#जय श्री कृष्ण
वृंदावन की हरी-भरी धरती पर सुबह का सुहावना समय था। नदी के किनारे हल्की-हल्की हवा चल रही थी और चारों ओर फूलों की सुगंध फैली हुई थी। उसी सुंदर वातावरण में बाल रूप में Krishna अपनी प्रिय गायों के बीच खड़े थे।
नन्हे कान्हा के सिर पर मोरपंख सजा हुआ था और उनके चेहरे पर एक प्यारी मुस्कान थी। उनके गले में सुंदर आभूषण और फूलों की माला चमक रही थी। उनके पास दो बड़ी गायें और एक छोटा सा बछड़ा खड़ा था, जो बड़े प्रेम से कान्हा की ओर देख रहा था।
कृष्ण अपने नन्हे हाथों से गायों को प्यार से सहला रहे थे। गायें भी अपने प्रिय गोपाल के पास आकर बहुत प्रसन्न थीं। ऐसा लगता था जैसे वे भी कान्हा के स्नेह को समझती हों। छोटा बछड़ा तो खुशी से उछल-उछलकर कान्हा के पास आने की कोशिश कर रहा था।
थोड़ी दूरी पर और भी गायें शांत भाव से घास चर रही थीं। नदी का पानी धीरे-धीरे बह रहा था और सूर्य की किरणें पूरे वृंदावन को स्वर्णिम बना रही थीं। उस समय ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति का हर कण इस सुंदर दृश्य को देखकर आनंदित हो रहा हो।
कान्हा का हृदय करुणा और प्रेम से भरा हुआ था। वे केवल मनुष्यों से ही नहीं, बल्कि हर जीव से समान प्रेम करते थे। इसलिए वृंदावन की गायें उन्हें अपना सबसे प्रिय मित्र मानती थीं।
जब भी Krishna गायों के बीच आते, तो पूरा वातावरण प्रेम और शांति से भर जाता था। यही कारण है कि लोग उन्हें प्रेम से **गोपाल** और **गोविंद** कहकर पुकारते हैं—अर्थात् गायों की रक्षा करने वाले और उनसे प्रेम करने वाले।
कहा जाता है कि जो भी भक्त प्रेम से कृष्ण की इन बाल लीलाओं का स्मरण करता है, उसके जीवन में भी वही शांति, करुणा और आनंद उतर आता है जो उस दिन वृंदावन की धरती पर फैला हुआ था।
जय श्रीकृष्ण....
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