जब पत्नी बनी गुरु: एक महान कवि का जन्म
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प्रभु श्रीराम जी की जब भी भक्ति, मर्यादा और गुणगान की बात आती है, तो सबसे पहले श्रद्धा से जिस नाम का स्मरण होता है, वह है गोस्वामी तुलसीदास जी। पर बहुत कम लोग जानते हैं कि जिन तुलसीदास जी ने संसार को रामचरितमानस जैसा अमृत दिया, वे किसी लोक से उतरे हुए देवदूत नहीं थे। वे भी हमारे जैसे ही मनुष्य थे — भावनाओं से भरे हुए, प्रेम में बँधे हुए, और मोह में उलझे हुए।
उनके बचपन का नाम रामबोला था। माता-पिता का साया बहुत जल्दी उठ गया। जीवन में सुरक्षा, अपनापन और स्थिरता का अभाव था। ऐसे में जब उनका विवाह हुआ, तो पत्नी केवल पत्नी नहीं बनी — वह उनका संसार बन गई।
यह कोई विकृति नहीं थी। यह मनुष्य का स्वभाव है। जिसे जीवन में सहारा देर से मिलता है, वह उसे कसकर पकड़ लेता है। पत्नी सुशील थीं, समझदार थीं, पर रामबोला का प्रेम धीरे-धीरे आसक्ति बन गया। इतनी गहरी आसक्ति कि पत्नी के बिना एक दिन भी सूना लगने लगा।
एक समय ऐसा आया जब पत्नी को मायके जाना पड़ा। कारण बहुत साधारण था — घर का कोई आवश्यक कार्य।
रामबोला मन से नहीं चाहते थे कि पत्नी जाए, पर सामाजिक मर्यादा और परिस्थिति के आगे उन्हें झुकना पड़ा। पत्नी चली गई… और रामबोला का मन भी उसी के साथ चला गया।
दिन किसी तरह कट गया।
पर रात…
रात केवल अंधकार नहीं लाती,
रात मन के भीतर छिपे हुए मोह को जगा देती है।
आधी रात के बाद, जब पूरा गाँव सो रहा था,
रामबोला की आँखों में नींद नहीं थी।
मन बेचैन था।
हृदय व्याकुल था, और सोच केवल एक ही थी —“वह अकेली होगी… मैं उसके बिना कैसे रह सकता हूँ?”
न कोई योजना।
न कोई विवेक।
न यह विचार कि यह उचित है या अनुचित।
बस उठे…
और चल पड़े।
रास्ते में अंधेरी रात थी।
नदी थी।
सन्नाटा था।
पर इन सबसे बड़ा अंधकार उनके भीतर था — काम और मोह का।
वे ससुराल पहुँचे।
सब सो रहे थे।
द्वार बंद था।
चारों ओर चक्कर लगाया, पर भीतर जाने का कोई मार्ग नहीं मिला।
तभी उनकी दृष्टि दीवार से लटकती हुई एक रस्सी जैसी वस्तु पर पड़ी।
मोह में डूबे व्यक्ति को खतरा दिखाई नहीं देता।
उन्होंने बिना सोचे उसे पकड़ लिया और ऊपर चढ़ गए।
वह रस्सी नहीं थी…
वह साँप था।
यह प्रसंग केवल चमत्कार नहीं है —
यह बताता है कि जब मन विषय में डूबा हो,
तो मृत्यु भी साधन लगती है।
घर के भीतर पहुँचे।
पत्नी जहाँ सो रही थीं, वहाँ पहुँचे।
पत्नी जागीं।
और यहाँ से कथा का सबसे महत्वपूर्ण क्षण आरंभ होता है।
पत्नी चौंकीं।
आश्चर्य, भय और पीड़ा — सब एक साथ उमड़ आए।
उन्होंने देखा कि यह प्रेम नहीं, यह अंधापन है।
पत्नी ने डाँटा नहीं, चीखी नहीं.....बस सत्य कह दिया।
और वही सत्य वज्र बन गया।
हाड़ मांस की देह मम, तापै ऐसी प्रीत।
ऐसी प्रीत जो राममय, होत न तौ भवभीत॥
अर्थात —मेरे इस नश्वर शरीर से तुम इतना प्रेम करते हो।
यदि इतना ही प्रेम श्रीराम से होता,तो तुम इस संसार-सागर से पार हो जाते।
यह कोई साधारण वाक्य नहीं था यह वही क्षण था, जब ईश्वर ने स्त्री का मुख लेकर उपदेश दिया।
रामबोला मौन हो गए।
मानो भीतर कुछ टूट गया।
मानो वर्षों की नींद एक ही क्षण में खुल गई।
उसी क्षण उन्होंने निर्णय लिया।
न घर लौटे।
न किसी से बोले।
न पत्नी को कुछ कहा।
बस बाहर निकले…
और “राम-राम” जपते हुए चले गए।
यहीं रामबोला समाप्त हो गया, और यहीं तुलसीदास का जन्म हुआ, बाद में पत्नी को अपने शब्दों की तीव्रता का आभास हुआ। उन्हें चिंता हुई, पश्चाताप हुआ, उन्होंने पत्र लिखा।
और उत्तर में तुलसीदास जी ने जो लिखा, वह बताता है कि
उन्होंने संसार का नहीं, राम का रस चख लिया था।
एक कटे श्रीराम संग, बाँधि जटा सिर केस।
मैंने चाखा प्रेम रस, पतनी के उपदेश॥
इसके बाद का जीवन —प्रयाग, काशी, अयोध्या, तप, उपेक्षा, साधना , और अंत में —एक ऐसा ग्रंथ, जिसने अनगिनत जीवन बदल दिए।
यह कथा इसलिए नहीं कही जाती कि पत्नी को कठोर बताया जाए। यह कथा इसलिए कही जाती है कि कभी-कभी भगवान सबसे निकट के व्यक्ति के माध्यम से ही हमें झकझोरते हैं।
और सबसे बड़ा प्रश्न —
हम रोज सुनते हैं… पर क्या हम कभी स्वीकार करते हैं?
क्योंकि जिस दिन स्वीकार कर लिया,
उसी दिन हमारे जीवन में भी
कोई न कोई दो पंक्तियाँ
रामबोला को जगा देंगी।
यदि यह लेख आपके हृदय को छू गया हो,तो इसे केवल कथा न समझें —इसे आईना समझें और चिंतन करें ॥
🙏 हे महादेव ॥ 🙏
#पौराणिक अनसुनी कहानियाँ


