कर्मों का फल हर किसी को भोगना ही पड़ता है। पद, प्रतिष्ठा और धन का अहंकार अक्सर मनुष्य के आध्यात्मिक पतन का कारण बनता है। सच्चा सुख ऐश्वर्य में नहीं, बल्कि सत्कर्मों और तप में है।
कर्म की गति गहन है!
🙏 जय सिया राम 🙏


