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##जय मां गायत्री जय गुरुवर
#जय मां गायत्री जय गुरुवर - अपनी दुनियाँ अपनी दृष्टि में अपने आप में, अपने अंतःकरण में एक जबरदस्त लोक  गोजूद  । उस लोक की स्थिति इतनी महत्त्वपूर्ण हे कि उसके  सामने ओर शुवः लोक तुच्छ निःसंदेह बाहर की शूलोक  परिस्थितियाँ मनुष्य को आंदोलित तरंगित तथा विचलित करती हैं॰ परंतु संसार के समस्त पदार्थों द्वारा जितना भला या बुरा प्रभाव होता है, उससो अनेक गुना प्रभाव अपने निज के विचारों तथा विश्वासों द्वारा होता है गीता में कहा है कि मनुष्य स्वयं अपना मित्र और स्वयं ही अपना शत्रु है कोई मित्र इतनी सहायता नहीं कर सकता, जितनी कि मनुष्य स्वयं अपनी सहायता कर सकता है। इसी प्रकार कोई उतनी शत्रुता नहीं कर सकता दूसरा  जितनी कि मनुष्य खुद अपने आप अपने से शत्रुता करता है अपनी कल्पना शक्ति, विचार और विश्वास के आधार पर मनुष्य अपनी एक दुनियाँ निर्माण करता है। वही दुनियाँ उसे वास्तविक सुख दुःख दिलाया करती है मनुष्य के मन में प्रचंड शक्ति भरी हुई है। वह इस शक्ति द्वारा अपने लिए अत्यंत अनिष्टकर अथवा अत्यंत उपयोगी तथ्य निर्मित कर सकता है | हर मनुष्य की अपनी एक अलग दुनियाँ होती है दुनियाँ जैसी होती है, बाहर भीतरी मन को की दुनियाँ भी उसी के अनुरूप दिखाई देने लगती है। अखण्ठ न्योति सितंबर १९४७ पृष्ठ ५ अपनी दुनियाँ अपनी दृष्टि में अपने आप में, अपने अंतःकरण में एक जबरदस्त लोक  गोजूद  । उस लोक की स्थिति इतनी महत्त्वपूर्ण हे कि उसके  सामने ओर शुवः लोक तुच्छ निःसंदेह बाहर की शूलोक  परिस्थितियाँ मनुष्य को आंदोलित तरंगित तथा विचलित करती हैं॰ परंतु संसार के समस्त पदार्थों द्वारा जितना भला या बुरा प्रभाव होता है, उससो अनेक गुना प्रभाव अपने निज के विचारों तथा विश्वासों द्वारा होता है गीता में कहा है कि मनुष्य स्वयं अपना मित्र और स्वयं ही अपना शत्रु है कोई मित्र इतनी सहायता नहीं कर सकता, जितनी कि मनुष्य स्वयं अपनी सहायता कर सकता है। इसी प्रकार कोई उतनी शत्रुता नहीं कर सकता दूसरा  जितनी कि मनुष्य खुद अपने आप अपने से शत्रुता करता है अपनी कल्पना शक्ति, विचार और विश्वास के आधार पर मनुष्य अपनी एक दुनियाँ निर्माण करता है। वही दुनियाँ उसे वास्तविक सुख दुःख दिलाया करती है मनुष्य के मन में प्रचंड शक्ति भरी हुई है। वह इस शक्ति द्वारा अपने लिए अत्यंत अनिष्टकर अथवा अत्यंत उपयोगी तथ्य निर्मित कर सकता है | हर मनुष्य की अपनी एक अलग दुनियाँ होती है दुनियाँ जैसी होती है, बाहर भीतरी मन को की दुनियाँ भी उसी के अनुरूप दिखाई देने लगती है। अखण्ठ न्योति सितंबर १९४७ पृष्ठ ५ - ShareChat