#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣2️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
शततमोऽध्यायः
शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 312)
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(सूतं भूयोऽपि संतप्त आह्वयामास वै पितुः ।। सूतस्तु कुरुमुख्यस्य उपयातस्तदाज्ञया । तमुवाच महाप्राज्ञो भीष्मो वै सारथिं पितुः ।।
उसके बाद भी दुःखसे दुःखी देवव्रतने पिताके सारथिको बुलाया। राजकुमारकी आज्ञा पाकर कुरुराज शान्तनुका सारथि उनके पास आया। तब महाप्राज्ञ भीष्मने पिताके सारथिसे पूछा।
भीष्म उवाच
त्वं सारथे पितुर्मह्यं सखासि रथयुग् यतः । अपि जानासि यदि वै कस्यां भावो नृपस्य तु ।।
यथा वक्ष्यसि मे पृष्टः करिष्ये न तदन्यथा ।
भीष्म बोले-सारथे ! तुम मेरे पिताके सखा हो, क्योंकि उनका रथ जोतनेवाले हो। क्या तुम जानते हो कि महाराजका अनुराग किस स्त्रीमें है? मेरे पूछनेपर तुम जैसा कहोगे, वैसा ही करूँगा, उसके विपरीत नहीं करूँगा।
सूत उवाच
दाशकन्या नरश्रेष्ठ तत्र भावः पितुर्गतः । वृतः स नरदेवेन तदा वचनमब्रवीत् ।।
योऽस्यां पुमान् भवेद् गर्भः स राजा त्वदनन्तरम् । नाकामयत तं दातुं पिता तव वरं तदा ।।
स चापि निश्चयस्तस्य न च दद्यामतोऽन्यथा । एवं ते कथितं वीर कुरुष्व यदनन्तरम् ।।)
सूत बोला- नरश्रेष्ठ ! एक धीवरकी कन्या है, उसीके प्रति आपके पिताका अनुराग हो गया है। महाराजने धीवरसे उस कन्याको माँगा भी था, परंतु उस समय उसने यह शर्त रखी कि 'इसके गर्भसे जो पुत्र हो, वही आपके बाद राजा होना चाहिये।' आपके पिताजीके मनमें धीवरको ऐसा वर देनेकी इच्छा नहीं हुई। इधर उसका भी पक्का निश्चय है कि यह शर्त स्वीकार किये बिना मैं अपनी कन्या नहीं दूँगा। वीर! यही वृत्तान्त है, जो मैंने आपसे निवेदन कर दिया। इसके बाद आप जैसा उचित समझें, वैसा करें।
ततो देवव्रतो वृद्धेः क्षत्रियैः सहितस्तदा ।
अभिगम्य दाशराजं कन्यां वने पितुः स्वयम् ।। ७५ ।।
यह सुनकर कुमार देवव्रतने उस समय बूढ़े क्षत्रियोंके साथ निषादराजके पास जाकर स्वयं अपने पिताके लिये उसकी कन्या माँगी ।। ७५ ।।
तं दाशः प्रतिजग्राह विधिवत् प्रतिपूज्य च।
अब्रवीच्चैनमासीनं राजसंसदि भारत ।। ७६ ।।
भारत ! उस समय निषादने उनका बड़ा सत्कार किया और विधिपूर्वक पूजा करके आसनपर बैठनेके पश्चात् साथ आये हुए क्षत्रियोंकी मण्डलीमें दाशराजने उनसे कहा ।। ७६ ।।
दाश उवाच
(राज्यशुल्का प्रदातव्या कन्येयं याचतां वर । अपत्यं यद् भवेत् तस्याः स राजास्तु पितुः परम् ।।)
दाशराज बोला- याचकोंमें श्रेष्ठ राजकुमार! इस कन्याको देनेमें मैंने राज्यको ही शुल्क रखा है। इसके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हो, वही पिताके बाद राजा हो।
त्वमेव नाथः पर्याप्तः शान्तनोर्भरतर्षभ ।
पुत्रः शस्त्रभृतां श्रेष्ठः किं तु वक्ष्यामि ते वचः ।। ७७ ।।
भरतर्षभ ! राजा शान्तनुके पुत्र अकेले आप ही सबकी रक्षाके लिये पर्याप्त हैं। शस्त्रधारियोंमें आप सबसे श्रेष्ठ समझे जाते हैं; परंतु तो भी मैं अपनी बात आपके सामने रखूँगा ।। ७७ ।।
को हि सम्बन्धकं श्लाघ्यमीप्सितं यौनमीदृशम् ।
अतिक्रामन्न तप्येत साक्षादपि शतक्रतुः ।। ७८ ।।
ऐसे मनोऽनुकूल और स्पृहणीय उत्तम विवाह-सम्बन्धको ठुकराकर कौन ऐसा मनुष्य होगा जिसके मनमें संताप न हो? भले ही वह साक्षात् इन्द्र ही क्यों न हो ।। ७८ ।।
अपत्यं चैतदार्यस्य यो युष्माकं समो गुणैः।
यस्य शुक्रात् सत्यवती सम्भूता वरवर्णिनी ।। ७९ ।।
यह कन्या एक आर्य पुरुषकी संतान है, जो गुणोंमें आपलोगोंके ही समान हैं और जिनके वीर्यसे इस सुन्दरी सत्यवतीका जन्म हुआ है ।। ७९ ।।
तेन मे बहुशस्तात पिता ते परिकीर्तितः ।
अर्हः सत्यवतीं बोढुं धर्मज्ञः स नराधिपः ।। ८० ।।
तात ! उन्होंने अनेक बार मुझसे आपके पिताके विषयमें चर्चा की थी। वे कहते थे, सत्यवतीको ब्याहनेयोग्य तो केवल धर्मज्ञ राजा शान्तनु ही हैं ।। ८० ।।
अर्थितश्चापि राजर्षिः प्रत्याख्यातः पुरा मया । स चाप्यासीत् सत्यवत्या भृशमर्थी महायशाः ।। ८१ ।।
कन्यापितृत्वात् किंचित् तु वक्ष्यामि त्वां नराधिप ।
बलवत्सपत्नतामत्र दोषं पश्यामि केवलम् ।। ८२ ।।
महान् कीर्तिवाले राजर्षि शान्तनु सत्यवतीको पहले भी बहुत आग्रहपूर्वक माँग चुके हैं; किंतु उनके माँगनेपर भी मैंने उनकी बात अस्वीकार कर दी थी। युवराज ! मैं कन्याका पिता होनेके कारण कुछ आपसे भी कहूँगा ही। आपके यहाँ जो सम्बन्ध हो रहा है, उसमें मुझे केवल एक दोष दिखायी देता है, बलवान्के साथ शत्रुता ।। ८१-८२ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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