#श्रीमहाभारतकथा-2️⃣5️⃣7️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
अशीतितमोऽध्यायः
शुक्राचार्य का वृषपर्वा को फटकारना तथा उसे छोड़कर जाने के लिये उद्यत होना और वृषपर्वा के आदेश से शर्मिष्ठा का देवयानी की दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानी को संतुष्ट करना...(दिन 257)
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शुक्र उवाच
समुद्रं प्रविशध्वं वा दिशो वा द्रवतासुराः । दुहितुर्नाप्रियं सोढुं शक्तोऽहं दयिता हि मे ।। ९ ।।
शुक्राचार्यने कहा-असुरो ! तुमलोग समुद्रमें घुस जाओ अथवा चारों दिशाओंमें भाग जाओ; मैं अपनी पुत्रीके प्रति किया गया अप्रिय बर्ताव नहीं सह सकता; क्योंकि वह मुझे अत्यन्त प्रिय है ।। ९ ।।
प्रसाद्यतां देवयानी जीवितं यत्र मे स्थितम् । योगक्षेमकरस्तेऽहमिन्द्रस्येव बृहस्पतिः ।। १० ।।
तुम देवयानीको प्रसन्न करो, क्योंकि उसीमें मेरे प्राण बसते हैं। उसके प्रसन्न हो जानेपर इन्द्रके पुरोहित बृहस्पतिकी भाँति में तुम्हारे योगक्षेमका वहन करता रहूँगा ।। १० ।।
वृषपर्वावाच
यत् किंचिदसुरेन्द्राणां विद्यते वसु भार्गव । भुवि हस्तिगवाश्वं च तस्य त्वं मम चेश्वरः ।। ११ ।।
वृषपर्वा बोले- भृगुनन्दन ! असुरेश्वरोंके पास इस भूतलपर जो कुछ भी सम्पत्ति तथा हाथी-घोड़े और गाय आदि पशुधन है, उसके और मेरे भी आप ही स्वामी हैं ।। ११ ।।
शुक्र उवाच
यत् किंचिदस्ति द्रविणं दैत्येन्द्राणां महासुर । तस्येश्वरोऽस्मि यद्येषा देवयानी प्रसाद्यताम् ।। १२ ।।
शुक्राचार्यने कहा- महान् असुर ! दैत्यराजोंका जो कुछ भी धन-वैभव है, यदि उसका स्वामी मैं ही हूँ तो उसके द्वारा इस देवयानीको प्रसन्न करो ।। १२ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तथेत्याह वृषपर्वा महाकविः । देवयान्यन्तिकं गत्वा तमर्थ प्राह भार्गवः ।। १३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! शुक्राचार्यके ऐसा कहनेपर वृषपर्वाने 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा मान ली। तदनन्तर दोनों देवयानीके पास गये और महाकवि शुक्राचार्यने वृषपर्वाकी कही हुई सारी बात कह सुनायी ।। १३ ।।
देवयान्युवाच
यदि त्वमीश्वरस्तात राज्ञो वित्तस्य भार्गव । नाभिजानामि तत् तेऽहं राजा तु वदतु स्वयम् ।। १४ ।।
तब देवयानीने कहा-तात ! यदि आप राजाके धनके स्वामी हैं तो आपके कहनेसे में इस बातको नहीं मानूँगी। राजा स्वयं कहें, तो मुझे विश्वास होगा ।। १४ ।।
वृषपर्वोवाच
यं काममभिकामासि देवयानि शुचिस्मिते।
तत् तेऽहं सम्प्रदास्यामि यदि वापि हि दुर्लभम् ।। १५ ।।
वृषपर्वा बोले-पवित्र मुसकानवाली देवयानी! तुम जिस वस्तुको पाना चाहती हो, वह यदि दुर्लभ हो तो भी तुम्हें अवश्य दूँगा ।। १५ ।।
देवयान्युवाच
दासीं कन्यासहस्रेण शर्मिष्ठामभिकामये ।
अनु मां तत्र गच्छेत् सा यत्र दद्याच्च मे पिता ।। १६ ।।
देवयानीने कहा- मैं चाहती हूँ, शर्मिष्ठा एक हजार कन्याओंके साथ मेरी दासी होकर रहे और पिताजी जहाँ मेरा विवाह करें, वहाँ भी वह मेरे साथ जाय ।। १६ ।।
वृषपर्वोवाच
उत्तिष्ठ त्वं गच्छ धात्रि शर्मिष्ठां शीघ्रमानय।
यं च कामयते कामं देवयानी करोतु तम् ।। १७ ।।
यह सुनकर वृषपर्वाने धायसे कहा- धात्री! तुम उठो, जाओ और शर्मिष्ठाको शीघ्र बुला लाओ एवं देवयानीकी जो कामना हो, उसे वह पूर्ण करे ।। १७ ।।
(त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ।।)
कुलके हितके लिये एक मनुष्यको त्याग दे। गाँवके भलेके लिये एक कुलको छोड़ दे। जनपदके लिये एक गाँवकी उपेक्षा कर दे और आत्मकल्याणके लिये सारी पृथ्वीको त्याग दे।
वैशम्पायन उवाच
ततो धात्री तत्र गत्वा शर्मिष्ठां वाक्यमब्रवीत् । उत्तिष्ठ भद्रे शर्मिष्ठे ज्ञातीनां सुखमावह ।। १८ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- तब धायने शर्मिष्ठाके पास जाकर कहा- 'भद्रे शर्मिष्ठे! उठो और अपने जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाओ ।। १८ ।।
त्यजति ब्राह्मणः शिष्यान् देवयान्या प्रचोदितः । सा यं कामयते कामं स कार्योऽद्य त्वयानघे ।। १९ ।।
'पापरहित राजकुमारी! आज बाबा शुक्राचार्य देवयानीके कहनेसे अपने शिष्यों-यजमानोंको त्याग रहे हैं। अतः देवयानीकी जो कामना हो, वह तुम्हें पूर्ण करनी चाहिये' ।। १९ ।।
शर्मिष्ठोवाच
यं सा कामयते कामं करवाण्यहमद्य तम्।
यद्येवमाह्वयेच्छुक्रो देवयानीकृते हि माम्।
मद्दोषान्मा गमच्छुक्रो देवयानी च मत्कृते ।। २० ।।
शर्मिष्ठा बोली- यदि इस प्रकार देवयानीके लिये ही शुक्राचार्यजी मुझे बुला रहे हैं तो देवयानी जो कुछ चाहती है, वह सब आजसे मैं करूँगी। मेरे अपराधसे शुक्राचार्यजी न जायें और देवयानी भी मेरे कारण अन्यत्र जानेका विचार न करे ।। २० ।।
वैशम्पायन उवाच
ततः कन्यासहस्रेण वृता शिबिकया तदा । पितुर्नियोगात् त्वरिता निश्चक्राम पुरोत्तमात् ।। २१ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! तदनन्तर पिताकी आज्ञासे राजकुमारी शर्मिष्ठा शिबिकापर आरूढ़ हो तुरंत राजधानीसे बाहर निकली। उस समय वह एक सहस्र कन्याओंसे घिरी हुई थी ।। २१ ।।
शर्मिष्ठोवाच
अहं दासीसहस्रेण दासी ते परिचारिका । अनु त्वां तत्र यास्यामि यत्र दास्यति ते पिता ।। २२ ।।
शर्मिष्ठा बोली- देवयानी! मैं एक सहस्र दासियोंके साथ तुम्हारी दासी बनकर सेवा करूँगी और तुम्हारे पिता जहाँ भी तुम्हारा ब्याह करेंगे, वहाँ तुम्हारे साथ चलूँगी ।। २२ ।।
देवयान्युवाच
स्तुवतो दुहिताहं ते याचतः प्रतिगृह्णतः ।
स्तूयमानस्य दुहिता कथं दासी भविष्यसि ।। २३ ।।
देवयानीने कहा-अरी! मैं तो स्तुति करनेवाले और दान लेनेवाले भिक्षुककी पुत्री हूँ और तुम उस बड़े बापकी बेटी हो, जिसकी मेरे पिता स्तुति करते हैं; फिर मेरी दासी बनकर कैसे रहोगी ।। २३ ।।
शर्मिष्ठोवाच
येन केनचिदार्तानां ज्ञातीनां सुखमावहेत्।
अतस्त्वामनुयास्यामि यत्र दास्यति ते पिता ।। २४ ।।
शर्मिष्ठा बोली- जिस किसी उपायसे भी सम्भव हो, अपने विपद्ग्रस्त जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाना चाहिये। अतः तुम्हारे पिता जहाँ तुम्हें देंगे, वहाँ भी मैं तुम्हारे साथ चलूँगी ।। २४ ।।
वैशम्पायन उवाच
प्रतिश्रुते दासभावे दुहित्रा वृषपर्वणः । देवयानी नृपश्रेष्ठ पितरं वाक्यमब्रवीत् ।। २५ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- नृपश्रेष्ठ ! जब वृषपर्वाकी पुत्रीने दासी होनेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब देवयानीने अपने पितासे कहा ।। २५ ।।
देवयान्युवाच
प्रविशामि पुरं तात तुष्टास्मि द्विजसत्तम ।
अमोघं तव विज्ञानमस्ति विद्याबलं च ते ।। २६ ।।
देवयानी बोली-पिताजी ! अब मैं नगरमें प्रवेश करूँगी। द्विजश्रेष्ठ ! अब मुझे विश्वास हो गया कि आपका विज्ञान और आपकी विद्याका बल अमोघ है ।। २६ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तो दुहित्रा स द्विजश्रेष्ठो महायशाः ।
प्रविवेश पुरं हृष्टः पूजितः सर्वदानवैः ।। २७ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! अपनी पुत्री देवयानीके ऐसा कहनेपर महायशस्वी द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्यने समस्त दानवोंसे पूजित एवं प्रसन्न होकर नगरमें प्रवेश किया ।। २७ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्यानेऽशीतितमोऽध्यायः ।।
८० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८० ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
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