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गज़ल #✒ शायरी
✒ शायरी - गज़ल क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता तू छोड़ रहा है तो ख़ता इस में तेरी क्या हर शख़्स मेरा साथ निभा भी नहीं सकता प्यासे रहे जाते हैं ज़माने के सवालात किसके लिए ज़़िंदा हूँ बता भी नहीं सकता ढूँड रहे हैं मेरा रातों के पुजारी घर मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता वैसे तो इक आँसू ही बहा कर मुझे लेे जाए ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता वसीम बरेलवी Moiivational Vicleos Appl Want गज़ल क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता तू छोड़ रहा है तो ख़ता इस में तेरी क्या हर शख़्स मेरा साथ निभा भी नहीं सकता प्यासे रहे जाते हैं ज़माने के सवालात किसके लिए ज़़िंदा हूँ बता भी नहीं सकता ढूँड रहे हैं मेरा रातों के पुजारी घर मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता वैसे तो इक आँसू ही बहा कर मुझे लेे जाए ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता वसीम बरेलवी Moiivational Vicleos Appl Want - ShareChat