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ऋषि अष्टावक्र की कहानी 👌 ऋषि अष्टावक्र का शरीर जन्म से ही कई स्थानों से टेढ़ा-मेढ़ा था। बाहरी रूप से वे साधारण या सुंदर नहीं दिखाई देते थे, लेकिन उनके भीतर अद्भुत ज्ञान और आत्मबल का प्रकाश था। एक दिन वे विदेह नरेश राजा जनक की सभा में पहुँचे। जैसे ही सभा के लोगों की दृष्टि उन पर पड़ी, उनके असामान्य शरीर को देखकर कई लोग हँस पड़े। यह देखकर ऋषि अष्टावक्र बिना कुछ कहे सभा से बाहर जाने लगे। राजा जनक यह देखकर चकित हो गए और आदरपूर्वक बोले— “भगवन! आप लौट क्यों रहे हैं? कृपया बताइए।” ऋषि अष्टावक्र ने शांत स्वर में उत्तर दिया— “राजन, जहाँ विवेक नहीं होता, वहाँ बैठना मैं उचित नहीं समझता। मैं मूर्खों की सभा में नहीं रुक सकता।” यह सुनकर सभा के कुछ लोग क्रोधित हो गए। उनमें से एक ने कटु शब्दों में कहा— “हम मूर्ख क्यों हुए? आपका शरीर ही ऐसा है, तो हँसने में हमारी क्या गलती?” ऋषि अष्टावक्र मुस्कुराए और बोले— “तुम यह नहीं समझ पा रहे कि तुम किसका उपहास कर रहे हो। तुम मेरा नहीं, ईश्वर की रचना का मज़ाक उड़ा रहे हो। मनुष्य का शरीर मिट्टी की उस हांडी के समान है, जिसे ईश्वर रूपी कुम्हार अपने हाथों से बनाता है। यदि हांडी पर हँसा जाए, तो क्या वह कुम्हार का अपमान नहीं होता?” ऋषि के ये वचन सुनते ही सभा में सन्नाटा छा गया। सभी को अपनी भूल का आभास हुआ। लज्जित होकर सभी ने ऋषि अष्टावक्र से क्षमा माँगी। राजा जनक ने भी उन्हें सम्मानपूर्वक आसन दिया और सभा में उनका आदर किया। इस कथा से हमें यह गहरी सीख मिलती है कि हम अक्सर किसी के रंग, रूप, शरीर या पहनावे पर हँसते हैं, लेकिन ऐसा करके हम अनजाने में परमात्मा की बनाई रचना का अपमान करते हैं। मनुष्य की असली पहचान उसका बाहरी रूप नहीं, बल्कि उसके विचार, व्यवहार और संस्कार होते हैं। सुंदर वही है, जिसका मन निर्मल हो और आचरण श्रेष्ठ हो। जय श्री राधे कृष्णा 🙏🌸😊 #पौराणिक कथा
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