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##जय मां गायत्री जय गुरुवर
#जय मां गायत्री जय गुरुवर - रोने से काम न चलेगा ईश्वर ने मनुष्य को संपूर्ण योग्यताएँ और शक्तियाँ देकर इस * संसार में स्वच्छंदतापूर्वक जीवन बिताने के लिए भेजा है | परमात्मा कभी नहीं चाहता कि उसकी एक संतान सिंहासन पर बैठे और पिता को अपने सभी बच्चे संतान दर दर ठोकरें खाए दूसरी  प्यारे होते हैं। वह सभी को सुखी देखना चाहता है॰ अगर तुम हो॰ तो परमात्मा का अपराध नहों है, वरन् तुम स्वयं अपने ತ:ಠೆ' ईश्वर ने हमें स्वस्थ अपने पैर में कुल्हाड़ी मार रहे हो हाथों स्वतंत्रतापूर्वक सुखमय जीवन जीने  शरीर और शक्तिशाली मन अपना अधिकार प्राप्त करने और उन्नति करने  के लिए दिया के लिए नहीं के लिए दिया है, रोने, झीँखने और " करने हाय हाय ही यही दिया है। ऐसा सर्वसंपन्न शरीर और मन देन নান্পম  0 है कि मनुष्य सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करे। करते हैं॰ वे शक्तियों का जो सदुपयोग परमात्मा की दी हुई होते हैं और जो व्यक्ति अपनी शक्तियों को भूलकर  सर्वसुख " 747 करते हैं उन्हें जीवन में दुःख भोगना पड़ता है  उनका दुरुपयोग उन्हें जिंदगी रोते- रोते बितानी पड़ती है। अपने अस्तित्व को नहीं जो तुम्हें सुख शांति स्वतंत्रता में कोई ताकत समझो दुनियाँ से वंचित कर सके। आज से॰ही अपनी शक्तियों का सदुपयोग शुरू कर दो। तुम्हें भी परमात्मा के राज्य में स्वच्छंदतापूवक करना जीवन बिताने का अधिकार दिया गया है। अखाण ज्योति जववर १९४४ पृष्ठ २३५  रोने से काम न चलेगा ईश्वर ने मनुष्य को संपूर्ण योग्यताएँ और शक्तियाँ देकर इस * संसार में स्वच्छंदतापूर्वक जीवन बिताने के लिए भेजा है | परमात्मा कभी नहीं चाहता कि उसकी एक संतान सिंहासन पर बैठे और पिता को अपने सभी बच्चे संतान दर दर ठोकरें खाए दूसरी  प्यारे होते हैं। वह सभी को सुखी देखना चाहता है॰ अगर तुम हो॰ तो परमात्मा का अपराध नहों है, वरन् तुम स्वयं अपने ತ:ಠೆ' ईश्वर ने हमें स्वस्थ अपने पैर में कुल्हाड़ी मार रहे हो हाथों स्वतंत्रतापूर्वक सुखमय जीवन जीने  शरीर और शक्तिशाली मन अपना अधिकार प्राप्त करने और उन्नति करने  के लिए दिया के लिए नहीं के लिए दिया है, रोने, झीँखने और " करने हाय हाय ही यही दिया है। ऐसा सर्वसंपन्न शरीर और मन देन নান্পম  0 है कि मनुष्य सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करे। करते हैं॰ वे शक्तियों का जो सदुपयोग परमात्मा की दी हुई होते हैं और जो व्यक्ति अपनी शक्तियों को भूलकर  सर्वसुख " 747 करते हैं उन्हें जीवन में दुःख भोगना पड़ता है  उनका दुरुपयोग उन्हें जिंदगी रोते- रोते बितानी पड़ती है। अपने अस्तित्व को नहीं जो तुम्हें सुख शांति स्वतंत्रता में कोई ताकत समझो दुनियाँ से वंचित कर सके। आज से॰ही अपनी शक्तियों का सदुपयोग शुरू कर दो। तुम्हें भी परमात्मा के राज्य में स्वच्छंदतापूवक करना जीवन बिताने का अधिकार दिया गया है। अखाण ज्योति जववर १९४४ पृष्ठ २३५ - ShareChat
##जय मां गायत्री जय गुरुवर
#जय मां गायत्री जय गुरुवर - वंदनीया माताजी की जन्म शताब्दी दिव्य प्रकाश का महापर्व २०२६ 09 Feb - २०२६ कृष्ण पक्ष अष्टमो प्रजञेश्वर मह्यदेव मंदिर : DSVV परिसर 2082 awgpofficial] WWW awgp.org YoU TUBgl Shantilluni Rishi Chintan . 8439014110 वंदनीया माताजी की जन्म शताब्दी दिव्य प्रकाश का महापर्व २०२६ 09 Feb - २०२६ कृष्ण पक्ष अष्टमो प्रजञेश्वर मह्यदेव मंदिर : DSVV परिसर 2082 awgpofficial] WWW awgp.org YoU TUBgl Shantilluni Rishi Chintan . 8439014110 - ShareChat
##जय मां गायत्री जय गुरुवर
#जय मां गायत्री जय गुरुवर - Sణrlcardd' 2026. afFgsaassa शबिङज grsutar अजकासद्चिन्तन . 03,೩ ೩೯ किसी निर्दिष्ट ढँचि नें ढाल क सबस पबल एवं उच्चसतरोयशक्ति 90 |3%| यह अन्नःकरण की द्व्यिभूमि पमरत जवनका रयालो U3TT' T 9ಞಷನೌ@: श्रळता  ,4id3122: ೨ आस्था ( यहआस्थ जूब सिद्वून्त एवं 3ুন২নী ৫ ন 34 নিজ্ঞা কeন / 01 वङ्गय ०२ , (9 Shonthun Rshl chintan Tupuufficinl' Mwawgu ulu Bnantilul Vdeu ' Sణrlcardd' 2026. afFgsaassa शबिङज grsutar अजकासद्चिन्तन . 03,೩ ೩೯ किसी निर्दिष्ट ढँचि नें ढाल क सबस पबल एवं उच्चसतरोयशक्ति 90 |3%| यह अन्नःकरण की द्व्यिभूमि पमरत जवनका रयालो U3TT' T 9ಞಷನೌ@: श्रळता  ,4id3122: ೨ आस्था ( यहआस्थ जूब सिद्वून्त एवं 3ুন২নী ৫ ন 34 নিজ্ঞা কeন / 01 वङ्गय ०२ , (9 Shonthun Rshl chintan Tupuufficinl' Mwawgu ulu Bnantilul Vdeu ' - ShareChat
##जय मां गायत्री जय गुरुवर
#जय मां गायत्री जय गुरुवर - गायत्री साधना के कुछ विशेष प्रयोग गायत्री सर्वोपरि मन्त्र है।गायत्री साधना के असंख्य प्रकार हैं , जिसका वर्णन यहाँ संभव नहीं है। कुछ विशेष प्रयोजनों के लिए कुछ विशेष प्रयोग दिये जा 288 (१) रोग निवारण- स्वयं रोगी होने पर मन ही मन गायत्री का जप चाहिये एक मन्त्र समाप्त होने और दूसरा cpral आरम्भ होने के बीच में एक `बीज मन्त्र 9রলনা रोगों में एं बीज मन्त्र चाहिये | सर्दी प्रधान (फ५  गर्मी प्रधान पित्त' रोगों में ऐं॰, अपच एवं विष रोगों   में बीज मन्त्र का प्रयोग সঘান (বান) 5 करना चाहिए | निरोग होने के कारण वृषभ वाहिनी हरित वस्त्र वाली का ध्यान करना चाहिए | गायत्री को निरोग करने के लिए भी इन्हीं बीज मन्त्रों का और इसी दूसरों घ्यान का प्रयोग करना चाहिए | रोगी के पीडित अंगों पर उपरोक्त ध्यान और करते U ক্রিহানা; छिड़कना  अभिमन्त्रित करके रोगी पर मार्जन देना एवं हुए हाथ U C चाहिए (२ ) बुद्धि वृद्धि, मन्द बुद्धि और स्मरण शक्ति बढ़ाने केलिए- सूर्योदय की प्रथम किरणें , से भीगे हुये मस्तक पानी पड़ने दें | पूर्व की ओर मुख करके अधखुले नेत्रों पर से सूर्य का दर्शन करते हुए तीननचार बार ऊँ का उच्चारण करने के बाद गायत्री मन्त्र की कम से कम करने के एक माला (१०८ मन्त्र अवश्य जपें பபு सूर्य की ओर করী বথলী ক্রা সাঠা बादमे दोनों ভাথা ताप रहे हैं। इस प्रकार करें माता आग इस பு- চথলিত্রী ক্রী 3া9ম ম स्थिति में १२ ಚc3 অতন नासिका , ग्रीवा, कर्ण, रगडना चाहिये और हाथों मुख 6 Sc 37 C1 आदि समस्त सिर के भागों पर फिराना चाहिए मरतक गायत्री साधना के कुछ विशेष प्रयोग गायत्री सर्वोपरि मन्त्र है।गायत्री साधना के असंख्य प्रकार हैं , जिसका वर्णन यहाँ संभव नहीं है। कुछ विशेष प्रयोजनों के लिए कुछ विशेष प्रयोग दिये जा 288 (१) रोग निवारण- स्वयं रोगी होने पर मन ही मन गायत्री का जप चाहिये एक मन्त्र समाप्त होने और दूसरा cpral आरम्भ होने के बीच में एक `बीज मन्त्र 9রলনা रोगों में एं बीज मन्त्र चाहिये | सर्दी प्रधान (फ५  गर्मी प्रधान पित्त' रोगों में ऐं॰, अपच एवं विष रोगों   में बीज मन्त्र का प्रयोग সঘান (বান) 5 करना चाहिए | निरोग होने के कारण वृषभ वाहिनी हरित वस्त्र वाली का ध्यान करना चाहिए | गायत्री को निरोग करने के लिए भी इन्हीं बीज मन्त्रों का और इसी दूसरों घ्यान का प्रयोग करना चाहिए | रोगी के पीडित अंगों पर उपरोक्त ध्यान और करते U ক্রিহানা; छिड़कना  अभिमन्त्रित करके रोगी पर मार्जन देना एवं हुए हाथ U C चाहिए (२ ) बुद्धि वृद्धि, मन्द बुद्धि और स्मरण शक्ति बढ़ाने केलिए- सूर्योदय की प्रथम किरणें , से भीगे हुये मस्तक पानी पड़ने दें | पूर्व की ओर मुख करके अधखुले नेत्रों पर से सूर्य का दर्शन करते हुए तीननचार बार ऊँ का उच्चारण करने के बाद गायत्री मन्त्र की कम से कम करने के एक माला (१०८ मन्त्र अवश्य जपें பபு सूर्य की ओर করী বথলী ক্রা সাঠা बादमे दोनों ভাথা ताप रहे हैं। इस प्रकार करें माता आग इस பு- চথলিত্রী ক্রী 3া9ম ম स्थिति में १२ ಚc3 অতন नासिका , ग्रीवा, कर्ण, रगडना चाहिये और हाथों मुख 6 Sc 37 C1 आदि समस्त सिर के भागों पर फिराना चाहिए मरतक - ShareChat
##जय मां गायत्री जय गुरुवर
#जय मां गायत्री जय गुरुवर - allzzilcilzl शान्तिकुञ्ज अनीति के समर्थक तभी तक साथी बने रहते हैं I साझेदारी में निर्बाध रीति से लाभऱ्ही लाभ दीखता है। जब इस जब उन्हें लगता है कि प्रतिरोध प्रचण्ड हो रहा है और अपने को लांछित एवं लज्जित होने के साथ साथ परास्त भी होना पडेगा तो उन्हें अनीति का साथ छोड़ते देर नहीं लगती | और युग प्रत्यावर्त्तन प्रक्रिया vlauI हम बदलेंगे - युग बदलेगा , हम सुधरेंगे - युग सुधरेगा वंदनीया माताजी की जन्म शताब्दी ل 1021 . 2026 ` दिव्य प्रकाश का महापर्व २०२६ awgpofficial 8439014110 WWW.awgp..rg' YOUfUBE Shantikunj Rishi Chintan allzzilcilzl शान्तिकुञ्ज अनीति के समर्थक तभी तक साथी बने रहते हैं I साझेदारी में निर्बाध रीति से लाभऱ्ही लाभ दीखता है। जब इस जब उन्हें लगता है कि प्रतिरोध प्रचण्ड हो रहा है और अपने को लांछित एवं लज्जित होने के साथ साथ परास्त भी होना पडेगा तो उन्हें अनीति का साथ छोड़ते देर नहीं लगती | और युग प्रत्यावर्त्तन प्रक्रिया vlauI हम बदलेंगे - युग बदलेगा , हम सुधरेंगे - युग सुधरेगा वंदनीया माताजी की जन्म शताब्दी ل 1021 . 2026 ` दिव्य प्रकाश का महापर्व २०२६ awgpofficial 8439014110 WWW.awgp..rg' YOUfUBE Shantikunj Rishi Chintan - ShareChat
##जय मां गायत्री जय गुरुवर
#जय मां गायत्री जय गुरुवर - वंदनीया माताजी की जन्म शताब्दी दिव्य प्रकाश का महापर्व २०२६ 09 Feb - २०२६ कृष्ण पक्ष अष्टमो भगवान सदाशिव एवं माता पार्वती - शिव मंदिर 2082 awgpofficial] WWW awgp.org YoU TUBgl Shantilluni Rishi Chintan . 8439014110 वंदनीया माताजी की जन्म शताब्दी दिव्य प्रकाश का महापर्व २०२६ 09 Feb - २०२६ कृष्ण पक्ष अष्टमो भगवान सदाशिव एवं माता पार्वती - शिव मंदिर 2082 awgpofficial] WWW awgp.org YoU TUBgl Shantilluni Rishi Chintan . 8439014110 - ShareChat
##जय मां गायत्री जय गुरुवर
#जय मां गायत्री जय गुरुवर - ಲೊ್ಿಗ @ಿ9  2026 925855282 ೩೪8 4 110 ] ८९ ११९ः आउकासद्चित्तन॰ 5SIT' 01)' 98 সমকা वह पकाश पाप्ति के लिए बनाय गए मर्गको दिखाती रहती ` जब भी मनुष्य एकक्ष्ण के टिर दे लिए लकिक चमक - दमक , कमिनी ३र कचन मारग्रस्न हाता " तमतकी तरह ७०डज८ %& ठाला शक्त धकर जग  श्रद्वा एव्यकी सोमा तक सधकको सध सभटे रहीे ह पंः शीरामधीर्मआचार्य ॰ 4-6, 41g44' AShantlkun Rishl chmntan ಖuuuuufficihl Mwawgu ulu Cnnntilu೦ Vden' ಲೊ್ಿಗ @ಿ9  2026 925855282 ೩೪8 4 110 ] ८९ ११९ः आउकासद्चित्तन॰ 5SIT' 01)' 98 সমকা वह पकाश पाप्ति के लिए बनाय गए मर्गको दिखाती रहती ` जब भी मनुष्य एकक्ष्ण के टिर दे लिए लकिक चमक - दमक , कमिनी ३र कचन मारग्रस्न हाता " तमतकी तरह ७०डज८ %& ठाला शक्त धकर जग  श्रद्वा एव्यकी सोमा तक सधकको सध सभटे रहीे ह पंः शीरामधीर्मआचार्य ॰ 4-6, 41g44' AShantlkun Rishl chmntan ಖuuuuufficihl Mwawgu ulu Cnnntilu೦ Vden' - ShareChat
##जय मां गायत्री जय गुरुवर
#जय मां गायत्री जय गुरुवर - मृत्यु का भय दूर कर दीजिए मृत्यु से मनुष्य बहुत डरता है। इस डर के कारण की खोज " करने पर प्रतीत होता है कि मनुष्य  मृत्यु से नहीं वरन अपने पापों के दुष्परिणामों से डरता है। देखा जाता है कि यदि मनुष्य को कहीं कष्ट या विपत्ति के स्थान में जाना पडे़, तो वह जाते समय  डरता और व्याकुल होता है। मृत्यु से मनुष्य इसलिए " agd घबराता है कि उसकी अंतःचेतना ऐसा अनुभव करती है कि इस * जीवन का मैंने जो दुरुपयोग किया है, उसके फलस्वरूप मरने  के पश्चात् मुझे दुर्गति में जाना पड़ेगा | जब कोई व्यक्ति वर्तमान की अपेक्षा अधिक अच्छी उन्नत और सुखकर परिस्थिति के लिए  है, तो उसे जाते समय कुछ भी कष्ट नहीं होता, वरन् जाता होती है।जो लोग अपने जीवन को निर्थक अनुचित  प्रसन्नता और अनुपयोगी कार्यों में खर्च कर रहे हैं॰ वे लोग मृत्यु से उसी  प्रकार डरते हैं जैसे बकरा कसाईखाने के दरवाजे में घुसता  हुआ भावी पीडा की आशंका से डरता है। भय से बचना चाहते हैं॰ तो अपने जीवन यदि आप मृत्यु के सदुपयोग करना, अपने कार्यक्रम को धर्ममय बनाना आरंभ 877 दीजिए। ऐसा करने से आप की अंतःचेतना को यह विश्वास  कर होने लगेगा कि भविष्य अंधकारमय नहीं वरन् प्रकाशपूर्ण है। में हुआ  जिस क्षण यह विश्वास हृदय उसी क्षण मृत्यु का भय भाग जाता है। तब वह शरीर  परिवर्तन को वस्त्र- परिवर्तन की बात समझता है और उससे जरा भी डरता या तरह मामूली Ta घबराता नही   अखण्ठ न्योति सितवर १९४४ पृष्ठन५ मृत्यु का भय दूर कर दीजिए मृत्यु से मनुष्य बहुत डरता है। इस डर के कारण की खोज " करने पर प्रतीत होता है कि मनुष्य  मृत्यु से नहीं वरन अपने पापों के दुष्परिणामों से डरता है। देखा जाता है कि यदि मनुष्य को कहीं कष्ट या विपत्ति के स्थान में जाना पडे़, तो वह जाते समय  डरता और व्याकुल होता है। मृत्यु से मनुष्य इसलिए " agd घबराता है कि उसकी अंतःचेतना ऐसा अनुभव करती है कि इस * जीवन का मैंने जो दुरुपयोग किया है, उसके फलस्वरूप मरने  के पश्चात् मुझे दुर्गति में जाना पड़ेगा | जब कोई व्यक्ति वर्तमान की अपेक्षा अधिक अच्छी उन्नत और सुखकर परिस्थिति के लिए  है, तो उसे जाते समय कुछ भी कष्ट नहीं होता, वरन् जाता होती है।जो लोग अपने जीवन को निर्थक अनुचित  प्रसन्नता और अनुपयोगी कार्यों में खर्च कर रहे हैं॰ वे लोग मृत्यु से उसी  प्रकार डरते हैं जैसे बकरा कसाईखाने के दरवाजे में घुसता  हुआ भावी पीडा की आशंका से डरता है। भय से बचना चाहते हैं॰ तो अपने जीवन यदि आप मृत्यु के सदुपयोग करना, अपने कार्यक्रम को धर्ममय बनाना आरंभ 877 दीजिए। ऐसा करने से आप की अंतःचेतना को यह विश्वास  कर होने लगेगा कि भविष्य अंधकारमय नहीं वरन् प्रकाशपूर्ण है। में हुआ  जिस क्षण यह विश्वास हृदय उसी क्षण मृत्यु का भय भाग जाता है। तब वह शरीर  परिवर्तन को वस्त्र- परिवर्तन की बात समझता है और उससे जरा भी डरता या तरह मामूली Ta घबराता नही   अखण्ठ न्योति सितवर १९४४ पृष्ठन५ - ShareChat
##जय मां गायत्री जय गुरुवर
#जय मां गायत्री जय गुरुवर - নিনাব্ধ 9 ஈன ்பeரி सहिष्णुता का अभ्यास करो उत्तरादायित्व को समझो। किसी के को देखने और उन पर करने के पहले अपने बड़े-बड़े दोषों का अन्वेषण करो। यदि अपनी वाणी ಕ नियंत्रण नहीं कर सकते तो उसे दूसरों प्रतिकू ल नहीं बल्कि अपने   प्रतिकू ल उपदेश करने दो। सबसे पहले अपने घर को नियमित के बनाओ f क्योंकि आचरण आत्मानु भव नहीं   हो /77 सकता | सहि ष्णुता सरलता, साधु ता, सब आत्मानुभव के प्रधान अंग हैँ। दूसरे तुम्हारे साथ क्या॰करते हैँ হমন্ধী चिंता ने करो। आत्मोन्नति में तत्पर रहो। यदि यह तथ्य समझ लिया तो एक बड़े रहस्य को पा लिया हारिए न हिम्मत /१० নিনাব্ধ 9 ஈன ்பeரி सहिष्णुता का अभ्यास करो उत्तरादायित्व को समझो। किसी के को देखने और उन पर करने के पहले अपने बड़े-बड़े दोषों का अन्वेषण करो। यदि अपनी वाणी ಕ नियंत्रण नहीं कर सकते तो उसे दूसरों प्रतिकू ल नहीं बल्कि अपने   प्रतिकू ल उपदेश करने दो। सबसे पहले अपने घर को नियमित के बनाओ f क्योंकि आचरण आत्मानु भव नहीं   हो /77 सकता | सहि ष्णुता सरलता, साधु ता, सब आत्मानुभव के प्रधान अंग हैँ। दूसरे तुम्हारे साथ क्या॰करते हैँ হমন্ধী चिंता ने करो। आत्मोन्नति में तत्पर रहो। यदि यह तथ्य समझ लिया तो एक बड़े रहस्य को पा लिया हारिए न हिम्मत /१० - ShareChat